पशुपालन

बस्तर के सामाजिक- आर्थिक रूपांतरण में महिला जनित ‘श्वेत क्रांति’ की भूमिका

डॉ. देवेश कुमार गिरी, डॉ. नितेश कुमार कुंभकार, डॉ. भूपिका देवांगन, डॉ. प्रतिभा ताटी एवं डॉ. कशिश अफरीन आलम

किसी भी विकासशील ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन, विशेषकर डेयरी क्षेत्र, आजीविका सुरक्षा और कुपोषण उन्मूलन का एक सशक्त माध्यम होता है। छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल और वन-आच्छादित क्षेत्र बस्तर पारंपरिक रूप से धान की खेती और लघु वनोपज (जैसे महुआ, इमली, तोरा) पर निर्भर रहा है। भौगोलिक विषमताओं और ऐतिहासिक रूप से नक्सलवाद से प्रभावित होने के कारण यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था लंबे समय तक सीमित रही। वनोपज का संग्रहण मौसम आधारित होने के कारण ग्रामीणों के पास वर्षभर नियमित आय का अभाव रहता था।परंतु, हाल के वर्षों में बस्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक युगांतकारी बदलाव देखा जा रहा है। इस बदलाव के केंद्र में हैं—बस्तर की ग्रामीण और आदिवासी महिलाएं। स्थानीय महिलाओं ने पारंपरिक सोच को तोड़कर डेयरी (दुग्ध उत्पादन) क्षेत्र को एक व्यावसायिक रूप देना शुरू किया है। यह विस्तार पत्र विश्लेषण करता है कि कैसे महिला स्वयं सहायता समूहों, नवीन सरकारी नीतियों और राष्ट्रीय सहयोग के समन्वय से बस्तर में एक संगठित ‘श्वेत क्रांति’ का सूत्रपात हो रहा है।

बस्तर के डेयरी क्षेत्र में महिलाओं के संस्थागत प्रयास

बस्तर में दुग्ध विज्ञान और डेयरी को एक संगठित उद्योग बनाने के लिए महिलाओं को संस्थागत रूप से मजबूत किया गया है:

स्व-सहायता समूहों का नेतृत्व: राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) और ‘लखपति दीदी योजना’ के अंतर्गत बस्तर की महिलाओं को स्व-सहायता समूहों में संगठित किया गया है। इन समूहों के माध्यम से महिलाएं अब सिर्फ पारिवारिक उपभोग के लिए दूध नहीं निकालतीं, बल्कि सामूहिक रूप से दुग्ध व्यवसाय का प्रबंधन संभाल रही हैं।

वित्तीय आत्मनिर्भरता और ऋण प्रबंधन: डेयरी क्षेत्र में उतरने से महिलाओं में वित्तीय साक्षरता का विकास हुआ है। समूह के माध्यम से महिलाएं बैंकों से संस्थागत ऋण लेकर उन्नत नस्ल के मवेशी खरीद रही हैं, जिससे वे साहूकारों के चंगुल से मुक्त हुई हैं।

नवीन रणनीतिक पहल एवं बुनियादी ढांचा

बस्तर के दुर्गम और अंदरूनी इलाकों तक डेयरी क्षेत्र का विस्तार करने के लिए सरकार और जिला प्रशासन ने कई विशिष्ट रणनीतियां अपनाई हैं:

क. “एक गाय, एक भैंस” वितरण नीति पारंपरिक रूप से बस्तर के आदिवासी परिवारों के पास कम दूध देने वाले स्थानीय मवेशी होते थे, जिनका उपयोग केवल घरेलू स्तर पर होता था। इस समस्या को दूर करने के लिए प्रत्येक चिन्हित आदिवासी महिला/परिवार को एक उन्नत नस्ल की गाय और एक भैंस उपलब्ध कराई जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को पहले ही दिन से व्यावसायिक दुग्ध उत्पादन की मुख्यधारा से जोड़ना है।

ख. ‘वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा’ मॉडल क्षेत्र में सुरक्षा परिदृश्य में आए सुधार के बाद, सुरक्षा बलों के पुराने और अतिरिक्त कैंपों का पुनरुत्पादन किया जा रहा है। ऐसे 70 कैंपों को ‘वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा’ केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है। प्रत्येक ‘सेवा डेरा’ केंद्र में एक प्राथमिक कृषि साख समिति और एक विलेज डेयरी की सह-स्थापना की जा रही है। ये केंद्र ग्रामीण महिलाओं के लिए सबसे नजदीकी दूध संग्रह केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जिससे परिवहन की लागत और बिचौलियों का शोषण पूरी तरह समाप्त हो गया है।

तकनीकी कौशल, सहकारिता एवं वैश्विक विपणन

उत्पादन को सही बाजार और सही मूल्य दिलाने के लिए बस्तर के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक और सहकारिता से जोड़ा गया है:

[आदिवासी महिला उत्पादक] ➔ [विलेज डेयरी / सेवा डेरा केंद्र] ➔ [प्राथमिक कृषि साख समिति / सहकारी नेटवर्क] ➔ [NDDB / अमूल (AMUL) विपणन]

कौशल विकास और प्रशिक्षण

‘बिहान’ योजना के तहत ९०,००० से अधिक युवाओं और महिलाओं को वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन, पशुओं के नियमित टीकाकरण, संतुलित पशु आहार (हरे चारे की व्यवस्था) और स्वच्छ दुग्ध निष्कासन का विशेष व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया है।राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) से समन्वय: छत्तीसगढ़ सरकार ने NDDB और अमूल (AMUL) जैसे राष्ट्रीय सहकारी ढांचों के साथ समझौता किया है। बस्तर की महिलाओं द्वारा उत्पादित दूध को आधुनिक तरीके से प्रोसेस करके राष्ट्रव्यापी बाजारों तक पहुँचाने की मुकम्मल व्यवस्था की गई है।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव एवं परिणाम

डेयरी क्षेत्र में महिलाओं के इस बढ़ते कदम के बस्तर के ग्रामीण परिवेश पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिले हैं:

प्रभाव का क्षेत्र बदलाव की स्थिति (पहले बनाम अब)
आय की निरंतरता पहले केवल मौसमी वनोपज पर निर्भरता थी; अब वर्ष के ३६५ दिन नियमित नकद आय प्राप्त हो रही है।
आय वृद्धि का लक्ष्य इस डेयरी नेटवर्क के माध्यम से अगले ५ वर्षों में आदिवासी परिवारों की आय को ६ गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
निर्णय लेने की क्षमता दूध की बिक्री से होने वाली आय सीधे महिलाओं के बैंक खातों में आती है, जिससे परिवार के स्वास्थ्य, पोषण, और बच्चों (विशेषकर बेटियों) की उच्च शिक्षा से जुड़े निर्णयों में उनकी भागीदारी और स्वायत्तता बढ़ी है।
लैंगिक समानता आर्थिक स्वायत्तता के कारण महिलाओं की आवाज मजबूत हुई है।

महिलाएं अब केवल गृहणी या खेतिहर मजदूर नहीं हैं; वे एक संगठित ग्रामीण उद्योग की संचालक हैं।

निष्कर्ष

बस्तर के डेयरी क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी केवल आर्थिक सुदृढ़ीकरण की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक गहरे सामाजिक और संरचनात्मक रूपांतरण का जीवंत प्रतीक है। पारंपरिक रूप से सीमित और मौसमी आजीविका पर निर्भर रहने वाली आदिवासी महिलाएं आज उन्नत पशुपालन, डिजिटल वित्तीय प्रबंधन और सहकारी नेटवर्क (NDDB व अमूल) के माध्यम से संगठित ग्रामीण उद्यमी के रूप में उभर रही हैं।

‘वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा’ और “एक गाय, एक भैंस” जैसी दूरदर्शी योजनाओं ने महिलाओं को निर्णय लेने की क्षमता, पारिवारिक पोषण सुरक्षा और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता प्रदान की है। बंदूक और संघर्ष की ऐतिहासिक छाया को पीछे छोड़ते हुए, बस्तर की ये महिला डेयरी किसान वर्षभर मिलने वाली नियमित आय से न केवल अपने परिवारों का भविष्य संवार रही हैं, बल्कि पूरे वनांचल क्षेत्र को ‘श्वेत क्रांति’ के जरिए स्थायी शांति, समृद्धि और देश के विकास की मुख्यधारा से जोड़ रही हैं।

लेखक :
डॉ. देवेश कुमार गिरी, डॉ. नितेश कुमार कुंभकार, डॉ. भूपिका देवांगन, डॉ. प्रतिभा ताटी एवं डॉ. कशिश अफरीन आलम
वेटनरी पॉलिटेक्निक जगदलपुर
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय,दुर्ग छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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