छत्तीसगढ़ में ड्रैगन फ्रूट की खेती: आर्थिक लाभप्रदता एवं सरकारी अनुदान का विश्लेषण
नीलम सिन्हा, कृषि अर्थशास्त्री एवं शोधार्थी, कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय


बदलती कृषि अर्थव्यवस्था में किसानों के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी फसलों का चयन भी आवश्यक है जिनसे सीमित भूमि और संसाधनों से बेहतर आय प्राप्त की जा सके। छत्तीसगढ़ में धान प्रमुख फसल होने के कारण कृषि विविधीकरण की आवश्यकता लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलें इस दिशा में एक विकल्प प्रदान कर सकती हैं। ड्रैगन फ्रूट (Hylocereus spp.) ऐसी ही एक बहुवर्षीय फल फसल है, जिसकी व्यावसायिक खेती भारत के विभिन्न राज्यों में तेजी से बढ़ रही है। इसकी खेती में शुरुआती निवेश अपेक्षाकृत अधिक होता है, लेकिन बाग स्थापित होने के बाद कई वर्षों तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए इसकी आर्थिक लाभप्रदता का आकलन केवल एक वर्ष की लागत और आय के आधार पर न करके पूरे उत्पादन जीवनकाल को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
ड्रैगन फ्रूट की खेती में शुरुआती निवेश
ड्रैगन फ्रूट की खेती की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका support structure है। पौधों को सामान्यतः concrete poles तथा trellis व्यवस्था पर प्रशिक्षित किया जाता है। इसलिए भूमि की तैयारी और पौध सामग्री के अलावा खंभों, support system तथा सिंचाई व्यवस्था पर भी पर्याप्त निवेश करना पड़ता है। ICAR की तकनीकी जानकारी में 2 × 2 मीटर spacing वाले high-density production system के लिए लगभग 2,500 concrete poles प्रति हेक्टेयर तथा प्रत्येक pole पर चार पौधों की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार plantation density लगभग 10,000 पौधे प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। हालांकि वास्तविक लागत pole की गुणवत्ता, spacing, पौध सामग्री, सिंचाई व्यवस्था और स्थानीय मजदूरी दर के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
ड्रैगन फ्रूट की आर्थिक गणना में establishment cost को अलग से देखना महत्वपूर्ण है। भूमि की तैयारी, पौध सामग्री, support structure, सिंचाई तथा प्रारंभिक श्रम पर किया गया खर्च बाग की शुरुआती लागत का हिस्सा होता है। इसके बाद हर वर्ष pruning, training, खाद एवं उर्वरक, सिंचाई, पौध संरक्षण, निराई-गुड़ाई और harvesting पर खर्च होता है। इस कारण किसान को plantation शुरू करने से पहले उपलब्ध पूंजी, ऋण की आवश्यकता तथा संभावित आय का दीर्घकालीन आकलन करना चाहिए।
उत्पादन बढ़ने के साथ बढ़ती आय
ड्रैगन फ्रूट एक बहुवर्षीय फसल है और इसमें शुरुआती वर्षों में पूर्ण उत्पादन प्राप्त नहीं होता। पौधों के स्थापित होने के साथ उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ता है। ICAR-CIARI के अनुसार अच्छी तरह स्थापित पौधों से लंबे समय तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है और mature plants से प्रति pole लगभग 8–10 kg फल प्राप्त होने की जानकारी दी गई है।
किसान की वास्तविक आय मुख्यतः उत्पादन और उसे प्राप्त होने वाले बिक्री मूल्य पर निर्भर करती है। इसलिए आर्थिक विश्लेषण में केवल बाजार में दिखाई देने वाले retail price को शामिल करना उचित नहीं है। किसान को वास्तव में प्राप्त farm-gate price को आधार बनाना अधिक वैज्ञानिक होगा। यदि किसान सीधे उपभोक्ता, retailers, hotels या अन्य संस्थागत खरीदारों को बेचता है, तो उसे सामान्य wholesale marketing की तुलना में अलग मूल्य प्राप्त हो सकता है।
सकल आय की गणना कुल उत्पादन × किसान को प्राप्त बिक्री मूल्य के आधार पर की जा सकती है। इसके बाद कुल लागत घटाने पर शुद्ध आय प्राप्त होती है। लाभ-लागत अनुपात (B:C ratio) से यह पता चलता है कि एक रुपये की लागत पर किसान को कितनी सकल आय प्राप्त हो रही है। ड्रैगन फ्रूट जैसी perennial crop के लिए इसके साथ payback period भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि शुरुआती वर्षों में लागत अधिक और उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है।
आर्थिक लाभप्रदता का वास्तविक आकलन
ड्रैगन फ्रूट को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने वाला प्रमुख तत्व इसकी बहुवर्षीय प्रकृति है। एक बार support structure और plantation स्थापित हो जाने के बाद उसी संरचना का उपयोग कई वर्षों तक किया जा सकता है। इसलिए शुरुआती लागत को पूरे productive life में फैलाकर देखना चाहिए।
विभिन्न क्षेत्रों में किए गए अध्ययनों में dragon fruit की लाभप्रदता के अलग-अलग परिणाम प्राप्त हुए हैं। इन परिणामों में अंतर उत्पादन तकनीक, मिट्टी, जलवायु, मजदूरी, planting density और बाजार मूल्य के कारण हो सकता है। इसलिए बिहार, महाराष्ट्र या किसी अन्य राज्य में प्राप्त B:C ratio को सीधे छत्तीसगढ़ के किसानों पर लागू करना उचित नहीं होगा। छत्तीसगढ़ में स्थानीय farm-level data के आधार पर cost of cultivation, yield, price, net return तथा payback period का आकलन करना अधिक उपयोगी होगा।
विशेष रूप से किसानों के लिए subsidy-adjusted profitability का आकलन महत्वपूर्ण है। यदि सरकार से plantation establishment के लिए सहायता मिलती है, तो किसान की स्वयं की पूंजीगत आवश्यकता कम होती है। इससे निवेश की वसूली अवधि कम होने तथा परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता में सुधार की संभावना रहती है।
सरकारी अनुदान से कम हो सकता है शुरुआती निवेश
ड्रैगन फ्रूट की खेती में शुरुआती स्थापना लागत किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार के Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) के अंतर्गत dragon fruit को cost-intensive fruit crop के रूप में शामिल किया गया है। MIDH Operational Guidelines 2025 के अनुसार dragon fruit with support system के लिए ₹6.75 लाख प्रति हेक्टेयर का cost norm निर्धारित किया गया है। सामान्य क्षेत्रों में इस निर्धारित लागत का 40 प्रतिशत तक सहायता का प्रावधान है तथा सहायता अधिकतम 2 हेक्टेयर क्षेत्र तक दी जा सकती है। इस लागत मान पर 40 प्रतिशत की गणना करने पर सहायता की अधिकतम राशि ₹2.70 लाख प्रति हेक्टेयर तक बनती है। सहायता planting material तथा trellis एवं अन्य support systems से संबंधित स्थापना व्यय के लिए निर्धारित है। सहायता दो किस्तों में 60:40 के अनुपात में दी जाती है और दूसरी किस्त के लिए दूसरे वर्ष में 80 प्रतिशत पौध survival की शर्त निर्धारित है।
इस अनुदान का आर्थिक महत्व केवल सहायता राशि तक सीमित नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि किसी किसान की पात्र स्थापना लागत निर्धारित cost norm के बराबर है और उसे अधिकतम 40 प्रतिशत सहायता प्राप्त होती है, तो किसान की स्वयं की प्रारंभिक पूंजी आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इससे किसान को अपनी पूंजी को अन्य कृषि गतिविधियों में लगाने का अवसर भी मिल सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ₹2.70 लाख को हर किसान के लिए निश्चित भुगतान नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक सहायता पात्रता, स्वीकृत क्षेत्र, विभागीय प्रक्रिया, physical verification और योजना के उस वर्ष के प्रावधानों पर निर्भर करेगी। इसलिए plantation शुरू करने से पहले संबंधित जिला उद्यानिकी कार्यालय से वर्तमान नियमों की पुष्टि करना आवश्यक है।
छत्तीसगढ़ के लिए क्या है संभावना?
छत्तीसगढ़ में ड्रैगन फ्रूट की खेती को लेकर किसानों की रुचि लगातार बढ़ रही है। राज्य के दुर्ग, बेमेतरा, राजनांदगांव, कबीरधाम, जशपुर और महासमुंद सहित विभिन्न क्षेत्रों में किसान अब इसकी व्यावसायिक खेती अपना रहे हैं। इसके अलावा, बस्तर जिले में भी ड्रैगन फ्रूट की व्यावसायिक खेती का सफल उदाहरण सामने आया है। ICAR की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड के पंडनार गांव में एक किसान ने KVK के तकनीकी मार्गदर्शन में लगभग 7 एकड़ क्षेत्र में ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की और इससे अच्छी आर्थिक आय प्राप्त की। यह अनुभव दर्शाता है कि उपयुक्त तकनीक, प्रबंधन और बाजार सुविधा उपलब्ध होने पर छत्तीसगढ़ में ड्रैगन फ्रूट को एक लाभकारी बागवानी उद्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है।
हालांकि, किसी एक किसान की सफलता को पूरे राज्य के लिए सामान्य नहीं माना जा सकता। छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में मिट्टी, तापमान, सिंचाई सुविधा, बाजार की दूरी, परिवहन लागत और श्रम उपलब्धता में अंतर पाया जाता है। इसलिए राज्य में इसके विस्तार के लिए क्षेत्र-विशिष्ट अध्ययन और location-specific economic analysis आवश्यक है। विशेष रूप से किसानों की वास्तविक लागत, उत्पादन, बाजार मूल्य, सरकारी अनुदान तथा शुद्ध आय का आकलन कर यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि किन क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के लिए अधिक आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो सकती है।
किसानों के लिए जरूरी सावधानियाँ
ड्रैगन फ्रूट में निवेश करने वाले किसान को सबसे पहले अपनी भूमि, सिंचाई सुविधा और बाजार की उपलब्धता का आकलन करना चाहिए। अच्छी गुणवत्ता की planting material का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार support structure की मजबूती से समझौता नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह कई वर्षों का पूंजी निवेश है।
किसान को plantation शुरू करने से पहले यह भी तय करना चाहिए कि फल की बिक्री कहाँ की जाएगी। केवल उत्पादन पर ध्यान देने के बजाय स्थानीय बाजार, direct marketing, retailers, hotels, supermarkets तथा FPO के माध्यम से बिक्री की संभावनाओं को देखना चाहिए। इससे किसान को बेहतर price realization प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
इसके अलावा, सरकारी अनुदान को अपनी पूरी आर्थिक योजना का एकमात्र आधार नहीं बनाना चाहिए। पहले कुल investment और annual maintenance cost का अनुमान तैयार करना चाहिए और उसके बाद संभावित subsidy को शामिल करके effective investment और payback period की गणना करनी चाहिए।
निष्कर्ष
ड्रैगन फ्रूट छत्तीसगढ़ में उच्च मूल्य वाली बागवानी फसल के रूप में एक संभावित आर्थिक विकल्प बन सकता है। इसकी खेती की सबसे बड़ी चुनौती शुरुआती स्थापना लागत है, जबकि इसकी प्रमुख ताकत बहुवर्षीय उत्पादन और उच्च मूल्य प्राप्त करने की संभावना है। इसलिए इसकी आर्थिक व्यवहार्यता का मूल्यांकन केवल वार्षिक आय के आधार पर न करके establishment cost, maintenance cost, yield, farm-gate price, net return, B:C ratio और payback period को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
MIDH के अंतर्गत dragon fruit के लिए Rs 6.75 लाख प्रति हेक्टेयर का cost norm और सामान्य क्षेत्रों में 40 प्रतिशत तक सहायता किसानों के शुरुआती पूंजीगत बोझ को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। छत्तीसगढ़ में उपलब्ध सफल उदाहरणों को देखते हुए राज्य में इसके विस्तार की संभावना दिखाई देती है, लेकिन बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन देने से पहले स्थानीय स्तर पर वास्तविक लागत, उत्पादन और बाजार मूल्य के आधार पर आर्थिक अध्ययन किया जाना आवश्यक है। उचित तकनीकी मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री, सरकारी सहायता और बाजार संपर्क के साथ ड्रैगन फ्रूट किसानों के लिए एक लाभकारी diversification option बन सकता है।
स्रोत
- Ministry of Agriculture & Farmers Welfare, Government of India. Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) – Operational Guidelines, 2025. Dragon Fruit with Support System component.
- Indian Council of Agricultural Research (ICAR). Annual Report 2021–22 — Bastar, Chhattisgarh dragon fruit cultivation success case.










