कृषि

यूरिया का विकल्प: नील हरित काई से टिकाऊ खेती की नई राह

कम लागत, बेहतर उत्पादन और स्वस्थ मिट्टी के लिए जैविक विकल्प अपनाएं किसान

आज के आधुनिक कृषि युग में रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, का अत्यधिक उपयोग मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। लगातार बढ़ती लागत और घटती मिट्टी की गुणवत्ता के बीच किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प की आवश्यकता महसूस की जा रही है। ऐसे में नील हरित काई (Blue-Green Algae – BGA) एक प्रभावी, सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल समाधान के रूप में उभर रही है।
क्या है नील हरित काई?
नील हरित काई वास्तव में सूक्ष्म जीव (सायनोबैक्टीरिया) होते हैं, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को स्थिर (Nitrogen Fixation) कर मिट्टी में उपलब्ध कराते हैं। यह प्राकृतिक प्रक्रिया फसलों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखती है।
धान की खेती में विशेष लाभ
धान के खेतों में नील हरित काई का उपयोग अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुआ है। इसके प्रयोग से लगभग 20–30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक नाइट्रोजन की पूर्ति संभव है, जिससे यूरिया की आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
मुख्य फायदे (Highlight Box)
✔ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम
✔ मिट्टी की उर्वरता और संरचना में सुधार
✔ सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि
✔ जल धारण क्षमता बढ़ती है
✔ पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल और जैविक
उपयोग की विधि
धान के खेत में पानी भरने के बाद 10–15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नील हरित काई का छिड़काव करें। कुछ ही दिनों में यह तेजी से फैलकर खेत की सतह पर हरी परत बना लेती है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया शुरू कर देती है।
महत्वपूर्ण सलाह
नील हरित काई यूरिया का पूर्ण विकल्प नहीं है, लेकिन इसके नियमित उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की मात्रा में काफी कमी लाई जा सकती है। इसे समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के तहत अपनाना अधिक लाभकारी होता है।
निष्कर्ष
आज के समय में टिकाऊ और लाभकारी खेती के लिए जरूरी है कि किसान रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करें और जैविक विकल्पों को अपनाएं। नील हरित काई न केवल लागत घटाती है, बल्कि मिट्टी और पर्यावरण की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाती है।
✍ लेखक:
डॉ. तरुण कुमार कैवर्त
कृषि सूक्ष्मजीव विज्ञान विशेषज्ञ
ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी

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