एल नीनो (EL-nino) के प्रभाव में कम वर्षा की संभावना : दलहन एवं तिलहन बन सकते हैं किसानों की आर्थिक सुरक्षा का आधार
नीलम सिन्हा, कृषि अर्थशास्त्री एवं शोधार्थी, कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय


इस वर्ष भारतीय मौसम विभाग द्वारा एल नीनो (El Niño) के प्रभाव के कारण कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना व्यक्त की गई है। ऐसे समय में वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर राज्यों के किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमित जल उपलब्धता में लाभकारी खेती करना है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ शासन ने विशेष रूप से ऊँचाई वाले एवं असिंचित क्षेत्रों के किसानों को धान के स्थान पर अरहर, मूंग, उड़द तथा सोयाबीन जैसी दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी है। साथ ही इन फसलों को प्रोत्साहित करने के लिए ₹15,000 प्रति एकड़ की प्रोत्साहन सहायता देने की घोषणा भी की गई है।
यह पहल केवल कम वर्षा से होने वाले नुकसान को कम करने का उपाय नहीं है, बल्कि कृषि को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु के अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
कम वर्षा में धान की खेती क्यों होती है जोखिमपूर्ण?
छत्तीसगढ़ की पहचान धान उत्पादन से जुड़ी रही है, लेकिन धान ऐसी फसल है जिसकी सफलता पर्याप्त एवं समय पर वर्षा पर निर्भर करती है। यदि मानसून कमजोर पड़ जाए या वर्षा का वितरण असमान हो, तो अंकुरण, रोपाई, पौधों की वृद्धि तथा दाना भरने की अवस्था प्रभावित होती है। परिणामस्वरूप उत्पादन घटता है और किसानों की आय पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ऊँचाई वाले क्षेत्रों में कम वर्षा होने पर धान की उत्पादकता लगभग 8–10 क्विंटल प्रति एकड़ रह सकती है, जिससे किसानों को लगभग ₹19,500 से ₹24,400 प्रति एकड़ की सकल आय प्राप्त होती है। जबकि उत्पादन लागत लगभग समान बनी रहती है, जिससे शुद्ध लाभ में उल्लेखनीय कमी आती है।
ऐसी परिस्थितियों में किसानों के लिए कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलें अधिक व्यावहारिक विकल्प बन जाती हैं।
दलहन एवं तिलहन : कम पानी में बेहतर आय
अरहर, मूंग, उड़द एवं सोयाबीन जैसी फसलें अपेक्षाकृत कम नमी में भी अच्छी उपज देने की क्षमता रखती हैं। इनकी खेती में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है तथा उत्पादन लागत भी धान की तुलना में अपेक्षाकृत कम रहती है।
वर्तमान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के आधार पर—
- अरहर से लगभग ₹32,000–40,000 प्रति एकड़,
- मूंग से ₹26,000–35,000 प्रति एकड़,
- उड़द से ₹23,000–31,000 प्रति एकड़ तथा
- सोयाबीन से ₹26,000–37,000 प्रति एकड़ तक सकल आय प्राप्त की जा सकती है।
यदि इसमें राज्य शासन द्वारा घोषित ₹15,000 प्रति एकड़ प्रोत्साहन सहायता को भी जोड़ा जाए, तो इन फसलों की आर्थिक उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है।
दलहन एवं तिलहन को बढ़ावा देना क्यों आवश्यक है?
भारत विश्व के सबसे बड़े दलहन उपभोक्ता देशों में से एक है, वहीं खाद्य तेलों की घरेलू मांग का एक बड़ा हिस्सा आज भी आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। इससे देश की विदेशी मुद्रा पर भारी व्यय होता है। ऐसी स्थिति में दलहन एवं तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना केवल किसानों की आय का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक हितों से भी जुड़ा हुआ है।
छत्तीसगढ़ में पर्याप्त वर्षा आधारित क्षेत्र उपलब्ध हैं, जहाँ वैज्ञानिक सलाह के अनुसार दलहन एवं तिलहन की खेती को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे राज्य न केवल अपनी कृषि आय में वृद्धि कर सकता है, बल्कि देश की दाल एवं खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता को भी मजबूती प्रदान कर सकता है।
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका
दलहन एवं तिलहन फसलें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
दलहनी फसलें अपनी जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणुओं की सहायता से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है तथा रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
इसी प्रकार इन फसलों में जल की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होने से भूजल दोहन घटता है तथा सीमित जल संसाधनों का अधिक दक्षता से उपयोग संभव हो पाता है। बदलती जलवायु परिस्थितियों में यह विशेषता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
कृषि अर्थशास्त्री की दृष्टि से
एक कृषि अर्थशास्त्री के रूप में मेरा मानना है कि वर्तमान समय में कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि किसानों की आय, संसाधनों की दक्षता तथा कृषि की स्थिरता को समान महत्व दिया जाना चाहिए।
कम वर्षा की परिस्थितियों में किसानों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न उत्पादन का नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का होता है। यदि कोई फसल कम लागत, कम जोखिम तथा बेहतर मूल्य के कारण अधिक लाभ प्रदान करती है, तो वह किसानों के लिए अधिक उपयुक्त विकल्प सिद्ध होती है।
आज आवश्यकता ऐसी कृषि प्रणाली विकसित करने की है जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करते हुए किसानों को स्थिर आय उपलब्ध करा सके। इसके लिए केवल प्रोत्साहन राशि पर्याप्त नहीं होगी। गुणवत्तापूर्ण बीज, प्रभावी विस्तार सेवाएँ, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर समयबद्ध खरीदी, प्रसंस्करण इकाइयाँ, भंडारण सुविधाएँ तथा बेहतर बाजार संपर्क भी समान रूप से आवश्यक हैं।
राष्ट्रीय खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
दलहन भारतीय भोजन में प्रोटीन का सबसे महत्वपूर्ण एवं सुलभ स्रोत हैं। दूसरी ओर तिलहन फसलें खाद्य तेल उद्योग की आधारशिला हैं। इन दोनों वर्गों का उत्पादन बढ़ने से न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी बल्कि देश की पोषण सुरक्षा एवं खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता को भी बल मिलेगा।
यदि राज्य स्तर पर इन फसलों के लिए उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन की मजबूत व्यवस्था विकसित की जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे तथा कृषि आधारित उद्योगों को भी गति मिलेगी।
निष्कर्ष
एल नीनो और जलवायु परिवर्तन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कृषि को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालना समय की आवश्यकता है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में दलहन एवं तिलहन फसलों को बढ़ावा देना किसानों की आय बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, पोषण सुरक्षा को मजबूत करने तथा देश की आयात निर्भरता कम करने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है।
सरकार द्वारा घोषित प्रोत्साहन सहायता निश्चित रूप से किसानों के लिए एक सकारात्मक पहल है, किन्तु इसकी वास्तविक सफलता तभी सुनिश्चित होगी जब इसके साथ प्रभावी विपणन व्यवस्था, वैज्ञानिक मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण आदान, प्रसंस्करण सुविधाएँ तथा मूल्य समर्थन की मजबूत व्यवस्था भी विकसित की जाए।
कृषि अर्थशास्त्री की विशेष टिप्पणी
“मेरे विचार में आज कृषि की सफलता का आकलन केवल प्रति हेक्टेयर उत्पादन के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। वास्तविक सफलता तब होगी जब किसान को प्रति इकाई क्षेत्र अधिक शुद्ध आय प्राप्त हो, सीमित जल एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों का कुशल उपयोग हो तथा खेती जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम बने। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में दलहन एवं तिलहन फसलों को बढ़ावा देना केवल फसल परिवर्तन का निर्णय नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, खाद्य तेलों एवं दलहनों में देश की आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने तथा कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने की आर्थिक रणनीति है। मेरा मानना है कि भविष्य की कृषि नीतियाँ ‘अधिक उत्पादन‘ के बजाय ‘अधिक लाभप्रद एवं संसाधन–कुशल कृषि‘ को प्राथमिकता दें, तभी कृषि विकास वास्तव में किसान–केंद्रित कहा जा सकेगा।










