पशुपालन

वैज्ञानिक पशु शेड निर्माण: लाभकारी पशुपालन की पहली आवश्यकता

डॉ. उपासना वर्मा, डॉ. स्मृति श्रवण, डॉ. चित्रलेखा देव, डॉ. नेहा पूरे

भारत में पशुपालन केवल एक परंपरागत व्यवसाय नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। आज जब पशुपालक कम पशुओं से अधिक उत्पादन प्राप्त करना चाहते हैं, तब पशुओं के पोषण, स्वास्थ्य और प्रबंधन के साथ-साथ उनके आवास पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक हो गया है। अक्सर देखा जाता है कि पशुओं को अच्छी नस्ल, संतुलित आहार और समय पर उपचार तो उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन उन्हें रखने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयुक्त शेड का निर्माण नहीं किया जाता। परिणामस्वरूप पशु गर्मी, ठंड, वर्षा और नमी जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

एक स्वस्थ एवं आरामदायक पशु आवास पशुओं के लिए उतना ही आवश्यक है जितना मनुष्य के लिए सुरक्षित घर। वैज्ञानिक ढंग से निर्मित शेड पशुओं को मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने के साथ-साथ उन्हें तनावमुक्त वातावरण प्रदान करता है। ऐसे शेड में पर्याप्त हवा और प्रकाश का आवागमन होता है, फर्श सूखा रहता है, जल निकासी की उचित व्यवस्था होती है तथा सफाई आसानी से की जा सकती है। यही कारण है कि आधुनिक डेयरी एवं पशुपालन इकाइयों में पशु शेड के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

क्यों आवश्यक है वैज्ञानिक पशु शेड?

पशु अपने जीवन का अधिकांश समय शेड में ही बिताते हैं। यदि आवास अस्वच्छ, संकीर्ण अथवा नम हो तो पशुओं में खुरपका-मुंहपका, गलघोटू, मास्टाइटिस, खुर संबंधी रोग तथा परजीवी संक्रमण जैसी समस्याएँ अधिक देखने को मिलती हैं। वहीं दूसरी ओर उचित शेड में रहने वाले पशु अपेक्षाकृत कम बीमार पड़ते हैं, उनका चारा सेवन बेहतर होता है तथा दूध उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता में भी सुधार देखा जाता है।

गर्मी के मौसम में अधिक तापमान पशुओं में हीट स्ट्रेस उत्पन्न करता है, जिससे दूध उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। यदि शेड में पर्याप्त वेंटिलेशन, ऊँची छत और छायादार व्यवस्था हो तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसी प्रकार सर्दियों में ठंडी हवाओं से बचाव तथा वर्षा ऋतु में सूखा फर्श पशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा करता है।

शेड निर्माण के लिए स्थान का चयन

पशु शेड बनाते समय सबसे पहले उपयुक्त स्थान का चयन करना चाहिए। शेड ऐसी भूमि पर बनाया जाना चाहिए जो आसपास के क्षेत्र से थोड़ी ऊँची हो ताकि वर्षा का पानी जमा न हो। जलभराव वाले स्थानों पर नमी बनी रहती है, जिससे जीवाणु और परजीवी तेजी से बढ़ते हैं।

स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ स्वच्छ पेयजल, बिजली, सड़क तथा चारे की व्यवस्था आसानी से उपलब्ध हो। भविष्य में यदि पशुओं की संख्या बढ़ानी हो तो विस्तार के लिए पर्याप्त स्थान भी होना चाहिए।

शेड की दिशा का महत्व

भारत की जलवायु को देखते हुए अधिकांश क्षेत्रों में पशु शेड को उत्तर-दक्षिण दिशा में बनाना उपयुक्त माना जाता है। इस दिशा में दिनभर सूर्य का प्रकाश क्रमशः फर्श पर पड़ता रहता है, जिससे नमी कम होती है और रोगाणुओं की वृद्धि भी घटती है। साथ ही प्राकृतिक वायु संचार बेहतर बना रहता है, जिससे पशुओं को गर्मी से राहत मिलती है।

फर्श कैसा होना चाहिए?

किसी भी पशु शेड का सबसे महत्वपूर्ण भाग उसका फर्श होता है। यदि फर्श चिकना होगा तो पशुओं के फिसलने का खतरा बढ़ जाएगा और यदि अत्यधिक खुरदरा होगा तो खुरों में चोट लग सकती है। इसलिए फर्श मजबूत, टिकाऊ तथा हल्का खुरदरा होना चाहिए। सीमेंट-कंक्रीट का फर्श सबसे अधिक उपयुक्त माना जाता है।

फर्श में हल्की ढाल अवश्य होनी चाहिए ताकि मूत्र एवं धुलाई का पानी आसानी से नालियों में चला जाए और शेड हमेशा सूखा रहे।

हवादार एवं रोशन शेड

पशुओं के लिए ताजी हवा उतनी ही आवश्यक है जितना संतुलित आहार। यदि शेड में हवा का उचित आवागमन नहीं होगा तो अमोनिया जैसी हानिकारक गैसें जमा होने लगती हैं, जिससे श्वसन संबंधी समस्याएँ बढ़ जाती हैं। इसी कारण शेड की दीवारें अधिक ऊँची न रखते हुए ऊपर का भाग खुला रखना चाहिए।

दिन के समय प्राकृतिक प्रकाश पर्याप्त मात्रा में मिलना चाहिए, जबकि रात्रि में दुग्ध दुहन एवं अन्य कार्यों के लिए पर्याप्त कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रति पशु स्थान की अनुशंसा

पशु ढका क्षेत्र (वर्गमीटर)                     खुला क्षेत्र (वर्गमीटर)
दुधारू गाय 3.5–4.0 7–8
भैंस 4.0–4.5 8–10
गर्भित पशु 12 24
बछड़ा 1.0–2.0 2–4

 

पानी और चारा प्रबंधन

दुग्ध उत्पादन करने वाले पशुओं को प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ एवं ताजा पानी उपलब्ध होना चाहिए। गर्मियों में एक दुधारू पशु 80 लीटर या उससे अधिक पानी भी पी सकता है। पानी की कमी का सीधा प्रभाव दूध उत्पादन पर पड़ता है।

नांद ऐसी होनी चाहिए जिसमें चारा बिखरे नहीं तथा उसे साफ करना आसान हो। इससे चारे की बर्बादी कम होती है और स्वच्छता बनी रहती है।

स्वच्छता ही रोगों से बचाव का सबसे सरल उपाय

पशु शेड की नियमित सफाई वैज्ञानिक प्रबंधन का अभिन्न भाग है। गोबर और मूत्र को प्रतिदिन हटाना चाहिए तथा सप्ताह में कम से कम एक बार कीटाणुनाशक घोल से शेड की धुलाई करनी चाहिए। मक्खी एवं मच्छर नियंत्रण के उपाय भी आवश्यक हैं क्योंकि ये अनेक रोगों के वाहक होते हैं।

यदि कोई पशु संक्रामक रोग से ग्रसित हो तो उसे अन्य पशुओं से अलग रखना चाहिए। नए खरीदे गए पशुओं को भी कुछ समय तक पृथक रखकर ही मुख्य झुंड में शामिल करना चाहिए।

आधुनिक डेयरी फार्मों की दिशा

आज बड़े डेयरी फार्मों में स्वचालित पानी पिलाने की व्यवस्था, रबर मैट, फॉगर्स, स्प्रिंकलर, बड़े एचवीएलएस पंखे, वर्षा जल संचयन तथा बायोगैस संयंत्र जैसी आधुनिक सुविधाएँ तेजी से अपनाई जा रही हैं। इन तकनीकों से पशुओं को अधिक आराम मिलता है, श्रम की बचत होती है तथा उत्पादन लागत कम होती है।

यह मानक भारतीय डेयरी आवास संबंधी अनुशंसाओं के अनुरूप व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।

निष्कर्ष

वैज्ञानिक पशु शेड निर्माण कोई अतिरिक्त खर्च नहीं, बल्कि लाभकारी निवेश है। एक सुव्यवस्थित, स्वच्छ और हवादार शेड पशुओं को स्वस्थ रखता है, उत्पादन क्षमता बढ़ाता है तथा उपचार पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करता है। यदि पशुपालक शेड निर्माण के समय वैज्ञानिक सिद्धांतों का पालन करें और नियमित स्वच्छता बनाए रखें, तो कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आधुनिक एवं टिकाऊ पशुपालन की दिशा में वैज्ञानिक पशु शेड सबसे महत्वपूर्ण आधार है।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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