रेशम उत्पादन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार
मनीषा टंडन एवं डॉ सुनील कुमार


कच्चा रेशम (Silk) बनने के लिए रेशम के कीटो का पालन सेरीकल्चर या रेशमकीट पालन कहलाता है। रेशम उत्पादन कृशि आधारित एक कुटीर उद्योग है, रेशम 3 जिसमे बड़ी मात्रा में रेशम प्राप्त करने के लिए रेशमकीट पालन किया जाता है। कच्चा रेशम एक धागा होता है जिसे कुछ विशेश कीटो द्वारा काटे गए कोकुनोे से प्राप्त किया जाता है| केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने रेशम उद्योग के विकास के लिए एकीकृत योजना को मंजूरी दी है। इससे 2020 तक आय गुणवत्ता वाले रेशम (बाइवोल्टाइन) के उत्पादन में 62% की वृद्धि होने का अनुमान है । केन्द्रीय वस्त्र मंत्रालय के मुताबिक भारत 2020 तक रेशम उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया है मल्टीवोल्टाइन रेशम पीले रंग की होती है और इसे वर्श भर प्राप्त किया जा सकता है। बाइवोल्टाइन रेशम सफेद रंग का होता है और यह बहुत ही नरम होता है इसे सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला रेशम माना जाता है । भारत में केन्द्री रेशम अनुसंधान प्रक्शेत्र बलरामपुर में 1943 में स्थापित किया गया था। रेशम उद्योग को बढ़ावा देने के लिए 1949 में रेशम बोर्ड की स्थापना की गई थी। केन्द्रीय पूरी अनुसंधान संस्थान मेें दिपाधर (मेघालय) में एवं केन्द्रीय टसर अनुसंधान प्रशिक्शण संस्थान रांची (झारखण्ड) मेे स्थित है।
प्रमुख बिन्दु
- सरकार का लक्श्य रेशम क्शेत्रो में कार्यरत लोगो की संख्या को 85 लाख से बढ़ाकर अगले तीन वर्शों में एक करोड़ करना है इस क्शेत्र में 50,000 लोगो को प्रशिक्शण प्रदान किया जाएगा।
- वस्त्र मंत्रालय के अन्तर्गत संबंधित मंत्रालयो की एक अंतर मंत्रालयी समिति गठित की जायेगी जो शोध और विकास के लिए 1000 करोड़ स्वंय की धन राशि संतितरित करेगी।
- डिजिटल इण्डिया के अंतर्गत बीज उत्पादन तथा अन्य गतिविधियों में संलग्न किसानों को समाधान उपलब्ध कराऐ जाएगे।
- किसान और बीज उत्पादको को प्रत्यक्श लाभ हस्तांतरण के जरिए सब्सिडी को सोधा भुगतान किया जाएगा।
- बाजार के विकास हेतु देश के प्रमुख रेशम उत्पादक राज्यो में 21 कोकुन परिक्शण केन्द्रो की स्थापना की जा रही है |
- एकल किसानो एवं रेशम उत्पादको द्वारा अवसंरचना की विकास की केन्द्र सरकार द्वारा वित्तीय रूप से सहायता की जाएगी जो लागत का 50% तक वहन करेगी।
- अनुसूचित जाति एव अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित लाभार्थियो के लिए केन्द्र सरकार लागत का 65% वहन करेगी।
- पूर्वोत्तर राज्यो, जम्मू व कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ के लाभर्थियो के मामले में केन्द्र सरकार लागत का 80% वहन करेगी ।
रेशम क्या है
रेशम रसायन की भाशा में रेशमकीट के रूप में विख्यात इल्ली द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता हैें । रेशमकीट कुछ विशेश खाद्य पौधो पर पलते है तथा अपने जीवन कोे बनाए रखने के लिए सुरक्शा कवच के रूप में कोकून का निर्माण करते है । रेशम कीट का जीवन चक्र 4 चरणो अण्डा (Egg), इल्ली (calexpiller), प्यूपा (Pupa), तथा शलभ (malh) से निर्मित होता है । रेशम प्राप्त करने के लिए इसके जीवन चक्र में कोकून दो चरण पर अवरोध डाला जाता है जिससे व्यावसायिक महत्व का तंतु (Silk) निकाला जाता है तथा इसका इस्तेमाल वस्त्र की बुनाई में किया जाता है। कच्चा रेशम उत्पादन कृशि आधारित एक धागा होता है जिसे कुछ विशेश कीटो द्वारा काटे गए कोकुनो से प्राप्त किया जाता हैं।
विश्व का 90% से भी अधिक रेशम एशिया में उत्पादित होता है । व्यावसायिक महत्व के दृश्टिकोण से रेशम की कुल 5 किस्में होती है जो रेशमकीट की विभिन्न प्रजातियो से प्राप्त होती है और विभिन्न खाद्य पौधो पर पलती है ये किस्मे निम्नलिखित है:-
- शहतूत (Mulberry)
- ओेक टसर (Oat Tasar)
- उश्मकटिबंधीय टसर (Trapical Tasar)
- मूगा (Muga)
- एरी (Eri)
भारत में इन सभी प्रकार के वाणिज्यिक रेशम का उत्पादन होता है। रेशम उत्पादन के मामले में भारत चीन के बाद द्वितीय स्थान पर है और साथ ही भारत विश्व में रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है ।भारत में शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्ययता कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तथा उत्तर पूर्वी राज्यो में होता हैं वर्तमान में 26 रेशम उत्पादक एवं उपभोक्ता राज्यो में से केवल 19 के पास ही अलग विभाग या रेशम कीट पालन निदेशालय है ।
भारत रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता होने के कारण साथ-साथ पांच किस्मों के रेशम-मलबरी, टसर, ओक टसर, इरी औैर मूंगा सिल्क का उत्पादन करने वाला अकेला देश है और यह चीन से बड़ी मात्रा में मलबरी कच्चे सिल्क और रेशमी वस्त्रो का आयात करता है। भारत में कुल रेशम उत्पादन में से मलबरी किस्म के रेशम का उत्पादन 89% इरी किस्म के रेशम का उत्पादन 8.6% टसर किस्म के रेशम का 2% तथा मूंग किस्म के रेशम का उत्पादन 0.4% होता है। विश्व के कुल रेशम उत्पादन में भारत का हिस्सा 18% है। देश के कुल रेशम उत्पादन का लगभग 50% कर्नाटक में होता है, इसके बाद क्रमशः आध्रंप्रदेश तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का नम्बर आता है। भारत के कुल कपड़ा निर्यात में रेशमी वस्त्रो को हिस्सा 3% है। रेशम उद्योग पर्यावरण के लिए लाभकारी होने के साथ-साथ पैशन उद्योग के लिए भी बहुत लाभकारी है।
रेशम उत्पादन के मुख्य कार्य- कलापो में रेशम कीटो के आहार के लिए खा़द्य पौध कृशि तथा कीटो द्वारा बुने हएु कोकुनो से रेशम तंतु निकालना इसका प्रसस्कंरण तथा बुनाई आदि की प्रक्रिया सन्निहित हैं।
रेशम उत्पादन मेंए रेशमकीट पालन की प्रक्रिया मादा रेशम कीट द्वारा अंडे देने से शुरू होती है। आमतौर पर एक मादा रेशम कीट से 300-500 अंडे प्राप्त होते हैं। इन अंडों को (कागजध/कार्डबोर्ड शीट पर रखकर) 2% फॉर्मेलिन घोल की मदद से कीटाणुरहित किया जाता है। एक पालन.पोशण ट्रे पर कटी हुई शहतूत की पत्तियाँ छिड़क कर एक आहार बिस्तर तैयार किया जाता है। अंडे से निकले लार्वा को ब्रशिंग नामक प्रक्रिया के माध्यम से इस ट्रे में स्थानांतरित किया जाता है। नमी बनाए रखने के लिए फोम स्ट्रिप्स को पानी में भिगोकर ट्रे पर रखा जाता है। रेशमकीट के लार्वा को शुरू में अच्छी भूख लगती है। जैसे.जैसे वे बढ़ते हैंए सक्रिय अवस्था तक उनकी भूख धीरे.धीरे कम होती जाती है। इस अवस्था मेंए रेशमकीट अपने अंतिम भोजन चरण तक उत्साहपूर्वक खाता है। परिपक्वता तक पहुंचने के बादए लार्वा अपना पुतला बनाना शुरू करने के लिए मेहमाननवाज़ स्थानों की तलाश शुरू कर देते हैं। इस अवस्था में रेशमकीट का शरीर सिकुड़ जाता है और पारदर्शी हो जाता है। ये परिपक्व लार्वा अब अपने सिर पर दो लार ग्रंथियों से लार स्रावित करके खुद को कोकून में लपेट लेते हैं। हवा के संपर्क में आने पर यह लार जम जाती है और रेशम बन जाती है। सामान्यतः कोकून 2-3 दिनों में कात जाता है। हालाँकिए रेशमकीटों की कुछ किस्मों को अपना कोकून बनाने में 4 दिन तक का समय लग सकता है।
रेशम रीलिंग
कोकून के अंदर लार्वा कायापलट से गुजरता है और प्यूपा में बदल जाता है। इन कोकून से रेशम की कटाई रेशम उत्पादन का अंतिम चरण है। सबसे पहलेए कोकून को उबालकर और इसे भाप और सूखी गर्मी में रखकर कोकून के अंदर के प्यूपा को मार दिया जाता है। इस प्रक्रिया को स्टिफ़लिंग कहा जाता है। अबए रेशम के रेशों को रीलिंग नामक प्रक्रिया के माध्यम से मृत कोकून से हटा दिया जाता है। जब कोकून को लगभग 15 मिनट तक उबलते पानी में रखा जाता हैए तो रेशम के धागों का आसंजन कम हो जाता हैए जिससे अलग.अलग तंतु अलग हो जाते हैं। इन फिलामेंट्स को गाइड और पुली की एक श्रृंखला की मदद से एक धागे में घुमाया जाता है। इस रेशम की चमक बढ़ाने के लिए इसे दोबारा उबाला जाता है।
रेशम के एक धागे में लगभग 50 रेशम के तंतु होते हैं। हालाँकिए एक कोकून से 900 मीटर से अधिक फिलामेंट प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकारए रेशमकीट से कच्चा रेशम प्राप्त किया जाता है और रेशम उत्पादन की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
रेशम के उत्पादन के लाभ
- रोजगार सृजन की पर्याप्त क्षमता
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार
- कम समय में अधिक आय
- महिलाओ के अनुकूल व्यवसाय
- समाज के कमजोर वर्ग के लिए आदर्श कार्यक्रम
- पर्यावरण अनुकूल कार्यकलाप
- समानता संबंधी मुददो की पूर्ति










