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विश्व रेबीज़ दिवस 2026: रेबीज़ के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का संकल्प

रेबीज़ (अलर्क, जलकांटा) एक गंभीर और घातक विषाणु जनित बीमारी है, जो मनुष्यों और जानवरों दोनों को प्रभावित करती है। जिस के कारण अत्यंत तेज इन्सेफेलाइटिस (मस्तिष्क का सूजन) इंसानों एवं अन्य गर्म रक्तयुक्त जानवरों में हो जाता है। रेबीज रोग रेबिड़ोविरडी परिवार के लैसा वायरस (Lyssa Virus) से होता है। यह एक न्यूरोट्रॉपिक वायरस है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। मानव में इसे हाइड्रोफोबीया या जलकांटा भी कहते है।

यह बीमारी मुख्य रूप से संक्रमित जानवर के काटने, खरोंचने या उसकी लार के किसी खुले घाव अथवा श्लेष्म झिल्ली के संपर्क में आने से संक्रमण हो सकता है। रेबीज़ के लक्षण विकसित होने के बाद यह बीमारी लगभग हमेशा घातक होती है। हालांकि, समय पर सही कदम उठाए जाएँ तो रेबीज़ से होने वाली बीमारी और मृत्यु को काफी हद तक रोका जा सकता है।

हर वर्ष 28 सितंबर को विश्व रेबीज़ दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों में रेबीज़ के प्रति जागरूकता बढ़ाना, पशुओं के टीकाकरण को प्रोत्साहित करना, जिम्मेदार पशु-पालन को बढ़ावा देना और पशु के काटने या खरोंचने के बाद तत्काल चिकित्सा सहायता लेने के महत्व को समझाना है। इस वर्ष विश्व रेबीज़ दिवस  की थीम “Strength Together” (साथ मिलकर मजबूत) है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग, पशु चिकित्सा सेवाएँ, सरकार, स्थानीय प्रशासन, समुदाय, विद्यालय, स्वास्थ्यकर्मी, पशु कल्याण संगठन और आम नागरिक—सभी को मिलकर काम करना होगा।

दुनिया के कई हिस्सों में कुत्ते मनुष्यों में रेबीज़ संक्रमण के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं। शुरुआत में बुखार, कमजोरी, बेचैनी या घाव के आसपास असामान्य संवेदना जैसे लक्षण हो सकते हैं। बीमारी बढ़ने पर निगलने में कठिनाई, पानी से डर लगना, अत्यधिक उत्तेजना, भ्रम, लकवा और अन्य गंभीर तंत्रिका संबंधी लक्षण विकसित हो सकते हैं। एक बार नैदानिक लक्षण विकसित हो जाने के बाद रेबीज़ लगभग हमेशा घातक होता है। इसलिए इसका सबसे प्रभावी उपाय है: रोकथाम और संभावित संपर्क के तुरंत बाद उचित चिकित्सा सहायता।

विश्व रेबीज़ दिवस का महत्व

विश्व रेबीज़ दिवस केवल एक जागरूकता दिवस नहीं है, बल्कि यह हमें रेबीज़ की रोकथाम के लिए अपने सामूहिक प्रयासों को मजबूत करने का अवसर देता है।

इस दिन लोगों को विशेष रूप से बताया जाता है कि:

  • रेबीज़ कैसे फैलता है।
  • रेबीज़ से बचाव कैसे किया जा सकता है।
  • कुत्तों का टीकाकरण क्यों आवश्यक है।
  • पशु के काटने या खरोंचने के बाद क्या करना चाहिए।
  • घाव को तुरंत धोना क्यों जरूरी है।
  • समय पर चिकित्सा सहायता लेना क्यों महत्वपूर्ण है।
  • जिम्मेदार पशु-पालन की क्या भूमिका है।
  • समुदाय रेबीज़ की रोकथाम में कैसे योगदान दे सकता है।

सही जानकारी कई बार जीवन बचा सकती है, क्योंकि पशु के काटने के बाद तुरंत सही कदम उठाना रेबीज़ की रोकथाम में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

“Strength Together” का अर्थ

“Strength Together” अर्थात “साथ मिलकर मजबूत” इस बात पर जोर देता है कि रेबीज़ की रोकथाम एक सामूहिक जिम्मेदारी है। रेबीज़ मनुष्य और पशु स्वास्थ्य के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध को दर्शाता है। इसलिए इसके नियंत्रण के लिए विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग आवश्यक है।

स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका : डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट और अन्य स्वास्थ्यकर्मी पशु के काटने या खरोंचने के बाद जोखिम का मूल्यांकन करते हैं तथा आवश्यक होने पर घाव की देखभाल, रेबीज़ वैक्सीन और अन्य उचित उपचार उपलब्ध कराते हैं।

पशु चिकित्सकों की भूमिका : पशु चिकित्सक कुत्तों और अन्य संबंधित पशुओं के टीकाकरण, संदिग्ध मामलों की जाँच, पशु मालिकों को सलाह देने तथा समुदाय में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सरकार की भूमिका : सरकार और स्थानीय प्रशासन को प्रभावी रेबीज़ नियंत्रण कार्यक्रम चलाने, पशु टीकाकरण को बढ़ावा देने, आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता होती है।

समुदाय की भूमिका : समुदाय के लोग अपने पालतू पशुओं का टीकाकरण करवाकर, आवारा या संदिग्ध रूप से व्यवहार करने वाले पशुओं के बारे में संबंधित अधिकारियों को सूचित करके तथा पशु के काटने के बाद तुरंत चिकित्सा सहायता लेकर महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

जिम्मेदार कुत्ता-पालन में निम्न बातें शामिल हैं:

  • पशु का समय पर रेबीज़ टीकाकरण करवाना।
  • पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार टीकाकरण कार्यक्रम का पालन करना।
  • कुत्तों को अनावश्यक रूप से खुले में घूमने से रोकना।
  • असामान्य व्यवहार करने वाले पशु से दूरी बनाए रखना।
  • पशु के काटने की घटना होने पर उचित कार्रवाई करना।
  • स्थानीय पशु-टीकाकरण अभियानों में सहयोग करना।

कुत्तों का टीकाकरण केवल पशु स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।

 WHO के अनुसार रेबीज एक्सपोजर को जोखिम के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में समझा जाता है।

श्रेणी I : पशु को छूना या खिलाना अथवा स्वस्थ, अखंड त्वचा पर पशु का चाटना—इसमें सामान्यतः रेबीज एक्सपोजर नहीं माना जाता।

श्रेणी I : पशु को छूना या खिलाना अथवा स्वस्थ, अखंड त्वचा पर पशु का चाटना-इसमें सामान्यतः रेबीज एक्सपोजर नहीं माना जाता।

श्रेणी II : खुले हुए त्वचा पर हल्का कुतरना या बिना रक्तस्राव वाली छोटी खरोंच/घर्षण-इसमें घाव की सफाई और तत्काल वैक्सीनेशन की आवश्यकता होती है।

श्रेणी III : त्वचा के आर-पार काटना या खरोंचना अथवा टूटी त्वचा/श्लेष्म झिल्ली का संक्रमित लार से संपर्क-यह गंभीर एक्सपोजर है और घाव की सफाई, वैक्सीनेशन तथा संकेत होने पर RIG/अन्य निष्क्रिय एंटीबॉडी उपचार की आवश्यकता होती है।

कुत्ते के काटने पर क्या करें?

रेबीज की रोकथाम में काटने के तुरंत बाद की गई कार्रवाई अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्या करें

  1. घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं।
  2. उपलब्ध होने पर घाव को उचित एंटीसेप्टिक से साफ करें।
  3. तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केंद्र/अस्पताल में जाएं।
  4. चिकित्सक की सलाह के अनुसार रेबीज वैक्सीन तथा आवश्यकता होने पर रेबीज़ इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) लगवाएं।
  5. पांच-डोज़ वाला रेबीज वैक्सीन इंट्रामस्क्युलर शेड्यूल- एक्सपोज़र के बाद बचाव (पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफ़िलैक्सिस) के कोर्स में पांच इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन दिए जाते हैं; हर डोज़ 0, 3, 7, 14 और 28वें दिन दी जाती है। ‘दिन 0’ का मतलब है वैक्सीन की पहली डोज़ देने का दिन। वयस्कों में ये वैक्सीन देने के लिए डेल्टॉइड हिस्सा (कंधे का ऊपरी हिस्सा) सबसे सही रहता है। शिशुओं और छोटे बच्चों के मामले में, जांघ का सामने-बाहरी हिस्सा (एंटेरोलेटरल हिस्सा) सबसे सही जगह मानी जाती है।
  6. चिकित्सक द्वारा बताई गई पूरी वैक्सीनेशन प्रक्रिया समय पर पूरी करें।

क्या न करें

  • काटने को मामूली समझकर उपचार में देरी न करें।
  • घरेलू नुस्खों पर निर्भर न रहें।
  • घाव पर तुरंत मिर्च, तेल, मिट्टी, चूना, राख या कोई घरेलू पदार्थ न लगाएं।
  • बिना चिकित्सकीय सलाह के टीकाकरण बंद न करें।
  • संदिग्ध पशु को स्वयं पकड़ने या मारने का प्रयास न करें।
  • बच्चे को काटने की घटना छिपाएं नहीं।
  • घाव को कसकर बांधने या बिना चिकित्सकीय सलाह के टांके लगाने से बचें।

 बच्चों को विशेष रूप से जागरूक करना आवश्यक : बच्चे अक्सर कुत्तों और अन्य जानवरों के साथ खेलना पसंद करते हैं और कभी-कभी अनजाने में उन्हें परेशान कर सकते हैं। इसलिए स्कूलों और परिवारों में बच्चों को पशुओं के साथ सुरक्षित व्यवहार के बारे में शिक्षित करना जरूरी है।

बच्चों को सिखाया जाना चाहिए:

  • अनजान कुत्ते या अन्य पशु के पास न जाएँ।
  • पशु को परेशान न करें।
  • खाना खाते या सोते समय पशु को न छेड़ें।
  • किसी पशु के काटने या खरोंचने पर तुरंत किसी बड़े व्यक्ति को बताएँ।
  • घाव को तुरंत साबुन और पानी से धोएँ।
  • चिकित्सा सहायता लेने में देरी न करें।

एक जागरूक बच्चा अपने परिवार और समुदाय की सुरक्षा में भी योगदान दे सकता है।

 रेबीज़ से जुड़े मिथक और गलत धारणाएँ

रेबीज़ के संबंध में कई गलत धारणाएँ लोगों को समय पर उपचार लेने से रोक सकती हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि यदि घाव छोटा है तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं है। यह सही नहीं है। किसी भी संभावित जोखिम वाले पशु के काटने या खरोंचने के बाद चिकित्सकीय सलाह लेना महत्वपूर्ण है। कुछ लोग घरेलू उपचार या पारंपरिक उपायों पर निर्भर रहते हैं। इसी प्रकार, केवल यह देखकर कि काटने वाला पशु स्वस्थ दिखाई दे रहा है, स्वयं यह निर्णय नहीं लेना चाहिए कि कोई जोखिम नहीं है। जोखिम का उचित मूल्यांकन स्वास्थ्य या पशु-चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए।

 “वन हेल्थ” की अवधारणा और रेबीज़

रेबीज़ की रोकथाम One Health (वन हेल्थ) दृष्टिकोण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वन हेल्थ यह मानता है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। रेबीज़ को नियंत्रित करने के लिए मानव स्वास्थ्य और पशु स्वास्थ्य विभागों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है।

भारत में रेबीज़ की रोकथाम : भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में रेबीज़ नियंत्रण के लिए समुदाय की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बड़ी संख्या में लोगों और पशुओं तक जागरूकता एवं स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

भारत में रेबीज़ की रोकथाम के लिए निम्न प्रयास महत्वपूर्ण हैं:

  • कुत्तों का व्यापक टीकाकरण।
  • जिम्मेदार पालतू पशु-पालन।
  • पशु के काटने के बाद तत्काल घाव की सफाई।
  • समय पर चिकित्सा सहायता और संक्रमण के बाद बचाव का आवश्यक उपाय (PEP)।
  • स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण।
  • पशु एवं मानव स्वास्थ्य विभागों के बीच समन्वय।
  • स्कूल और समुदाय आधारित जागरूकता कार्यक्रम।
  • रेबीज़ के मामलों की निगरानी और रिपोर्टिंग।
  • जनता में फैली गलत धारणाओं को दूर करना।

स्थानीय स्तर पर पंचायत, नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग, पशु चिकित्सा विभाग, स्कूल और स्वयंसेवी संगठन मिलकर जागरूकता को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका : रेबीज़ को नियंत्रित करने के लिए केवल सरकार या स्वास्थ्य विभाग पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपनी भूमिका निभा सकता है।

हम सभी:

  1. अपने पालतू कुत्तों का समय पर टीकाकरण करवाएँ।
  2. अनजान या संदिग्ध पशुओं से सुरक्षित दूरी बनाए रखें।
  3. बच्चों को पशुओं के साथ सुरक्षित व्यवहार सिखाएँ।
  4. पशु के काटने या खरोंचने के बाद घाव को तुरंत धोएँ।
  5. तुरंत स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करें।
  6. डॉक्टर द्वारा बताई गई PEP योजना का पालन करें।
  7. संदिग्ध पशुओं की सूचना संबंधित अधिकारियों को दें।
  8. रेबीज़ से संबंधित अफवाहों और गलत जानकारी को न फैलाएँ।
  9. जिम्मेदार पशु-पालन को बढ़ावा दें।
  10. समुदाय में रेबीज़ जागरूकता कार्यक्रमों में भाग लें।

निष्कर्ष : रेबीज़ एक अत्यंत घातक बीमारी है, लेकिन इसे रोका जा सकता है। इसके लिए हमारे पास प्रभावी टीके, उचित चिकित्सा उपाय और रोकथाम की वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध है। आवश्यकता है कि इन उपायों को हर व्यक्ति और हर समुदाय तक पहुँचाया जाए। विश्व रेबीज़ दिवस 2026 की थीम “Strength Together” हमें एक स्पष्ट संदेश देती है-रेबीज़ के खिलाफ हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी एकजुटता है। मानव स्वास्थ्य और पशु स्वास्थ्य के बीच सहयोग, कुत्तों का टीकाकरण, जिम्मेदार पशु-पालन, जन-जागरूकता, समय पर घाव की सफाई और आवश्यकता होने पर शीघ्र चिकित्सा उपचार-ये सभी रेबीज़ की रोकथाम के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। आइए, इस विश्व रेबीज़ दिवस पर हम सभी: जागरूक बनें और रेबीज़ के खिलाफ मिलकर काम करें।

“काटने को न समझें मामूली, तुरंत चिकित्सा सबसे जरूरी!”

 “टीकाकरण कराएँ, संक्रमण रोकें; टीकाकरण कराएँ, जीवन बचाएँ।”

लेखक :
डॉ. नितेश कुमार कुंभकार, डॉ. देवेश कुमार गिरी,डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. गोविना देवांगन,
डॉ. दीपक कुमार कश्यप,  डॉ. प्रतिभा ताटी, डॉ. भूपिका देवांगन एवं डॉ.कशिश अफरीन आलम
वेटनरी पॉलिटेक्निक
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय,दुर्ग छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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