अंजीर : भविष्य का लाभदायक फल वृक्ष
वैभव शर्मा एवं श्री राम कुमार देवांगन, क्रन्तिकारी डेबरीधुर उधानिकी महाविधालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जगदलपुर, बस्तर


परिचय (Introduction) : अंजीर (Fig) एक पौष्टिक एवं औषधीय गुणों से भरपूर फल है। इसकी बाजार में ताजा तथा सूखे फल (ड्राई फ्रूट) के रूप में लगातार मांग बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां अंजीर की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक अच्छा विकल्प बन सकती है। यह फसल अपेक्षाकृत कम पानी में भी अच्छी उपज देती है और लंबे समय तक उत्पादन देती रहती है। और भारत के विभिन्न राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
अंजीर (Ficus carica) मोरेसी (Moraceae) कुल का फलदार पौधा है, जिसकी उत्पत्ति पश्चिमी एशिया में मानी जाती है। इसकी गुणसूत्र संख्या 2n = 26, फल का प्रकार सायकोनस (syconus) तथा खाद्य भाग मांसल पात्र (Fleshy Receptacle) होता है।
अंजीर की खेती क्यों करें ?
कम पानी में अच्छी पैदावार। बाजार में फल की अच्छी कीमत। ताजा एवं सूखे दोनों रूपों में बिक्री संभव। पौधा 30 वर्ष या उससे अधिक समय तक उत्पादन दे सकता है। सूखा सहन करने की क्षमता अधिक होती है।
आहार मूल्य (Nutritive Value)
ऊर्जा -74 calorie
प्रोटीन -0.75gm
रेशा -2.9gm
कार्बोहाइड्रेट -19gm
कैल्शियम – 35gm
फॉस्फोरस -14gm
पोटेशियम – 243mg/100gm
आयरन -0.37mg/100gm
जलवायु (Climate)-
तापमान: 15 से 35 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त।
मिट्टी: अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट।
pH मान : 6.5 से 8.0।
जलभराव वाली भूमि से बचाव आवश्यक।
फलों के विकास तथा परिपक्वता के समय शुक मौसम अच्छा रहता है।
पुष्यों के प्रकार, परागण की विधि, आदि आधारों पर अंजीर को चार वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।
(अ) एड्रियेटिक फिग (Adriatic fig)
इन्हें सामान्य अंजीर भी कहते हैं। इनमें फलों का विकास बिना परागण या निषेचन के होता है। इस वर्ग की प्रमुख किस्में पूना, काडेटा, मिशन, एड्रियेटिक, ब्राउन टर्की, सेलेस्ट, तथा कोनार्डिया हैं। भारत में सर्वाधिक उत्पादन पूना किस्म का होता है।
(ब) केप्रीफिग (Caprifig)
केप्रीफिग अंजीर का जंगली प्रकार है, जिसमें नर एवं मादा दोनों प्रकार के पुष्प पाए जाते हैं। इसके फल खाने योग्य नहीं होते हैं। केप्रीफिग को मुख्य रूप से एड्रियाटिक तथा स्मार्यना समूह की अंजीर किस्मों में परागण की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए उगाया जाता है। केप्रीफिग के परागकणों द्वारा अन्य अंजीर किस्मों में परागण कराने की प्रक्रिया को केप्रीफिकेशन कहा जाता है।
(स) स्मार्यना फिग (Smyrna Fig)
स्मार्यना फिग समूह की किस्मों में फल विकास के लिए परागण आवश्यक होता है। केप्रीफिग के नर पुष्पों से परागण हुए बिना इनमें फल नहीं बनते तथा फल विकास नहीं हो पाता। इस समूह के सबसे प्रमुख एवं अधिक उगाई जाने वाली किस्म केलिमार्ना है | इसके अतिरिक्त जिदी तथा टेरानिस्ट भी इस वर्ग के महत्वपूर्ण किस्म है ।
(द) सेन पेड्रो फिग (San Pedro Fig)
सेन पेड्रो फिग समूह की किस्मों में पहली फसल, जिसे ब्रेबा (Breba Crop) कहा जाता है, बिना परागण एवं निषेचन के विकसित हो जाती है। जबकि दूसरी फसल के फल विकास के लिए परागण एवं निषेचन आवश्यक होता है। इस समूह की प्रमुख किस्में सेन पेड्रो(San Pedro), किंग (King) , जेनटीले (Gentile) डाफाइन (Dauphine) तथा लेम्पेरिया (Lampeira) हैं। भारत में इस समूह की किस्मों का व्यावसायिक उत्पादन नहीं किया जाता है।
प्रसारण(Propagation) : अंजीर का प्रवर्धन वायु-दाब (Air Layering), कलिकायन (Budding), उपरोपण (Grafting) तथा कलम (Cutting) द्वारा किया जा सकता है। किन्तु व्यावसायिक स्तर पर इसके प्रसारण के लिए कठोर काष्ठ कलम (Hardwood Cutting) विधि सबसे अधिक प्रचलित एवं सफल मानी जाती है। इस विधि में स्वस्थ एवं परिपक्व शाखाओं से 25-30 सेमी लंबी कलमें तैयार की जाती हैं। इन कलमों को वर्षा ऋतु के प्रारंभ (जून-जुलाई) में नर्सरी अथवा खेत में लगाया जाता है। उचित नमी एवं देखभाल मिलने पर कलमों में शीघ्र जड़ें विकसित हो जाती हैं तथा नए पौधे तैयार हो जाते हैं।
रोपण (Planting) : सामान्यतः अंजीर के पौधों का रोपण 5 × 5 मीटर की दूरी पर विधिवत तैयार किए गए गड्ढों में किया जाता है। इस दूरी पर रोपण करने से पौधों को पर्याप्त प्रकाश, वायु तथा पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। हालाँकि, एक्सेल (Excel) तथा कोनाड्रिया (Conardria) जैसी किस्मों में 2.5 × 2.5 मीटर की दूरी पर सघन रोपण (High Density Planting) भी किया जा सकता है। उत्तरी भारत में अंजीर की कलमों का रोपण उनकी सुषुप्तावस्था (Dormant Statge) के दौरान फरवरी-मार्च माह में किया जाता है, जिससे पौधों की स्थापना एवं वृद्धि अच्छी होती है।
सिंचाई (Irrigation): अंजीर एक सूखा सहिष्णु फल वृक्ष है, अतः यह कम पानी की परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। फिर भी अच्छी वृद्धि, पुष्पन एवं उच्च उत्पादन प्राप्त करने के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करना आवश्यक है। विशेष रूप से फल विकास की अवस्था में पर्याप्त नमी बनाए रखना लाभकारी होता है। जलभराव से बचना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ गलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
सधाई एवं काट-छांट (Training and Pruning): अंजीर की सधाई सामान्यतः एकल तना पद्धति द्वारा की जाती है। इसके लिए मुख्य तने को लगभग 1 मीटर की ऊँचाई पर काट दिया जाता है तथा चारों ओर संतुलित रूप से पार्श्व शाखाओं को विकसित होने दिया जाता है। अंजीर में प्रतिवर्ष काट-छांट करना आवश्यक होता है, क्योंकि पुष्पन एवं फलन नई वृद्धि वाली शाखाओं पर होता है। उत्तर प्रदेश में सामान्यतः दिसंबर माह में गहरी काट-छांट की जाती है, जिसमें पिछले वर्ष की वृद्धि वाले प्ररोहों को 3-4 कलियाँ छोड़कर काट दिया जाता है। इससे नई शाखाओं का विकास होता है तथा फल उत्पादन में वृद्धि होती है।
पोषणिक प्रबन्ध (Nutritional Management):
अंजीर के पौधों की उचित वृद्धि, पुष्पन एवं फलन के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन आवश्यक है। पाँच वर्ष आयु के एक पौधे को प्रतिवर्ष लगभग 40 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन (N), 200 ग्राम फास्फोरस (P₂O₅) तथा 200 ग्राम पोटाश (K₂O) देना पर्याप्त माना जाता है। गोबर की खाद एवं फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा पौधों को शीत ऋतु में देनी चाहिए, जबकि नाइट्रोजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बाँटकर देना लाभकारी होता है। संतुलित पोषण प्रबंधन से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है तथा फलों की गुणवत्ता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है।
तुड़ाई एवं उपज: अंजीर के पौधों से सामान्यतः रोपण के पाँचवें वर्ष से लाभकारी उपज प्राप्त होने लगती है। भारत में अंजीर के फल मुख्य रूप से ताजे रूप में उपभोग किए जाते हैं, इसलिए फलों की तुड़ाई पूर्ण परिपक्वता प्राप्त होने पर की जाती है। जिन देशों में अंजीर का उपयोग सूखे फल के रूप में किया जाता है, वहाँ फलों को वृक्ष पर ही पककर सूखने दिया जाता है। पूर्ण रूप से सूख जाने पर फल प्राकृतिक रूप से भूमि पर गिर जाते हैं, जिन्हें एकत्रित कर लिया जाता है। उचित प्रबंधन एवं देखभाल की स्थिति में एक अंजीर वृक्ष से प्रतिवर्ष लगभग 180 से 360 फल प्राप्त होते हैं। उपज की मात्रा किस्म, पौधे की आयु तथा बाग प्रबंधन पर निर्भर करती है।
अंजीर के प्रमुख रोग एवं कीट तथा नियंत्रण
1. छेदक कीट
लक्षण: तने में छेद बन जाते हैं, पौधा कमजोर हो जाता है।
नियंत्रण: प्रभावित शाखाएँ काटें, छेद में तार डालकर कीट नष्ट करें।
2. फल मक्खी
लक्षण: फल सड़ने लगते हैं और गिर जाते हैं।
नियंत्रण: गिरे फल नष्ट करें, फेरोमोन ट्रैप लगाएँ।
3. पत्ती धब्बा रोग
लक्षण: पत्तियों पर भूरे-काले धब्बे बनते हैं।
नियंत्रण: रोगग्रस्त पत्तियाँ हटाएँ, फफूंदनाशी का छिड़काव करें।
4. जड़ गलन रोग
लक्षण: जड़ें सड़ जाती हैं, पौधा मुरझा जाता है।
नियंत्रण: खेत में जलभराव न होने दें।
भंडारण : अंजीर एक नाशवान फल है, इसलिए इसकी तुड़ाई के बाद शीघ्र विपणन करना चाहिए। ताजे फलों को 0-2°C तापमान तथा 85-90% आर्द्रता पर लगभग 2-4 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। सूखे अंजीर को साफ एवं सूखी जगह पर वायुरोधी (।पतजपहीज) पात्रों में लंबे समय तक संग्रहित किया जा सकता है। उचित भंडारण से फलों की गुणवत्ता एवं स्वाद बना रहता है।
विपणन: अंजीर के फलों की बाजार में अच्छी मांग रहती है। फलों को ताजा, सूखा, जैम, जेली एवं अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में बेचा जा सकता है। तुड़ाई के बाद फलों की ग्रेडिंग एवं पैकिंग करके स्थानीय मंडियों, फल बाजारों तथा प्रसंस्करण इकाइयों में भेजा जाता है। उचित विपणन व्यवस्था अपनाकर किसान अंजीर की खेती से अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में अंजीर के फलों को स्थानीय फल मंडियों, सुपरमार्केट, होटल, रेस्टोरेंट तथा प्रसंस्करण इकाइयों में बेचा जा सकता है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और कोरबा जैसे बड़े शहरों में ताजे एवं सूखे अंजीर की मांग लगातार बढ़ रही है। किसान सीधे उपभोक्ताओं, फल विक्रेताओं, थोक व्यापारियों तथा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी अपने उत्पाद का विपणन कर सकते हैं। अंजीर की अच्छी गुणवत्ता, ग्रेडिंग एवं पैकिंग से बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।
निष्कर्ष : छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए अंजीर की खेती एक उभरता हुआ और लाभकारी विकल्प है। कम पानी, कम रखरखाव तथा अच्छी बाजार मांग के कारण यह फसल भविष्य में किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती करें, तो अंजीर उनके बगीचे की “सोने की फसल” साबित हो सकती है।
लेखक :
वैभव शर्मा एवं श्री राम कुमार देवांगन,
क्रन्तिकारी डेबरीधुर उधानिकी महाविधालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जगदलपुर, बस्तर









