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बरसीम की खेती एवं चारा प्रबंधन: पोषण और उत्पादकता का संतुलन

डॉ. ईशांत कुमार सुकदेवे एवं डॉ. ओमप्रकाश

परिचय : बरसीम (ट्राईफोलियम अलेक्जेड्रीनम) एक प्रमुख शीत ऋतु की चारा फसल है, जिसे “चारा फसलों का राजा” भी कहा जाता है। यह दलहनी वर्ग की फसल है और भारत में विशेष रूप से उत्तर भारत, मध्य भारत तथा सिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। बरसीम का उत्पत्ति स्थान मिस्र माना जाता है, जहाँ से यह विश्व के विभिन्न देशों में फैली। भारत में यह पशुपालन आधारित कृषि प्रणाली का एक महत्वपूर्ण घटक है, क्योंकि यह उच्च गुणवत्ता का हरा चारा प्रदान करती है, जिससे दुधारू पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

बरसीम का पौधा बहुवर्षीय प्रकृति का होता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे एक वर्षीय फसल के रूप में उगाया जाता है। इसकी पत्तियाँ कोमल, हरी और अत्यधिक पौष्टिक होती हैं। बरसीम के चारे में प्रोटीन की मात्रा अधिक (लगभग 18–22 प्रतिशत) तथा पाच्यता भी अधिक होती है, जिससे यह पशुओं के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह फसल पशुओं को खिलाने पर स्वास्थ्य में सुधार, दुग्ध उत्पादन में वृद्धि तथा दूध की गुणवत्ता में सुधार करती है।

बरसीम चारे में पोषक तत्वों की मात्रा

क्रम सं. पोषक तत्व मात्रा (औसत मान, % / प्रति किग्रा शुष्क पदार्थ) महत्व
1 शुष्क पदार्थ (Dry Matter) 18–22 % चारे की कुल ठोस मात्रा
2 कच्चा प्रोटीन (Crude Protein) 18–22 % दुग्ध उत्पादन एवं वृद्धि के लिए आवश्यक
3 कच्चा रेशा (Crude Fibre) 22–25 % पाचन क्रिया में सहायक
4 कच्चा वसा (Ether Extract) 2–3 % ऊर्जा का स्रोत
5 नाइट्रोजन मुक्त अर्क (NFE) 40–45 % शीघ्र ऊर्जा प्रदान करता है
6 कुल खनिज तत्व (Total Ash) 8–10 % शरीर की क्रियाओं हेतु आवश्यक
7 कैल्शियम (Ca) 1.2–1.5 % हड्डी निर्माण एवं दूध में कैल्शियम
8 फास्फोरस (P) 0.25–0.35 % ऊर्जा चक्र एवं हड्डी विकास
9 पोटैशियम (K) 2.0–2.5 % द्रव संतुलन एवं एंजाइम क्रिया
10 मैग्नीशियम (Mg) 0.25–0.35 % स्नायु एवं एंजाइम क्रिया
11 सल्फर (S) 0.20–0.25 % प्रोटीन संश्लेषण में

चारा प्रबंधन : बरसीम का प्रसार केवल बीजों द्वारा किया जाता है तथा इसकी बुवाई सामान्यतः प्रारंभिक शरद ऋतु में की जाती है। इसे पारंपरिक रूप से तैयार किए गए बीजशैय्या में या प्रत्यक्ष ड्रिल विधि द्वारा भी बोया जा सकता है। बरसीम की बुवाई अकेले भी की जा सकती है अथवा इसे अन्य फसल प्रजातियों के साथ मिश्रित रूप में उगाया जा सकता है।

उच्च गुणवत्ता की साइलेंज तैयार करने के लिए बरसीम को घास वर्ग की फसलों, विशेषकर राईग्रास, या शीतकालीन अनाज फसलों जैसे जई के साथ मिलाकर बोया जाता है। बरसीम को धान-गेहूँ फसल चक्र में भी सफलतापूर्वक सम्मिलित किया जा सकता है, जहाँ यह शीत एवं वसंत ऋतु के दौरान चारे की फसल के रूप में कार्य करती है। ऐसी स्थिति में इसकी बुवाई धान की कटाई से पहले या तुरंत बाद की जाती है।

हरा चारा (Green Forage) : बरसीम एक उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा है। इसकी पहली कटाई बुवाई के 50 से 60 दिनों बाद तथा इसके बाद प्रत्येक 30–40 दिनों के अंतराल पर की जानी चाहिए। लगभग 40 सेमी ऊँचाई पर पौधे की कटाई करने से प्रोटीन की अधिकतम उपज प्राप्त होती है, जबकि रेशा (फाइबर) की मात्रा अपेक्षाकृत कम रहती है। सिंचित परिस्थितियों में बरसीम से 5–6 कटाइयाँ ली जा सकती हैं, जबकि असिंचित क्षेत्रों में शीत ऋतु के अंत तक 1–2 कटाइयाँ संभव होती हैं।

सूखा चारा / हे : बरसीम का उपयोग हे (सूखा चारा) बनाने के लिए अधिक उपयुक्त नहीं माना जाता है, क्योंकि इसके रसदार तने आसानी से नहीं सूखते। यदि बरसीम से हे तैयार करना हो, तो केवल वसंत ऋतु की अंतिम कटाई का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि उस समय पौधे अपेक्षाकृत अधिक शुष्क होते हैं। हे बनाने के लिए बरसीम को खेत में कुछ समय तक मुरझाने देना तथा बाद में छतों पर सुखाना भी उपयोगी पाया गया है।

साइलेंज (Silage) : बरसीम को 20 प्रतिशत पिसे हुए मक्का के साथ मिलाकर उच्च गुणवत्ता की साइलेंज तैयार की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, बरसीम से 5 प्रतिशत शीरा मिलाकर भी साइलेंज बनाना संभव है, जिससे साइलेंज की गुणवत्ता एवं किण्वन प्रक्रिया में सुधार होता है।

लोकप्रिय किस्में और उनकी उपज

बीएल 1: यह तेजी से बढ़ने वाली और मध्यम अवधि की किस्म है। इसमें अधिक अंकुर निकलते हैं। यह मई के अंतिम सप्ताह तक हरा चारा देती है। प्रति एकड़ लगभग 380 क्विंटल हरा चारा प्राप्त होता है।

बीएल 10 (1983): इस किस्म का विकास काल लंबा होता है और यह जून के मध्य तक हरा चारा प्रदान करती है। इसका बीज छोटा होता है। इसमें तना सड़न के प्रति मध्यम प्रतिरोधक क्षमता होती है। इसका पोषण मूल्य उच्च होता है और पशु इसे स्वेच्छा से खाते हैं। यह प्रति एकड़ लगभग 410 क्विंटल हरा चारा पैदा करती है। जून के अंतिम सप्ताह में इसकी बीज फसल पक जाती है।

बीएल 42 (2003): यह तेजी से बढ़ने वाली किस्म है जो प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक अंकुर उत्पन्न करती है। यह तना सड़न रोग के रोगजनक के प्रति प्रतिरोधी है। इसका पोषण मूल्य अधिक है। यह जून के पहले सप्ताह तक हरा चारा प्रदान करती है, प्रति एकड़ लगभग 440 क्विंटल हरा चारा और उच्च बीज उत्पादन देती है।

बीएल 43 (2017): यह एक लंबी, तेजी से बढ़ने वाली किस्म है जिसमें अधिक संख्या में टहनियाँ होती हैं। जून के पहले सप्ताह तक, यह प्रति एकड़ लगभग 390 क्विंटल हरा चारा प्रदान करती है और उच्च बीज उपज देती है।

बीएल 44 (2021): यह किस्म तेजी से बढ़ती है और इसमें प्रचुर मात्रा में अंकुर होते हैं। तना सड़न के प्रति इसमें मध्यम प्रतिरोधक क्षमता है। इसमें असाधारण पोषण गुणवत्ता है, विशेष रूप से इन विट्रो में शुष्क पदार्थ की पाचन क्षमता के संदर्भ में। यह प्रति एकड़ 395 क्विंटल हरा चारा पैदा करती है और जून के पहले सप्ताह तक हरा चारा उपलब्ध कराती है।

मेस्कावी: यह किस्म मिस्र से लाई गई है और फिर हिसार स्थित एचएयू में इसका चयन किया गया। भारत के सभी बरसीम उत्पादक क्षेत्रों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में इसकी खेती की अनुशंसा की जाती है। इसके पौधे झाड़ीनुमा और सीधे बढ़ते हैं, जिनकी ऊंचाई 45-75 सेंटीमीटर तक होती है और इनमें प्रचुर मात्रा में शाखाएँ निकलती हैं।

मौसम एवं जलवायु : बरसीम की खेती के लिए ठंडी एवं आर्द्र जलवायु अच्छी वृद्धि होती है। इसके लिए 15–25°C तापमान उपयुक्त माना जाता है। यह फसल पाले के प्रति संवेदनशील होती है, इसलिए अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में इसकी उपज प्रभावित हो सकती है। बरसीम की बुवाई सामान्यतः अक्टूबर से नवंबर के मध्य की जाती है।

उपयुक्त मृदा : बरसीम के लिए उपजाऊ, दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी, जिसमें जलधारण क्षमता अच्छी हो, सर्वाधिक उपयुक्त होती है। मिट्टी का pH 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। इसकी बुवाई के लिए 20–25 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। बीज को बुवाई से पूर्व राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना लाभदायक होता है, जिससे नत्रजन स्थिरीकरण की क्षमता बढ़ती है। बरसीम एक दलहनी फसल होने के कारण वायुमंडलीय नत्रजन को स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार करती है। बुवाई के लिए समतल भूमि का उपयोग करें ताकि फसल की वृद्धि के दौरान जलभराव की स्थिति उत्पन्न न हो। प्रत्येक जुताई के बाद समतलीकरण करें।

सिंचाई : हल्की मिट्टी में 3 से 5 दिनों के भीतर और भारी मिट्टी में 6-8 दिनों के भीतर पहली सिंचाई करें। शेष सिंचाई गर्मियों में 8-10 दिनों के अंतराल पर और सर्दियों में 10-15 दिनों के अंतराल पर करनी चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन : बरसीम में नाइट्रोजन की आवश्यकता कम होती है, लेकिन फास्फोरस और पोटाश की उचित मात्रा देने से अच्छी वृद्धि और अधिक चारा प्राप्त होता है। सामान्यतः 20–25 किग्रा नाइट्रोजन, 60–80 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देना लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त सल्फर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी उपज और गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक होते हैं।

कीट नियंत्रण :

टिड्डी: यह पत्तियों को खाकर फसलों को नुकसान पहुंचाती है। यह मुख्य रूप से मई-जून महीने में पाई जाती है। यदि टिड्डी का प्रकोप दिखाई दे, तो प्रति एकड़ 80-100 लीटर पानी में 500 मिलीलीटर मैलाथियन 50 ईसी मिलाकर फसल पर छिड़काव करें। छिड़काव के बाद सात दिनों तक पशुओं को चारा न खिलाएं।

चना कीट: टमाटर, चना और देर से बोई गई गेहूं की फसलों के आसपास फसलें उगाने से बचें। यदि कीटों का प्रकोप दिखाई दे, तो क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5 एसएल @ 50 मिलीलीटर या स्पिनोसाड 48 एससी @ 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से 80-100 लीटर पानी में मिलाकर नैपसैक स्प्रेयर की सहायता से छिड़काव करें।

उपज : बुवाई के 55-60 दिनों बाद फसल पहली कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद की कटाई सर्दियों और वसंत ऋतु में 30 दिनों के अंतराल पर की जाती है। मई के मध्य तक कुल 5-6 कटाई प्राप्त की जा सकती हैं। कुल उपज 500-600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। बीज प्राप्त करने के लिए, फरवरी के बाद खेतों को बिना काटे छोड़ दिया जाता है और इस स्थिति में 4-5 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त किए जा सकते हैं। टेट्राप्लॉइड बरसीम को उच्च उपज वाली किस्म माना जाता है।

References

Göhl, B. (1982). Tropical feeds: Feeds information summaries and nutritive values. Food and Agriculture Organization of the United Nations.

Suttie, J. M. (1999). Berseem (Trifolium alexandrinum L.). Food and Agriculture Organization of the United Nations. (FAO Plant Production and Protection Series)

Shaug, S. P., SuePea, P., & Ahmed, A. M. (2000). Quality evaluation of berseem–maize mixed silage. Journal of Animal Nutrition and Feed Technology, 10(2), 145–152.

Gaafar, H. M. A., Mohi El-Din, A. M. A., & Basiouni, M. I. (2011). Nutritional evaluation of berseem silage treated with molasses. Egyptian Journal of Sheep and Goat Sciences, 6(1), 21–32.

 

लेखक :
डॉ
. ईशांत कुमार सुकदेवे, विषय वस्तु विशेषज्ञ, कृषि विस्तार, कृषि विज्ञान केंद्र, दंतेवाड़ा
डॉ. ओमप्रकाश, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, दंतेवाड़ा

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