अण्डा सेने के समय मुर्गी की देखभाल
डाॅ.ऋतु गुप्ता, डाॅ. दीपक कुमार चैरसिया, डाॅ. अभिषेक कुमार, डाॅ खुशबु चंद्राकर, डाॅ. कमलेश कुमार चौधरी, डाॅ. कस्तुरी प्रधान


देशी मुर्गी एक अच्छी मां होती है हमेशा अपने अण्डों और चूजों की उचित देखभाल करती है। कुड़क मुर्गी (Brooding Hen) अण्डों या नवजात चूजों के ऊपर पंखों को फैलाकर उन्हें अपनी शरीर के तापमान से गर्म रखती है। यह देखा गया है कि कुडुक मुर्गी की देखभाल ग्रामीण पशुपालक नहीं करते हैं। मुर्गी को कहीं भी बैठना पड़ता है एवं इसके कुछ अण्डे खराब होने के साथ-साथ जूँ किलनी आदि से भी वह परेशान रहती है।

निम्नलिखित बातों पर ध्यान देने से अण्डों की संख्या में बढ़ोत्तरी के फलस्वरूप चूजों की संख्या बढ़ाई जा सकती है:-
- घोंसला/ लेइंग नेस्ट, वह स्थान है जहाँ मुर्गी अंडे देकर उन्हे सेती है। यह एक बांस की टोकरी या लकड़ी के बक्से से बनाया जा सकता है। जो मुर्गी घर के कोनों में, किसी ऊँचे स्थान पर रखा गया हो। घर पर उपलब्ध पुरानी टोकरी, टूटी हंडी का भी उपयोग किया जाता है।
- घोंसला/लेइंग नेस्ट पर सूखी, मुलायम, साफ पैरा घास का बिछौना बिछाया जा सकता है, जहां कुड़क मुर्गी बैठ सके।
- इन मुर्गियों को व उनके घोंसलों (लेइंग नेस्ट) को जूँ, किलनी, पिस्सू आदि बाह्य परजीवी से मुक्त रखना चाहिए, ताकि बार-बार खुजली से परेशानी न हो व मुर्गी आराम से अण्डे से सकें।
- एक साफ-सुथरा, आरामदायक घोंसला नेस्ट बनाने से मुर्गियां कहीं भी अण्डा नहीं देती है। इससे गंदे अण्डों से मुक्ति मिलती है तथा जंगली जानवर व पक्षी अण्डे खा नहीं पाते हैं।
- अण्डों के चटकने टूटने. अण्डे खाने की आदत में कमी तथा अण्डे खराब होने का अन्देशा कम रहता है।
- अण्डा देने वाली मुर्गी को नियमित (प्रति तीन माह पश्चात) कृमिनाशक दवापान कराना चाहिए।

घोंसला/नेस्ट की जगह
मुर्गीयां हमेशा एकांत स्थान पर ही अण्डे देना पसंद करती है, इस कारण घोंसला/नेस्ट हमेशा ऐसे स्थान पर रखें जहां-
- एकांत हो (घर के अन्दर या मुर्गी घर/कोठे के कोने में)।
- अंधेरा रहे (सीधे सूर्य की रोशनी न पड़े)।
- हवादार हो।
- जमीन से कम से कम 2 फीट/1 हाथ की ऊंचाई पर हों।
- ठंडा व सूखी जगह हो।
- घोंसला/नेस्ट के नजदीक हर समय साफ, पीने का पानी उपलब्ध होना चाहिए तथा उपलब्धता के अनुसार दाना (कोंढ़ा, पत्ती/भाजी. मक्का आदि) रखना चाहिए। ऐसा करने से मुर्गी ज्यादा से ज्यादा समय अण्डा सेने के लिए बैठती है।

लेखक:
डाॅ.ऋतु गुप्ता (सहायक प्राध्यापक),
डाॅ. दीपक कुमार चैरसिया (सहायक प्राध्यापक),
डाॅ. अभिषेक कुमार (पशु चिकित्सक),
डाॅ खुशबु चंद्राकर (पशु चिकित्सक),
डाॅ. कमलेश कुमार चौधरी (पशु चिकित्सक),
डाॅ. कस्तुरी प्रधान (पशु चिकित्सक)










