पशुपालन

गर्मी के मौसम में मुर्गियों के अच्छे स्वास्थ्य हेतु आवश्यक प्रबंधन कार्य

डाॅ. भारती साहू, डाॅ. फनेश्वर कुमार, डाॅ. वी. एन. खुने, डाॅ. जागृति कृषान

भारत उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले देशोंमें से एक है जहां उत्तरी भारत के छोड़कर देश के अन्य भागों में तापमान अधिक ही रहता है। कुक्कुट प्रजाति जो कि तापमान के प्रति अत्याधिक संवेदनशील होते हैं, यदि उचित प्रबंधन न किया जाए तो ग्रीष्म ऋतु में तापमान विकट स्थिति का कारक होता है। अत्यधिक तापमान कुक्कुटों की उत्पादन क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती है। सामान्यतः यह पाया गया है कि 21 से 24 डिग्री सेल्सियस का तापमान कुक्कुटों के लिए आरामदायक होता है जिसे थर्मो न्युट्रल जोन या कम्फर्ट जोन कहते हैं गर्मी के मौसम में सूर्य की गर्म किरणों के साथ ही वातारण की गर्मी गर्म हवा, परावर्तित किरणें आदि कुक्कुटों को प्रभावित करती है। जिससें उनमें शारीरिक, व्यवहारिक तथा जैव रासायनिक परिवर्तन आता है। अत्यधिक गर्मी उनके खान-पान पर व्यापक असर डालती है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। सामान्यतः कुक्कुट अपने वेटल (गलचर्म) टांग, तथा पंखो के निचले भाग के मांस वाले स्थान से ऊष्मा या गर्मी को कम करते है, परंतु यदि वातावरण का तापमान 80 डिग्री फेरेनहाइट के आस पास होता है तो कुक्कुटों में तापमान नियंत्रण के लिए हाॅफना (तेज श्वास दर) प्रारंभ हो जाता है। हाॅफने की क्रिया में श्वसन नली के नम भागों से पानी वाष्पीकृत होता है , जिसमें गर्मी /ऊष्मा को दूर किया जाता है । इस गर्मी में अनुकुलन हेतु कुक्कुटों में अनेक परिवर्तन होते है। अतः कुक्कुटों को उनकी आवश्यकतानुसार  साधन उपलब्ध कराकर, आरामदायक जोन प्रदान करना चाहिए जिससे मृत्युदर में न्युनता हो तथा उत्पादन प्रभावित न हो।

अधिक तापमान का कुक्कुट/पक्षियों पर प्रतिकूल प्रभाव

  1. गर्मी के दिनों में दोपहर या दिन समाप्त होते होते ब्रायलर में लू लगने की समस्या आती है।
  2. वातारणीय तापमान अधिक होने से कुक्कुटों के आहार व पोशण ग्रहण करने में कमी आती है जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है।
  3. अधिक वातावरणीय ताप से श्वसन दर बढ़ जाती है क्योंकि कुक्कुटों में पसीने की ग्रंथि अनुपस्थित होती है अतः आवश्यकता से बहुत अधिक शारीरिक गर्मी को बाहर निकालने के लिए जल्द ही हांफने की क्रिया प्रारंभ हो जाती है।
  4. अत्याधिक गर्मी से अंडे के कवच की मोटाई कम हो जाती है, जिससे अंडो के जल्दी टुटने की समस्या आती है।
  5. गर्मी में शरीर की गर्मी केा बाहर निकालने के लिए कुक्कुटों के बहुत अधिक पंख गिरने लगते है , जिससे अतिरिक्त ऊष्मा को बिना पंख वाले स्थान से आसानी से निकाला जा सके।
  6. अधिक वातारणीय तापमान से आंक्सीजन लेने में कमी आती है।
  7. अधिक तापमान नाड़ी की गति ,रक्त में कैल्शियम का स्तर,शारीरिक भार, रक्त चाप, थाइराॅइड के आकार व क्रिया में कमी का कारक होता है।
  8. सामान्यता अधिक वातावरणीय तापमान के साथ आर्द्रता भी बढ़ जाती है। इससे काक्सीडियोसिस की संभावना अधिक होती है।
  9. ग्रीष्म ऋतु में बाह्य परजीवी की समस्या बढ़ जाती है।
  10. अधिक तापमान अंडे के छोटे आकार का कारक बनता है, क्योंकि इस मौसम में बहुत ही कम धनत्व वाले लिपोप्रोटिन और वाइटेलोजोनिन की मात्रा में कमी आती है।
  11. गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए जब कुक्कुटों तेज गति से सांस लेते हैं तो शरीरका द्रव्य काफी क्षारीय हो जाता है, जिससे गुर्दे से अधिक मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट का स्रावन होता है। अतः इलेक्ट्रोलाइट की कमी हो जाती है।
  12. शरीर में आक्सीजन की कमी की पूर्ति के लिए वसीय अम्लों का आक्सीकरण (ग्लुकोनियोजेनेसिस) बढ़ जाता है जिससे शरीर में उर्जा की कमी की पूर्ति की जाती है।
  13. भारी ब्रायलर में गर्मी के दिनों में अनके चयापचयी विकार उत्पन्न हो जाते है तथा लु लगना, यकृत फटने जैसी बीमारियाँ हो जाती है।
  14. यदि वातारणीय तापमान के साथ साथ आर्द्रता भी अधिक हो, तो कुक्कुट अपने षरीर की अधिक गर्मी को निकालने में अक्षम रहते है जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है।
  15. गर्मी के कारण श्वसन दर अधिक होने तथा आक्सीजन ग्रहण करने की कमी के कारण रक्त का पी.एच मान बढ़ जाता है।
  16. गर्मी के दिनों में प्रजनक कुक्कुटों की सामान्य क्रियाओं में कमी आने के कारण फर्टिलिटी तथा हैचेबिलिटी में कमी आती है।
  17. पिंजरे मे पालने वाले कुक्कुटों में बिछावन वाले कुक्कुटों की तुलना में अधिक समस्या आती है।

कुक्कुटों में गर्मी के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक प्रबंधन-

अ. आनुवंशिकी प्रबंधनः
गर्मी में अधिक तापमान के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए कुक्कुटों का आनुवंशिकी प्रबंधन एक स्थायी समाधान है। अतः अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में ऐसे नस्ल का चयन करना चाहिए जिनमें गर्मी के प्रति अधिक सहनषीलता हो। सामान्यतः विदेशी नस्ल की तुलना में भारतीय नस्ल/देशी नस्ल के कुक्कुट में गर्मी सहने की क्षमता एवं बीमारियोें के प्रति प्रतिरोधकता अधिक होती है। इसके साथ ही ऐसे विकसित नस्लों का उपयोग करना चाहिए जिनमें देषी नस्लों का समावेष हो।

ब. आवास प्रबंधनः

  1. गर्मी में तापमान को नियंत्रित करने के लिए कुक्कुटों के घर की संरचना (विशेषकर छत, दरवाजे, खिडकियाॅं व अन्य हवादान ) की बनावट सही तरीके से होना चाहिए । इससे तापमान को 5-10 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है।
  2. गर्मी में कुक्कुट आवास के तापमान को सामान्य बनाए रखने के लिए घर के छत को पर्याप्त ऊॅचाई में होना चाहिए।
  3. बडे़ फार्म में एल्युमिनियम की छत को ही प्राथमिता दी जाती है। जिसमें प्रकाश परावर्तन की क्षमता होती है।
  4. कुक्कुटों के घर की लम्बाई पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए ताकि सुर्य का प्रकाश सीधे घर के अंदर प्रवेश न करे।
  5. कुक्कुट आवास के छत के सभी दिशाओं में छज्जा होना चाहिए जिससे कुक्कुटों पर पड़ने वाले प्रकाष की सीधी किरणों को रोका जा सके।
  6. यदि गर्मी बहुत ही अधिक हो, तो छत को घास से ढक देना चाहिए या तो बाहर की ओर छत को हल्के रंग जैसे सफेद आदि से पोताई कर देना चाहिए।
  7. कुक्कुटों के कमरे पर्याप्त हवादानी ( वेन्टीलेटर) होना चाहिए। कूलर, पंखे आदि का उपयोग करना चाहिए।
  8. जितना संभव हो कुक्कुट आवास की चैड़ाई 10 मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए अन्यथा अधिक वायुसंचार की आवश्यकता होती है।
  9. घर को ठंडा रखने के लिए छत में स्प्रिंकलर लगा कर 10 से 18 घंटे प्रतिदिन पानी का छिडकाव करना चाहिए।
  10. घर के चारो ओर हरे छायादार वृक्ष या पेड़ लगाने चाहिए जिससे गर्म हवा को घर में आने से रोका जा सके।
  11. यदि आर्द्रता कम हो तथा तापमान अधिक हो, तो सुरंग प्रकार का वायु संचारक ठंडे गत्ते के साथ होना चाहिए ।
  12. गर्म व सुखे मौसम में ब्रायलर फार्म में अंदर की ओर फाॅगर उपलब्ध कराना चाहिए ।
  13. गर्मी के मौसम में प्रत्येक कुक्कुट को सामान्य से अधिक जगह रहने के लिए देना चाहिए जिससे दो कुक्कुट के बीच पर्याप्त वायु प्रवाह हो सके।
  14. यदि कुक्कुटों को पिंजरे में पाला जाए तो घर के मध्य में छत की ऊॅचाई कम से कम 14 फीट होनी चाहिए ।
  15. गर्म सुखे प्रदेशों में यदि संभव हो तो वातारण नियंत्रित (ई.सी.) घरों की व्यवस्था करनी चाहिए ।

स. आहार प्रबंधनः कुक्कुटों के आहार (दाना-पानी) में सामान्यतः परिवर्तन कर ग्रीष्म ऋतु मे अच्छा प्रबंधन किया जा सकता है।

  1. ग्रीष्म ऋतु में कुक्कुटों को अधिक से अधिक पानी पीने के लिए उपलब्ध कराना चाहिए। पानी तथा भोजन का अनुपात 2ः1 होना चाहिए तथा कुक्कुटों को सामान्य से दो गुना अधिक पानी पीना चाहिए जिससे तापमान को नियंत्रित किया जा सके।
  2. कुक्कुटो को स्वच्छ व ठण्डा पानी दिन में कम से कम चार बार उपलब्ध कराना चाहिए तथा पानी के बर्तनों की संख्या बढ़ाकर रखना चाहिए।
  3. उर्जा के स्तर को सामान्य बनाए रखते हुए उनके स्त्रोत में परिवर्तन कर गर्मी को नियंत्रित किया जा सकता है। कार्बोहाइड्रेट या प्रोटीन द्वारा प्राप्त उर्जा को वसा या तेल से स्थानांतरित करना गर्मी में लाभदयक होता है।
  4. ग्रीष्म ऋतु में कुक्कुटो को आहार में उर्जा का स्तर घटाकर (10 प्रतिशत तक) व प्रोटीन के स्तर को 01 से 02 प्रतिशत बढ़ाकर उनमें खाने के लिए रूचि जागृत की जा सकती है।
  5. गर्मी में कुक्कुट दाने में विटामिन ,खनिज लवण व अन्य अमीनो अम्ल की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
  6. गर्मी को सहन करने के लिए कुक्कुटों को दाने में सोडियम बाइकार्बोनेट, क्लोरप्रोमाजिन हाइड्रोक्लोराइड , पैरासिटामाल, एस्कार्बिक अम्ल, इलेक्ट्रोलाइट आदि सम्मिलित किया जा सकता है।
  7. इलेक्ट्रोलाइट को पानी में मिलाकर देने से पीने के पानी की मात्रा में वृद्वि होने से तापमान नियंत्रित रहता है।
  8. कुक्कुटों को लु लगने से बचाने के लिए तथा अच्छी गुणवत्ता (मोटा अंडा कवच) के अण्डा उत्पादन के लिए एक टन दाने में एक से दो किलो सोडियम बाइकार्बोनेट मिलाना चाहिए।
  9. लेयर मुर्गियों को लु से बचाने के लिए 0.59 प्रतिषत पोटेशियम क्लोराइड दाने के साथ दिया जाना चाहिए ।
  10. आहार ग्रहण करने से और अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है अतः कुक्कुटों विशेष कर ब्रायलर को दोपहर के समय भोजन देने से बचना चाहिए तथा उन्हे ठंड के समय (सुबह या शाम) को दाना देना चाहिए।

द. बिछावन प्रबंधनः

  1. बिछावन की मोटाई 2 से 3 इंच रखना चाहिए।
  2. बिछावन को समय अंतराल में पलटते रहना चाहिए। आवष्यकतानुसार बिछावन को बदलना चाहिए क्योंकि बिछावन से काफी गर्मी व गैस बनती हैं।
  3. बिछावन ज्यादा धूलित नहीं होना चाहिए।

ग्रीष्म ऋतु में अच्छे कारगार उपयों का कुक्कुट पालन में उपयोग कर उनकी उत्पादन क्षमता को कम होने से बचाया जा सकता है जो कि आर्थिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। वर्तमान में नई नई तकनीको का उपयोग कर गर्मी के प्रभाव के प्रभाव को कम किया जा रहा है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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