सहजन (मुनगा) की वैज्ञानिक खेती
युगलकिशोर लोधी, जितेंद्र त्रिवेदी, प्रवीण शर्मा, अरविंद कुमार जंघेल एवं संगीता चन्द्राकर


सहजन (Moringa) भारतीय मूल का मोरिंगेसी परिवार का सदस्य है। इसका वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलीफेरा है। सामान्यतया यह एक बहुवर्षीय, कमजोर तना और छोटी-छोटी पत्तियों वाला लगभग दस मीटर से भी ऊँचा पौधा होता है। सहजन किसानों के लिए एक बहुवर्षिय सब्जी देने वाला जाना पहचाना पौधा है। गाँव देहात में सहजन बिना किसी विशेष देखभाल के किसान अपने घरों के आसपास दो एक पेड़ लगाकर रखते हैं जिसके फल का उपयोग वे साल में एक बार जाड़े के दिनों में सब्जी के रूप में करते हैं। सहजन का फूल, छोटा-नन्हा कोमल सहजन से लेकर बड़ा और मोआ सहजन भी ऊँचे दामों में बिकता है। सहजन के बीज से तेल भी निकाला जाता है। बीज को उबालकर सुखाने और फिर पाउड़र बनाकर विदेशों में निर्यात भी किया जा रहा है। सहजन में औषधीय गुण प्रचुर मात्रा में है और इसके पौधे के सभी भागों का उपयोग विभिन्न कार्यो में किया जाता है।
जलवायु- इसकी वृद्धि के लिए गर्म और नमीयुक्त जलवायु और पुष्पन के लिए सूखा मौसम सटीक है। सामान्यतया 25-300 के औसत तापमान पर सहजन के पौधा का हरा-भरा व काफी फैलने वाला विकास होता है। यह ठंढ़ को भी सहता है परन्तु पाला से पौधे को नुकसान होता है। पुष्पन के समय 400 से ज्यादा तापमान पर फूल झड़ने लगता है।
मिट्टी – सभी प्रकार की मिट्टियों में सहजन की खेती की जा सकती है। यहाँ तक कि बेकार, बंजर और कम उर्वरा भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है, परन्तु व्यवसायिक खेती के लिए साल में दो बार फलने वाले सहजन के प्रभेदों के लिए 6-7.5 पी.एच. मान वाली बलुई दोमट मिट्टी बेहतर पाया गया है।
किस्में:
रोहित 1: इसका गुदा मुलायम, स्वादिस्ट होता है और इसकी गुणवत्ता भी बहुत अच्छी है। एक पौधे से करीब तीन से दस किलो तक सहजन मिल सकता है और 10 साल तक व्यावसायिक उत्पादन होता रहता है। एक साल में दो फसल देता है। सहजन की छड़ी गहरे हरे रंग की 45 से 60 इंच की होती है।
कोयम्बटूर 2 : इसकी छड़ी की लंबाई 25 से 35 सेमी होती है। छड़ी का रंग गहरा हरा और स्वादिस्ट होता है। प्रत्येक पौधा करीब 250 से 375 छड़ी पैदा करता है। इसकी प्रत्येक छड़ी भारी और गुदेदार होती है।
पी.के.एम 1 : साल में दो बार इसकी फसल होती है। इसके पौधे से करीब 200 से 350 छड़ी पैदा होती है। यह 8 से 10 साल तक उपज देती है। इसकी प्रत्येक छड़ी लंबाई में बड़ी होती है ।
पी.के.एम 2 रू इस किस्म की कच्ची छड़ी का रंग हरा होता है और स्वादिस्ट होता है। प्रत्येक छड़ी की लंबाई 45 से 75 सेमी होती है। प्रत्येक पौधा करीब 300 से 400 छड़ी पैदा करता है। यह किस्म अच्छी किस्म की फसल पैदा करता है लेकिन इसमे ज्यादा पानी की जरूरत होती है।
प्रवर्धन- सहजन में बीज और शाखा के टुकड़ों दोनों से ही प्रबर्द्धन होता है। लेकिन अच्छी फलन और साल में दो बार फलन के लिए बीज से प्रबर्द्धन करना अच्छा है। एक हेक्टेयर में खेती करने के लिए 500 ग्राम बीज पर्याप्त है। बीज को सीधे तैयार गड्ढों में या फिर पॉलीथीन बैग में तैयार कर गड्ढों में लगाया जा सकता है।
नर्सरी – सहजन की खेती में अगर आप नर्सरी में उगाये पौधे का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो 18 सेमी की ऊंचाई और 12 सेमी की चौड़ाई वाले पॉली बैग का इस्तेमाल करें। बैग के लिए मिट्टी का मिश्रण हल्का होना चाहिए, उदाहरण के तौर पर तीन भाग मिट्टी और एक भाग बालू। प्रत्येक बैग में एक से दो सेमी गहराई में दो या तीन बीज लगाएं। अंकुरण होने के बाद बैग से अतिरिक्त पौधा निकाल दें और एक पौधा प्रत्येक बैग में छोड़ दें। जब पौधे की लंबाई 50 से 90 सेमी हो जाए तब उसे बाहर लगा सकते हैं। पौधे को बाहर लगाने से पहले बैग की तलहटी में इतना बड़ा छेद बना दें ताकि उसकी जड़ें बाहर निकल सके। इस बात का ध्यान रखें कि पौधे के जड़ के आसपास मिट्टी अच्छी तरह लगा दें।
भूमि की तैयारी – जमीन की पहले अच्छे से जुताई कर खरपतवार मुक्त कर लें। बीजारोपन से पहले 50 x 50 x 50 सेमी लम्बा, चौडा व गहरा गड्ढा 3 x 3 मीटर के अन्तर पर खोद लें। गड्ढे के उपरी मिट्टी के साथ 10 किलोग्राम सड़ा हुआ गोबर का खाद मिलाकर गड्ढे को भर देते हैं। ऊपरी मिट्टी में लाभकारी जीवाणु होते हैं जो जड़ की वृद्धि को तेजी से बढ़ावा दे सकते हैं। गड्ढे में पौध रोपन के लिए अच्छी बारिश का इंतजार करें और उसके बाद जुलाई-सितम्बर माह में बैग से पौधा निकाल कर गड्ढे में रोप दें। शुरुआत के कुछ दिनों तक ज्यादा पानी नहीं दें। अगर पौधा गिरता है तो उसे एक 40-50 सेमी छड़ी के सहारे बांध दें।
सीधा पौधारोपन – अगर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो तो मकान के पिछले हिस्से में पूरे साल मुनगा के बीज को सीधे लगाया और बढ़ाया जा सकता है। सबसे पहले पौधारोपन के लिए 50 x 50 x 50 सेमी लम्बा, चौडा व गहरा गड्ढा तैयार करें, पानी डालें और पौधारोपन से पहले कम्पोस्ट या खाद से मिश्रित उपरी मिट्टी को गड्ढे में डाल दें। नमी वाले मौसम में बड़े खेत में पेड़ को सीधे लगाया जा सकता है।
कलम (कटिंग) से प्रवर्धन – कलम लगाने के लिए हरी लकड़ी को छोड़कर कठोर लकड़ी लें। कलम की लंबाई 45 सेमी से 1.5 मीटर लंबा और 1.5 सेमी मोटा होना चाहिए। कलम को सीधे लगाया जा सकता है या फिर नर्सरी में थैले में लगाया जा सकता है। कलम का सीधा पौधारोपण रोशनी वाली जगह और बलुई मिट्टी में करें। पौधे का एक तिहाई हिस्सा जमीन में लगाएं (जैसे कि अगर कलम की लंबाई 1.5 मी है तो 50 सेमी मिट्टी में दबाएं)। ज्यादा पानी भी नहीं डालें क्योंकि मिट्टी अगर ज्यादा भीगा और पानी भारी रहा तो जडे़ सड़ सकती है। जब कलम को नर्सरी में लगाया जाता है तो जड़ का विकास धीरे-धीरे होता है। अगर संभव हो तो जड़ के विकास को बढ़ावा देने के लिए मिट्टी में फॉस्फोरस मिलाएं। नर्सरी में लगाए गए कलम को दो या तीन महीने बाद खेत में लगाया जा सकता है।
खाद और ऊर्वरक – आमतौर पर सहजन का पेड़ बिना ज्यादा ऊर्वरक के ही अच्छी तरह से तैयार हो जाता है। पौधारोपन से 8 से 10 दिन पहले प्रति पौधा 8 से 10 किलो सड़ा हुआ गोबर का खाद डाला जाना चाहिए। रोपन के तीन महीने के बाद दिसंबर में 100 ग्राम यूरिया 100 ग्राम सुपर फास्फेट ़ 50 ग्राम पोटाश प्रति गड्ढा की दर से डालें तथा इसके तीन महीने बाद अप्रैल में 100 ग्राम यूरिया प्रति गड्ढा का पुनरू व्यवहार करें। अथवा पौधारोपन के दौरान जुलाई-सितंबर में प्रति हेक्टेयर 50-50 किलो नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटास डाला जाना चाहिए। प्रत्येक छह महीने के अंतराल पर जुलाई-सितंबर व अप्रैल माह में तीनों की इतनी ही मात्रा पौधे में डाली जानी चाहिए। उर्वरक खुराक फसल की आवश्यकता के अनुसार प्रति वर्ष 500 ग्राम की दर से वृद्धि हो सकती है। सहजन पर किए गए शोध से यह पाया गया कि मात्र 15 किलोग्राम गोबर की खाद प्रति गड्ढा तथा एजोसपिरिलम और पी.एस.बी. (5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) के प्रयोग से जैविक सहजन की खेती, उपज में बिना किसी ह्रास के किया जा सकता है।
सिंचाई – अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई करना लाभदायक है। सहजन के पेड़ तभी फूल और फल देता है जब पर्याप्त पानी उपलब्ध होता है। फूल लगने के समय खेत ज्यादा सूखा या ज्यादा गीला रहने पर दोनों ही अवस्था में फूल के झड़ने की समस्या होती है। सूखे मौसम में प्रत्येक दो सप्ताह में एक बार सिंचाई की जरूरत होती है। वहीं, व्यावसायिक खेती में सिंचाई की ड्रिप तकनीक का सहारा लिया जा सकता है जिसके तहत गर्मी के मौसम में प्रति पेड़, प्रतिदिन 12 से 16 लीटर पानी दिया जा सकता और अन्य मौसम में ये मात्रा घटकर सीधे आधी रह जाती है।
फरवरी महीने के बाद सिंचाई बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि पत्ते गिर जाते हैं और मई माह तक आराम की आवश्यकता होती है। अधिक फूल लाने के लिए तनाव देते है जिसके लिए नवंबर-दिसंबर के महीनों के दौरान सिंचाई 1 से 20 अक्तूबर तक रोका जाना चाहिए। फूल के बाद से फली के गठन तक, 10-20 दिन के अंतराल में पानी दिया जाना चाहिए ।
पेड़ की कंटाई-छंटाई – पेड़ की कटाई-छटाई का काम पौधारोपण के एक या डेढ़ साल बाद ठंडे मौसम में की जा सकती है। दो फीट की ऊंचाई पर प्रत्येक पेड़ में 3 से 4 शाखाएं छांट सकते हैं।
हानिकारक रोग और कीट –
- डिप्लोडिया रुट रॉट : सहजन अधिकांश कीटों से लड़ने की क्षमता रखता है। जहां ज्यादा पानी जमा होने की स्थिति है वहां डिप्लोडिया रुट रॉट पैदा हो सकता है। भीगी हुई स्थिति में पौधारोपन मिट्टी के ढेर पर किया जाना चाहिए ताकि ज्यादा पानी अपने-आप बह कर निकल जाए।
- केटरपिलर : बरसात के मौसम में अगर कीटनाशकों का छिड़काव नहीं किया जाता है तो केटरपिलर की वजह से पत्ते झड़ने लगते हैं। नियंत्रण के एकमात्र दवा डाइक्लोरोवॉस (नूवान) 0.5 मिली. एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करने से तत्काल लाभ मिलता है।
- छाल खाने वाला केटरपिलर : डाइक्लोरोवॉस (नूवान) 0.5 मिली. एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करने से तत्काल लाभ मिलता है।
- भुआ पिल्लू नामक कीट : इसके नियंत्रण के लिए सरल उपाय यह है कि जब कीट नवजात अवस्था समूह में एक स्थान पर रहता हैं तब सर्फ को घोलकर अगर इसके ऊपर डाल दिया जाय तो सभी कीट मर जाते हैं। वयस्क अवस्था में जब यह सम्पूर्ण पौधों पर फैल जाता है तो एकमात्र दवा डाइक्लोरोवॉस (नूवान) 0.5 मिली. एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करने से तत्काल लाभ मिलता है।
- फल मक्खी : इस कीट के नियंत्रण हेतु भी डाइक्लोरोवॉस (नूवान) 0.5 मिली. दवा एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने पर कीट का नियंत्रण होता है।
तुड़ाई – फली को तभी तोड़ लिया जाना चाहिए जब वो कच्चा (करीब एक सेमी मोटा) हो और आसानी से टूट जाता हो। साल में दो बार फल देने वाले सहजन की किस्मों की तुड़ाई सामान्यतया फरवरी-मार्च और सितम्बर-अक्टूबर में होती है। प्रत्येक पौधे से लगभग 200-400 (40-50 किलोग्राम) सहजन सालभर में प्राप्त हो जाता है। सहजन की तुड़ाई बाजार और मात्रा के अनुसार 1-2 माह तक चलता है। सहजन के फल में रेशा आने से पहले ही तुड़ाई करने से बाजार में मांग बनी रहती है और इससे लाभ भी ज्यादा मिलता है।
पौधा रोपन के लिए बीज या तेल निकालने के मकसद से फली को पूरी तरह तब तक सूखने देना चाहिए जब तक कि वो भूरा ना हो जाए। कुछ मामलों में ऐसा जरूरी हो जाता है कि जब एक ही शाखा में कई सारी फलियां लगी होती है तो उसे टूटने से बचाने के लिए सहारा देना पड़ता है। फलियों के फटने और उनके पेड़ से गिरने से पहले उन्हें तोड़ लेना चाहिए।
उपज – फसल की पैदावार मुख्य तौर पर बीज के प्रकार और किस्म पर निर्भर करता है। सहजन की पैदावार प्रति हेक्टेयर 50 से 55 टन हो सकती है (220 फली प्रति पेड़ एक साल में)।









