पशुपालन

जैविक खेतीः बेहतर स्वास्थ्य और कल के लिए

डॉ. दीपक कुमार कश्यप, डॉ. देवेश कुमार गिरी और डॉ. ओमप्रकाश

जैविक खेती : जैविक खेती कृषि की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें रसायनों (केमिकल) का उपयोग किए बिना प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से फसलों और भोजन का उत्पादन किया जाता है। इसमें कृत्रिम उर्वरकों, सिंथेटिक कीटनाशकों, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों या ग्रोथ हार्मोन्स की जगह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का सहारा लिया जाता है ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे, जल प्रदूषण न हो और जैव विविधता को बढ़ावा मिले।

जैविक खेती के मुख्य सिद्धांत

  • कृषि को मिट्टी, पौधों, पशुओं, मनुष्यों और पूरे ग्रह के स्वास्थ्य को एक एकीकृत इकाई के रूप में बनाए रखना और बढ़ाना चाहिए।
  • खेती की पद्धतियां जीवंत पारिस्थितिक प्रणालियों और चक्रों पर आधारित होनी चाहिए उनके साथ काम करना, उनका अनुकरण करना और उन्हें बनाए रखने में मदद करना चाहिए।
  • किसानों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण के बीच के संबंधों में जीवन के अवसरों और पर्यावरणीय देखभाल के संबंध में निष्पक्षता होनी चाहिए।
  • वर्तमान और भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा के लिए जैविक खेती का प्रबंधन सावधानीपूर्वक और जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए।

प्रमुख तकनीकें और पद्धतियां
जैविक किसान स्वस्थ फसलें उगाने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जैविक विज्ञान के संयोजन का उपयोग करते हैं।

मिट्टी की उर्वरता का प्रबंधन

  • जैविक खेती में मिट्टी को केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र माना जाता है।
  • कंपोस्ट और वर्मीकंपोस्टः’’ जैविक अपशिष्ट या केंचुओं द्वारा तैयार खाद (वर्मीकंपोस्ट) मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) और सूक्ष्मजीव प्रदान करती है।
  • हरी खादः सनई, ढैंचा या बरसीम जैसे तेजी से बढ़ने वाले पौधों को उगाकर हरी अवस्था में ही खेत में जोत दिया जाता है, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थ बढ़ते हैं।
  • पशुओं की खादः’’ गोबर की अच्छी तरह सड़ी हुई खाद और पोल्ट्री खाद मिट्टी को दीर्घकालिक पोषण देती है और उसकी जलधारण क्षमता में सुधार करती है।

फसल चक्र और बहु-फसल प्रणाली

  • एक ही भूमि पर बार-बार एक ही फसल उगाने से विशिष्ट पोषक तत्व समाप्त हो जाते हैं और कीटों का प्रकोप बढ़ता है। जैविक किसान क्रमबद्ध रूप से अलग-अलग श्रेणियों की फसलें बदलते हैं।
  • नाइट्रोजन-फिक्सिंग दलहनी फसलेंः मटर, चना और दालों की जड़ों में पाए जाने वाले ’राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में अवशोषित करते हैं।
  • अधिक पोषक तत्व वाली फसलेंः दलहनी फसलों के बाद मक्का, गोभी या टमाटर जैसी फसलों को लगाया जाता है ताकि वे संचित नाइट्रोजन का उपयोग कर सकें।
  • कवर क्रॉप्स (आवरण फसलें): मुख्य फसलों के बीच के समय में राई या जई जैसी फसलें उगाई जाती हैं ताकि मिट्टी का कटाव रुके और खरपतवार न पनपें।

प्राकृतिक कीट एवं रोग नियंत्रण
रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव के बजाय प्राकृतिक संतुलन का उपयोग किया जाता हैः

  • जैविक कीटनाशकः नीम के बीज का अर्क, लहसुन-मिर्च का घोल, या जैविक एजेंट बिना किसी हानिकारक अवशेष के कीटों को नियंत्रित करते हैं।
  • मित्र कीटः’ लेडीबग, लेसविंग और मेंटिस जैसे प्राकृतिक शिकारी कीट हानिकारक कीटों (जैसे माहू एफिड्स और सुंडी) को खाकर नियंत्रित रखते हैं।
  • ट्रैप क्रॉप्सः मुख्य फसल के चारों ओर गेंदा या सरसों जैसी फसलें लगाई जाती हैं ताकि हानिकारक कीट मुख्य फसल को छोड़कर इन पर आ जाएं।

खरपतवार नियंत्रण
खरपतवारों को यांत्रिक और पारिस्थितिक तरीकों से प्रबंधित किया जाता हैः

  • ’मल्चिंग:’’ मिट्टी को पुआल, सूखी पत्तियों या लकड़ी के बुरादे से ढक दिया जाता है, जिससे सूर्य का प्रकाश न मिलने के कारण खरपतवार नहीं उगते और मिट्टी की नमी बनी रहती है।
  • निराई-गुड़ाईः’’ खरपतवारों में बीज बनने से पहले उन्हें हाथों से या हल्के हल से निकाल दिया जाता है।

प्रमुख लाभ

  • पर्यावरण संरक्षणः मधुमक्खियों और तितलियों जैसे परागणकों की रक्षा करता है, मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को बनाए रखता है और जल स्रोतों को दूषित होने से बचाता है।
  • सुरक्षित भोजनः उपज में कोई हानिकारक रासायनिक अवशेष या कृत्रिम हार्मोन नहीं होते।
  • मिट्टी का पुनरुद्धारः मिट्टी में ह्यूमस का निर्माण करता है, जलधारण क्षमता बढ़ाता है और बंजर होने से रोकता है।
  • जलवायु सहनशीलताः अधिक कार्बनिक पदार्थ वाली मिट्टी कार्बन को अवशोषित करती है और सूखे के समय नमी बनाए रखती है।

जैविक खेती बनाम रासायनिक (पारंपरिक) खेती

जैविक खेती रासायनिक (पारंपरिक) खेती
पोषक तत्वों का स्रोत कंपोस्ट, गोबर खाद, जैव उर्वरक, हरी खाद सिंथेटिक रासायनिक उर्वरक (यूरिया, डीएपी, एनपीके)
कीट नियंत्रण जैव-कीटनाशक, मित्र कीट, फसल चक्र सिंथेटिक रासायनिक कीटनाशक, फफूंदनाशक
खरपतवार नियंत्रण ’मल्चिंग, हाथ से निराई, आवरण फसलें रासायनिक खरपतवारनाशक (जैसे ग्लाइफोसेट)
मिट्टी की संरचना मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ और सूक्ष्मजीव बढ़ते हैं सूक्ष्मजीव कम होते हैं और मिट्टी कठोर हो सकती है
पर्यावरण पर प्रभाव जल प्रदूषण मुक्त, जैव विविधता को बढ़ावा भूजल प्रदूषण और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने का जोखिम
उत्पादन व लागत  इनपुट लागत कमय 2 से 3 वर्षों में उपज स्थिर होती है  शुरुआत में अधिक उपजय निरंतर रसायनों पर निर्भरता

जैविक खेती की चुनौतियां

  • रूपांतरण कालः रासायनिक से पूर्ण जैविक खेती में बदलने में 2 से 3 साल का समय लगता है, जिस दौरान मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और शुरुआती दौर में उपज थोड़ी कम हो सकती है।
  • अधिक श्रम की आवश्यकताः निराई-गुड़ाई, कंपोस्ट बनाने और नियमित निगरानी के लिए अधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है।
  • प्रमाणीकरणः आधिकारिक जैविक प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए विस्तृत रिकॉर्ड रखना, मिट्टी का परीक्षण और वार्षिक निरीक्षण आवश्यक होता है।
  • शीघ्र खराब होनाः रासायनिक परिरक्षकों या कृत्रिम वैक्स का उपयोग न होने के कारण जैविक उत्पादों को सही रखरखाव की आवश्यकता होती है।

जैविक प्रमाणीकरण
अपने उत्पादों को जैविक के रूप में बेचने के लिए किसानों को कड़े मानकों का पालन करना होता है। प्रमाणित करने वाली एजेंसियां यह जांचती हैंः

  • खेत में कम से कम पिछले 3 वर्षों से किसी भी प्रतिबंधित रसायन का उपयोग न हुआ हो।
  • जैविक और आसपास के रासायनिक खेतों के बीच बफर जोन मौजूद हो।
  • बीज, खाद, मिट्टी परीक्षण और फसल की बिक्री का पूरा रिकॉर्ड रखा गया हो।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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