अमरूद की खेती
लिशा तंबोली, डॉ. सेवन दास खुंटे एवं सुष्मिता चेल्से उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, सांकरा - पाटन दुर्ग


परिचय: अमरूद (Psidium guajava L-) एक महत्वपूर्ण उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय फलदार फसल है। इसे सामान्यतः “गरीबों का सेब” भी कहा जाता है। अमरूद के फल स्वादिष्ट होने के साथ-साथ विटामिन ब् आहार रेशा एवं विभिन्न खनिज तत्वों से भरपूर होते हैं। इसके फलों का उपयोग ताजे फल के रूप में तथा जूस, जैम, जेली, पल्प, अमरूद की कैंडी एवं अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। वैज्ञानिक ढंग से अमरूद की खेती करने पर कम समय में अच्छी एवं नियमित आय प्राप्त की जा सकती है।
अमरूद की वैज्ञानिक खेती का उद्देश्य अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों का चयन, उचित दूरी पर रोपण, संतुलित पोषण, सिंचाई, प्रशिक्षण एवं छंटाई तथा कीट एवं रोगों का समुचित प्रबंधन करके अधिक उत्पादन प्राप्त करना है। उच्च घनत्व एवं मेड़ो ऑर्चर्ड प्रणाली जैसी आधुनिक तकनीकों से भी अमरूद की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। प्ब्।त् द्वारा अमरूद में उच्च घनत्व रोपण एवं कैनोपी प्रबंधन जैसी तकनीकों को विकसित किया गया है।
भारत में अमरूद एक प्रमुख उष्ण एवं उपोष्ण फल फसल है, जिसकी खेती देश के विभिन्न भागों में बड़े पैमाने पर की जाती है। अमरूद की खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, गुजरात और छत्तीसगढ़ में की जाती है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र प्रमुख अमरूद उत्पादक राज्य हैं। अमरूद की फसल विभिन्न प्रकार की मिट्टी में अच्छी तरह उगाई जा सकती है तथा इसकी कम लागत, नियमित फलन और पोषण की दृष्टि से उच्च महत्त्व के कारण किसानों के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। भारत में अमरूद की प्रमुख किस्मों में इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49 (सरदार), लालित, श्वेता, अर्का अमूल्या और अर्का किरण आदि शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ की जलवायु एवं मिट्टी अमरूद की खेती के लिए काफी अनुकूल है। राज्य में अमरूद की खेती मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ बागवानी क्षेत्रों में भी की जाती है। विशेष रूप से रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बिलासपुर, धमतरी, महासमुंद, बालोद, बेमेतरा, कबीरधाम, जांजगीर-चांपा और बलौदाबाजार क्षेत्रों में अमरूद के बाग एवं व्यावसायिक उत्पादन देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ में अमरूद की खेती किसानों के लिए अच्छी आय का स्रोत बन सकती है, क्योंकि इसे सीमित सिंचाई में भी उगाया जा सकता है और फल की स्थानीय बाजारों में अच्छी मांग रहती है। राज्य में लखनऊ-49 (सरदार), इलाहाबाद सफेदा तथा अन्य स्थानीय एवं उन्नत किस्मों की खेती की जाती है। अमरूद के फल का उपयोग ताजे फल के रूप में करने के साथ-साथ जैम, जेली, अमरूद पल्प, नेक्टर, स्क्वैश और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्माण में भी किया जाता है।
अमरूद का पोषण मूल्यरू प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में लगभग
| पोषक तत्व | मात्रा |
| ऊर्जा | 68 कैलोरी |
| जल | 80-81 ग्राम |
| कार्बोहाइड्रेट | 14 ग्राम |
| प्रोटीन | 2.5-2.6 ग्राम |
| वसा | 0.9-1.0 ग्राम |
| आहार रेशा | 5 ग्राम के आसपास |
| कैल्शियम | लगभग 18 मि.ग्रा. |
| फॉस्फोरस | लगभग 40 मि.ग्रा. |
| आयरन | लगभग 0.3 मि.ग्रा. |
| विटामिन सी | लगभग 200-230 मि.ग्रा. |
अमरूद की प्रमुख किस्में
इलाहाबादी सफेदा: यह भारत की प्रसिद्ध अमरूद की किस्म है। फल मध्यम से बड़े आकार के होते हैं, गूदा सफेद, मुलायम और रसदार होता है तथा स्वाद अच्छा होता है। ताजे फल के रूप में इसका उपयोग अधिक होता है।
लखनऊ-49 (सरदार): यह अधिक उत्पादन देने वाली लोकप्रिय किस्म है। फल अपेक्षाकृत बड़े, गोल तथा गूदा सफेद और स्वादिष्ट होता है। व्यावसायिक बागों के लिए इसका उपयोग काफी किया जाता है।
लालित: यह लाल गूदे वाली अमरूद की किस्म है। फल आकर्षक होते हैं और गूदे में गुलाबी से लाल रंग दिखाई देता है। ताजे फल के साथ प्रसंस्करण के लिए भी उपयोगी है।
Kg अमरूद: छत्तीसगढ़ में भी इस किस्म की खेती कुछ क्षेत्रों में दर्ज है। यह स्थानीय परिस्थितियों में उगाई जाने वाली अमरूद की किस्मों में शामिल है।
छत्तीसगढ़ में अमरूद की प्रमुख रूप से उगाई जाने वाली किस्मों में इलाहाबादी सफेदा, लखनऊ-49 (सरदार), लालित तथा Kg अमरूद शामिल हैं। इनमें लखनऊ-49 अपनी अच्छी उत्पादकता के लिए तथा लालित अपने लाल गूदे के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
पौध रोपण: अमरूद में अच्छी गुणवत्ता वाले प्रमाणित एवं स्वस्थ पौधों का चयन करना चाहिए। सामान्य बागवानी के लिए स्वस्थ ग्राफ्टेड या लेयर्ड पौधों का उपयोग किया जा सकता है। रोपण से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई एवं समतलीकरण करें। सामान्य रोपण के लिए 5 × 5 मीटर या 6 × 6 मीटर की दूरी अपनाई जा सकती है। 5 × 5 मीटर दूरी पर लगभग 400 पौधे तथा 6 × 6 मीटर दूरी पर लगभग 278 पौधे प्रति हेक्टेयर लगाए जा सकते हैं।
गड्ढे की तैयारी: लगभग 60 × 60 × 60 सेमी आकार के गड्ढे तैयार किए जा सकते हैं। गड्ढों को कुछ समय के लिए खुला छोड़ने के बाद ऊपरी मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खादध्कम्पोस्ट मिलाकर गड्ढों को भरना चाहिए। रोपण के समय पौधे के ग्राफ्ट यूनियन को मिट्टी की सतह से ऊपर रखना चाहिए। रोपण के तुरंत बाद सिंचाई करनी चाहिए।
उच्च घनत्व रोपण: अमरूद में उच्च घनत्व तथा मेड़ो ऑर्चर्ड प्रणाली का उपयोग करके प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं। प्ब्।त् के अनुसार अमरूद में 1 × 2 मीटर की दूरी पर लगभग 5,000 पौधे प्रति हेक्टेयर की अल्ट्रा हाई डेंसिटी प्रणाली विकसित की गई है। इसमें पौधों की नियमित छंटाई एवं कैनोपी प्रबंधन महत्वपूर्ण होता है।
पौधों की ट्रेनिंग एवं छंटाई: अमरूद में पौधे की उचित संरचना बनाने के लिए प्रारंभिक अवस्था में प्रशिक्षण एवं छंटाई की जाती है। मुख्य तने से लगभग 50-75 सेमी तक निकलने वाली अनावश्यक शाखाओं/साईड शूट को हटाया जा सकता है। सूखी, रोगग्रस्त एवं आपस में रगड़ने वाली शाखाओं को भी निकालना चाहिए। उचित छंटाई से प्रकाश एवं वायु का संचार बेहतर होता है और फलदार शाखाओं के विकास में सहायता मिलती है। अमरूद में प्रशिक्षण, छंटाई एवं बहार प्रबंधन को बेहतर उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन: अमरूद में संतुलित पोषण के लिए मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। रोपण के समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट को मिट्टी में मिलाना लाभदायक है। फलदार पौधों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश के साथ-साथ जिंक, बोरॉन, मैग्नीशियम एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता हो सकती है। उर्वरकों को पौधे के तने से थोड़ी दूरी पर वृत्ताकार नाली बनाकर मिट्टी में मिलाना तथा आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करना चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी की स्थिति में मिट्टी एवं पत्ती परीक्षण के आधार पर जिंक, मैग्नीशियम आदि का प्रयोग किया जा सकता है। प्ब्।त् की अमरूद संबंधी सलाह में जिंक एवं मैग्नीशियम की कमी की स्थिति में इनके घोल के पर्णीय छिड़काव की सिफारिश दी गई है।
सिंचाई: अमरूद सूखे की कुछ सीमा तक सहनशील फसल है, फिर भी अच्छी वृद्धि एवं फल उत्पादन के लिए नियमित सिंचाई आवश्यक है। नए लगाए गए पौधों में प्रारंभिक अवस्था में मिट्टी की नमी बनाए रखना चाहिए।
ICAR की सलाह के अनुसार नए पौधों में पहले महीने लगभग 4-5 दिन के अंतराल पर तथा वर्षा न होने की स्थिति में पहले दो वर्षों में लगभग 7-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है। सिंचाई की वास्तविक आवृत्ति मिट्टी, मौसम एवं वर्षा की स्थिति के अनुसार निर्धारित करनी चाहिए।
ड्रिप सिंचाई द्वारा पानी सीधे पौधे के जड़ क्षेत्र में दिया जा सकता है। इससे पानी की बचत के साथ-साथ उर्वरकों का दक्ष उपयोग भी संभव होता है।
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण: अमरूद के बाग में नियमित निराई-गुड़ाई आवश्यक है। पौधों के आसपास खरपतवारों को नियंत्रित रखने से पानी एवं पोषक तत्वों के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा कम होती है। पौधे के चारों ओर मल्चिंग करने से मिट्टी की नमी बनाए रखने तथा खरपतवारों को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।
बहार प्रबंधन: अमरूद में वर्ष में एक से अधिक बार फूल एवं फल आने की क्षमता होती है, इसलिए बहार प्रबंधन के माध्यम से फल आने के समय को नियंत्रित कर इच्छित मौसम में अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। अमरूद में मुख्यतः अम्बे बहार, मृग बहार एवं हस्त बहार लिए जाते हैं। अम्बे बहार में जनवरीदृफरवरी में फूल आते हैं और वर्षा ऋतु में जुलाईदृअगस्त में फल प्राप्त होते हैं, जबकि मृग बहार में जून-जुलाई में फूल आने पर सामान्यतः अक्टूबरदृनवंबर में फल मिलते हैं। हस्त बहार में सितंबर-अक्टूबर में फूल आने पर फरवरीदृमार्च के आसपास फल प्राप्त होते हैं। व्यावसायिक उत्पादन में सामान्यतः मृग बहार को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि इस मौसम में फल मक्खी तथा अधिक वर्षा से होने वाली फल गुणवत्ता की समस्याएँ अपेक्षाकृत कम हो सकती हैं और फल गुणवत्ता अच्छी प्राप्त होती है। बहार प्रबंधन के लिए चुनी गई बहार से पहले पौधों पर नियंत्रित जल तनाव दिया जाता है, अर्थात कुछ समय के लिए सिंचाई रोककर नई कोपलों एवं फूल आने की प्रक्रिया को प्रेरित किया जाता हैय इसके बाद पर्याप्त सिंचाई एवं पोषण देने से एक साथ नई वृद्धि एवं पुष्पन को प्रोत्साहित किया जाता है। जल तनाव की अवधि मिट्टी, पौधे की आयु, जल उपलब्धता एवं स्थानीय जलवायु के अनुसार निर्धारित करनी चाहिए तथा अत्यधिक या लंबे समय तक पानी रोकने से पौधों को नुकसान हो सकता है। बहार प्रबंधन के दौरान हल्की एवं आवश्यक छंटाई करके सूखी, रोगग्रस्त, कमजोर तथा अंदर की ओर बढ़ने वाली शाखाओं को हटाया जाता है, जिससे प्रकाश एवं वायु का संचार बढ़ता है और नई फलदार शाखाओं का विकास होता है।
प्रमुख कीट एवं उनका नियंत्रण:
1. फल मक्खी: फल मक्खी अमरूद की फसल का एक महत्वपूर्ण कीट है। मादा फल मक्खी स्वस्थ या पकते हुए फलों की त्वचा के नीचे अंडे देती है, जिनसे निकलने वाली सूंडियाँ फल के गूदे को खाकर नुकसान पहुँचाती हैं। प्रभावित फलों के अंदर सड़न विकसित हो जाती है तथा फल समय से पहले गिरने लगते हैं। इसके नियंत्रण के लिए बगीचे में स्वच्छता बनाए रखना बहुत आवश्यक है तथा गिरे हुए और संक्रमित फलों को नियमित रूप से एकत्र करके नष्ट करना चाहिए या लगभग 60 सेमी गहराई में दबा देना चाहिए। फल मक्खी की निगरानी एवं नियंत्रण के लिए मिथाइल यूजीनॉल ट्रैप लगभग 16 ट्रैप प्रति एकड़ की दर से लगाए जा सकते हैं। आवश्यकता होने पर अजाडिरैक्टिन 0.3% / 2.5 मिली/लीटर पानी या क्लोरपाइरीफॉस 20 EC / 2 मिली/लीटर पानी का प्रयोग ICAR की कृषि सलाह के अनुसार किया जा सकता है। कीटनाशी का प्रयोग फल की तुड़ाई के समय, लेबल पर दिए निर्देशों और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की अनुशंसा के अनुसार ही करना चाहिए।
2. अमरूद की छाल खाने वाली इल्ली:
तना बेधक: तना बेधक कीट अमरूद के तने एवं मोटी शाखाओं में सुरंग बनाकर अंदर के ऊतकों को नुकसान पहुँचाता है। अधिक प्रकोप होने पर शाखाएँ कमजोर होकर सूखने लग सकती हैं। नियंत्रण के लिए संक्रमित शाखाओं की छंटाई करके उन्हें नष्ट करना तथा बगीचे की स्वच्छता बनाए रखना चाहिए। तने में कीट द्वारा बनाए गए छेदों को साफ करके क्लोरपाइरीफॉस 20 EC / 5 मिलीध्लीटर पानी के घोल में रूई भिगोकर छेद में रखने तथा छेद को गीली मिट्टी से बंद करने की सलाह दी गई है। यह उपाय प्ब्।त् की कृषि सलाह में स्टेम बोरर के लिए दिया गया है।
मिलीबग: मिलीबग अमरूद की कोमल शाखाओं, नई पत्तियों एवं अन्य कोमल भागों से रस चूसकर पौधे को कमजोर करता है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों में पीलापन, वृद्धि में कमी तथा चिपचिपे मधुरस के कारण काली फफूंद जैसी परत दिखाई दे सकती है। नियंत्रण के लिए संक्रमित भागों की नियमित निगरानी कर अत्यधिक प्रभावित भागों को हटाकर नष्ट करना चाहिए तथा बगीचे को खरपतवार एवं अन्य वैकल्पिक पोषक पौधों से मुक्त रखना चाहिए। प्रारंभिक प्रकोप में नीम आधारित उत्पादों का उपयोग किया जा सकता है। अधिक प्रकोप की स्थिति में क्लोरपाइरीफॉस 20 EC / 2.5 मिलीध्लीटर पानी का छिड़काव किया जा सकता हैय प्ब्।त् की 2025 कृषि सलाह में मिलीबग के प्रबंधन के लिए यह मात्रा दी गई है।
प्रमुख रोग एवं उनका नियंत्रण:
फल सड़न: फल सड़न अमरूद का एक महत्वपूर्ण रोग है, जिसमें फलों पर भूरे या गहरे रंग के सड़े हुए धब्बे दिखाई देने लगते हैं और धीरे-धीरे पूरा फल सड़कर खराब हो सकता है। अधिक नमी तथा बाग में खराब वायु संचार होने पर रोग का प्रकोप बढ़ सकता है। इसके नियंत्रण के लिए रोगग्रस्त एवं गिरे हुए फलों को नियमित रूप से एकत्र करके नष्ट करना चाहिए, बाग में उचित वायु संचार बनाए रखना चाहिए तथा अत्यधिक नमी और जलभराव से बचना चाहिए। आवश्यकता होने पर कृषि विशेषज्ञ की अनुशंसा के अनुसार पंजीकृत कवकनाशी का प्रयोग करना चाहिए।
2. एन्थ्रेक्नोज: एन्थ्रेक्नोज रोग में अमरूद के फलों, पत्तियों तथा कोमल शाखाओं पर भूरे से काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं और अधिक प्रकोप होने पर फल की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अधिक आर्द्रता और लगातार बारिश की स्थिति में इस रोग का प्रकोप बढ़ सकता है। नियंत्रण के लिए रोगग्रस्त पत्तियों, शाखाओं एवं फलों को हटाकर नष्ट करना चाहिए तथा बाग की स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए। पौधों की उचित छंटाई करके वायु संचार बढ़ाना चाहिए और आवश्यकता के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की सलाह से पंजीकृत कवकनाशी का छिड़काव करना चाहिए।
3. विल्ट: अमरूद का विल्ट एक गंभीर रोग है, जिसमें प्रभावित पौधों की पत्तियाँ धीरे-धीरे पीली पड़ने लगती हैं, मुरझाती हैं और अंततः पौधे की वृद्धि रुककर पूरा पौधा कमजोर या सूख सकता है। रोग की रोकथाम के लिए स्वस्थ एवं रोगमुक्त पौध सामग्री का उपयोग करना, खेत या बाग में उचित जल निकास बनाए रखना तथा जलभराव से बचाना आवश्यक है। रोगग्रस्त पौधों को स्वस्थ पौधों से अलग रखते हुए संक्रमित पौध भागों एवं पौधों का उचित प्रबंधन करना चाहिए। रोग की सही पहचान के बाद कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित जैविक या रासायनिक नियंत्रण उपाय अपनाने चाहिए।
अमरूद की कटाई: अमरूद की कटाई फल की किस्म एवं बाजार की आवश्यकता के अनुसार की जाती है। ताजे फल के लिए सामान्यतः पूर्ण आकार प्राप्त कर चुके लेकिन अत्यधिक पकने से पहले फलों की तुड़ाई की जाती है। फल की त्वचा का रंग हरे से हल्का पीला/पिला-हरा होने पर तथा फल के आकार एवं स्वाद के अनुसार कटाई की जाती है। फलों को हाथ से सावधानीपूर्वक तोड़ना चाहिए ताकि फल पर चोट न लगे।
अमरूद का उत्पादन: अमरूद की उपज किस्म, पौधों की संख्या, मिट्टी, जलवायु, सिंचाई, पोषण, छंटाई एवं बाग प्रबंधन पर निर्भर करती है। सामान्य रोपण की तुलना में उचित उच्च घनत्व एवं कैनोपी प्रबंधन से प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। प्ब्।त् द्वारा अमरूद की उच्च घनत्व प्रणाली में तीसरे वर्ष तक अच्छी उत्पादकता प्राप्त होने की जानकारी दी गई है।
अमरूद का विपणन: अमरूद का विपणन मुख्यतः ताजे फल के रूप में स्थानीय बाजार, थोक मंडी, फल विक्रेताओं एवं प्रसंस्करण इकाइयों के माध्यम से किया जाता है। इसके अतिरिक्त अमरूद से जूस, पल्प, जैम, जेली, कैंडी एवं अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। अच्छी गुणवत्ता, उचित ग्रेडिंग, पैकिंग एवं बाजार की मांग के अनुसार बिक्री करने से किसान को बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
अमरूद की खेती से लाभ: अमरूद की खेती किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण फल-आधारित व्यवसाय हो सकती है। एक बार बाग स्थापित होने के बाद कई वर्षों तक फल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। ताजे फलों के साथ-साथ प्रसंस्कृत उत्पादों की बिक्री से आय के अतिरिक्त अवसर प्राप्त होते हैं। उचित किस्म का चयन, स्वस्थ पौध सामग्री, वैज्ञानिक रोपण, संतुलित पोषण, सिंचाई, छंटाई, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन करने से अमरूद की खेती को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाया जा सकता है।
लेखक:
लिशा तंबोली, डॉ. सेवन दास खुंटे एवं सुष्मिता चेल्से
उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, सांकरा – पाटन दुर्ग
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)










