उद्यानिकी

केले की रोपाई : पौध चयन से लेकर रोपण तक

लिशा तंबोली, डॉ. सेवन दास खुंटे एवं योगेश्वर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, सांकरा - पाटन दुर्ग

परिचय : केला (Musa spp.) विश्व की सबसे महत्वपूर्ण फल फसलों में से एक है। भारत केला उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण वर्ष भर उपलब्धता, अधिक उत्पादन क्षमता, उच्च पोषण मूल्य तथा किसानों को मिलने वाली नियमित आय है। केले के फल में कार्बोहाइड्रेट, पोटैशियम, कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, विटामिन B₆ तथा विटामिन C प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।

केले की सफल खेती केवल अच्छी किस्म चुनने से संभव नहीं होती, बल्कि पौध चयन, भूमि का उचित चुनाव, खेत की तैयारी, गड्ढों की तैयारी, पौध उपचार, सही समय पर रोपाई तथा वैज्ञानिक विधि से पौध स्थापित करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि रोपाई के समय छोटी-सी भी त्रुटि हो जाए, तो पौधों की वृद्धि, उत्पादन तथा फल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए केले की खेती में पौध चयन से लेकर रोपण तक प्रत्येक चरण वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहिए।

केले की किस्म का चयन : केले की खेती में सबसे पहला चरण उपयुक्त किस्म का चयन है। किस्म का चुनाव क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता तथा बाजार की मांग को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

केले की प्रमुख किस्में एवं उनकी विशेषताएँ: केला भारत की प्रमुख फल फसलों में से एक है और देश के विभिन्न कृषि-जलवायवीयक्षेत्रों में इसकी अनेक किस्मों की खेती की जाती है। किस्मों में फल का आकार, स्वाद, गुच्छे का वजन, पकने की अवधि, उपयोग तथा रोग-सहनशीलता में अंतर पाया जाता है। प्रमुख किस्मों का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है।

ग्रैंड नाइन: ग्रैंड नाइन, जिसे सामान्यतः G-9 के नाम से जाना जाता है, कैवेंडिश समूह की AAA जीनोम वाली व्यावसायिक किस्म है। इसके पौधे अपेक्षाकृत मध्यम ऊँचाई के होते हैं तथा फल लंबे, समान आकार के और आकर्षक होते हैं। इसके एक गुच्छे में सामान्यतः कई हाथ तथा अधिक संख्या में फल होते हैं। फल की गुणवत्ता और बाजार में स्वीकार्यता अच्छी होने के कारण यह व्यावसायिक उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ में स्थिति : ग्रैंड नाइन छत्तीसगढ़ में प्रमुख व्यावसायिक किस्म है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर से संबंधित शोध में भी छत्तीसगढ़ में ग्रैंड नाइन को अच्छी गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है और इस पर राज्य में कई शोध किए गए हैं।

उद्ययम : उधयम एक AAB समूह की किस्मध्क्लोन है, जिसे National Research Centre for Banana, तिरुचिरापल्ली से संबंधित स्रोतों में वर्णित किया गया है। पौधे मजबूत एवं लंबे होते हैं तथा गुच्छे का वजन लगभग 30-35 Kg. तक बताया गया है। इसके फल अच्छी तरह व्यवस्थित हाथों में होते हैं, जिससे पैकिंग और परिवहन में सुविधा होती है। यह हवा वाले क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी माना जाता हैं।

छत्तीसगढ़ में स्थिति: यह छत्तीसगढ़ की प्रमुख व्यावसायिक किस्मों की सूची में G-9 की तरह प्रमुख रूप से दर्ज नहीं है इसलिए छत्तीसगढ़ के लेख में इसे अन्य महत्वपूर्ण किस्म के रूप में रखा जा सकता है।

विलियम्स : विलियम्स को जायंट कैवेंडिश के नाम से भी जाना जाता है और यह AAA समूह से संबंधित है। यह कैवेंडिश समूह की डेजर्ट केला किस्म है। पौधे अपेक्षाकृत मजबूत होते हैं तथा फल लंबे और बाजार के लिए उपयुक्त होते हैं। कैवेंडिश समूह की किस्में ताजे फल के साथ-साथ व्यापार और निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

छत्तीसगढ़ में स्थिति : विलियम्स की तुलना में छत्तीसगढ़ में ग्रैंड नाइन का व्यावसायिक महत्व अधिक स्पष्ट रूप से दर्ज है।

रोबस्टा : रोबस्टा Cavendish समूह की AAA किस्म है। इसे हरिचाल आदि नामों से भी जाना जाता है। इसके फल बड़े और मोटे छिलके वाले होते हैं तथा पकने पर हरे से पीले रंग के हो जाते हैं। गुच्छे का वजन अच्छा होता है और यह भारत के विभिन्न राज्यों में व्यावसायिक रूप से उगाई जाती है।

छत्तीसगढ़ में स्थिति : छत्तीसगढ़ में ग्रैंड नाइन के साथ रोबस्टा की खेती भी की गई है छत्तीसगढ़ में ग्रैंड नाइन और रोबस्टा दोनों पर शोध/अध्ययन उपलब्ध हैं।

पूवन : पूवन को कई क्षेत्रों में चम्पा नाम से भी जाना जाता है। यह AAB जीनोम समूह की डेजर्ट केला किस्म है। इसके फल स्वादिष्ट होते हैं और यह विभिन्न परिस्थितियों में अच्छी तरह उग सकती है। यह दक्षिण भारत में महत्वपूर्ण किस्म है, लेकिन छत्तीसगढ़ की प्रमुख व्यावसायिक किस्मों की सूची में ग्रैंड नाइन जितना प्रमुख स्थान नहीं है।

रस्थाली : रस्थाली AAB समूह की प्रसिद्ध डेजर्ट केला किस्म है। इसके फल स्वाद और सुगंध के लिए पसंद किए जाते हैं तथा इसे उच्च गुणवत्ता वाली टेबल केलाकिस्म माना जाता है।

छत्तीसगढ़ में स्थिति : यह छत्तीसगढ़ की आधिकारिक प्रमुख व्यावसायिक किस्मों की सूची में ग्रैंड नाइन, ड्वार्फ कैवेंडिश और लाल केला की तरह प्रमुख रूप से सूचीबद्ध नहीं है।

नेन्द्रन : नेन्द्रन एक महत्वपूर्ण AAB समूह की किस्म है और इसे द्वि-उद्देश्यीय केला माना जाता है, अर्थात इसका उपयोग पके फल के रूप में तथा पाक केला/ सब्जी के लिए केलाकृ प्रसंस्करण हेतु केला के लिए किया जाता है। इससे चिप्स और अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद बनाए जाते हैं। नेन्द्रन मुख्य रूप से केरल और दक्षिण भारत में अधिक महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ के लिए यह प्रमुख व्यावसायिक किस्म नहीं मानी जाती।

इनमें ग्रैंड नाइन (G-9) छत्तीसगढ़ की प्रमुख व्यावसायिक किस्म के रूप में विशेष महत्व रखती है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर तथा छत्तीसगढ़ में किए गए शोध कार्यों में भी G-9 पर विशेष रूप से कार्य किया गया है। एक शोध में छत्तीसगढ़ में ग्रैंड नाइन को अच्छी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध बताया गया तथा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से टिशू कल्चर पौधा का उपयोग किया गया था।

पौध सामग्री का चयन : केले की खेती की सफलता काफी हद तक पौध सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। खराब या रोगग्रस्त पौध लगाने से पौधों की वृद्धि असमान होती है तथा उत्पादन में कमी आती है।

रोपाई के लिए निम्नलिखित गुणों वाले पौधे चुनने चाहिए रू केले की रोपाई के लिए पौधा पूरी तरह स्वस्थ एवं रोगमुक्त होना चाहिए। पौधे की ऊँचाई लगभग 30-45 सेमी तथा उसमें कम से कम 5-6 स्वस्थ एवं हरी पत्तियाँ होनी चाहिए। पौधे की जड़ें सफेद, स्वस्थ और अच्छी तरह विकसित हों तथा पौधे में किसी भी प्रकार के कीट, फफूंद या वायरस का संक्रमण नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, सभी पौधों का आकार लगभग समान होना चाहिए, ताकि खेत में पौधों की वृद्धि एक समान हो सके। आजकल अधिकतर किसान टिशू कल्चर पौधों का उपयोग करते हैं, क्योंकि इन पौधों में एकरूपता अधिक होती है, रोग एवं कीट का प्रकोप अपेक्षाकृत कम रहता है तथा उचित प्रबंधन के साथ बेहतर एवं समान उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

टिशू कल्चर पौधों का महत्व : टिशू कल्चर तकनीक द्वारा तैयार केले के पौधे प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों में विकसित किए जाते हैं। ये पौधे सामान्यतः रोगमुक्त, स्वस्थ, समान आकार वाले तथा उच्च गुणवत्ता के होते हैं। टिशू कल्चर पौधों का प्रमुख लाभ यह है कि खेत में सभी पौधों की वृद्धि लगभग एक समान होती है, जिससे पौधों में अच्छी एकरूपता बनी रहती है। इन पौधों में रोग एवं कीटों का संक्रमण अपेक्षाकृत कम होता है तथा इनकी वृद्धि तेजी से होने के कारण शीघ्र फलधारण संभव होता है। इसके साथ ही, टिशू कल्चर पौधों की जीवित रहने की क्षमता अधिक होती है और उचित प्रबंधन के साथ अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उपज प्राप्त की जा सकती है।

खेत का चयन : केले की अच्छी वृद्धि एवं बेहतर उत्पादन के लिए उपयुक्त खेत का चयन अत्यंत आवश्यक है। केले की खेती के लिए ऐसी भूमि का चयन करना चाहिए जो उपजाऊ हो तथा जिसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था हो। खेत में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए और भूमि यथासंभव समतल हो, ताकि सिंचाई का पानी समान रूप से पौधों तक पहुँच सके। ऐसे क्षेत्रों का चयन करना चाहिए जहाँ लंबे समय तक पानी जमा न रहता हो, क्योंकि जलभराव से केले की जड़ों को नुकसान पहुँच सकता है। इसके अलावा, तेज हवा वाले क्षेत्रों में पौधों को हवा से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए वायु अवरोध (Windbreak) की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

मिट्टी का चयन : केले की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, परंतु अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। केले की अच्छी वृद्धि एवं उत्पादन के लिए मिट्टी का चभ् लगभग 6.5-7.5 होना चाहिए। मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में जैविक कार्बन, अच्छी जलधारण क्षमता तथा उचित वायु संचार होना आवश्यक है। अत्यधिक लवणीय एवं क्षारीय भूमि में केले की खेती करने से बचना चाहिए। यदि मिट्टी का pH अधिक हो, तो मिट्टी की जाँच के आधार पर पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद तथा आवश्यकतानुसार उपयुक्त मिट्टी सुधारक पदार्थों का उपयोग करके मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।

भूमि की तैयारी: केले की अच्छी वृद्धि एवं जड़ों के तेजी से विकास के लिए भूमि की उचित तैयारी अत्यंत आवश्यक है। भूमि की तैयारी के लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद खेत की मिट्टी को भुरभुरी एवं समतल बनाने के लिए 2-3 बार कल्टीवेटर या हैरो चलाना चाहिए। खेत को अच्छी तरह समतल करने के साथ-साथ खरपतवार, पत्थर तथा अन्य अवांछित सामग्री को हटा देना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार खेत में मेड़ तथा जल निकासी के लिए नालियाँ बनानी चाहिए, ताकि वर्षा या सिंचाई के दौरान खेत में पानी का जमाव न हो। यदि ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनानी हो, तो रोपाई से पहले उसकी पाइपलाइन एवं आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था कर लेनी चाहिए।

गड्ढों की तैयारी: केले की रोपाई के लिए सामान्यतः 60 × 60 × 60 सेमी आकार के गड्ढे तैयार किए जाते हैं, जबकि भारी मिट्टी में आवश्यकता के अनुसार इससे बड़े गड्ढे भी बनाए जा सकते हैं। गड्ढों को भरने के लिए ऊपरी उपजाऊ मिट्टी में 10-20 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, नीम खली तथा जैव उर्वरक जैसे एजोस्पिरिलम और फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु (PSB) को मिलाया जा सकता है। आवश्यकता के अनुसार ट्राइकोडर्मा जैसे जैव फफूंदनाशी का उपयोग भी किया जा सकता है, जिससे जड़ क्षेत्र में रोगों के प्रबंधन में सहायता मिलती है। तैयार मिश्रण से गड्ढों को भरने के बाद उन्हें लगभग 10-15 दिनों तक खुला छोड़ना लाभदायक रहता है, ताकि मिट्टी अच्छी तरह व्यवस्थित हो सके और रोपाई के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो।

पौध उपचार: रोपाई से पहले केले के पौधों का उचित पौध उपचार करने से रोग एवं कीटों के प्रकोप की संभावना कम होती है तथा पौधों की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है। पौध उपचार का मुख्य उद्देश्य पौधों की जड़ों को मृदाजनित रोगों से सुरक्षित रखना, प्रारंभिक वृद्धि को बढ़ावा देना तथा पौधों की जीवित रहने की क्षमता को बढ़ाना है। इसके लिए आवश्यकता एवं स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार जैव फफूंदनाशी तथा जैव उर्वरकों का प्रयोग किया जा सकता है, जिससे पौधों की जड़ प्रणाली मजबूत होती है और खेत में पौधों की स्थापना बेहतर होती है।

रोपाई का समय : केले की रोपाई का उचित समय क्षेत्र की जलवायु, वर्षा तथा सिंचाई की सुविधा पर निर्भर करता है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में सामान्यतः जून-जुलाई का समय रोपाई के लिए उपयुक्त माना जाता है, जबकि सिंचित क्षेत्रों में फरवरी-मार्च तथा सितंबर-अक्टूबर में भी केले की रोपाई की जा सकती है। हालांकि, अत्यधिक गर्मी, तेज तापमान या खेत में जलभराव की स्थिति में रोपाई करने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में पौधों की स्थापना एवं प्रारंभिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

पौधों की दूरी: केले की खेती में पौधों के बीच उचित दूरी रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे प्रत्येक पौधे को पर्याप्त प्रकाश, वायु, पानी तथा पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। सामान्यतः केले की खेती में 1.8 × 1.8 मीटर या 2.0 × 2.0 मीटर की दूरी रखी जाती है। हालांकि, किस्म, मिट्टी, जलवायु तथा प्रबंधन प्रणाली के अनुसार पौधों की दूरी में आवश्यक परिवर्तन किया जा सकता है। उचित दूरी रखने से पौधों में वायु संचार अच्छा रहता है, रोगों एवं कीटों के प्रकोप को कम करने में सहायता मिलती है तथा फलों की वृद्धि एवं गुणवत्ता बेहतर होती है।

रोपाई की विधि: रोपाई करते समय पौधे को सावधानीपूर्वक पॉलीबैग से निकालें ताकि जड़ों को कोई क्षति न पहुँचे। पौधे को गड्ढे के मध्य में सीधा रखें और उसके चारों ओर मिट्टी भरकर हल्के हाथों से दबाएँ। पौधे का कॉलर भाग भूमि की सतह के बराबर या थोड़ा ऊपर होना चाहिए। रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करें ताकि मिट्टी और जड़ों का अच्छा संपर्क स्थापित हो सके।

लेखक :
लिशा तंबोली, डॉ. सेवन दास खुंटे एवं योगेश्वर
उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, सांकरा – पाटन दुर्ग
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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