छत्तीसगढ़ में नाफेड खरीद प्रणाली: एक कृषि अर्थशास्त्री का समकालीन दृष्टिकोण
नीलम सिन्हा, कृषि अर्थशास्त्री एवं शोधार्थी, कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय


भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) केवल एक घोषित मूल्य नहीं, बल्कि किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र है। किंतु MSP की वास्तविक प्रभावशीलता तभी सुनिश्चित होती है जब उसके साथ प्रभावी और समयबद्ध खरीद व्यवस्था जुड़ी हो। इसी संदर्भ में National Agricultural Cooperative Marketing Federation of India Ltd. (नाफेड) की भूमिका विशेष महत्व रखती है, विशेषकर दलहन एवं तिलहन के क्षेत्र में।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ कृषि व्यवस्था लंबे समय से धान-केंद्रित रही है, नाफेड खरीद प्रणाली को केवल एक मूल्य समर्थन नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे कृषि संरचना में परिवर्तन लाने वाले एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। एक कृषि अर्थशास्त्री के रूप में मेरा मानना है कि यह प्रणाली राज्य में फसल विविधीकरण, आय स्थिरता और संसाधन संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करती है।
वर्तमान स्थिति: विस्तार की ओर बढ़ती प्रणाली
वर्ष 2025–26 के परिप्रेक्ष्य में यदि छत्तीसगढ़ में नाफेड खरीद की स्थिति का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह प्रणाली अब प्रारंभिक चरण से निकलकर विस्तार के दौर में प्रवेश कर चुकी है। राज्य में दलहन की MSP आधारित खरीद धीरे-धीरे गति पकड़ रही है। हजारों किसानों ने चना, मसूर जैसे फसलों के लिए पंजीयन कराया है और कई जिलों में खरीद केंद्र स्थापित किए गए हैं। सहकारी समितियों (PACS) के माध्यम से खरीद संचालन किया जा रहा है, जिससे संस्थागत पहुँच मजबूत हो रही है।
हालाँकि कुल खरीद मात्रा अभी राज्य के कुल उत्पादन की तुलना में सीमित है, फिर भी यह एक सकारात्मक संकेत है कि किसान अब धान के अतिरिक्त अन्य फसलों की ओर भी ध्यान देने लगे हैं। यह परिवर्तन भले ही धीमा हो, लेकिन नीति की दिशा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
MSP और नाफेड: सिद्धांत और व्यवहार का अंतर
सैद्धांतिक रूप से MSP किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी प्रदान करता है, लेकिन व्यवहार में यह तभी प्रभावी होता है जब सरकारी एजेंसियाँ सक्रिय रूप से बाजार में हस्तक्षेप करें। धान और गेहूँ के लिए यह भूमिका खाद्य निगम निभाता है, जबकि दलहन एवं तिलहन के लिए नाफेड जिम्मेदार है।
छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक MSP का लाभ मुख्यतः धान उत्पादकों तक सीमित रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि कृषि प्रणाली में असंतुलन उत्पन्न हो गया—फसल विविधता कम हुई, जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा और किसानों की आय में जोखिम बना रहा। नाफेड द्वारा दलहन एवं तिलहन की खरीद इस असंतुलन को सुधारने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
फसल विविधीकरण: क्या वास्तव में बदलाव संभव है?
छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” कहा जाता है, और यह उपाधि इसकी कृषि संरचना को दर्शाती है। MSP और सुनिश्चित खरीद ने धान की खेती को अत्यधिक प्रोत्साहित किया है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या नाफेड खरीद इस प्रवृत्ति को बदल सकती है।
एक कृषि अर्थशास्त्री के रूप में मेरा आकलन है कि—
- नाफेड खरीद किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर आकर्षित करने का प्रोत्साहन तंत्र (incentive mechanism) प्रदान करती है
- दलहन एवं तिलहन की MSP पर खरीद से किसानों का जोखिम कम होता है
- दीर्घकाल में यह नीति फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे सकती है
हालाँकि, यह परिवर्तन स्वतः नहीं होगा। इसके लिए खरीद प्रणाली का विस्तार, जागरूकता और बाजार ढाँचे का सुदृढ़ीकरण आवश्यक है।
आर्थिक दृष्टिकोण: नाफेड खरीद का व्यापक प्रभाव
नाफेड खरीद प्रणाली का प्रभाव केवल मूल्य समर्थन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि अर्थव्यवस्था के कई पहलुओं को प्रभावित करती है।
- मूल्य स्थिरीकरण और आय सुरक्षा
दलहन एवं तिलहन की कीमतें अत्यधिक अस्थिर होती हैं। नाफेड द्वारा MSP पर खरीद किसानों को मूल्य जोखिम से बचाती है और आय में स्थिरता लाती है।
- बाजार हस्तक्षेप
नाफेड एक counter-cyclical mechanism के रूप में कार्य करता है। जब बाजार में कीमतें गिरती हैं, तो यह खरीद कर मांग को बढ़ाता है, जिससे कीमतें संतुलित होती हैं।
- संसाधन संरक्षण
धान की तुलना में दलहन कम पानी का उपयोग करते हैं और मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं। इस प्रकार, नाफेड खरीद का प्रभाव पर्यावरणीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।
चुनौतियाँ: जमीनी हकीकत
हालाँकि नाफेड खरीद प्रणाली की दिशा सकारात्मक है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक चुनौतियाँ सामने आती हैं—
- सीमित पहुँच – सभी किसानों तक खरीद केंद्रों की पहुँच नहीं है
- पंजीयन की जटिलता – कई किसान समय पर पंजीयन नहीं कर पाते
- गुणवत्ता मानक (FAQ) – उपज अस्वीकृति की समस्या
- भुगतान में देरी – नकदी प्रवाह प्रभावित होता है
- अवसंरचना की कमी – भंडारण एवं लॉजिस्टिक्स कमजोर हैं
- क्षेत्रीय असमानता – कुछ जिलों में ही अधिक सक्रियता
ये समस्याएँ यह संकेत देती हैं कि नीति और क्रियान्वयन के बीच अभी भी अंतर मौजूद है।
नीति के स्तर पर सुधार की आवश्यकता
यदि नाफेड खरीद को वास्तव में प्रभावी बनाना है, तो इसे केवल “खरीद कार्यक्रम” के रूप में नहीं बल्कि “कृषि विकास रणनीति” के रूप में लागू करना होगा। इसके लिए—
- खरीद केंद्रों का विकेंद्रीकरण और विस्तार
- डिजिटल पंजीयन एवं भुगतान प्रणाली का सुदृढ़ीकरण
- भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं का विकास
- किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की भागीदारी
- दलहन एवं तिलहन की मूल्य श्रृंखला का निर्माण
जैसे कदम आवश्यक हैं।
निष्कर्ष: संभावनाओं से वास्तविकता तक
छत्तीसगढ़ में नाफेड खरीद प्रणाली वर्तमान में एक संक्रमणकालीन अवस्था में है। यह न तो पूरी तरह विकसित है और न ही केवल प्रारंभिक प्रयोग तक सीमित है। यह एक ऐसी नीति है जिसमें अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन इन संभावनाओं को साकार करने के लिए व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण आवश्यक है।
एक कृषि अर्थशास्त्री के रूप में मेरा स्पष्ट मत है कि—
नाफेड खरीद प्रणाली को केवल अल्पकालिक मूल्य समर्थन के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक कृषि परिवर्तन के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए।
यदि इसे सही दिशा, पर्याप्त संसाधन और प्रभावी क्रियान्वयन मिले, तो यह छत्तीसगढ़ की धान-केंद्रित कृषि को एक संतुलित, विविधीकृत और टिकाऊ कृषि प्रणाली में परिवर्तित कर सकती है।









