अफ्रीकन स्वाइन फीवर: खाद्य सुरक्षा तथा जैव विविधता के लिए खतरा
देवेश कुमार गिरी एवं दीपक कुमार कश्यप


भारत में सूअर पालन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पूर्वोत्तर राज्यों में यह गतिविधि छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय का प्रमुख साधन है। भारत में सूअर पालन न केवल रोजगार बल्कि पोषण सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में सूअर पालन महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- यह कम लागत में शुरू किया जा सकता है
- सूअर तेजी से बढ़ते हैं और जल्दी आय देते हैं
- घर के बचे हुए भोजन (किचन वेस्ट) का उपयोग किया जा सकता है
- गरीब और भूमिहीन किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है
- पोषण (प्रोटीन) का अच्छा स्रोत है
अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) एक अत्यधिक संक्रामक और जानलेवा वायरल रक्तस्रावी बीमारी है, जो घरेलू और जंगली सूअरों को प्रभावित करती है। विश्वभर में फैले एएसएफ ने पारिवारिक सूअर फार्मों को तबाह कर दिया है, जो अक्सर लोगों की आजीविका का मुख्य आधार और सामाजिक उन्नति का एक अहम ज़रिया होते हैं। इसने स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक पहुंच के अवसरों को भी सीमित कर दिया है। इसके अलावा, सूअर का मांस पशु प्रोटीन के प्राथमिक स्रोतों में से एक है, जो वैश्विक मांस सेवन का 35% से अधिक हिस्सा है इसलिए, यह बीमारी विश्व स्तर पर खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर समस्या पैदा करती है। यह बीमारी जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि यह न केवल घरेलू रूप से पाले गए सूअरों को प्रभावित करती है, बल्कि देशी नस्लों सहित जंगली सूअरों को भी प्रभावित करती है
अफ्रीकी स्वाइन फीवर क्या है?
अफ्रीकी स्वाइन फीवर घरेलू और जंगली सूअरों की एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है, जिसकी मृत्यु दर 100% तक पहुंच सकती है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है, लेकिन इसका सूअरों की आबादी और कृषि अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
यह वायरस पर्यावरण में अत्यधिक प्रतिरोधक क्षमता रखता है, जिसका अर्थ है कि यह कपड़ों, जूतों, पहियों और अन्य सामग्रियों पर जीवित रह सकता है। यह विभिन्न प्रकार के सूअर के मांस उत्पादों, जैसे कि हैम, सॉसेज या बेकन में भी जीवित रह सकता है। इसलिए, यदि पर्याप्त उपाय नहीं किए गए तो मानव व्यवहार इस सूअर रोग को सीमाओं के पार फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अफ्रीकी स्वाइन फीवर, विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (OIE) के पशु स्वास्थ्य कोड में सूचीबद्ध एक बीमारी है।
कारक
अफ्रीकन स्वाइन फीवर एक वायरल बीमारी है, जो अफ्रीकन स्वाइन फीवर वायरस के कारण होती है। यह वायरस एस्फारविरिडे परिवार का सदस्य है और डीएनए वायरस होता है। यह बहुत मजबूत (प्रतिरोधी) होता है तथा मांस, खून और वातावरण में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। यह रोग रक्तस्रावी (हेमरेजिक) प्रकृति का होता है, जिसमें सूअरों में तेज बुखार, आंतरिक रक्तस्राव और उच्च मृत्यु दर (90–100%) देखने को मिलती है।
भारत में बीमारी का इतिहास
भारत में अफ्रीकन स्वाइन फीवर का पहला प्रकोप वर्ष 2020 में अरुणाचल प्रदेश और असम में दर्ज किया गया। इसके बाद यह बीमारी तेजी से पूर्वोत्तर राज्यों में फैल गई और धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों जैसे सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, केरल, गोवा, महाराष्ट्र आदि में भी फैलने लगी। हाल के वर्षों (2024–2025) में इस बीमारी के कई नए प्रकोप सामने आए हैं, जिनमें मिजोरम, असम, केरल और कर्नाटक प्रमुख हैं। इन प्रकोपों के कारण हजारों सूअरों की मृत्यु हुई और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। वर्तमान में यह बीमारी भारत के कई क्षेत्रों में स्थायी रूप लेने की ओर बढ़ रही है। अप्रैल 2026 में, छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के मुड़पार गांव के एक फार्म में अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) का प्रकोप सामने आया है, जहां 400 से ज्यादा सूअरों की मौत के बाद प्रशासन ने 1 किमी के क्षेत्र को सील कर दिया है और एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं।
फैलने के तरीके
(A) प्रत्यक्ष संचरण
- संक्रमित सूअर से स्वस्थ सूअर
- खून, लार, मल, मूत्र के संपर्क से
(B) अप्रत्यक्ष संचरण
- संक्रमित मांस या मांस उत्पाद
- दूषित चारा, पानी, उपकरण
- कपड़े, वाहन, फार्म सामग्री
(C) जैविक वाहक
- सॉफ्ट टिक (Ornithodoros spp.)
(D) मानव गतिविधियाँ
- सूअरों का परिवहन
- अवैध मांस व्यापार
मुख्य लक्षण
- बीमारी के लक्षण तथा मृत्यु दर वायरस की क्षमता तथा सुअर की प्रजातियों के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।
- तीव्र रूप में सूअर का तापमान उच्च (5 डिग्री सेल्सियस या 105 डिग्री फरेनहाइट) होता है, फिर यह सुस्त हो जाते हैं और अपना भोजन छोड़ देते हैं।
- अन्य महत्वपूर्ण लक्षणों में:
- उल्टी
- दस्त (कभी-कभी खूनी)
- त्वचा में रक्तस्राव (कान, पेट और पैरों पर आदि की त्वचा का लाल होना)
- त्वचा का लाल होना या काला पड़ना, विशेष रूप से कान और थूथन
- श्रमसाध्य साँस लेना और खाँसना
- गर्भपात, मृत जन्म और कमज़ोर बच्चे
- कमजोरी और खड़े होने में असमर्थता
रोकथाम और नियंत्रण
अभी तक ASF का कोई सुरक्षित और प्रभावी इलाज या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस “किलर डिजीज” से बचाव ही सबसे जरूरी है।
बायो-सिक्योरिटी
- संक्रमित क्षेत्र की अच्छी तरह से सफाई (पानी से) और कीटाणुशोधन (कीटाणुशोधन 2% सोडियम या कैल्शियम हाइपोक्लोराइट/सोडियम हाइड्रॉक्साइड या डिटर्जेंट-आधारित विषाणुनाशक एजेंट से किया जा सकता है)
- फार्म में बाहरी लोगों की एंट्री सीमित करें
- जूते, कपड़े और उपकरण सैनिटाइज करें
- वाहन नियंत्रण रखें
रोग नियंत्रण उपाय
- बीमार सूअरों को तुरंत अलग करें
- सभी संक्रमित और संपर्क में आए सूअरों को तुरंत मारना
- शवों, बिछौने और बचे हुए भोजन का उचित निपटान करना आवश्यक है। इन सभी चीज़ों को आस-पास ही गहराई में दफना देना चाहिए, और ऊपर से चूना और नमक की परत डाल देनी चाहिए; इन्हें दूर की जगहों पर नहीं ले जाना चाहिए ताकि इनके गिरने या फैलने का खतरा न रहे
- प्रभावित क्षेत्र में क्वारंटाइन लागू करें
- पशुओं के आवागमन पर रोक लगाएं
निगरानी और रिपोर्टिंग/ संदेह होने पर क्या करें?
पशु स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच इस बीमारी के बारे में जागरूकता पैदा करना, उन्हें बीमारी की शुरुआती पहचान, संदिग्ध नैदानिक नमूनों को इकट्ठा करने और भेजने का प्रशिक्षण देना, और निकटतम पशु चिकित्सक/ औषधालय को सूचित करना, स्वास्थ्य-देखभाल प्रणाली के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम हैं।
- सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करें
- तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक या पशुपालन विभाग को सूचित करें
- संक्रमित सूअरों को बेचने या स्थानांतरित करने से बचें
- फार्म को अस्थायी रूप से बंद करें
- संक्रमित या संदिग्ध सूअरों के शवों को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट करें।
- सूअर पालन फार्मों में स्वच्छता बनाए रखें और बाहरी लोगों का प्रवेश रोकें।
निष्कर्ष
सूअर पालन ग्रामीण भारत और विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के लिए आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन अफ्रीकन स्वाइन फीवर जैसी खतरनाक बीमारी इस क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। इसलिए किसानों को जागरूक रहना, सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन, सही प्रबंधन अपनाना और समय पर कार्रवाई करना अत्यंत आवश्यक है।
लेखक
देवेश कुमार गिरी एवं दीपक कुमार कश्यप
वेटनरी पॉलिटेक्निक
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग छत्तीसगढ़









