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सहकारी समितियों का सामाजिक एवं आर्थिक योगदान

डॉ. संगीता सिंह, डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. सुरेन्द्र कुमार, डॉ. प्रभाकर जायसवाल

सारांश : सहकारी समितियां भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार हैं। सहकारिता का मूल सिद्धांत है-“सभी के लिए एक और एक के लिए सभी”। सहकारी संस्थाएं उन लोगों को सामूहिक रूप से आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर देती हैं, जिनके पास व्यक्तिगत रूप से सीमित पूंजी, संसाधन या बाजार तक पहुंच होती है। भारत में सहकारिता का विस्तार कृषि, डेयरी, बैंकिंग, मत्स्य पालन, श्रम, आवास, उपभोक्ता वस्तुओं और ग्रामीण उद्योगों सहित अनेक क्षेत्रों में हुआ है। सहकारी समितियों ने छोटे और सीमांत किसानों, ग्रामीण महिलाओं, कारीगरों, मजदूरों तथा निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों को ऋण, बीज, खाद, चारा और अन्य कृषि इनपुट उपलब्ध होते हैं तथा उनके उत्पादों के लिए बाजार और बेहतर मूल्य प्राप्त करने के अवसर बढ़ते हैं। सामाजिक स्तर पर सहकारिता सामूहिक निर्णय, लोकतांत्रिक भागीदारी, आत्मनिर्भरता, सामाजिक एकता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देती है। हालांकि पूंजी की कमी, प्रबंधन संबंधी समस्याएं, राजनीतिक हस्तक्षेप, तकनीकी पिछड़ापन और बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं। इन चुनौतियों के समाधान के लिए पारदर्शी प्रशासन, डिजिटल तकनीक, पेशेवर प्रबंधन, वित्तीय समावेशन और सदस्यों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। सहकारी समितियों को मजबूत करके भारत में समावेशी, टिकाऊ और जन-केंद्रित आर्थिक विकास को नई गति दी जा सकती है।

प्रस्तावना : भारत में सहकारिता की परंपरा बहुत पुरानी है। गांवों में लोग सदियों से सामूहिक रूप से संसाधनों का उपयोग करते आए हैं। पानी की व्यवस्था, कृषि कार्य, सामुदायिक संसाधनों का प्रबंधन और पारस्परिक सहायता जैसी परंपराएं भारतीय ग्रामीण समाज में सहयोग की भावना को दर्शाती हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था में इसी सहयोग की भावना को संस्थागत रूप देकर सहकारी समिति का स्वरूप दिया गया। सहकारी समिति ऐसे लोगों का स्वैच्छिक संगठन है, जो अपने साझा आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक हितों की पूर्ति के लिए मिलकर कार्य करते हैं। इसमें सदस्य केवल ग्राहक या लाभार्थी नहीं होते, बल्कि संस्था के मालिक और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदार भी होते हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सहकारिता का महत्व और भी बढ़ जाता है। देश में बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास कम भूमि और सीमित पूंजी है। अकेले बाजार में उनकी सौदेबाजी की क्षमता कम होती है। लेकिन जब वे सामूहिक रूप से संगठित होते हैं, तो खरीद, उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन में उनकी स्थिति मजबूत हो जाती है। इस प्रकार सहकारी समितियां केवल आर्थिक संगठन नहीं हैं। वे आर्थिक अवसरों के साथ सामाजिक भागीदारी और सामूहिक आत्मनिर्भरता का माध्यम भी हैं।

सहकारिता की मूल भावना : सहकारिता का आधार व्यक्तिगत लाभ के बजाय सामूहिक हित है। इसका उद्देश्य सदस्यों को आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर देना और उन्हें ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराना है, जिन्हें वे अकेले आसानी से प्राप्त नहीं कर सकते। सहकारिता के प्रमुख सिद्धांतों में स्वैच्छिक सदस्यता, लोकतांत्रिक नियंत्रण, सदस्यों की आर्थिक भागीदारी, स्वायत्तता, शिक्षा एवं प्रशिक्षण और समुदाय के विकास के प्रति जिम्मेदारी शामिल हैं। सहकारी संस्था में सामान्यतः निर्णय लेने का अधिकार पूंजी के आकार के बजाय सदस्यता पर आधारित होता है। इसका अर्थ है कि एक छोटा किसान और अपेक्षाकृत बड़ा किसान भी संस्था के लोकतांत्रिक ढांचे में समान सदस्य के रूप में भाग ले सकते हैं। यही विशेषता सहकारिता को पारंपरिक व्यावसायिक कंपनियों से अलग बनाती है।

सहकारी समितियों का आर्थिक योगदान

छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक शक्ति : भारत में बड़ी संख्या में किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं। ऐसे किसानों के लिए अकेले बाजार में अपनी उपज बेचने या आवश्यक कृषि सामग्री खरीदने में कई कठिनाइयां होती हैं। सहकारी समितियां किसानों को सामूहिक रूप से संगठित करती हैं। किसान अपनी उपज को एकत्र करके बड़े पैमाने पर बेच सकते हैं। इससे परिवहन, भंडारण और विपणन की लागत कम हो सकती है तथा किसानों की बाजार में सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है। सामूहिक खरीद से बीज, खाद, कीटनाशक, कृषि उपकरण और अन्य आवश्यक वस्तुएं अपेक्षाकृत बेहतर शर्तों पर प्राप्त की जा सकती हैं।

 कृषि ऋण और वित्तीय समावेशन : ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के लिए समय पर और उचित ब्याज दर पर ऋण प्राप्त करना हमेशा आसान नहीं रहा है। सहकारी बैंक और ग्रामीण सहकारी संस्थाएं किसानों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कृषि ऋण के माध्यम से किसान बीज, खाद, मशीनरी, पशुधन और अन्य कृषि आवश्यकताओं पर निवेश कर सकते हैं। इससे ग्रामीण परिवारों की अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलता है।

 किसानों को बाजार से जोड़ना : उत्पादन करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उत्पाद को उचित बाजार और उचित मूल्य दिलाना भी है। कई बार छोटे किसान बिखरे हुए उत्पादन और कमजोर बाजार संपर्क के कारण अपनी उपज कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सहकारी समितियां किसानों की उपज को एकत्र करके उसे संगठित बाजार तक पहुंचाने में सहायता कर सकती हैं। दूध, अनाज, फल, सब्जियां, मसाले, मछली, हस्तशिल्प और अन्य उत्पादों के लिए सहकारी विपणन व्यवस्था किसानों की आय बढ़ाने में उपयोगी हो सकती है।

 डेयरी क्षेत्र में योगदान : भारत में सहकारिता की सबसे सफल कहानियों में डेयरी सहकारिता का महत्वपूर्ण स्थान है। Amul से जुड़ा सहकारी मॉडल इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। डेयरी सहकारिता के माध्यम से छोटे पशुपालक अपने दूध को संगठित संग्रह केंद्रों तक पहुंचा सकते हैं। दूध की गुणवत्ता की जांच, संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था विकसित होने से उत्पादकों को बाजार से जुड़ने का अवसर मिलता है। इस मॉडल ने यह दिखाया है कि छोटे उत्पादक भी सामूहिक संगठन के माध्यम से बड़े बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।

 रोजगार का सृजन : सहकारी संस्थाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में रोजगार पैदा करती हैं। डेयरी सहकारी समितियों में दूध संग्रह और प्रसंस्करण से रोजगार मिलता है। कृषि सहकारी संस्थाओं में भंडारण, परिवहन और विपणन की गतिविधियां रोजगार पैदा करती हैं। इसी प्रकार मछली पालन, हस्तशिल्प, श्रमिक और ग्रामीण उद्योग सहकारी समितियां स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ा सकती हैं। इससे ग्रामीण युवाओं को अपने क्षेत्र में ही रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिल सकते हैं।

 स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना : सहकारी समितियों का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर रहता है। जब किसान और ग्रामीण उत्पादक अपनी संस्था के माध्यम से उत्पादन और विपणन करते हैं, तो आय का एक हिस्सा स्थानीय अर्थव्यवस्था में पुनः निवेश हो सकता है। इससे गांवों में व्यापार, परिवहन, सेवाओं और छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार सहकारिता ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थानीय आर्थिक चक्र को मजबूत कर सकती है।

 मूल्यवर्धन को बढ़ावा : कच्चे उत्पाद को सीधे बेचने की तुलना में उसका प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन अधिक आय दे सकता है। सहकारी संस्थाएं दूध से दही, पनीर और अन्य उत्पाद; फलों से प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ; कृषि उत्पादों से पैकेज्ड वस्तुएं और हस्तशिल्प को बाजार योग्य उत्पादों में बदलने की दिशा में कार्य कर सकती हैं। मूल्यवर्धन से किसानों और उत्पादकों को अंतिम उपभोक्ता द्वारा भुगतान किए गए मूल्य में अधिक भागीदारी का अवसर मिलता है।

सहकारी समितियों का सामाजिक योगदान

 सामाजिक एकता : सहकारिता का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक योगदान लोगों को एक साझा उद्देश्य के लिए संगठित करना है। जाति, वर्ग, आर्थिक स्थिति और व्यक्तिगत हितों के अंतर के बावजूद जब लोग किसी सहकारी संस्था के सदस्य बनते हैं, तो वे साझा आर्थिक गतिविधि में भाग लेते हैं। इससे संवाद और सहयोग की भावना विकसित हो सकती है। सहकारी संस्थाएं ग्रामीण समाज में सामूहिक जिम्मेदारी और पारस्परिक विश्वास को मजबूत करने का माध्यम बन सकती हैं।

 लोकतांत्रिक भागीदारी : सहकारिता लोकतंत्र की भावना को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का माध्यम है। सदस्य बैठकों में भाग लेते हैं, संस्था के प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और संस्था के संचालन से संबंधित निर्णयों पर अपनी राय देते हैं। इस प्रक्रिया से लोगों में नेतृत्व, निर्णय लेने और जवाबदेही की भावना विकसित होती है। इस दृष्टि से सहकारी संस्थाएं केवल आर्थिक संस्थान नहीं बल्कि स्थानीय लोकतांत्रिक प्रशिक्षण के केंद्र भी बन सकती हैं।

 महिला सशक्तिकरण : महिलाओं के लिए सहकारी संस्थाएं आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं। दुग्ध, हस्तशिल्प, कृषि प्रसंस्करण, स्वयं सहायता समूहों और अन्य सामूहिक व्यवसायों में महिलाओं की भागीदारी से उनकी आय और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ सकती है। जब महिला स्वयं आय अर्जित करती है और संस्था के निर्णयों में भाग लेती है, तो परिवार और समुदाय में उसकी सामाजिक स्थिति मजबूत होती है। महिला सहकारिता का प्रभाव केवल व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं रहता। इससे बच्चों की शिक्षा, परिवार के स्वास्थ्य, पोषण और घरेलू आर्थिक निर्णयों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

 कमजोर वर्गों का समावेशन : सहकारिता का उद्देश्य आर्थिक अवसरों को अधिक लोगों तक पहुंचाना है। इसलिए यह समाज के कमजोर और संसाधन-वंचित वर्गों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर, कारीगर, मछुआरे, ग्रामीण महिलाएं और छोटे उत्पादक सामूहिक संगठन के माध्यम से बाजार, वित्त और तकनीकी सेवाओं तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार सहकारिता समावेशी विकास को बढ़ावा देती है।

 ग्रामीण पलायन को कम करने में भूमिका : ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के पर्याप्त अवसर न होने पर लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। मजबूत सहकारी संस्थाएं स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता पैदा करके इस दबाव को कम करने में योगदान दे सकती हैं। यदि गांव में ही डेयरी, कृषि प्रसंस्करण, भंडारण, विपणन और अन्य सहकारी व्यवसाय विकसित हों, तो ग्रामीण युवाओं को अपने क्षेत्र में आर्थिक अवसर मिल सकते हैं।

 सामाजिक सुरक्षा : कई ग्रामीण परिवारों की आय अनिश्चित होती है। फसल खराब होने, बीमारी, बाजार मूल्य में गिरावट या अन्य संकटों के कारण उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। सहकारी संस्थाएं सामूहिक बचत, ऋण, बीमा और अन्य सामाजिक-आर्थिक सेवाओं के माध्यम से सदस्यों की जोखिम सहने की क्षमता को मजबूत कर सकती हैं।

 शिक्षा और कौशल विकास : सहकारी संस्थाओं को सफल बनाने के लिए सदस्यों का शिक्षित और प्रशिक्षित होना आवश्यक है। कई सहकारी संस्थाएं अपने सदस्यों को उत्पादन, वित्तीय प्रबंधन, डिजिटल तकनीक, विपणन, गुणवत्ता नियंत्रण और व्यवसाय प्रबंधन से संबंधित प्रशिक्षण दे सकती हैं। इससे ग्रामीण लोगों में तकनीकी और व्यावसायिक कौशल विकसित होते हैं।

सहकारिता और सतत विकास : आज आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी आवश्यक हो गया है। सहकारी संस्थाएं सतत विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। किसान सहकारी समितियां जल संरक्षण, जैविक खेती, प्राकृतिक संसाधनों के सामूहिक प्रबंधन और कृषि अपशिष्ट के पुनर्चक्रण जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती हैं। डेयरी और पशुपालन सहकारी समितियां गोबर से जैविक खाद और बायोगैस उत्पादन को प्रोत्साहित कर सकती हैं। इसी प्रकार मत्स्य सहकारी समितियां जल संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और मछली संसाधनों के संरक्षण में योगदान दे सकती हैं। इस प्रकार सहकारिता आर्थिक लाभ और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकती है।

डिजिटल युग में सहकारिता : डिजिटल तकनीक सहकारी संस्थाओं के लिए नए अवसर लेकर आई है। ऑनलाइन भुगतान, डिजिटल लेखांकन, मोबाइल एप्लीकेशन, ऑनलाइन बाजार और डिजिटल पहचान से सहकारी संस्थाओं की पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाई जा सकती है। किसान अपने उत्पादों के बाजार मूल्य की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। डिजिटल भुगतान से लेन-देन अधिक सुविधाजनक और पारदर्शी हो सकता है। ई-कॉमर्स के माध्यम से ग्रामीण उत्पादों को स्थानीय बाजार से बाहर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की संभावना भी बढ़ी है। हालांकि डिजिटल तकनीक के लाभ के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, डिजिटल साक्षरता और तकनीकी प्रशिक्षण आवश्यक है।

सहकारी समितियों के सामने चुनौतियां

सहकारिता की अनेक सफलताओं के बावजूद इसके सामने कई चुनौतियां हैं।

प्रबंधन की कमजोरी : कुछ सहकारी संस्थाओं में पेशेवर प्रबंधन और आधुनिक व्यवसायिक कौशल की कमी होती है। इससे संस्था की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।

राजनीतिक हस्तक्षेप : जहां सहकारी संस्थाओं के निर्णय आर्थिक और सदस्य हितों के बजाय राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित होते हैं, वहां उनकी स्वायत्तता और कार्यक्षमता कमजोर हो सकती है।

वित्तीय समस्या : कुछ संस्थाओं के पास पर्याप्त पूंजी नहीं होती। आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण और विपणन के लिए निवेश की आवश्यकता होती है।

सदस्यों की कम भागीदारी : यदि सदस्य केवल लाभ प्राप्त करने के लिए संस्था से जुड़े रहें और निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी न करें, तो सहकारी भावना कमजोर हो सकती है।

तकनीकी पिछड़ापन : डिजिटल युग में डेटा प्रबंधन, ऑनलाइन बाजार और आधुनिक लेखांकन की कमी संस्था को प्रतिस्पर्धा में पीछे कर सकती है।

बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा : आज सहकारी संस्थाओं को निजी कंपनियों और बड़े व्यवसायों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इसलिए उन्हें गुणवत्ता, कीमत, नवाचार और ग्राहक सेवा पर विशेष ध्यान देना होगा।

सहकारिता को मजबूत करने के उपाय

सहकारी संस्थाओं को भविष्य के लिए मजबूत बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम आवश्यक हैं।1, सहकारी संस्थाओं में पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 2, सदस्यों को आधुनिक प्रबंधन, वित्तीय साक्षरता और डिजिटल तकनीक का प्रशिक्षण देना चाहिए।3, सहकारी संस्थाओं को बाजार की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार नए उत्पाद और सेवाएं विकसित करनी चाहिए। 4, महिला और युवा सदस्यों की निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।5, सहकारी संस्थाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाना चाहिए।6, उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और विपणन तक पूरी मूल्य श्रृंखला में सहकारिता की भूमिका बढ़ाई जानी चाहिए।7, सहकारी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखते हुए उनकी लोकतांत्रिक और आर्थिक स्वायत्तता को मजबूत किया जाना चाहिए।

सहकारिता और आत्मनिर्भर भारत

भारत के आत्मनिर्भर विकास के लक्ष्य में सहकारिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल देश में उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि स्थानीय उत्पादकों को उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और मूल्यवर्धन की पूरी प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देना भी है। यदि गांव के किसान और उत्पादक संगठित होकर अपनी उपज का प्रसंस्करण और विपणन स्वयं करें, तो मूल्य श्रृंखला में उनकी हिस्सेदारी बढ़ सकती है इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा।

निष्कर्ष : सहकारी समितियां भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास की महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे व्यक्तिगत क्षमता को सामूहिक शक्ति में बदलती हैं। एक छोटा किसान अकेले बाजार में कमजोर हो सकता है, लेकिन हजारों किसान एक सहकारी संस्था के माध्यम से संगठित होकर उत्पादन, खरीद, प्रसंस्करण और विपणन में बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकते हैं। इसी प्रकार ग्रामीण महिलाएं, कारीगर, मछुआरे और छोटे उत्पादक भी सहकारिता के माध्यम से आर्थिक अवसरों तक पहुंच बना सकते हैं। सहकारिता आर्थिक लाभ के साथ सामाजिक एकता, लोकतांत्रिक भागीदारी, महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और वित्तीय समावेशन को भी बढ़ावा देती है। यही कारण है कि सहकारी समितियां केवल व्यवसाय करने का तरीका नहीं हैं, बल्कि समावेशी और जन-केंद्रित विकास का मॉडल हैं। 21वीं सदी में सहकारिता को अपनी पारंपरिक ताकत—सामूहिकता और विश्वास—को आधुनिक तकनीक, पेशेवर प्रबंधन, डिजिटल बाजार और नवाचार के साथ जोड़ना होगा। यदि ऐसा किया जाता है, तो सहकारी संस्थाएं भारत के ग्रामीण और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सबसे मजबूत शक्तियों में से एक बन सकती हैं। अंततः कहा जा सकता है कि “सहकारिता में केवल आर्थिक लाभ का विचार नहीं, बल्कि सामूहिक प्रगति का दर्शन छिपा है।” जब व्यक्ति अपने हित के साथ समुदाय के हित को जोड़कर आगे बढ़ता है, तब विकास अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और टिकाऊ बनता है। भारत के भविष्य के विकास में यही सहकारी भावना एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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