बरसात के मौसम में खरगोश पालन: अपनाएँ वैज्ञानिक उपाय, बढ़ाएँ उत्पादन और मुनाफा
डॉ. आशुतोष तिवारी, डॉ. दीप्ति किरण बरवा, डॉ. नमिता शुक्ला, डॉ. आर. सी. रामटेके, डॉ. जागृति कृषान, डॉ. शिवेश देशमुख, डॉ. निशिमा सिंह, डॉ. राजकुमार गडपायले, डॉ. बी. पी. सिंह कंवर


बरसात का मौसम जहाँ एक ओर हरियाली, ठंडक और प्राकृतिक सौंदर्य लेकर आता है, वहीं दूसरी ओर यह खरगोश पालन करने वाले किसानों के लिए कई चुनौतियाँ भी लेकर आता है। खरगोश स्वभाव से अत्यंत संवेदनशील एवं नाजुक प्राणी होते हैं। वे अत्यधिक गर्मी, उमस, नमी और गंदगी को आसानी से सह नहीं कर पाते। वर्षा ऋतु में वातावरण की आर्द्रता (Humidity) बढ़ जाती है, तापमान में उतार-चढ़ाव होता है तथा बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद एवं परजीवियों की वृद्धि तेजी से होने लगती है। यदि इस मौसम में खरगोशों की उचित देखभाल न की जाए तो उनमें निमोनिया, दस्त, कॉक्सीडियोसिस, त्वचा रोग, पैरों में घाव (Sore Hock), श्वसन संबंधी संक्रमण तथा मृत्यु दर बढ़ सकती है। इसलिए बरसात के मौसम में वैज्ञानिक पद्धति से खरगोश पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
आवास (Housing Management): सबसे पहले खरगोशों के आवास पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खरगोशों का शेड ऐसी जगह बनाया जाना चाहिए जहाँ वर्षा का पानी किसी भी स्थिति में जमा न हो। शेड भूमि से कुछ ऊँचाई पर होना चाहिए ताकि पानी आसानी से बाहर निकल सके। पिंजरे लोहे के जालीदार या उन्नत प्रकार के होने चाहिए जिससे मल-मूत्र नीचे गिरता रहे और खरगोश हमेशा सूखे स्थान पर रहें। यदि लकड़ी या फर्श का उपयोग किया गया हो तो उसे हमेशा सूखा रखना चाहिए। पिंजरे के ऊपर मजबूत छत होनी चाहिए जिससे वर्षा का पानी अंदर न आए। शेड में पर्याप्त वेंटिलेशन होना चाहिए ताकि ताजी हवा का संचार बना रहे, लेकिन तेज हवा या वर्षा की बौछार सीधे खरगोशों तक न पहुँचे। अत्यधिक उमस होने पर एग्जॉस्ट फैन या प्राकृतिक वेंटिलेशन की व्यवस्था लाभदायक होती है।

स्वच्छता (Sanitation): बरसात के मौसम में स्वच्छता का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। गंदगी और नमी रोगों का सबसे बड़ा कारण होती है। इसलिए पिंजरे की प्रतिदिन सफाई करनी चाहिए तथा मल-मूत्र और गीले बिछावन को तुरंत हटाना चाहिए। सप्ताह में कम से कम एक बार शेड, पिंजरे, फीडर एवं ड्रिंकर को उपयुक्त कीटाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए। शेड के आसपास झाड़ियाँ, कूड़ा-कचरा तथा पानी जमा नहीं होने देना चाहिए क्योंकि इससे मच्छर, मक्खियाँ और अन्य कीट बढ़ते हैं जो रोग फैलाने का कार्य करते हैं। मृत खरगोशों या जैविक अपशिष्ट का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना चाहिए।
भोजन प्रबंधन (Feeding Management): भोजन प्रबंधन वर्षा ऋतु में अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस मौसम में हरा चारा जल्दी खराब हो जाता है तथा उस पर फफूंद लगने की संभावना रहती है। फफूंदयुक्त चारा खरगोशों के लिए अत्यंत हानिकारक होता है और इससे विषाक्तता तथा पाचन संबंधी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए हमेशा ताजा, स्वच्छ एवं अच्छी गुणवत्ता वाला चारा ही खिलाना चाहिए। यदि हरा चारा खेत से लाया गया हो तो उसे साफ पानी से धोकर छाया में सुखाने के बाद ही खिलाना चाहिए ताकि अतिरिक्त नमी समाप्त हो जाए। संतुलित पेलेट आहार, सूखी घास तथा आवश्यक खनिज एवं विटामिन की पूर्ति भी नियमित रूप से करनी चाहिए। भोजन को हमेशा सूखी एवं सुरक्षित जगह पर संग्रहित करना चाहिए ताकि उसमें नमी या फफूंद न लगे।
स्वच्छ पेयजल: स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी अत्यंत आवश्यक है। बरसात में जल स्रोत आसानी से दूषित हो सकते हैं। इसलिए खरगोशों को हमेशा साफ, ताजा एवं रोगाणुरहित पानी उपलब्ध कराना चाहिए। पानी के बर्तन या निप्पल ड्रिंकर की प्रतिदिन सफाई करनी चाहिए। यदि संभव हो तो पीने के पानी को समय-समय पर कीटाणुरहित किया जा सकता है। गंदा पानी दस्त, कॉक्सीडियोसिस तथा अन्य संक्रामक रोगों का प्रमुख कारण बनता है।
रोगों की रोकथाम (Disease Prevention): वर्षा ऋतु में रोगों की रोकथाम पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इस मौसम में कॉक्सीडियोसिस, निमोनिया, पाश्चुरेलोसिस, त्वचा संक्रमण तथा परजीवी रोग अधिक देखने को मिलते हैं। यदि किसी खरगोश में भूख कम लगना, सुस्ती, दस्त, छींक, नाक से स्राव, सांस लेने में कठिनाई या वजन कम होना जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत अन्य खरगोशों से अलग कर देना चाहिए तथा पशु चिकित्सक से उपचार कराना चाहिए। नए खरीदे गए खरगोशों को कम से कम 15 दिनों तक अलग रखकर निरीक्षण करना चाहिए ताकि यदि उनमें कोई संक्रामक रोग हो तो वह अन्य खरगोशों में न फैले।
पैरों की देखभाल: बरसात में पैरों की देखभाल भी आवश्यक है। लगातार गीले फर्श पर रहने से खरगोशों के पैरों में घाव बनने लगते हैं जिन्हें सोर हॉक (Sore Hock) कहा जाता है। इससे चलने-फिरने में कठिनाई होती है तथा संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए पिंजरे का फर्श सूखा एवं साफ रखना चाहिए तथा समय-समय पर खरगोशों के पैरों का निरीक्षण करना चाहिए। यदि लालिमा, सूजन या घाव दिखाई दें तो तत्काल उपचार करना चाहिए।
प्रजनन प्रबंधन (Breeding Management): प्रजनन प्रबंधन भी वर्षा ऋतु में सावधानीपूर्वक करना चाहिए। अत्यधिक नमी एवं उमस के कारण प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है। गर्भवती मादा खरगोशों को शांत, स्वच्छ एवं सूखा वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। प्रसव से पहले नेस्ट बॉक्स में सूखी घास या मुलायम बिछावन रखना चाहिए ताकि नवजात बच्चों को पर्याप्त गर्माहट मिल सके। जन्म के बाद बच्चों को नमी और ठंडी हवा से बचाना चाहिए क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।
कीटों का नियंत्रण: बरसात में मच्छरों, मक्खियों और अन्य कीटों का नियंत्रण भी आवश्यक है। शेड के आसपास जलभराव नहीं होना चाहिए। समय-समय पर सुरक्षित कीटनाशकों का उपयोग तथा मक्खी नियंत्रण के उपाय अपनाने चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी रसायन सीधे खरगोशों के संपर्क में न आए।
तनाव (Stress Management): तनाव को कम करना भी महत्वपूर्ण है। खरगोश अत्यधिक शोर, भीड़ और बार-बार पकड़ने से तनावग्रस्त हो जाते हैं। वर्षा के दौरान बिजली कड़कने, तेज आवाज या अत्यधिक तापमान परिवर्तन से भी तनाव बढ़ सकता है। इसलिए उन्हें शांत वातावरण प्रदान करना चाहिए तथा अनावश्यक रूप से पिंजरे से बाहर नहीं निकालना चाहिए।
दैनिक स्वास्थ्य निरीक्षण: प्रत्येक खरगोश का दैनिक स्वास्थ्य निरीक्षण करना एक अच्छी प्रबंधन पद्धति है। प्रतिदिन यह देखना चाहिए कि खरगोश सामान्य रूप से भोजन कर रहा है या नहीं, पानी पी रहा है या नहीं, उसकी आँखें एवं नाक साफ हैं या नहीं, मल सामान्य है या नहीं तथा वह सक्रिय है या सुस्त दिखाई दे रहा है। किसी भी असामान्य लक्षण की पहचान प्रारंभिक अवस्था में हो जाने पर उपचार आसान हो जाता है और आर्थिक हानि कम होती है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि बरसात का मौसम खरगोश पालन के लिए चुनौतीपूर्ण अवश्य है, लेकिन यदि वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाया जाए तो इस मौसम में भी उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। स्वच्छ एवं सूखा आवास, संतुलित एवं सुरक्षित आहार, स्वच्छ पेयजल, नियमित सफाई, रोगों की समय पर रोकथाम, उचित वेंटिलेशन, कीट नियंत्रण तथा दैनिक स्वास्थ्य निरीक्षण—ये सभी सफल खरगोश पालन के प्रमुख आधार हैं। जो पशुपालक इन बातों का नियमित पालन करते हैं, उनके खरगोश स्वस्थ रहते हैं, उनकी वृद्धि एवं प्रजनन क्षमता बेहतर होती है तथा मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आती है। इस प्रकार बरसात के मौसम में थोड़ी अतिरिक्त सावधानी अपनाकर खरगोश पालन को लाभदायक, सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सकता है।
लेखक :
डॉ. आशुतोष तिवारी, डॉ. दीप्ति किरण बरवा, डॉ. नमिता शुक्ला, डॉ. आर. सी. रामटेके, डॉ. जागृति कृषान,
डॉ. शिवेश देशमुख, डॉ. निशिमा सिंह, डॉ. राजकुमार गडपायले, डॉ. बी. पी. सिंह कंवर
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, अंजोरा, दुर्ग, छत्तीसगढ़










