करौंदा की उन्नत खेती (Carissa carandas L.)
वैभव शर्मा , श्री राम कुमार देवांगन क्रन्तिकारी डेबरीधुर उधानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जगदलपुर, बस्तर


परिचय : बदलती कृषि परिस्थितियोंए जलवायु परिवर्तन तथा सीमित जल संसाधनों के दौर में ऐसी फल फसलों की आवश्यकता बढ़ गई है जो कम लागतए कम पानी और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन दें। करौंदा ऐसी ही एक महत्वपूर्ण फल फसल है। यह बंजरए पथरीली एवं वर्षा आधारित भूमि में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। इसके फल विटामिन “C” आयरनए कैल्शियम एवं एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं तथा प्रसंस्करण उद्योग में अचारए मुरब्बाए जैमए जेलीए कैंडीए चटनी एवं स्क्वैश बनाने में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
भारत में करौंदा (Carissa carandas L.) की खेती मुख्यतः शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में की जाती है। प्रमुख करौंदा उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश राजस्थान बिहार झारखंड छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र गुजरात ओडिशा कर्नाटक
छत्तीसगढ़ में करौंदा की खेती विशेष रूप से बस्तर, सरगुजा, जशपुर, कांकेर, धमतरी, रायगढ़ और राजनांदगांव जैसे क्षेत्रों में की जाती है। यहां इसे बागवानी फसल के साथ-साथ खेतों की जीवित बाड़ (Live Fence) के रूप में भी लगाया जाता है।
आहार मूल्य (Nutritive Value)
| ऊर्जा (Energy) | 42 kcl |
| प्रोटीन | 1.1-1.5 gm |
| रेशा | 1.4-1.8 gm |
| Vitamin C | 7-72 mg |
| कैल्शियम | 2-11 mg |
| फॉस्फोरस | 14 mg |
| पोटेशियम | 79-351 mg/100gm |
| आयरन | 0.9-6.9 mg/100 gm
39 mg/100 gm in dried karonda |
जलवायु (Climate)-
करोंदा उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु का पौधा है। यह गर्म तथा अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियों में अच्छी वृद्धि करता है और स्थापित पौधे सूखे को सहन कर सकते हैं।
तापमान: लगभग 20-35 सेंटीग्रेट उपयुक्त।
वर्षा: लगभग 500-1000 मिमी वार्षिक वर्षा पर्याप्त।
प्रकाश: पूर्ण सूर्यप्रकाश में अच्छी वृद्धि एवं फलन होता है।
सूखा: पौधा सूखा सहनशील है, इसलिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
पाला: छोटे पौधे पाले से प्रभावित हो सकते हैं अत्यधिक ठंड उपयुक्त नहीं।
जलभराव: लंबे समय तक जलभराव सहन नहीं करता, इसलिए अच्छी जल निकास वाली भूमि आवश्यक है।
जलवायु क्षेत्र: भारत के उष्ण, उपोष्ण तथा शुष्क क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है।
मिट्टी
करोंदा विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उग सकता है, लेकिन अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट से दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। यह कम उपजाऊ, पथरीली तथा कुछ हद तक लवणीय-क्षारीय मिट्टी को भी सहन कर सकता है। लगभग 5.5-8.0 pH वाली मिट्टी उपयुक्त रहती है। जलभराव वाली भारी मिट्टी से बचना चाहिए।
करोंदा की नर्सरी
करोंदा की अच्छी पौध तैयार करने के लिए स्वस्थ और पूरी तरह पके फलों से प्राप्त बीज लें। नर्सरी के लिए भुरभुरी, उपजाऊ और अच्छी जल निकास वाली मिट्टी वाली जगह चुनें। क्यारियां बनाकर मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं। बीजों को लगभग 1-2 सेमी गहराई पर बोएं और हल्की सिंचाई करते रहें। नमी बनाए रखें, लेकिन पानी जमा न होने दें। समय-समय पर खरपतवार निकालें और पौधों को कीट एवं रोगों से बचाएं। स्वस्थ एवं मजबूत पौध तैयार होने पर उन्हें मुख्य खेत में रोपाई के लिए उपयोग करें।
करोंदा के खेत की तैयारी
करोंदा की अच्छी वृद्धि और फल उत्पादन के लिए खेत की अच्छी तरह तैयारी और जल निकास जरूरी है।
स्थान का चयन: ऐसी भूमि चुनें जहाँ धूप अच्छी मिले और पानी का निकास अच्छा हो। जलभराव वाले खेत से बचें।
जुताई: खेत की 1-2 बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा करें। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल करें।
खरपतवार सफाई: खेत से पुराने खरपतवार, जड़ें और अवशेष निकाल दें।
गोबर की खाद: अंतिम जुताई के समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला दें।
गड्ढे तैयार करना: पौध रोपण से पहले लगभग 45 × 45 × 45 सेमी के गड्ढे तैयार किए जा सकते हैं। गड्ढों को कुछ समय खुला छोड़ने के बाद ऊपरी मिट्टी और खाद से भरें।
जल निकास: भारी मिट्टी या अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में नालियां बनाकर जल निकास की व्यवस्था करें।
रोपण की योजना: खेत में पौधों की दूरी फसल के उद्देश्य के अनुसार तय करें। फल उत्पादन और जीवित बाड़ के लिए दूरी अलग रखी जा सकती है।
करोंदा में खाद एवं उर्वरक
करोंदा के पौधों की अच्छी वृद्धि और अधिक फल उत्पादन के लिए जैविक खाद एवं रासायनिक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करना चाहिए। रोपण के समय प्रत्येक गड्ढे में 5-10 किग्रा अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाई जा सकती है। पौधे की उम्र बढ़ने के साथ खाद की मात्रा भी बढ़ाई जाती है। एक वर्ष पुराने पौधे में लगभग 20 ग्राम नाइट्रोजन, 10 ग्राम फास्फोरस और 20 ग्राम पोटाश प्रति पौधा दिया जा सकता है। दूसरे वर्ष में यह मात्रा क्रमशः 40, 20 और 40 ग्राम, तीसरे वर्ष में 60, 30 और 60 ग्राम तथा चार वर्ष एवं उससे अधिक उम्र के पौधों में लगभग 80-100 ग्राम नाइट्रोजन, 40-50 ग्राम फास्फोरस और 80-100 ग्राम पोटाश प्रति पौधा दिया जा सकता है।
गोबर की खाद तथा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा वर्षा शुरू होने से पहले, जबकि नाइट्रोजन की मात्रा को दो भागों में देना उपयोगी रहता है। खाद एवं उर्वरक को पौधे के तने से थोड़ी दूरी पर डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
सिंचाई (Irrigation)
करोंदा सूखा सहनशील फसल है, इसलिए इसे बार-बार सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी पौधों की अच्छी वृद्धि और नियमित फल उत्पादन के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करना लाभदायक है। रोपण के बाद शुरुआती अवस्था में पौधों को नियमित हल्की सिंचाई दें, ताकि जड़ों को अच्छी तरह स्थापित होने में मदद मिले। गर्मी के मौसम में मिट्टी में नमी कम होने पर लगभग 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है। वर्षा ऋतु में सामान्यतः सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। फल विकास के समय पर्याप्त नमी बनाए रखना अच्छा रहता है। सर्दियों में सिंचाई का अंतर बढ़ाया जा सकता है।
तुड़ाई एवं उपज (Harvesting Yield)
करोंदा में फल फूल आने के लगभग 2-3 महीने बाद पकने लगते हैं। उपयोग के अनुसार फलों की कटाई की जाती है। अचार एवं सब्जी के लिए फल पूर्ण विकसित लेकिन हरे और कच्चे अवस्था में तोड़े जाते हैं, जबकि जैम, जेली एवं अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों के लिए पके या रंग बदलने लगे फलों की कटाई की जाती है। फलों को हाथ से सावधानीपूर्वक तोड़ना चाहिए, ताकि शाखाओं और पौधे को नुकसान न पहुंचे। करोंदा की फल तुड़ाई सामान्यतः मई से जुलाई के बीच होती है, हालांकि क्षेत्र एवं मौसम के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।
🍈 उपज अच्छी देखभाल और अनुकूल परिस्थितियों में एक वयस्क करोंदा पौधे से लगभग 10-20 किग्रा फल प्रति वर्ष प्राप्त हो सकते हैं। उपज किस्म, पौधे की उम्र, जलवायु, मिट्टी और प्रबंधन पर निर्भर करती है।
प्रमुख रोग एवं कीट तथा नियंत्रण
1. फल मक्खी (Fruit Fly):
मादा मक्खी फलों में अंडे देती है। इसके कारण फल के अंदर कीट की सूंडी विकसित होती है और फल सड़ने लगते हैं।
प्रबंधनरू संक्रमित एवं गिरे हुए फलों को इकट्ठा करके नष्ट करें, खेत की सफाई रखें और फेरोमोन ट्रैप लगाएं।
2. मिलीबग (Mealybug):
यह पत्तियों, कोमल टहनियों एवं फलों से रस चूसता है। अधिक प्रकोप में पौधे की वृद्धि कमजोर हो जाती है।
प्रबंधन: प्रभावित टहनियों की छंटाई करें, खरपतवार हटाएं और आवश्यकता होने पर नीम आधारित कीटनाशी का प्रयोग करें।
3. स्केल कीट (Scale insect):
यह पौधे की टहनियों एवं पत्तियों पर चिपककर रस चूसता है। इससे पौधा कमजोर हो सकता है।
प्रबंधन: संक्रमित भागों की छंटाई करें और बाग में नियमित निगरानी रखें।
प्रमुख रोग
1. पत्ती धब्बा रोग (Leaf spot):
पत्तियों पर भूरे या काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। अधिक संक्रमण होने पर पत्तियां गिर सकती हैं।
प्रबंधन: संक्रमित पत्तियों को हटाकर नष्ट करें, बाग में हवा का उचित संचार रखें और आवश्यकता के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशी का प्रयोग करें।
2. शाखा झुलसा/डाई-बैक (Die&back):
टहनियों के सिरे से सूखना शुरू होता है और धीरे-धीरे शाखा नीचे की ओर सूख सकती है।
प्रबंधन: संक्रमित शाखाओं को स्वस्थ भाग से नीचे से काटकर नष्ट करें तथा कटे हुए भाग को कॉपर आधारित फफूंदनाशी से उपचारित करें।
3. जड़ सड़न (Root rot):
अधिक नमी और जलभराव की स्थिति में जड़ों के सड़ने की समस्या हो सकती है। पौधे की वृद्धि रुकने और पत्तियों के पीले पड़ने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
प्रबंधन: खेत में अच्छा जल निकास रखें और जलभराव से बचाएं।
करोंदा की तुड़ाई
करोंदा की तुड़ाई फल के उपयोग और पकने की अवस्था के अनुसार की जाती है।
अचार एवं सब्जी के लिए: फल पूरी तरह विकसित होने पर हरे एवं कच्चे अवस्था में तोड़े जाते हैं।
जैम, जेली, मुरब्बा आदि के लिए: फल हल्के गुलाबी से लालध्बैंगनी रंग में आने पर तोड़े जाते हैं।
बीज के लिए: पूरी तरह पके हुए स्वस्थ फलों का चयन किया जाता है।
फल सामान्यतः हाथ से सावधानीपूर्वक तोड़े जाते हैं, ताकि पौधे की शाखाओं और फलों को नुकसान न हो।
- तुड़ाई के दौरान कांटों से बचाव के लिए दस्ताने का उपयोग करना अच्छा रहता है।
- तुड़ाई के बाद फलों को आकार, रंग और गुणवत्ता के अनुसार छांटकर साफ टोकरियों/क्रेट में रखना चाहिए।
- करोंदा की तुड़ाई सामान्यतः मई से जुलाई के बीच होती है, लेकिन क्षेत्र और मौसम के अनुसार समय बदल सकता है।
करोंदा से मूल्यवर्धित उत्पाद
1. करोंदा का अचार
कच्चे, हरे करोंदे को साफ करके काटें। इसमें नमक, मसाले और खाद्य तेल मिलाकर उचित तरीके से अचार तैयार किया जाता है। यह करोंदा के सबसे लोकप्रिय उत्पादों में से एक है।
2. करोंदा की चटनी
पके या कच्चे करोंदे को धोकर काटें और आवश्यकतानुसार नमक, मसाले तथा अन्य सामग्री के साथ पीसकर चटनी बनाई जा सकती है।
3. करोंदा की कैंडी
स्वच्छ एवं उपयुक्त अवस्था के फलों को काटकरध्छेदकर चीनी की चाशनी में धीरे-धीरे पकाया जाता है। बाद में सुखाकर कैंडी तैयार की जाती है।
4. करोंदा का जैम
पके करोंदे के गूदे को चीनी के साथ पकाकर जैम तैयार किया जाता है। उचित पकने पर जैम को साफ, निष्फल जार में भरकर सुरक्षित रखा जाता है।
5. करोंदा की जेली
करोंदा के फलों से रस निकालकर उसमें चीनी और आवश्यक मात्रा में पेक्टिन मिलाकर पकाया जाता है। ठंडा होने पर जेली तैयार होती है।
6. करोंदा का मुरब्बा
पूरे या बड़े टुकड़ों वाले फलों को चीनी की चाशनी में पकाकर मुरब्बा तैयार किया जाता है।
7. करोंदा का स्क्वैश/शरबत
करोंदा के रस को चीनी की चाशनी के साथ मिलाकर स्वादिष्ट पेय तैयार किया जा सकता है।
“कम लागत, कम देखभाल और बहुउपयोगिता के कारण करोंदा सीमांत एवं शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए आय बढ़ाने वाली एक संभावनाशील फल फसल है।”










