उद्यानिकी

बोनसाई

डॉ राजीव दीक्षित, सहायक प्राध्यापक (उद्यानिकी) कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जांजगीर चांपा

बोनसाई एक ऐसी कला है जिसमें पौधे या झाड़ी को छोटे एवं उथले गमलों में उगाया एवं संवारा जाता है जिससे वह आकर में छोटे होने के बावजूद दशको पुराने विशाल वृक्ष की तरह दिखाई देते हैं । इसकी उत्पत्ति चीन में हुई थी लेकिन इसे जापानी कला भी कहा जाता है । जापानी शब्द बोनसाई दो शब्दों से मिलकर बना है “Bon” जिसका मतलब उथले गमले से एवं  “Sai” मतलब पौधे लगाना अर्थात उथले गमले में पौधे उगाने की कला बोनसाई कहलाती है। बोनसाई केवल बागवानी नहीं बल्कि धैर्य कला व प्रकृति के प्रति प्रेम का एक अद्भुत संगम है ।

बोनसाई का इतिहास: हालांकि आज इसे एक जापानी कला के रूप में जाना जाता है लेकिन इसकी उत्पत्ति प्राचीन चीन में है जहां इसे Penjing कहा जाता था । बाद में जापानियों ने इसे अपनाया और अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इसे एक परिष्कृत कला का रूप दिया । भारत में स्वर्गीय बी पी अग्निहोत्री जी को बोनसाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए याद किया जाता है । यह कला १७ वीं शताब्दि में पूरी दुनिया में व्यापक रूप से फैली ।

बोनसाई कैसे तैयार किया जाता है:
बोनसाईं बनाना रातों-रात होने वाले काम नहीं है इसके लिए कुछ मुख्य प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है –

1. पौधों का चयनः फायकस स्पीशीज (बरगद पीपल) जेट प्लांट, बोगनविलिया , चीड़ और जूनिपर जैसे पौधे बोनसाई के लिए बेहतर माने जाते हैं । फाईकस रिलिजियस और फाईकस बेंजामिन शुरुआती दौर में बोनसाई बनाना सीखने के लिए बेहतरीन विकल्प हैं क्योंकि इनकी जड़े और तने बहुत लचीले होते हैं इन्हें आप घर के अंदर भी रख सकते हैं इनकी छटाई करना भी आसान है और यह तेजी से छ टा ई उपरांत रिकवर होते हैं । इसी तरह जेड प्लांट भी बेहतर विकल्प है वह बोनसाई सिखाने हेतु क्योंकि इसे बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है और बिना वायरिंग के भी इनकी शाखोंओ को आसानी से मैनेज किया जा सकता है । बोनसाई की वायरिंग सीखने के लिए चीनी एल्म का पौधा बहुत अच्छा माना गया है ।

2. छटाई (Pruning): बोनसाई तैयार करने हेतु पौधों की जड़ों और शाखोंओ की नियमित छटाई की जाती है ताकि पौधा अपनी उर्जा ऊंचाई बढ़ाने की बजाय तना को मोटा करने में लगाए और वह जाकर में छोटा होने के बावजूद दशको पुराना विशाल वृक्ष लगे ।

3. वायरिंग: तांबे या एल्युमिनियम के तार की मदद से शाखोंओ को मनचाहा आकार दिया जाता है जिससे विभिन्न शैली की बोनसाई तैयार की जाती है ।

4. गमलों को बदलना (Repotting) : प्रत्येक 2 से 3 साल में पौधों की मिट्टी बदली जाती है और जड़ों को ट्रिम किया जाता है ताकि वह छोटे गमले में आसानी से आ सकें ।

ऊंचाई के आधार पर बोनसाई के प्रकारः

  1. मिनिएचर या (Mame):15 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक पौधों की ऊंचाई रखकर जिन बोनसाई को तैयार किया जाता है उन्हें मिनिएचर कहते हैं ।
  2. Shohin या छोटे आकर के बोनसाई: जिन बोनसाई की ऊंचाई 15 से 25 सेंटीमीटर तक की होती है उन्हें  Shonin के रूप में जाना जाता है ।
  3. Kumono या मध्यम आकार के बोनसाई: जिन बोनसाई की ऊंचाई 25 से 60 सेमी होती है उन्हें Kumono कहा जाता है ।
  4. Omuno या बृहद आकर के बोनसाई: जिन बोनसाई की ऊंचाई 60 से 120 सेंटीमीटर होती है उन्हे Omuno के नाम से जाना जाता है ।
    जिन पौधों की ऊंचाई 120 सेंटीमीटर से ऊपर हो जाती है बोनसाई तैयार करते समय उन्हें Dai के रूप में जाना जाता है ।

बोनसाई की शैली: बोनसाई तैयार करते समय उन्हें विभिन्न शैलियों में तैयार किया जाता है कुछ प्रमुख शैलियों की जानकारी निम्नलिखित है:

01. अपराइट या चोखन(Chhokhan) शैली: इस शैली में पौधों का तना एकदम सीधा ऊपर की ओर जाता है शाखाएं नीचे से ऊपर की ओर लंबाई में छोटी होती जाती हैं अर्थात शक्वाकार दिखाई देती हैं । पौधे का शीर्ष आधार के ठीक ऊपर अर्थात लंबवत होता है ।इस शैली में पौधों को उथले गोल या अंडाकार गमले के बीचो-बीच लगाया जाता है ।

02. इनफॉर्मल अपराइट (Moyogi): इस शैली में पौधे का तना हल्का सा मुडा हुआ curve दिखाई देता है जो की फॉर्मल स्टाइल की बनिस्बत ज्यादा रियलिस्टिक दिखाई देता है । इस शैली को गोल या अंडाकार गमले में लगाया जाता है ।

03. ब्रूम स्टाइल या (Hokidochi): इस शैली में पौधे का तना ऊपर की ओर और शाखाएं ऊपर में जाकर फैलती है जैसे झाड़ू को उल्टा रख दिया गया हो। इस प्रकार की शैली को भी गोल और अंडाकार गमले में लगाया जाता है।

04. स्लांटिंग या (Shaken ) शैली: इसमें तना 45 डिग्री सेंटीग्रेड के कोण पर एक ओर झुका हुआ होता है । इससे पौधे को गमले के एक किनारे पर लगाया जाता है कई बार एक तरफ अधिक शाखोंओ को रखा जाता है इस शैली को भी आयताकार या अंडाकार गमले में लगाया जाना उचित होता है ।

05. विंड स्विफ्ट या(Fukinagashi): इस शैली में पौधे का तना व शाखाएं एक दिशा में झुकी हुई होती है ऐसा प्रतीत होता है कि तेज हवाओं से पौधा एक और झुक गया है । इस शैली को भी आयातकार अंडाकार गमले में लगाया जाना उचित होता है।

06. कैस्केड शैली या (Kengai): इस शैली में पौधे का तना व शाखाएं गमले से नीचे की ओर झुका हुआ होता है जिससे ऐसा प्रतीत होता है की पहाड़ों से कोई झरना बह रहा है इस शैली के लिए गमले की गहराई कुछ ज्यादा होती है ।

07. मल्टीट्रक शैली या (Kabudachi) इस शैली में एक ही जड़ से बहुत से पौधे निकलते हैं। पौधों की संख्या को विषम संख्या में रखा जाता है जिसमें बीच वाले पौधा की ऊंचाई ज्यादा होती है फिर आजू-बाजू के पौधों की ऊंचाई क्रमशः कम होती जाती है । इस शैली को भी आयताकार शैली में लगाया जाना उचित होता है ।

08. राफ्ट या (Ikrabuki) इस शैली में मुख्य तना गमले के समानांतर लेटा हुआ होता है और शाखोंओ को ऊपर की ओर बढ़ने दिया जाता है जिससे ऐसा प्रतीत होता है की कई पौधे निकले हुए हैं। इसे भी आयताकार गमले में लगाया जाना उचित उचित होता है ।

09. सुकन स्टाइल या (Twin trunk style) इस शैली में पौधे के तनों को दो भाग में निकलने दिया जाता है जिसमें जो मुख्य तना होता है उसकी लंबाई और मोटाई अधिक होती है और उसके जो बाजू से तना निकलता है उसकी मोटाई और ऊंचाई पहले वाले तने की बनिस्बत काफी कम होती है और दोनों तने एक ही और झुके हुए होते हैं।

10. रूट ओवर रॉक या Shekujojo इस शैली में पौधों को पत्थरों के बीच से ऐसा निकाला जाता है कि उनकी जड़े पत्थरों से लिपटी हुई प्रतीत होती है और ऐसा प्रतीत होता है की पौध बहुत संघर्ष करते हुए अपने आप को जीवित रखा हुआ है।

सावधानियां:
बोनसाई तैयार करते वक्त कुछ बातों को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक होता है –

  1. पौधों का चयन सावधानीपूर्वक करें जो आपकी जलवायु के अनुकूल हो, पत्तियां छोटी हो और पौधा छटाई पश्चात अपने आप को जल्दी से रिकवर करें
  2. गमलों का चयन बोनसाई के स्टाइल के अनुरूप हो उथले गमले का चयन किया जाना उचित होता है एवं पानी निकासी हेतु छिद्रों का ध्यान रखा जाता है ।
  3. तीसरा मिट्टी भरते समय गमले के छिद्रों को मिट्टी ना ढके इस हेतु गमले में पहली सतह कंकड़ पत्थर की डाली जाती है फिर दो अनुपात एक अनुपात एक मिट्टी पत्तियों से बनी साड़ी खाद एवं रेत का प्रयोग कर गमले की भराई की जाती है ।
  4. जड़ों की छटाई करते वक्त एक तिहाई जड़ों को ही काटा जाता है अन्यथा पौधों के मरने की आशंका बनी रहती है ।
  5. वर्ष में एक या दो बार ही पिचिंग की जाती है।
  6. पिचिंग के बाद पानी देते वक्त सावधानी रखी जाती है कि ज्यादा पानी की सिंचाई न की जाए।

अंततः हम यह कह सकते हैं बोनसाई बनाना एक ऐसी कला है जिसमें एक मूर्तिकार के हाथ एक कवि की कल्पना और एक पेंटर की आंख का होना जरूरी है ताकि अत्यधिक सुंदर बोनसाई का निर्माण किया जा सके

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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