पशुपालन

वर्षा ऋतु में बकरियों का प्रबंधन

डॉ. नितेश कुमार कुंभकार, डॉ. प्रतिभा ताटी, डॉ. देवेश कुमार गिरी, डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. गोविना देवांगन, डॉ. भूपिका देवांगन एवं डॉ. कशिश अफरीन आलम

प्रस्तावना

बकरी पालन ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार का एक महत्वपूर्ण साधन है। बकरियाँ विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में आसानी से पाली जा सकती हैं और इनके पालन में अपेक्षाकृत कम पूंजी की आवश्यकता होती है। हालांकि, वर्षा ऋतु में बकरी पालन के दौरान विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। बारिश के कारण वातावरण में नमी बढ़ जाती है, फर्श और चारागाह गीले हो जाते हैं तथा कीचड़ और दूषित पानी के कारण विभिन्न संक्रामक रोगों और परजीवी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

वर्षा ऋतु में उचित आवास, पोषण, स्वच्छता, टीकाकरण, कृमिनाशन और रोगों की समय पर पहचान करके बकरियों को स्वस्थ रखा जा सकता है तथा मृत्यु दर और आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकता है।

1. वर्षा ऋतु में बकरी पालन की प्रमुख समस्याएँ

वर्षा के मौसम में बकरियों को मुख्य रूप से निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है—

  • अत्यधिक नमी और गीला वातावरण
  • शेड में पानी का प्रवेश
  • कीचड़ और गंदगी
  • दूषित पानी पीने का खतरा
  • फफूंदयुक्त या सड़ा हुआ चारा
  • आंतरिक एवं बाहरी परजीवियों की समस्या
  • दस्त और पाचन संबंधी विकार
  • खुरों में संक्रमण तथा खुर सड़ने की समस्या
  • निमोनिया और श्वसन संबंधी रोग
  • त्वचा रोग
  • मक्खी, मच्छर और अन्य कीटों की संख्या में वृद्धि
  • हरे चारे में अचानक वृद्धि के कारण पाचन संबंधी समस्या

इसलिए इस मौसम में सामान्य दिनों की तुलना में अधिक सावधानी आवश्यक होती है।

2. बकरी आवास का प्रबंधन

वर्षा ऋतु में सबसे महत्वपूर्ण कार्य बकरियों के लिए सूखा, स्वच्छ और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना है।

शेड का स्थान

बकरी का शेड ऊँची एवं ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ वर्षा का पानी जमा न हो। निचले स्थान पर शेड बनाने से पानी और कीचड़ जमा हो सकता है तथा बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।

छत

शेड की छत से पानी का रिसाव नहीं होना चाहिए। छत पर्याप्त ढलान वाली हो ताकि वर्षा का पानी आसानी से नीचे निकल जाए। आवश्यकता पड़ने पर छत की मरम्मत वर्षा शुरू होने से पहले कर लेनी चाहिए।

फर्श

फर्श सूखा और साफ रहना चाहिए। संभव हो तो फर्श को जमीन से कुछ ऊँचा बनाना बेहतर होता है। इससे वर्षा का पानी और नमी सीधे बकरियों के संपर्क में नहीं आती। गीली बिछावन को नियमित रूप से हटाकर सूखी बिछावन डालनी चाहिए। भूसा, सूखी घास या अन्य उपयुक्त सूखी सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है।

वेंटिलेशन

शेड में हवा का पर्याप्त आवागमन होना चाहिए, लेकिन तेज बारिश और ठंडी हवा सीधे बकरियों पर नहीं पड़नी चाहिए। अत्यधिक बंद शेड में नमी और अमोनिया बढ़ने से श्वसन रोगों का खतरा बढ़ सकता है।

3. स्वच्छता एवं सफाई

वर्षा ऋतु में शेड की नियमित सफाई अत्यंत आवश्यक है।

  • गोबर और मूत्र को नियमित रूप से हटाएँ।
  • गीली बिछावन को तुरंत बदलें।
  • भोजन और पानी के बर्तनों को नियमित रूप से साफ करें।
  • शेड के आसपास पानी जमा न होने दें।
  • कीचड़ को हटाकर जल निकासी की व्यवस्था करें।
  • मृत पशु या जैविक कचरे को शेड के आसपास न रखें।
  • समय-समय पर पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार शेड की स्वच्छता और कीटाणु नियंत्रण करें।

स्वच्छ वातावरण से रोग पैदा करने वाले जीवाणु और परजीवियों का दबाव कम करने में मदद मिलती है।

4. वर्षा ऋतु में आहार प्रबंधन

वर्षा ऋतु में हरा चारा आसानी से उपलब्ध हो जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बकरियों को केवल हरा चारा ही दिया जाए। बकरियों के आहार में हरा चारा, सूखा चारा और आवश्यकतानुसार संतुलित दाना शामिल होना चाहिए। हरे चारे की मात्रा अचानक बहुत अधिक बढ़ाने से पाचन संबंधी समस्या हो सकती है।

चारा देते समय सावधानियाँ

  • गीला, सड़ा या फफूंद लगा चारा न दें।
  • कीचड़ या गंदगी से दूषित चारा न खिलाएँ।
  • चारे को जमीन पर सीधे डालने के बजाय उचित नांद या फीडर में दें।
  • हरे चारे को साफ स्थान से काटकर लाएँ।
  • अत्यधिक गीले चारे के साथ पर्याप्त सूखा चारा उपलब्ध कराएँ।
  • गर्भित, दूध देने वाली और बढ़ते बच्चों की पोषण आवश्यकताओं के अनुसार आहार दें।

5. साफ पानी की व्यवस्था

बारिश के मौसम में आसपास पानी आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद बकरियों को स्वच्छ और सुरक्षित पीने का पानी देना जरूरी है।

जमा हुआ वर्षा जल, नालियों का पानी या कीचड़युक्त पानी नहीं पिलाना चाहिए। पानी के बर्तनों को नियमित रूप से साफ करें और उनमें शैवाल, गंदगी या गोबर जमा न होने दें।

6. खुरों की देखभाल

वर्षा ऋतु में लगातार गीली जमीन और कीचड़ में रहने से खुर नरम हो सकते हैं और उनमें संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। कुछ परिस्थितियों में खुरों से संबंधित रोग तेजी से फैल सकते हैं।

इसलिए—

  • बकरियों को लंबे समय तक कीचड़ में खड़ा न रहने दें।
  • शेड का फर्श सूखा रखें।
  • नियमित रूप से खुरों की जाँच करें।
  • अत्यधिक बढ़े हुए खुरों की उचित छंटाई करवाएँ।
  • लंगड़ापन, सूजन, दुर्गंध या घाव दिखाई देने पर पशु चिकित्सक से सलाह लें।

7. परजीवी नियंत्रण

वर्षा ऋतु में नमी और चारागाह की परिस्थितियों के कारण कई प्रकार के परजीवियों की समस्या बढ़ सकती है। आंतरिक परजीवी बकरियों में वजन कम होने, कमजोरी, दस्त, एनीमिया और वृद्धि में कमी जैसी समस्याएँ पैदा कर सकते हैं। कृमिनाशक दवा बिना आवश्यकता या बार-बार अपने मन से देने के बजाय पशु चिकित्सक की सलाह और स्थानीय पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम के अनुसार दें। आवश्यकता के अनुसार मल परीक्षण और लक्षित उपचार अधिक उपयोगी हो सकता है। बाहरी परजीवियों जैसे जूँ, किलनी और माइट्स की भी नियमित जाँच करनी चाहिए।

8. टीकाकरण

वर्षा ऋतु से पहले बकरियों के टीकाकरण की स्थिति की समीक्षा करना उपयोगी है। बकरियों के सामान्य महत्वपूर्ण संक्रामक रोगों (गलगोटू, एकटंगीया एवं फड़किया रोग ) के विरुद्ध टीकाकरण कार्यक्रम स्थानीय पशु चिकित्सा विभाग की सलाह के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।

टीकाकरण के लिए—

  • स्वस्थ पशुओं को प्राथमिकता दें।
  • टीके को निर्धारित तापमान पर रखें।
  • समाप्त हो चुके या गलत तरीके से रखे गए टीके का उपयोग न करें।
  • टीकाकरण की तारीख का रिकॉर्ड रखें।
  • स्थानीय क्षेत्र में प्रचलित रोगों के अनुसार कार्यक्रम बनाएं।

9. दस्त और पाचन संबंधी समस्याओं से बचाव

बारिश के मौसम में गंदा पानी, दूषित चारा, अचानक आहार परिवर्तन और परजीवी संक्रमण के कारण दस्त की समस्या हो सकती है। दस्त वाली बकरी को तुरंत अलग करके उसकी स्थिति पर निगरानी रखें। पानी की कमी और कमजोरी को गंभीरता से लें। विशेषकर छोटे बच्चों में दस्त तेजी से निर्जलीकरण कर सकता है, इसलिए बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर पशु चिकित्सक से शीघ्र संपर्क करना चाहिए।

10. श्वसन रोगों से बचाव

बारिश के दौरान ठंडी हवा, लगातार नमी और खराब वेंटिलेशन से श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। यदि बकरी में लगातार खाँसी, नाक से स्राव, तेज या कठिन साँस लेना, बुखार, भूख कम होना या अत्यधिक कमजोरी दिखाई दे तो उसे अलग रखें और पशु चिकित्सक से संपर्क करें। शेड में हवा का उचित आवागमन रखें और बकरियों को लगातार ठंडे तथा गीले वातावरण में न रखें।

11. नवजात एवं छोटे बकरी बच्चों का प्रबंधन

छोटे बच्चे वर्षा ऋतु में विशेष देखभाल की मांग करते हैं क्योंकि उनका शरीर संक्रमण और ठंड के प्रति अधिक संवेदनशील होता है।

  • जन्म के बाद बच्चे को सूखा रखें।
  • उसे पर्याप्त मात्रा में माँ का पहला दूध (कोलोस्ट्रम) समय पर मिले, यह सुनिश्चित करें।
  • गीली और ठंडी जमीन से बचाएँ।
  • शेड में साफ और सूखी बिछावन रखें।
  • बच्चों को दूषित पानी या फफूंदयुक्त चारा न दें।
  • उनके वजन, भूख और गतिविधि पर नियमित नजर रखें।

12. गर्भित एवं दूध देने वाली बकरियों का प्रबंधन

गर्भित बकरियों को पौष्टिक एवं संतुलित आहार देना चाहिए। अत्यधिक तनाव, गीले वातावरण और खराब पोषण से बचाना आवश्यक है।

दूध देने वाली बकरियों को पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन, खनिज और साफ पानी उपलब्ध कराना चाहिए। उनके थन को साफ और सूखा रखें तथा दूध निकालने के स्थान की स्वच्छता बनाए रखें।

13. चराई का प्रबंधन

वर्षा ऋतु में चराई के दौरान विशेष सावधानी आवश्यक है। बहुत गीले चरागाह में लंबे समय तक चराने से खुरों की समस्या और परजीवी संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। बारिश के तुरंत बाद अत्यधिक गीली जगहों पर चराने से बचना उपयोगी है। चारे के स्रोत को बदलते रहना और चराई क्षेत्र का उचित प्रबंधन करना परजीवी दबाव कम करने में सहायक हो सकता है।

14. बीमार बकरियों को अलग रखना

यदि किसी बकरी में बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो उसे स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए। इससे संभावित संक्रामक रोगों के प्रसार को कम किया जा सकता है।

निम्न लक्षणों पर विशेष ध्यान दें—

  • भूख में कमी
  • लगातार दस्त
  • खाँसी
  • नाक या आँख से असामान्य स्राव
  • बुखार
  • लंगड़ापन
  • खुर में घाव या सूजन
  • शरीर का तेजी से कमजोर होना
  • त्वचा पर घाव या खुजली
  • असामान्य रूप से अलग रहना

गंभीर लक्षण होने पर स्वयं दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक की सहायता लें।

15. दवाओं का सही उपयोग

वर्षा ऋतु में बीमारी की आशंका अधिक होने के कारण किसान कभी-कभी बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक, कृमिनाशक या अन्य दवाएँ दे देते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है।

दवा की मात्रा पशु की उम्र, वजन, बीमारी और दवा के प्रकार पर निर्भर करती है। इसलिए दवा का उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार करना चाहिए। विशेष रूप से एंटीबायोटिक का अनावश्यक उपयोग नहीं करना चाहिए।

16. वर्षा शुरू होने से पहले की तैयारी

वर्षा आने से पहले किसान को निम्न तैयारियाँ कर लेनी चाहिए—

  1. शेड की छत और दीवारों की मरम्मत करें।
  2. जल निकासी की व्यवस्था करें।
  3. सूखी बिछावन और चारे की पर्याप्त व्यवस्था करें।
  4. पानी के बर्तनों की सफाई करें।
  5. खुरों की जाँच करें।
  6. टीकाकरण की स्थिति की जाँच करें।
  7. पशु चिकित्सक से स्थानीय रोगों और टीकाकरण कार्यक्रम की जानकारी लें।
  8. बीमार पशुओं के लिए अलग स्थान तैयार रखें।
  9. चारे को बारिश और नमी से सुरक्षित रखें।
  10. शेड के आसपास की झाड़ियों और गंदगी को साफ करें।

17. वर्षा ऋतु में बकरी पालन के प्रमुख “करें और न करें”

क्या करें

  • शेड को सूखा और साफ रखें।
  • साफ पानी उपलब्ध कराएँ।
  • गुणवत्तापूर्ण चारा दें।
  • सूखा चारा भी आहार में रखें।
  • नियमित स्वास्थ्य निरीक्षण करें।
  • टीकाकरण कार्यक्रम का पालन करें।
  • परजीवी नियंत्रण पशु चिकित्सक की सलाह से करें।
  • बीमार पशुओं को अलग रखें।
  • चारे को नमी और फफूंद से बचाएँ।

क्या न करें

  • बकरियों को लगातार कीचड़ में न रखें।
  • सड़ा या फफूंद लगा चारा न खिलाएँ।
  • गंदा या जमा हुआ दूषित पानी न पिलाएँ।
  • बिना सलाह के दवाओं का बार-बार उपयोग न करें।
  • बीमारी के लक्षणों को नजरअंदाज न करें।
  • अत्यधिक गीले चरागाह में लंबे समय तक चराई न करवाएँ।
  • बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं के साथ न रखें।

निष्कर्ष

वर्षा ऋतु बकरी पालन के लिए चुनौतीपूर्ण मौसम है, लेकिन उचित प्रबंधन से इन चुनौतियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। सूखा और स्वच्छ आवास, उचित जल निकासी, संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, खुरों की देखभाल, परजीवी नियंत्रण, स्थानीय टीकाकरण कार्यक्रम का पालन और बीमारी की शीघ्र पहचान इस मौसम में सफल बकरी पालन के प्रमुख आधार हैं।

किसान को विशेष रूप से नवजात बच्चों, गर्भित बकरियों और कमजोर पशुओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए। किसी भी गंभीर बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर समय पर पशु चिकित्सक से संपर्क करना सबसे सुरक्षित उपाय है। इन व्यवस्थाओं को अपनाकर वर्षा ऋतु में बकरियों के स्वास्थ्य, वृद्धि, प्रजनन और उत्पादन को बेहतर बनाए रखा जा सकता है।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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