ग्रामीण परिपेक्ष्य में मुर्गियों हेतु आवास व्यवस्था एवं आहार प्रबंधन
डाॅ. रामचंद्र रामटेके डा. मनोज गेंदले, डा. मीनू दुबे, डा. रैना दोनेरिया एवं डाॅ. सोनाली


मुर्गी आवास की व्यवस्था: बस्तर में प्रायः सभी परिवारों के पास कुछ मुर्गियों होती हैं। एक देशी मुर्गी वर्ष भर में 40 – 50 अण्डें देती है। कुछ अण्डों में भ्रूण नहीं होता, लेकिन बाकी के करीब 20-22 अंडों से चूजे निकलते हैं। यद्यपि कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया गया लेकिन ऐसा प्रतीत होता हैं कि इन 20-22 चूजों में से केवल 4-5 पक्षी मिलती हैं। अनुमान हैं कि इनमें से लगभग 20 से 40 प्रतिशत बीमारी से, 20 प्रतिशत शिकारी जन्तु तथा खो जाने कारण तथा 20 प्रतिशत समुचित देखभाल के अभाव तथा सर्दी – गर्मी के प्रकोप से मारे जाते हैं। मुर्गियों के लिए, साल भर तक इस्तेमाल किये जाने वाली मुर्गी आवास व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना बहुत महत्वपूर्ण हैं। उचित आवास व्यवस्था कराने से निम्नलिखित फायदे प्राप्त किये जा सकते हैं।
1. अच्छा मुर्गी आवास ठंड, बरसात, तेज धूप एवं जंगली जानवरों से बचाता हैं ।
2. आवास के होने से मुर्गियों को दना- पानी देना तथा दवा पिलाना आसान होता हैं।
मुर्गी घर बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें:-
- मुर्गीघर अपने आवास के साथ लगा हुआ एवं स्थानीय सामग्रियों से बनाया जा सकता हैं। जहां तक हो सके, घर को पूर्व – पश्चिम दिशा की ओर बनाएं ।
- यदि संभव हो तो मुर्गीघर को इकट्ठे हुए पानी, बाढ़ आदि से बचाने हेतु घर के फर्श को जमीन से करीब 1 फुट ऊंचा बनाएं ताकि बीट आदि नीचे इकट्ठा हो जाए जिसे बाद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता हैं।
- मुर्गीघर बहुत महंगा नहीं होना चाहिए लेकिन मजबूती, आराम तथा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना चाहिए ।
- लकड़ी अथवा बांस या मिट्टी का फर्श समतल करके बनाया जा सकता हैं।
- घर का फर्श ऐसा होना चाहिए, कि नमी तथा दरार पड़ने से बचा रहे, आसानी से साफ किया जा सके, मजबूत हो तथा चूहों इत्यादि का प्रवेश न होने पाए ।
- चूंकि हमारे प्रदेश में प्रचुर मात्रा में वर्षा होती हैं, घर की छत ऐसी होनी चाहिए कि बारिश का पानी बहकर निकल जाए। छत दिवार से लगभग 3 फीट बाहर तक निकली होनी चाहिए । गावो में आसानी से उपलब्ध पैरा का इस्तेमाल छत बनाने के लिए किया जा सकता हैं। पैरा से ढंकी छत में से पानी चूने की गंजाइश नहीं रहती हैं।
- मुर्गी घर के आसपास पेड़ लगाएं ताकि पेड़ों की छाया उस पर पड़ती रहे ।
- दीवारों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्से को बांस की जाली बनाकर ढकें । जालीदार दीवार में मोटा बोरा का पर्दा लगाएं जिसे सामान्यतः गोल घुमाकर ऊपर बांध कर रखें । आवश्यकतानुसार बारिश या तेज धूप पड़ने पर उसे खोल कर नीचे लटका दंे ताकि मुर्गियां पानी तथा गर्मी से बची रहें । इन बोरों को अधिक गर्मी के दिनों में पानी डालकर ठंडा रखें ।
विभिन्न श्रेणी की मुर्गियों हेतु जगह की आवश्यकता (तकरीबन) निम्नानुसार हैं –
| श्रेणी | आवश्यक जगह (वर्ग फीट प्रति मुर्गी) |
| छोटे चूजे | 0.5 |
| 2-6 हफ्ते | 0.75 |
| 6 हफ्ते से अधिक | 1.00 |
| ब्रायलर | 1.00 |
| लेयर/बड़े मुर्गी | 1.50-2.00 |
दाना – पानी के बर्तन:-
- मुर्गियों के दाने तथा पानी के बर्तनों हेतु समुचित जगह उपलब्ध करवाना अत्यंत आवश्यक हैं। सामान्यतः दाने पानी के बर्तनों हेतु इतनी जगह उपलब्ध होनी चाहिए,कि कुल संख्या की आधी मुर्गियां एक समय में खा पी सकें।
- पानी के लिये चित्र में दर्शाये गये थोड़े महंगे बर्तनों का उपयोग किया जाता हैं। ग्रामीण पशुपालक चाहें तो इन्हें खरीद कर उपयोग कर सकते है।
- ग्रामीण मुर्गीपालक बांस के बने बर्तनों के कुक्कुट दाना पानी हेतु उपयोग करते हैं। गांव में बांस आसानी से तथा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता हैं तथा इसका उपयोग भी आसान,सस्ता एवं कम मेहनत लगने वाला होता हैं।
- तीन या चार फीट लंबे मोटे बांस को बीच से चीरा लगाकर दो हिस्सा कर लकड़ी के खूंटे पर रखा जाता हैं। इन बर्तनों को समय-समय पर साबुन तथा गुनगुने पानी से धोने तथा सुखाने के बाद पुनः उपयोग करते हैं। दाने को व्यर्थ जाने से बचाने हेतु बर्तनों में दाना आधे से अधिक नहीं भरना चाहिए ।
- दाना-पानी के लिए बांस के बर्तन के अतिरिक्त मार्केट में प्लास्टिक उपलब्ध बर्तन का भी उपयोग किया जा सकता हैं।
- सही जगह पर दाना-पानी के बर्तनों को रखकर मुर्गियों के लिए समुचित जगह उपलब्ध कराना आवश्यक हैं। आवश्यकतानुसार मुर्गियों को घर के बाहर भी दाना-पानी की व्यवस्था की जा सकती हैं।
मुर्गी घर में रूस्ट: रात में मुर्गियों को ऊंची जगह पर उड़ कर पैरों से पेड़ आदि की डाल पकड़ कर सोने की आदत होती हैं। मुर्गी घर में ऐसी सुविधा न होने पर मुर्गियां दाना-पानी बर्तन आदि के ऊपर बैठती हैं एवं उनके बीट से गंदगी फैलती है। मुर्गी घर में एक ऐसी व्यवस्था (जिसे रूस्ट कहते हैं) रखने पर मुर्गियां यहां-वहां न बैठकर निर्धारित जगह में ही रहेंगी । इसके लिये उनके घर में ही लगभग 5 से मी. व्यास का बांस जमीन से करीब 1 मीटर की ऊंचाई पर लगाना चाहिए। 12 पक्षियों के लिए बांसों की कुल लंबाई 3-4 मीटर के बीच होना चाहिए।
अंडे सेने हेतु व्यवस्था: अंडे सेने वाली मुर्गियों हेतु अलग से व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक हैं। इसके लिए बांस की बनी टोकनी का उपयोग समुचित संख्या में करना चाहिए,ताकि अंडों को टूट-फूट से बचाया जा सके। लगभग 1 वर्ग फीट तथा 6-9 इंच गहराई की एक टोकनी 5 मुर्गियों के लिए पर्याप्त हैं इस टाकनी में पैरा बिछाने से अंडे नहीं फूटेगे ।
देसी मुर्गी का आहार: मुर्गी की तुलना एक मशीन या फैक्ट्री से की जा सकती है, जो ग्रामीण परवेश में उपलब्ध जैविक अनुपयोगी पदार्थों को पौष्टिक प्रोटिन (अंडा या मांस) में बदल देती हैं। देशी मुर्गी घर के आस पास उपलब्ध चारे एवं कीड़े मकोड़ों को बड़ी चतुरता एवं चपलता से हासिल करती हैं। इस वजह से उनकी ऊर्जा खपत होती हैं। जिससे उनकी बढ़त कम होती हैं। यदि ग्रामीण पशुपालक सुबह एवं शाम को अल्प मात्रा में कुक्कुट दाना नियमित रूप से दे तो उनकी मुर्गियों को 1 किलो शरीर भार पहुंचाने में कम समय लगेगा एवे पशुपालक अधिक लाभान्वित होगंें । साथ ही उक्त कुक्कुट दाने में गांव में उपलब्ध कम खर्चीली पौष्टिक सामग्री मिलान से कुक्कुट दाने का व्यय भी कम किया जा सकता हैं।
निम्नलिखित उपाय अपनाये जा सकते हैं: पानी सबसे सस्ता एवं आहार का प्रमुख पदार्थ होता हैं। जीवित मुर्गी में 55-60 प्रतिशत पानी ही होता हैं। दाने को नरम करने व पचाने, हजम हुए भोजन को खून में ले जाने, शरीर के अंदर से खराब तत्वों को बाहर निकालने और शरीर का तापमान बनाये रखने के लिये मुर्गियों को पानी की आवश्यकता होती हैं। मुर्गी घर एवं आंगन के पास बांस बर्तनों (बांस बर्तन संबंधित जानकारी इस पुस्तक में उपलब्ध हैं।) या किसी भी साफ बर्तन में स्वच्छ, ताजे पानी को 24 घंटे सुगमता से उपलब्ध कराना अति आवश्यक हैं।
1. नियमित कृमिनाशक दवापान तथा बाह्य परजीवी नाशक का उपयोग करना चाहिए ।
2. मुर्गियों को नियमित हरा चारा एवं स्थानीय उपलब्ध आहार प्रदान करने से उनकी बढ़त केवल स्वयं द्वारा चरने से ज्यादा तेजी से हो सकती हैं जिससे ग्रामीण पशुपालक लाभान्वित हो सकते हैं।
उपरोक्त उपाय अपनाने से देशी मुर्गियों में रोग भी कम लगते हैं। स्वस्थ्य मुर्गी में भोजन का उपयोग रोगों से लड़ने के लिये न होकर अण्डा व मांस बनने के लिये होने लगता हैं।
कुक्कुट आहार के घटको का संक्षिप्त विवरण एवं उनका महत्व
| क्र. | घटक | शरीर के भीतर कार्य | स्त्रोत |
| 1. | पानी | पाचन, शरीर के तापमान को बनाए रखना शरीर में खुराक को ले जाना, शरीर से अनावश्यक तत्वों को निकालना। |
पानी, ताजा हरा चारा |
| 2. | कार्बोहाइड्रेट | ऊष्मा, ऊर्जा तथा उत्पादकता के लिये । | पीली मक्का, जौ, ज्वार, राइस पाॅलिश,कनकी |
| 3. | प्रोटीन | बढ़ोत्तरी, ऊतक निर्माण, अण्डा एवं मांस उत्पादन | मूगफली, तिल व सोयाबीन की खली, दाल का छिलका, मछली का चूरा,हरा चारा |
| 4. | खनिज | हड्डी निर्माण, अण्डा उत्पादन, शरीर के सभी तंत्रों के लिये । |
हड्डी का चूरा, नमक, चूना सीप / संगमरमर का चूरा |
| 5. | विटामिन | सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए तथा बेहतर अण्डा व मांस उत्पादन के लिये । |
हरा चारा, पीली मक्का, मछली का चूरा, धूप । |
दाने(Concentrate) के घटक –
मुर्गियों हेतू संतुलित आहार में दाना का एक निश्चित अनुपात में होना बहुत जरूरी हैं। दाना मुर्गी आहार का वह भाग है जिसमें रेशा की मात्रा कम होती है और प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। दानों में पोषक तत्व प्रचुर मात्रा पाये जाते हैं, दानों की उपयोगिता तथा आर्थिक दृष्टिकोण के आधार पर निम्न लिखित वर्गो में विभाजित किया जा सकता है। दाना में अपरिष्कृत रेशा कम होता है तथा सम्पूर्ण पाचक तत्व (टी.डी.एन.) या चयापचय उर्जा अधिक होता है। इनमें पाच्य प्रोटीन का प्रतिशत 12 प्रतिशत से अधिक होता है।
- अनाज के दाने (Cereal grain) – इस वर्ग के दानों में प्रोटीन की मात्रा थोड़ी कम होती है परंतु स्टार्च की मात्रा अधिक होती है। सम्पूर्ण पाचक तत्व अधिक होने के कारण यह आहार शीघ्र शक्ति प्रदान करते हैं। स्वादिष्ट होने के कारण इनके साथ पशु मोटे चारे को भी खा लेते हैं। इस वर्ग में मक्का, जौ, जई, ज्वार, बाजरा, गेहूं, सांवा, कोदो, आदि के दाने शामिल है। मुर्गियों के दाने में मुख्यतः मक्का, गेंहू या चांवल की कनकी का उपयोग का उपयोग किया जाता है।
- दालों वाले दानें (Pulse) – यह फलीदार फसलों (Leguminous crops) का अनाज होता है। इन दालों में पाच्य प्रोटीन 18 से 22 प्रतिश्त तक पायी जाती है। इस वर्ग में चना, मटर, अरहर, उड़द, मूंग, सोयाबीन, लोबिया आदि अनाज आते हैं। इन अनाजों को दल कर पशुओं को खिलाया जाता है। मुर्गी दाना में सोयाबीन मिल का उपयोग किया जाता है।
- अनाज के उपोत्पाद (Cereal by products) – इस वर्ग में गेहूं का चैकर, चावल का कनकी तथा चूनी आदि शामिल है। यह सुपाच्य तथा स्वादिष्ट होता है। इनमें 10 से 16 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा होती है। मुर्गियों के दाने में उप उत्पाद के रूप में वर्तमान में मुख्यतः मक्का या चांवल के ग्लूटल मिल का उपयोग किया जा रहा है।
- खली (oil cakes)- यह पाचक तथा स्वादिष्ट होते हैं। इनमें प्रोटीन तथा वसा की मात्रा अधिक होती है। इसलिए संतुलित आहार में खलियों का होना आवश्यक होता है। इस वर्ग में अलसी, मूंगफली, बिनौले, तिल तथा सरसों की खली आती है।
- पशु अन्य पदार्थ (Animal products)- इस वर्ग में मछली का चूरा, रक्त चूर्ण, हड्डी का चूरा, मेढक खाद्य, मट्ठा, सपरेटा, मांस का छिछड़ा आदि।
हरा चारा: हरा चारा प्राटीन, खनिज एवं विटामिन का अच्छा स्त्रोत हैं। जो हर आयु वर्ग की मुर्गियों को दिया जाना चाहिए। यह मुर्गियों के स्वास्थ्य व अंडा उत्पादन के लिए बहुत उपयोगी हैं। यदि पत्तेदार हरा चारा फूल आने से पहले काटकर मुर्गियों को दिया जाये तो उन्हें प्रोटीन, खनिज एवं विटामिन भरपूर मात्रा में मिलते हैं। हरे चारे में बरसीम एवं लोबिया सर्वोत्तम माने जातें हैं। इसके अलावा गोभी, गाजर, मूली आदि के पत्ते, पालक जैसी सब्जियों के अनुपयोगी पत्तों के हिस्से भी दिये जा सकते हैं। मुर्गी आहार में एजोला भी दिया जा सकता हैं। हरे चारे को साफ पानी से धोकर एवं काटकर देना चाहिए हरा चारा को निम्नलिखित मात्रा अनुसार खिलाना चाहिए ।
मुर्गी – 30 से 50 ग्राम प्रतिदिन
चूजा – 20 से 30 ग्राम प्रतिदिन
व्यावसायिक मुर्गी आहार: बाजार में मांस उत्पादन हेतू उपलब्ध मुर्गी दाने में 18 से 22 प्रतिशत पाच्य प्रोटीन व 2800 से 3200 किलो कैलोरी उपापचय उर्जा होना चाहिये। व्यावसायिक मुर्गीपालन में ब्रायलर स्टाटर, ब्रायलर फिनिशिर, ग्रोवर, लेयर व नर व मादा ब्रीडर में पाच्य प्रोटीन व उपापचय उर्जा की मात्रा निश्चित किया गया है, एवं समय-समय पर इसमें आवश्यकता अनुसार परिवर्तन होते रहता है। मुर्गी (ब्रायलर), अंडें वाली मुर्गी (लेयर) व देशी मुर्गी के शारीरिक वृद्धि व उत्पादन के अनुसार अलग अलग तरह के संतुलित आहार उपलब्ध है, जिसमें कम से कम 20 से 22 प्रतिशत पाच्य प्रोटीन व 2800 से 3200 किलो कैलारी ऊर्जा होती है, जिसमें मुख्यतः मक्का, चांवल कनकी,गेंहू,ज्वार, बारलें, गेंहू का चोकर, सोयाबीन खली, मुंगफल्ली खली, अलसी खली, मछली का चूरा, विभिन्न प्रकार की चूनी, शैल ग्रिट,कैल्साइट पावडर व खनिज लवण व नमक का उपयोग किया जाता है मुर्गीपालक इन चीजों का उपयोग कर खुद भी दाना तैयार कर सकते है।

मुर्गी आहार के अवयव

मुर्गी का आवास प्रबंधन एवं खाने एवं पानी पीने की व्यवस्था
लेखक:
डाॅ. रामचंद्र रामटेके डा. मनोज गेंदले, डा. मीनू दूबे, डा. रैना दोनेरिया एवं डाॅ. सोनाली
पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविदयालय,अंजोरा, दुर्ग
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनू विश्वविदयालय, दुर्ग










