आधुनिक मशीनों द्वारा धान फसल की बुआई एवं रोपाई, प्रमुख रोग लक्षण एवं उनका प्रबंधन
डॉ. अनुराग पटेल और डॉ. वर्षा उपाध्याय


धान देश की मुख्य खाद्यान फसल है। विश्व मे भारत सबसे अधिक धान उत्पादक देशो मे दूसरा स्थान रखता है। भारत के प्रमुख राज्यो जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा मे मुख्य रूप से इसकी खेती होती है। देश मे धान कि खेती लगभग 43 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल मे होती है। भारत मे खादान उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत धान है तथा देश मे लगभग 75 प्रतिशत लोगो का भोजन भी चावल है। धान फसल का खाद्य सुरक्षा में एक अहम भूमिका है। धान खरीफ की फसल है, जिस तरह धान की फसल हेतु नम एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। ठीक उसी प्रकार से रोगो की बृद्धि एवं प्रजनन हेतु जलवायु की आवश्यकता होती है।
इस कारण धान की फसल पर अनेक रोगो का प्रकोप होता है। इस कारण फसल को कम हानि पहुचाने वाले कीट भी काफी हानि पहुचाने लगते है। आज कल की समस्याएं प्रदूषित वायुमण्डल, बढ़ता हुआ तापमान, कार्बन डाईआक्साइड, भू-क्षरण, मृदा के साथ-साथ पानी स्रोत तथा रोग व खरपतवार से भारत में धान फसल बुरी तरह प्रभावित है। हमारे देष की समस्या खाद्य सुरक्षा के प्रति और जटिल होती जा रही है। इसके विपरीत हमारे प्राकृतिक संसाधनो का लगातार हृास होता चला जा रहा है क्योंकि संसाधनो का समुचित प्रयोग नहीं हो पा रहा है।
हमारी कृषि आज भी पिछड़ी है, क्योंकि आज भी आधुनिक तकनीकी एवं मषीनीकरण की कमी है। देष के किसानों में जागरूकता की कमी है और देष की अधिकांष कृषि लगभग 65 प्रतिशत वर्षा आधारित कृषि हैं और वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र में कृषि कर पाना हमारे लिए भी चुनौती है। बदलते हुए वातावरण में इन सब समस्याओं से निदान पाना हम सब के लिए चुनौती बनती जा रही है। इन सभी समस्याओं में खरपतवार एवं रोग से लगभग 30-70 प्रतिशत धान की फसल क्षतिग्रस्त हो जाती है। फसलों की बुवाई समय से करने पर श्रम, जल, ऊर्जा/ईधन की बचत के साथ-साथ खरपतवारो की संख्या एवं रोगों में कमी तथा अधिक उत्पादन एंव आय परम्परागत विधि की तुलना में अधिक प्राप्त होता है।
इन सभी विषयों को ध्यान में रखते हुए धान की बुआई एवं रोपाई हेतु उपयुक्त मशीनरी तथा उसमें उत्पन्न खरपतवार एवं रोग प्रबन्धन की रोकथाम का लेख में विस्तृत वर्णन किया जा रहा है। धान की फसल विभिन्न विधियों द्वारा उगाई जाती है। यहाॅं पर सिर्फ तीन प्रयोगिक विधि का वर्णन किया जा रहा है।
1. एस.आर.आई पद्वति से धान उगाना
2. धान की सीधी बुआई (एरोबिक्स राइस)
3. स्वचालित मशीन द्वारा धान की रोपाई
एस.आर.आई पद्वति से धान उगाना
एस.आर.आई पद्वति द्वारा धान की नर्सरी
धान की नर्सरी के लिए जल स्रोत के निकट की जगह का चुनाव करते है, कोशिश करते हैं कि मुख्य खेत के पास की जगह हो। 100 वर्गमीटर की नर्सरी 1 हे0 खेत की रोपाई के लिए पर्याप्त होती है। इसके लिए मृदा+ कम्पोस्ट (गोबर की खाद + 1.5 किग्रा. डाई अमोनियम फास्फेट+ 2 किग्रा.एन.पी.के. खाद) का मिक्चर की आवश्यकता होती है। एक लकड़ी का फ्रेम जो 1 मी. लम्बा, 0ं‐5 मी. चौड़ा तथा 4 सेमी. मोटाई के चार भागों सेबना होता है। उस पर पालीथीन शीट रखकर उसमें मिक्चर भरते है। फिर 12 घंटे का भीग¨ये हुए बीेज को 90 से 100 ग्राम मात्रा की दर से अच्छी तरह मिक्चर में मिला देते हैं, तदोपरान्त 5 मिमी. मोटाई के सूखी मृदा से बीज को ढ़क देते हैं उसके तुरन्त बाद हजारे से फुहारे के साथ अच्छी तरह भिगोकर लकड़ी के फ्रेम क¨ हटा देते हैं। आगे की प्रक्रिया इसी तरह चलती रहती हैं। नर्सरी में पानी हजारे द्वारा दिन में 2 या 3 बार डालते हैं तथा वर्षा के पानी से 5-6 दिन तक नर्सरी को बचाये रखते हैं। 10 से 12 दिन की पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।
एस.आर.आई पद्वति द्वारा धान की खेती
एस.आर.आई पद्वति द्वारा बीज व पानी दोनों की काफी बचत होती है क्योंकि 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। जहा पर जल भराव अधिक नहीं होता हैं उस जगह का चुनाव कर इस विधि से धान की खेती करते है। पहले खेत पलेवा कर 4-5 दिन उपरान्त एक-एक पौध को 25 x 25 सेमी. की दूरी पर हाथ द्वारा स्थापित करते हैं। सघन पद्वति से धान उगाने के लिए खेत को नम रखते हैं। ध्यान रहे कि खेत पूरी तरह पानी से भरा नहीं रहना चाहिए और न ही सूखा रहना चाहिए। उसमें हमेषा नमी बनी रहनी चाहिए, जिससे की मृदा जीवाणुओ की अत्यधिक संख्या बढ़ सके खास कर केंचुआ की संख्या, जिसके द्वारा पौधो को वायु संचार के साथ-साथ पोषक तत्व की उपलब्धता बढ़ जाती है, फलस्वरूप पौध की वृद्वि तीव्र हो जाती है उपज 20-25 प्रतिशत अधिक पा्रप्त होती हैं। पोषक तत्वो की मात्रा नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश (120ः60ः60) किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखते है। रोपाई के समय खेत में जल भराव नहीं होना चाहिए। तथा अधिक पानी इकठ्ठा होने पर जल निकास का उचित प्रबन्ध करना चाहिए। आवश्यकतानुसार फसल की सिंचाई करते रहते है। खरपतवार नियंत्रण के लिए पौध की दूरी 25 x 25 सेमी. होने के कारण कोनो बीडर द्वारा (चित्र 1) निराई कर देते है जिससे घास नियंत्रित हो जाती है और फसल की गुड़ाई भी हो जाती है जिसके फलस्वरूप पौध विकास अच्छा होता है और पैदावार भी अच्छी प्राप्त होती है।

धान की सीधी बुआई (एरोबिक्स राइस)
धान की सीधी बुआई
धान की रोपाई विधि से खेती करने मे जो समस्याए आती है, उनका एक ही विकल्प है धान की सीधी बुआई तकनीकी को अपनाना। सीधी बुआई विधि से किसान को खेत को तैयार करने एवं धान की नर्सरी डालने की जरूरत नहीं पड़ती है। खेत मे हल्की सी नमी रहने पर जीरो टिलेज (बिना जुताई) विधि से धान की सीधी बुआई कर देते है। जिससे धान की बुआई मे कम लागत और पानी, श्रम एवं ईधन की बचत होती है। धान की सीधी बुआई तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है।
- सीधी बुआई से 25 से 30 प्रतिशत पानी की बचत होती है क्योकि इस विधि से धान की बुआई करने पर खेत मे लगातार पानी भरने की आवश्यकता नही होती है।
- इस विधि से श्रम एवं समय की बचत होती है क्योकि इस विधि मे रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
- धान की नर्सरी उगाने और रोपाई का खर्च बच जाता है।
- इस तकनीक से रोपाई की तुलना मे ऊर्जा व ईधन की बचत होती है।
- सीधी बुआई से किसान मशीन मे खाद व बीज डालकर आसानी से बुआई कर सकता है।
- रोपाई विधि की तुलना मे सीधी बुआई विधि से धान की खेती करने मे बीज की मात्रा कम लगती है।
- इस विधि से धान की बुआई सीधे खेत मे की जाती है तथा इससे समय, श्रम, संसाधन एवं लागत की बचत होती है।

जीरो टिल ड्रिल मशीन से धान की बुआई
जीरो टिलेज तकनीक की माध्यम सेे खेती की लागत को कम करने, फसलों की बुवाई समय पर करने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। संरक्षित खेती में फसल अवशेषों का अधिंकाश भाग मृदा सतह पर छोड़ दिया जाता है, जिससे न केवल फसल उत्पादकता में वृद्वि होती है बल्कि पर्यावरण में सुधार एंव भूमि की उर्वरा शक्ति में सुधार होता है। जिससे अच्छी नमी में बुवाई की गयी फसलों का जमाव उचित होता है। साथ-साथ सिंचाई में कम पानी की आवश्यकता होती है। जीरो ट्रिल कम फर्टि ड्रिल मशीन (चित्र 2) से धान की बुवाई बिना जुताई के की जाती है। जीरो टिल ड्रिल की प्रमुख निम्न विषेशेताएं है, जीरो टिल ड्रिल के प्रयोग से 75 से 85 प्रतिशत ईंधन, ऊर्जा एवं समय की बचत होती है और खरपतवार का कम जमाव होता है। इस मशीन द्वारा 1 हेक्टेयर प्रति घंटा बुआई की जा सकती है। इस मशीन द्वारा खेत तैयार करने की लागत में 2500 से 3000 रू. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बचत होती है। परंम्परागत विधि की तुलना में शून्य जुताई विधि से करीब रू. 5000-6000 तक शुद्व लाभ प्राप्त होता है।
हैप्पी-टर्बो सीडर मशीन से धान की बुआई
हैप्पी-टर्बो सीडर मशीन ट्रैक्टर के पीटीओ शाफ्ट द्वारा चालित मशीन है। रोटरी ब्लेड की सहायता से खरपतवार को हटा कर बीच मे फरो-ओपनर द्वारा अच्छी तरह से बुवाई करता है। फरो-ओपनर के आगे की फसल अवशेष और खरपतवार को हटा कर लाईनो के बीच मे बुआई करने से, कूड मे बीज एव खाद का समान रूप से तथा उचित गहराई मे पडने से, बीज का जमाव अच्छा होता है। जिससे फसल का पैदावार भी अच्छा होता है। इस मशीन के उपयोग के लिए 35 से 40 अश्व शक्ति के ट्रैक्टर की आवश्यकता होती है। इस मशीन द्वारा बिना जुते खेत में (शून्य कर्षण) में बुवाई की जाती है। इस मशीन में दो इकाईयां होती है आगे की तरफ फसल अवशेष प्रबंधन और पीछे की तरफ बुवाई उपयोगी भाग जिसके माध्यम से खाद और बीज को उचित गहराई (लगभग 5-6 सेमी) पर मिट्टी मे डाला जाता है। इस मशीन से बुआई करने से खरपतवारों मे 15 से 20 प्रतिशत की कमी पाई जाती है। इस मशीन के प्रयोग करने से उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों (ऊर्जा, लेबर, डीजल इत्यादि) में 50-60 प्रतिशत की बचत होती है। इस मशीन का प्रयोग (चित्र 2) करने पर 10-12 लीटर प्रति हेक्टयर डीजल की खपत होती है तथा एक हेक्टयर बुवाई करने में 5-6 घंटे समय की आवश्यकता पडती है। इस मशीन (9-टाईन) की कीमत लगभग रु 1.5 लाख होती है। उपरोक्त जानकारी का सारांश यह है कि मशीनीकरण का उचित उपयोग करके किसान न केवल समय का सद उपयोग कर सकता है अपितु सही समय पर उचित प्रबंधन करके कम लागत से अधिक पैदावार की प्राप्ति कर सकता है। उचित फसल अवशेष का प्रबंधन करके मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को बढावा देने के साथ-साथ पौधों को उपयोगी तत्वों की उपलब्धता करवा कर फसलों की गुणवत्ता तथा मात्रा को बढाना है।
ड्रम सीडर मशीन से धान की बुआई
ड्रम सीडर का प्रयोग सीधे गीले मैदान में अंकुरित धान की बुआई के लिए प्रयोग किया जाता है। प्रत्यारोपण की कोई आवश्यकता नहीं है। यह मैन्युअल रूप से खींचा गया कार्यान्वयन यन्त्र है। इसमें एक समय में 18 सेमी पंक्ति से पंक्ति अंतर की 12 पंक्तियां शामिल होती हैं। यह प्लास्टिक सामग्री से बना है। कृषि क्षेत्र की व्यापक जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से हम सर्वोच्च गुणवत्ता वाले धान ड्रम सीडर की पेशकश में शामिल हैं जो धान की बुआई करने के लिए उपयोग किए जाने वाले बागवानी उपकरण हैं। यह कुशल पेशेवरों की देखरेख में बेहतरीन गुणवत्ता वाले घटकों और तकनीकों का उपयोग करके डिजाइन और निर्मित किया गया है।

ड्रम सीडर मशीन द्वारा धान की बुआई करने के लिए सबसे पहले खेत में पानी भरकर दो से तीन बार पलेवा (गीली जुताई) करके खेत को अच्छी तरह पाटा लगाकर समतल कर लेते है। इसके उपरान्त पलेवा किए हुए खेत को 8 घन्टे के लिए छोड़ देते है। धान की बुआई करने से कम से कम 6 घंटे पहले खेत से पानी को निकलना दे, बुवाई के समय खेत में लगभग 1 सेमी. पानी का केवल पतला लेयर रहना चाहिए। क्योंकि खेत में पानी ज्यादा होने पर बीज पानी के साथ बहने लगते है। बुआई करने से पूर्व बीज को 10 से 12 घंटा भिगोकर पानी से निकल ले, उसके बाद जूट के बोरे में भरकर रख दे या जमीन पर रखकर कपडे से ढक दे, जिससे बीज 10 से 12 घंटे में अंकुरित हो जाए। बीज को ड्रम सीडर के बॉक्स में एक तिहाई भर कर बॉक्स को बंद कर दे इसके पश्चात ड्रम सीडर को सामान्य गति (1 किमी/घंटा) से मैन्युअल रूप (चित्र 3) से खींचें। इस मशीन द्वारा बुवाई दो लेबर द्वारा आसानी से किया जा सकता है। इसके द्वारा ईधन, समय, श्रम, लागत आदि की बचत होती है।

धान की सीधी बुआई मे खरपतवार प्रबंधन
धान की बुआई से पूर्व खरपतवारो का प्रबंधन करना अति आवश्यक है। खरपतवारो को नष्ट करने के लिए खरपतवारनाशी दवाओ का प्रयोग किया जाता है। खरपतवारों को नष्ट करने के लिए पैराक्वाट 500 ग्राम या ग्लाईफोसेट 1 किग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हे0 को 500-600 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए तथा 2-3 दिन के बाद मशीन से बुआई कर देनी चाहिए। धान की बुआई के बाद खरपतवार काफी ज्यादा उगते है। इनके रोकथाम के लिए धान की बुआई के बाद पेन्डीमिथेलिन 1.00 किल¨गा्रम सक्रिय तत्व की दर से 500-600 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव करते समय मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी रहनी चाहिए तथा समान रूप से छिड़काव सारे खेत में करनी चाहिए। ये खरपतवारनाशी खरपतवारों के अंकुरित होते ही मार देती है। बाद में चैड़ी पत्ती वाले खरपतवार या अन्य जैसे मोथा घास के नियंत्रण के लिए आलमिक्स मात्रा 4.00 ग्राम सक्रिय तत्व को 500-600 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से काफी लाभ मिलाता है।
धान के प्रमुख खरपतवार
| खरपतवार के प्रकार | खरपतवार के नाम |
| चैड़ी पत्ती वाले खरपतवार | केना, अमेरिकन घास, भ्रगराज, पत्थर चट्टा, हुरहुर, सफेद मुर्ग, लहसुआ। |
| संकरी पत्ती वाले खरपतवार | बड़ी साई, छोटी साई, मुटमुर, मकड़ा, जंगली मड़ुआ, सियुर, चाइनीज घास, दूब, बसवट। |
| मोथा कुल के खरपतवार | मोथा, गलमोथा, जलमोथा। |
धान के प्रमुख रोग लक्षण एवं उनका प्रबंधन
धान भारतीय खाद्यान्नो मे सबसे महत्वपूर्ण फसल है। धान की फसल व गुड्वत्ता मे कमी आने वाले करको मे रोगो का महत्वपूर्ण स्थान है, जिससे धान के उत्पादन पर भारी प्रभाव पड़ता है। धान की फसल पर लगने वाले कीट रोगो मे प्रमुख रूप से भूरा धब्बा रोग, धान का झुलसा रोग जीवाणु जनित कर्णधारी, कर्ण छन्द, विगलन रोग, आमारी कंड, खैरा व सफेद रोग है, जो धान उत्पादन करने वाले सभी राज्यो मे पाये जाते है।
| रोग | लक्षण | प्रबंधन |
| भूरा धब्बा रोग-
यह रोग बाइपोलेरिस ओराइजो नामक कवक से होता है। यह जनित रोग है। यह रोग पौधो के अवशेषों द्वारा फैलता है। |
इस रोग के लक्षण पत्तियों पर काले से भूरे अंडाकार धब्बे जो पत्ती के बीच मे बनते है। रोग¨ के अधिक प्रभाव के कारण पत्तिया सूख जाती है और दानो पर काले भूरे रंग के धब्बे बन जाते है। |
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| धान का झुलसा रोग यह रोग पाईरिसकुलेरिस नामक कवक से होता है। यह धान की फसल लगने वाले मुख्य रोग है। |
इस रोग के लक्षण प्रायः पत्तियों, तनों व फलो पर पाये जाते है। फसल की रोपाई के 15 दिनों के बाद रोग के लक्षण दिखाई देने लगते है, जो फसल की परिपक्व अवस्था तक देखे जाते है। पत्तियों पर बैगनी रंग के छोटे-छोटे धब्बे बन जाते है। बालियो का ग्रसित भाग टूटकर गिर जाते है। |
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| जीवाणु जर्पण अंगमारी रोग यह रोग जैथोमोनास कंपेसिट्रस्पेथावर अराईजी नामक जीवाणु के द्वारा लगता है। यह बीज व भूमि जनित रोग है। यह रोग धान उगाये जाने वाले सभी क्षेत्रो मे पाया जाता है। |
इस रोग के लक्षण बुआई से 25-30 दिनों के बाद दिखाई देने लगते है। इस रोग के कारण पत्तियों का रंग हल्का पीला हो जाता है और पत्तियों पर लहर दार धारीय बनती है जो पत्तियों के दोनों किनारो से आरम्भ होकर पर्णछन्द तक सूख जाती है। |
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| जीवाणु जनित कर्णधारी रोग यह रोग जेंथोंमोनास कम्पेसिट्रस पैथवार आराइजी नामक जीवाणु के द्वारा फैलता है। |
इस रोग के लक्षण पत्तियों पर पीले मटमैली धारियों के रूप मे प्रकट होते है। ये धारिया आपस मे पत्ती सिराओ से मिल जाती है, जिससे पत्ती का रंग नारंगी हो जाता है और पत्तिया सुख जाती है। |
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| पर्णछ्ंद विघलन रोग यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक कवक से लगता है। यह बीज व मृदा जनित रोग है। |
इस रोग के लक्षण फसल की पोटरी अवस्था मे अधिक दिखाई देते है। इसके कारण पोटरी की निचली सतह पर हल्के भूरे, काले रंग के धब्बे बन जाते है, जो अनियमित आकार के होते है। |
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| आमासी कंड रोग यह रोग नियोवोसिया बारक्लेयाना नामक फफूड से लगता है। यह बीज जनित रोग है। |
छाने स्मट बल मे परिवर्तन हो जाते है। बाल काले रग के पाउडर मे बदल जाते है। जो कवक के समूह से मिलकर बनते है। ऽ सदैव प्रमाणित बीजो का प्रयोग करे। |
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| धान का खैरा रोग यह रोग जिंक तत्व की कमी के कारण होता है। |
यह रोग प्रायः 10 से 15 दिनो बाद दिखाई पड़ता है। ग्रसित पत्तियों पर ताबे रंग के धब्बे बन जाते है। जिससे पौधे बौने रह जाते है तथा जड़ो का विकास भी नहीं होता है। |
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| धान का सफेद रोग यह रोग लोहे की कमी के कारण होता है। |
इस रोग के लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते है। पत्तियों का रंग भूरे से सफेद हो जाते है। |
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निष्कर्षः
धान भारत की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की आधारभूत फसल है तथा देश की कृषि अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। बढ़ते जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण, खरपतवारों, कीटों एवं रोगों की समस्या तथा श्रम की कमी के कारण धान उत्पादन अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसी परिस्थितियों में समय पर बुवाई एवं रोपाई, उपयुक्त कृषि यंत्रीकरण, आधुनिक तकनीकों का उपयोग तथा समेकित खरपतवार एवं रोग प्रबंधन अपनाना अत्यंत आवश्यक है। इन उपायों से श्रम, जल, ऊर्जा एवं उत्पादन लागत में कमी लाने के साथ-साथ फसल की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है। अतः धान उत्पादन को अधिक लाभकारी, टिकाऊ एवं जलवायु-अनुकूल बनाने के लिए उपयुक्त बुवाई एवं रोपाई मशीनों का चयन तथा उनके साथ प्रभावी खरपतवार एवं रोग प्रबंधन तकनीकों का समन्वित उपयोग समय की प्रमुख आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से इस लेख में धान की विभिन्न बुवाई एवं रोपाई विधियों तथा उनसे संबंधित खरपतवार एवं रोग प्रबंधन का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
लेखक :
डॉ. अनुराग पटेल और डॉ. वर्षा उपाध्याय
संजीव अग्रवाल ग्लोबल एजुकेशनल यूनिवर्सिटी, भोपाल
Corresponding auther: 3679anuragpatel@gmail.com










