मुर्गियों में रोग एवं टीकाकरण
डॉ. ऋतु गुप्ता, डॉ. अर्चना एवलिन केरकेट्टा, डॉ. अभिषेक कुमार, डॉ. दीपक कुमार चौरसिया, डॉ. कस्तुरी प्रधान, डॉ. आशीष कुमार महंत


मुर्गियों में जीवाणु द्वारा उत्पन्न रोगों से 25-100 प्रतिशत तक मृत्यु दर होने की संभावना रहती है। आर्थिक दृष्टिकोण से मुर्गियों के रोगी हो जाने पर इलाज लाभकारी नहीं होता। कुछ बीमारियों से बचाव के लिए पहले से प्रयास करना आवश्यक होता है। अतः मुर्गी पालकों को अपनी मुर्गियों में होने वाले रोगों के लक्षण, रोकथाम, टीकाकरण तथा इलाज के संबध में जानकारी होना चाहिए। घरेलू मुर्गीपालन में आमतौर पर मुर्गियों को निम्नांकित दो बिमारियों से बचाना चाहिए तथा नियमित टीकाकरण चाहिए।
झुमरी रोग/रानीखेत रोग
यह देशी मुर्गियों का एक प्रमुख रोग है जिससे सबसे ज्यादा नुकसान मुर्गी पालक को होता है। यह एक विषाणु जनित रोग है जिसका इलाज संभव नहीं है, अर्थात् टीकाकरण ही एकमात्र बचने का उपाय है। रोग के विषाणु अक्सर दूषित जल व दाने तथा बीमार व स्वस्थ्य मुर्गियों के एक दूसरे के संपर्क में आने से फैलते है। इस कारण यह बेहद आवश्यक है कि मुर्गियों में रानीखेत का टीकाकरण नियमित रूप से किया जावे।

झुमरी बीमारी के मुख्य लक्षण:-
- सभी मुर्गियों का बीमार होना तथा प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा बीमार मुर्गियों की मृत्यु होना।
- सुस्त होना एवं खाना-पीना बंद करना।
- सिर में सूजन व मुंह से लार गिरना।
- आधा मुंह खोलकर लम्बी-लम्बी सांस लेना एवं सांस लेने में आवाज आना।
- मुर्गियों का ऊंघना/झुमरना।
- हरा/पीला दस्त होना।
- लकवा मारना-पंख लटक जाना पांव का अकड़ जाना।
- गर्दन टेढ़ी होना।
रानीखेत बीमारी फैलने पर क्या करे ?

रोग नियंत्रण की दृष्टि से पूरे गांव अथवा पारा को एक खुला देशी मुर्गी फार्म माना जा सकता है। किन्तु ऐसे देशी मुर्गी फार्म में कुछ विशेष ध्यान देने योग्य बातें हैं-
1. मुर्गियों को बाजार में लेकर जाने व बाहरी मुर्गियों (कई बार बीमार) को बाजार से गांव/पारा में लाने पर कोई नियंत्रण नहीं होता है।
2. टीकाकरण प्रतिशत का कम होना, जिसके निम्न कारण हो सकते है-
(अ) देशी मुर्गी पूर्णतः खुली पद्धति में पाली जाती है। अक्सर मुर्गियों के पेड़/छत में रहने के कारण मुर्गी पालक अपनी सभी मुर्गियों का टीकाकरण नहीं करा पाते है।
(ब) आदिवासियों में जागरूकता की कमी होने के कारण भी टीकाकरण के समय सभी घरों की मुर्गियों का टीकाकरण नहीं हो पाता है।
3. एक त्वरित रोग- ऐसा रोग जिसके फैलने की सूचना पशुपालन विभाग को देना चाहिए।
अतः प्रथम दृष्टि में देशी मुर्गियों मे झुमरी रोग नियंत्रण अत्यन्त कठिन कार्य लग सकता है पर योजनाबद्ध वैज्ञानिक तरीके से यह कार्य बहुत सरलता से किया जा सकता है।
झुमरी रोग फैलने की सूचना मिलते ही –
- सर्वप्रथम स्वयं गाँव/पार में जाकर देखें। अक्सर यह देखा गया है कि सफेद दस्त, कोराइजा बीमारी से मृत्यु को भी ग्रामीण मुर्गी पालक झुमरी रोग बता देते है।
- झुमरी रोग पाये जाने की स्थिति में सभी स्वस्थ्य दिखती मुर्गियों में तुरंत टीकाकरण करना चाहिए।
- बड़ी मुर्गियों में आर 2 बी टीका लगाना चाहिए।
- चूजों एवं छोटी मुर्गियों में एफ 1 टीका लगाना चाहिए।
- सभी बीमार मुर्गियों को अलग रखने की सलाह देना चाहिए। ऐसे मुर्गियों को टैट्रासाइक्लीन पाउडर पानी में मिलाकर पिलाया जा सकता है।
- टीकाकरण के दौरान सभी मुर्गी पालकों को नियमित टीकाकरण (आर 2 बी टीका) साल में तीन बार करने की सलाह देना चाहिए।
- झुमरी रोग को रानीखेत नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि यह बीमारी हमारे देश मे उत्तरांचल प्रदेश की रानीखेत नामक जगह पर पहली बार देखी गयी थी।
टीकाकरण विधि –
झुमरी अथवा रानीखेत रोग इसके लिए दो तरह के टीके लगवाने पड़ते है- एफ 1 एवं आर 2 बी टीका।
एफ 1/बी 1/लसोटा –

- चूजों को यह टीका लगवाना चाहिए।
- एक शीशी (वायल) टीका द्रव्य से 100 चूजों को टीका लगाया जा सकता है।
- टीका द्रव्य को बताए अनुसार घोल बनाएं, बर्फ में रखे, एवं 2 घंटे के भीतर खपत कर लें।
- घोल बनाने के बाद एक या दो बूंद टीकाद्रव्य ऑख या नाक में डाले।
आर 2 बी/आर.बी/ रानीखेत रेग्यूलरन
- बड़े मुर्गियों को यह टीका लगवाना चाहिए।
- एक शीशे (वायल) टीका द्रव्य से 100 मुर्गियों को टीका लगाया जा सकता है।
- टीका द्रव्य को उपरोक्त अनुसार घोल बनायें, बर्फ में रखें एवं 2 घंटे के भीतर खपत कर लें।
- घोल बनाने के बाद 0.5 एम.एल टीकाद्रव्य इन्जेक्शन द्वारा मांस में लगाएं।
- अच्छा हो कि यह टीका उन मुर्गियों में लगायें जिन्हें एफ 1 टीका पहले लग चुका हो।
- चार माह के भीतर पुनः आर 2 बी टीका लगाना चाहिए।
माता रोग /चेचक /फाउल पॉक्स

देशी मुर्गियों में चेचक/माता रोग एक आम व दूसरी प्रमुख बीमारी है। इससे ग्रस्त प्रायः सभी छोटे चूजों की मृत्यु हो जाती है। बड़ी मुर्गियों की मृत्यु तो कम होती है पर स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। चेचक/ माता रोग एक विषाणु जनित रोग होने के कारण इसके इलाज नहीं हो सकता हैं। अर्थात् टीकाकरण ही एकमात्र बचने का उपाय है। चूंकि बीमारी पूरे साल गॉव/पारा की मुर्गियों में बड़े
छोटे/बड़े रूप में होती रहती है, इस कारण बीमारी से बचने के लिए नियमित टीकाकरण (साल में दो बार) करना आवश्यक है।
लक्षण:-
चेचक/ माता रोग के तीन किस्में/रूप है-
1. त्वचा का चेचक 2. गले का चेचक 3. आँखों का चेचक
त्वचा का चेचक:-
यह किस्म/रूप सबसे अधिक देखने को मिलते हैं। छोटे-छोटे मटमैले छालों की तरह दाने कलगी तथा पंख रहित हिस्सों पर उभर आते हैं। व जल्दी से फट जाते हैं और पपड़ी बन जाते है। फिर आपस में ड़ जाते है व चेचक का रूप ले लेते हैं, फैलते-फैलते नाक पर, आँख पर और चोंच के दोनो कनारों पर भी आ जाते हैं। यह चेचक 3 या 4 सप्ताह तक रहकर झड़ जाते हे। छोटे चूजों की 3-4 सप्ताह भोजन चरने में कठिनाई के कारण मृत्यु हो जाती है। बड़ी मुर्गियों की मृत्यु तो नहीं होती पर स्वास्थ्य पर बड़ा बुरा असर पड़ता है। तथा वजन व अण्डा उत्पादन में बहुत कमी आ जाती है।

गले का चेचक:
चेचक की यह किस्म सबसे ज्यादा नुकसानदेह है। इससे छोटे चूजों व बड़ी मुर्गियां की समान रूप से मृत्यु होती है। गले वाली चेचक मे मुंह व गले के अन्दर उभरे हुए छाले हो जाते है. जो बड़े होकर और गहरे हो जाते है। जिसके कारण मुर्गिया अच्छी तरह खा नहीं पाती व उनकी हालत जल्दी बिगड़ जाती है व मृत्यु हो जाती है।
आंखों का चेचक:-
इस किस्म में बीमारी का प्रभाव आंखों में दिखता है। आंखो में पानी आने लगता है जो बाद में गाढ़ा हो जाता है, आखें मवाद से भर जाती है और फल आती है। पलक चिपक जाती हैं और मुर्गी देख नहीं पाती। फलस्वरूप भूख से मृत्यु हो जाती है। यह जानना आवश्यक हे कि एक ही समय में अलग-अलग मुर्गियों में तीनों किस्में देखी जा सकती है। छालों या फफोलों पर कोई एक अच्छा एन्टीबायोटिक मल्हम लगाकर रोग की तीव्रता को कम किया जा सकता है, लेकिन इस बीमारी का कोई सीधा इलाज संभव नहीं है। रोग न होने से पहले नियमित टीकाकरण ही बचाव का एकमात्र सही एवं सस्ता उपाय है।

टीकाकरण विधि:-
- चूजों एवं बड़ी मुर्गियों को यह टीका लगाना चाहिए।
- एक शीशी (वायल) टीका द्रव्य से 100 चूजों/मुर्गियों को टीका लगाया जा सकता है।
- टीका द्रव्य को पूर्व में बतायी विधि अनुसार घोल बनाएं, बर्फ में रखें, एवं 2 घंटे के भीतर खपत कर लें।
- चेचक टीका का 0.5 एम.एल. टीका द्रव्य इन्जेक्शन द्वारा मांस मे लगाया जाता है।
- यह टीका साल में दो बार लगवायें।
- इस रोग के टीकाकरण में, वर्ष में एक रूपया प्रति मुर्गा खर्च आता है।
टीकाकरण करने के पूर्व क्या करे ?
- हाथों के नाखूनों को अच्छी तरह से काटें।
- हाथों को कम से कम दो बार साबुन एवं साफ पानी से अच्छी तरह धोयें और बाद में तौलिये से न पोछंे बल्कि हाथों को हवा में सुखाएं।
- उबलते पानी में सिरिंज के विभिन्न भागों को अलग-अलग डालकर 15-20 मिनट उबालें।
- उबालने के पश्चात् चिमटी की सहायता से सिरिंज को निकालकर, बर्तन में रखें।
टीका बनाने की विधि:-
मुर्गियों के उपरोक्त दोनों टीके सूखी हुई, शीशी बंद गोली के रूप में मिलते हैं, जिन्हें टीकाकरण के पूर्व, साथ में उपलब्ध, घोलक में घोलकर बनाया जाता है।
- टीके तथा घोलक की सील खोलें।
- लगभग 1 मि.ली. घोलकर सिरिंज में भरकर टीके की शीशी में डालें। टीके की शीशी को हिलाकर टीके को घोलें।
- घुले हुए टीके को सिरिंज में भरकर वापस घोलक की शीशी में डालें घोलक की शीशी को हिलाकर टीके को पूरे घोलक में मिला लें। अब टीका तैयार है।
सावधानियाँ:-
- टीका घोलने के पश्चात् 2 घंटे के अंदर उपयोग करें नहीं जो टीका खराब हो जाएगा।
- दो घंटे के बाद शेष बचे टीके को फेंक दें।
- टीका हमेशा बर्फ में रखकर घोंलें।
- मुर्गियों में टीका निर्धारित मात्रा/ डोज से कम नही लगाना चाहिए।
टीकाकरण सबंधी आवश्यक बातें:-
- टीका बाजार से लाने से लेकर उपयोग करने तक इसे थर्मस के अन्दर बर्फ में रखें।
- टीका खरीदते समय टीके के उपयोग की अंतिम तारीख देखनी चाहिए।
- टीका लगने से पहले सिरिंज आदि को अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
- टीके को दिए गए निर्देश के अनुसार ठीक प्रकार मिलाना चाहिए।
- टीके को गर्मी या लू से बचाएं।
- घोलक को टीका तैयार करने से पूर्व ठंडा करना चाहिए।
- टीका तैयार कर लेने पर इसे 2 घंटे के अन्दर इस्तेमाल करें वरना असर जाता रहेगा।
- पुराना टीका फेंक दें। हमेशा नया टीका तैयार करके लगाएं।
- टीका लगाने के 1 दिन पूर्व से तथा 2-3 दिन बाद तक चजों का विटामिन तथा एंटीबायोटिक पाउडर दें।
- बीमार मुर्गियों का टीकाकरण न करें।
- टीका लगाने के साथ-साथ कृमिनाशक दवापान अवश्य कराएं।
- प्रथम टीकाकरण के 14 से 21 दिन बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है।
मुर्गीयों में होने वाली प्रमुख बिमारियां, लक्षण एवं बचाव
| क्र . | बिमारी | चित्र | प्रमुख लक्षण | बचाव |
| 1 | झुमरी/रानीखेत | ![]() |
ऊंघना एवं दस्त, नाक से पानी आना, पैर एवं पंख में लकवा मारना, सांस लेने में कठिनाई, बहुत सारी मुर्गी एक साथ प्रभावित |
बिमारी से पहले मियमित टीकाकरण आवास एवं बर्तनों की साफ सफाई बिमार मुर्गी से दूर रखना ठंड से बचाव |
| 2 | चेचक /पॉक्स | ![]() |
कलगी , चेहरा एवं आंखों में फोड़े, फोडे़ फूटकर घाव, बहुत सारी मुर्गी एक साथ प्रभावित |
|
| 3 | सफेद दस्त | ![]() |
ऊंघना एवं सफेद दस्त कमजोरी |
आवास एवं बर्तनों की साफ सफाई लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार |
| 4 | खूनी दस्त | ![]() |
ऊंघना एवं खूनी दस्त कमजोरी |
आवास एवं बर्तनों की साफ सफाई लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार |
| 5 | कृमि | ![]() |
वजन न बढ़ना, कमजोरी अन्य बिमारी से प्राकिृतिक बचाव शक्ति कम होना |
प्रति तीन माह कृमि नाशक दवा पिलाना |
| 6 | सर्दी | ![]() |
ऊंघना, नाक से पानी आना सांस लेने में कठिनाई सांस लेने में घरघराहट कमजोरी |
बिमार मुर्गी एवं ठंउ से बचाव लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार |
लेखक:
डॉ. ऋतु गुप्ता (सहायक प्राध्यापक), डॉ. अर्चना एवलिन केरकेट्टा (पशु चिकित्सक), डॉ. अभिषेक कुमार ( पशु चिकित्सक ), डॉ. दीपक कुमार चौरसिया ( सहायक प्राध्यापक ), डॉ. कस्तुरी प्रधान ( पशु चिकित्सक ), डॉ. आशीष कुमार महंत ( पशु चिकित्सक )
















