पशुपालन

रेबीज- एक घातक संक्रामक रोग

डॉ अरविंद कुमार नंदनवार (सहायक प्राध्यापक), डॉ सेवक अमृत ढ़ेंगे (सहायक प्राध्यापक) एवं डॉ प्रेरणा जायसवाल (अतिथि शिक्षक)

भारत में वर्तमान में कुत्ते पालन का क्रेज बड़ा है साथ ही साथ कुत्ते एवं बिल्ली द्वारा काटने की घटनाएंभी सामने आ रही हैं। लेकिन कुत्तों द्वारा काटे जाने के बाद लोगों में लापरवाही एवं असंवेदनशीलता भी बड़ी है, जिसके परिणाम स्वरुप एक घातक बीमारी भी फैलती जा रही है, जिस तरफ अधिकतर लोगों का ध्यान नहीं जाता। इस जानलेवा बीमारी का नाम रेबीज है । रेबीज एक अत्यधिक घातक विषाणु जनित रोग है जिसे संक्रामक रोगों की श्रेणी में रखा गया है, जिनके विषाणु जानवरों से इंसानों में फैलते हैं। रेबीज को एंथ्रोपोजून¨सिस भी कहा जाता है। एंथ्रोजून¨पोसिस विशेष रूप से उन जूनोटिक रोगों को कहा जाता है, जो मुख्य रूप से जानवरों में होते हैं परंतु इंसानों को भी संक्रमित कर सकतेहै। सामान्यतः यह आवारा कुत्तों एवं कुछ जंगली जानवरों जैसे चमगादड़, रैकून, स्कंक एवं लोमड़ी में देखा गया है। इस बीमारी से ग्रसित जानवरों के काटने एवं खरोचने से विषाणु संक्रमित जानवरों की लार से इंसानों में फैलते हैं।

भारत में इस बीमारी से 99 प्रतिशतमृत्यु दर का प्रमुख कारण ग्रसित कुत्तों के काटने से होता है। भारत में रेबीज के कारण मृत्यु दर विश्व का 36 प्रतिशतहै। रेबीज के विषाणु मुख्य तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। यह एक गंभीर और जानलेवा स्थिति है जिसे एन्सेफेलाइटीस या दिमागी बुखार कहते हैं जिसमें मस्तिष्क में सूजन आ जाती है। रेबीज के घातक प्रभाव को आमतौर पर लोगों के बीच पहुंचाने के उद्देश्य से हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। रेबीज 150 से ज्यादा देशों और इलाकों में खासकर एशिया और अफ्रीका में सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक गंभीर समस्या है जिससे हर साल हजारों लोगों की मौते होती है। इनमें से 40 प्रतिशतमौते 15 साल से कम उम्र के बच्चों की होती है।

रेबीज के कारक
रेबीज लाइसा वायरस से होता है। लाइसा वायरस रैबड¨विरिडी परिवार से है, जो गोली के आकार (75mm x 180mm) जैसा होता है, जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। यह वाइरस अत्यंत नाजुक होते हैं जो शरीर के बाहर गर्मी, साबुन या धूप के प्रभाव से आसानी से नष्ट हो जाते हैं। रेबीज के सामान्यतः दो रूप होते हैं प्रथम उग्र रूप एवं द्वितीय लकवाग्रस्त रूप। मनुष्यों में होने वाले रेबीज का सबसे आम रूप उग्र रेबीज होता है। एक बार रेबीज के लक्षण दिखने पर दोनों ही रूप हमेशा जानलेवा साबित होते हैं ।

रेबीज का संचरण
रेबीज के विषाणु सामान्यतः संक्रमित जानवरों के लार में पाए जाते हैं। जब भी कोई संक्रमित जानवर किसी मनुष्य को काटता या खरोचता है, तो यह विषाणुु लार के माध्यम से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। यदि किसी मनुष्य को चोट लगी है तब भी यह विषाणु उस चोट के माध्यम से भी शरीर में प्रवेश कर सकता है। रेबीज का विषाणु रक्त या मल में नहीं पाया जाता।

रेबीज के लक्षण
कुत्ते एवं बिल्ली में लक्षण- सामान्यतः कुत्तों में प्राकृतिक रूप से फैलने वाले रेबीज के लक्षण औसतन 3 से 8 सप्ताह तक दिखाई देते हैं। परंतु यह 10 दिनों से लेकर वर्षों तक हो सकता है। बिल्लियों में उग्र रूप अधिक देखा गया है।

1}उग्र अवस्था- इस अवस्था में सामान्यतः व्यवहार में परिवर्तन होता है साथ ही जानवरों में उत्तेजना की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अवस्था में कुत्तों द्वारा विभिन्न लक्षण दिखाई देते हैं

  • कुत्ते बेहद उग्र हो जाते हैं और किसी भी सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं को तब तक काटते हैं जब तक उनकी मृत्यु ना हो जाए।
  • इस अवस्था में कुत्तों द्वारा किसी भी वस्तुओं को पकड़ने की मुद्राएँ दिखाई देती है।
  • लार का बहाना।
  • ग्रसनी एवं स्वर यंत्र की मांसपेशियों के लकवा ग्रस्त होने के कारण कुत्ता पानी पीने व चाटने में असमर्थ होता है।
  • प्रकाश की उपस्थिति कुत्तों में भय की स्थिति पैदा करती है।
  • कुत्तों के भौंकने में परिवर्तन आता है।
  • अंतिम अवस्था तक कुत्तों के जबड़े का निचला भाग लटक जाता है एवं जीभ बाहर आ जाती है। ।

2}लकवाग्रस्त रूप

  • कुत्तों को प्रकाश से डर लगता है एवं वे अंधेरी जगह पर एकांत में रहते हैं।
  • इस अवस्था में कुत्ता काटने में असमर्थ होता है क्योंकि जबड़े का निचला हिस्सा लटक जाता है।
  • अंतिम अवस्था में श्वसन संबंधी रोगों के समस्याओं के कारण मृत्यु हो जाती है।

अन्य मवेशियों में रेबीज के लक्षण
1}उग्र रूप

  • अन्य जानवरों एवं निर्जीव वस्तुओं पर आक्रामक हमला करना।
  • जोर-जोर से आवाज निकालना।
  • पशुओं को चलने में परेशानी होना एवं ठीक से ना चल पाना।
  • मुंह से लार बाहर निकलना।
  • पशुओं के सामान्य व्यवहार में परिवर्तन एवं पशुओं में आक्रामक स्वभाव आना।

2}लकवाग्रस्त रूप-

  • पूछ का एक तरफ मुडना।
  • मुंह से अत्यधिक लार का गिरना।
  • पैर के टखने को मोड कर रखना।
  • शरीर के पिछले हिस्से का लटकना एवं डगमगाकर चलना।
  • मांसपेशियों में कंपन होना।
  • शरीर के किसी एक अंग में अचानक लंगड़ापन आना और उसके बाद लेेट जाना।
  • कभी-कभी इस बीमारी से पशु अपना सिर हिंसक तरीके से जमीन पर पटकते हैं।

मनुष्य में रेबीज
ग्रसित जानवर के काटने से काटने वाली जगह पर दर्द एवं जलन महसूस होता है जो परिधि तंत्रिकाओं से होते हुए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की ओर फैलती है जिसके बाद मस्तिष्क को प्रभावित करती है। मनुष्यों में आमतौर पर 30 से 60 दिनों की अवधि पर इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। साथ ही साथ यह अवधि निम्न कारको पर निर्भर करती है जैसे काटने की दूरी, काटने की गंभीरता, काटने के स्थान पर प्रवेश किए गए वायरस की मात्रा एवं रेबीज से संक्रमित जानवर की आक्रामक स्थिति आदि। वायरस जब मस्तिष्क में पहुंच जाता है तब यह दिमागी बुखार या इंसेफेलाइटिस कहलाता है जिसमें मस्तिष्क में सूजन आ जाती है एवं रेबीज के लक्षण मनुष्य में दिखाई देने लगते हैं।

मनुष्य में रेबीज के लक्षण

  • हाइड्रोफोबिया- इसमें मनुष्य को पानी पीने से डर लगता है। पानी पीते समय स्वर यंत्र में दर्दनाक एठन होता है जिसके कारण रोगी पानी पीने से इनकार कर देता है।
  • रोगी के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देता है एवं वह हमेशा बेचैन रहता है।
  • मांसपेशियों में ऐंठन होती है।
  • रोगी की लार चिपचिपा एवं गाढ़ी हो जाती है।
  • रोगी की आँखों से अधिक आंसू आने लगता है।
  • रोगी में अधिक पसीना आता है।
  • रोगी को बार-बार पेशाब आता है।

रेबीज रोग को पहचाने कैसे
यदि किसी जानवर के टीकाकरण का इतिहास उपलब्ध नहीं है और उस जानवर द्वारा किसी अन्य को काटा जाता है और वह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के लक्षण प्रदर्शित करता है तो उसे रेबीज रोग की समस्या के तौर पर माना जा सकता है।

  • फ्लोरोसेंट एंटीबॉडी परीक्षण- रेबीज रोग को पहचानने का अत्यधिक तीव्र परीक्षण फ्लोरोसेंट एंटीबॉडी परीक्षण (एएफटी) है। जिसमें मस्तिष्क का स्मीयर बनाया जाता है।
  • कॉर्नीयल स्मीयर परीक्षण-कॉर्नीयल स्मीयर द्वारा भी इस रोग की पहचान की जाती है।
  • नेग्रींबॉडीज- नेग्रींबॉडीज की पहचान द्वारा भी रेबीज का पता लगाया जा सकता है नेग्रींबॉडीज को इंटरासाइटोप्लास्मिक इंक्लूजन बॉडीज भी कहा गया है जो रेबीज रोग से ग्रसित मस्तिष्क में पाया जाता है इसे सेल स्टेन तकनीक द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है।

उपचार

  • किसी संदिग्ध जानवर द्वारा काटे जाने या किसी भी प्रकार के संपर्क में आने से जल्द से जल्द उस घाव को साफ करें एवं टीकाकरण करवाए। इस स्थिति में लगभग 100 प्रतिशतमामलों में रेबीज के होने की संभावना को रोका जा सकता है।
  • घाव को बहते पानी से धोएं एवं साफ करें।
  • घाव को फेनोलिक साबुन से धोएं एवं एंटीसेप्टिक का उपयोग करें।
  • घाव या किसी भी खरोच या कटे हुए स्थान को कभी भी पट्टी एवं टांके लगाने जैसे उपचार से दूर रखें।
  • घाव को हमेशा खुला रखें।
  • रेबीज रोधी टीका यथाशीघ्र लगाया जाए।
  • यदि किसी जानवर को पहले से टीकाकरण नहीं किया गया है तो इस स्थिति में काटने के 24 घंटे के भीतर टीकाकरण करना आवश्यक है। यह टीकाकरण मुख्यतः पहले दिन (काटने के 24 घंटे के भीतर), तीसरे सातवें,, 14वे, 28वें दिन किया जाता है। यदि आवश्यक हो तो नब्बेवे दिन भी टीकाकरण करना चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्लूयू एच ओ) का एक लक्ष्य ‘‘वन हेल्थ‘‘ के माध्यम से कुत्तों द्वारा फैलने वाली रेबीज से होने वाली मानव मौतो को समाप्त करना है, जिसमें बड़े पैमाने पर कुत्तों के टीकाकरण को बढ़ावा देना, स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षण देना, बेहतर निगरानी और सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से काटने से बचाव करना शामिल है।

जागरूकता
रेबीज वैक्सीनेशन प्रोग्राम के साथ-साथ बच्चों और बड़ों को कुत्तों के व्यवहार और उनके काटने से बचाव के बारे में जानकारी देना रेबीज वाले जानवर के काटने या खरोचने पर क्या करें और पालतू जानवरों की जिम्मेदारी से देखभाल करना भी बहुत जरूरी है।

जानवर के काटने से हुए घाव का इलाज
भौतिक विधि : बहते पानी से धोएं घाव से वायरस को यांत्रिक तरीके से हटाना
रासायनिक विधि : घाव को साबुन और पानी से धोएं, कीटाणुनाशक लगाएं वायरस को निष्क्रिय करना
बायोलॉजिकल विधि : कैटेगरी प्प्प् के एक्सपोजर में घाव की गहराई में और उसके आस-पास इम्युनोग्लोबुलिन पहुँचाना वायरस को बेअसर करना

अपना जोखिम कम करने के लिए 10 बातों का ध्यान रखे
  1. अपने पालतू जानवर को रेबीज का टीका लगवाएं।
  2. जंगली जानवरों को पालतू न बनाएं। अमेरिकी लोग 15 लाख से ज्यादा विदेशी जानवरों को पालतू बनाकर रखते हैं, जिन्हें रेबीज का टीका नहीं लगाया जा सकता।
  3. जंगली जानवरों को न छुएं, चाहे वे मरे हों या जिंदा। हालांकि वायरस मरे हुए जानवरों में ज्यादा देर तक जीवित नहीं रहता, फिर भी उन्हें उठाने से पहले नमी-रोधी (मॉइस्चर-प्रूफ) दस्ताने पहनने चाहिए।
  4. अजीब व्यवहार करने वाले जानवरों से दूर रहें। जो जंगली जानवर असामान्य रूप से मिलनसार हों या कोई और अजीब व्यवहार कर रहे हों, उनमें रेबीज वायरस हो सकता है।
  5. पालतू जानवरों और जंगली जानवरों के बीच संपर्क न होने दें। अपने पालतू जानवरों को बाहर घूमने न दें और न ही उन्हें अनजान घरेलू या जंगली जानवरों के साथ घुलने-मिलने दें।
  6. अपने पालतू जानवरों को घर के अंदर खाना खिलाएं। बाहर खाना छोड़ने से अक्सर आवारा कुत्ते, बिल्लियाँ और जंगली जानवर आपके आंगन में आ जाते हैं।
  7. अपने कचरे को जानवरों से सुरक्षित रखें। पक्का करें कि कचरे के डिब्बे के ढक्कन बंद हों, और कचरे की थैलियों को डिब्बों के बाहर न छोड़ें।
  8. जंगली जानवरों को घर में घुसने से रोकें। छत के ऊपर लटक रही पेड़ों की टहनियों को काट दें। खिड़कियों पर जाली (स्क्रीन) लगाएं और चिमनी, भट्टी के डक्ट और छज्जे जैसी छोटी जगहों को ढक दें।
  9. आवारा जानवरों की जानकारी एनिमल कंट्रोल को दें। हो सकता है कि आवारा जानवरों को रेबीज का टीका न लगा हो। उनमें रेबीज फैलाने वाले जंगली जानवरों के संपर्क में आने का भी ज्यादा खतरा होता है।
  10. अपने बच्चे को कुछ जरूरी बातें या नियम बताएं। छोटे बच्चों को डराएं नहीं, लेकिन यह पक्का करें कि वे अनजान जानवरों से खुद को बचाने के कुछ बुनियादी नियम सीखें।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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