धान के प्रमुख रोग, लक्षण एवं एकीकृत प्रबंधन तकनीक
धनेश्वरी साहू, डॉ. विनोद कुमार निर्मलकर, डॉ. आर.के.एस. तिवारी एवं डॉ. एस.के.वर्मा


धान मे विभिन्न प्रकार के रोगों का आक्रमण होता है जो कि विभिन्न माध्यमों जैसे बीज, मृदा, वायु या अन्य साधनों द्वारा फैलता है। धान मे होने वाले सभी रोगों का सही समय पर पहचान कर उचित नियंत्रण आवश्यक है। ताकि इससे होने वाले नुकसान को हानिस्तर तक पहुचने से रोका जा सके। वर्तमान समय मे पारिस्थितिक, पर्यावरण, एवं जैविक खादय की मांग, आदि को देखते हुये यह आवश्यक हो जाता है कि रोगो का नियंत्रण जैविक विधि से किया जाये, ताकि लोगो को रसायन रहित खाद्य मिल सके ।
- धान का झुलसा (Rice Blast)
लक्षण: रोग का आक्रमण फसल की तीनों अवस्थाओं नर्सरी, कल्ले फूटना एवं बाली निकलने पर होती है रोग के लक्षण पत्तियों पर हल्के बैंगनी रंग के छोटे-छोटे अंडाकार धब्बों से शुरू होता है जो धीरे-धीरे बढकर आँख या नाव के आकार का हो जाता है । इन धब्बों के बीच का रंग राख के रंग का व परिधि गहरे भूरे रंग की होती है । अनुकुल मौसम (आद्र वातावरण व तापमान 20-25 डिग्री से. ग्रे.) मे रोग तेजी से फैलता है और धब्बों के आपस मे मिल जाने से पुरी पत्ती झुलस जाती है ।
रोग के लक्षण पत्तीयों के अलावा बाली की गर्दन एवं तनो की निचली गठानो पर प्रमुखता से देखे जा सकते है । बाली की गर्दन पर रोग के लक्षण धान की बालियों में दुध भरने के बाद मे आती है बालियों के गर्दन में इस रोग के कारण सड़न पैदा होती है जिससे बालियां गिर जाती है।

रोग नियंत्रणः
- रोगरोधी किस्मों तुलसी, महामाया, आई आर 36, आई आर 64, बम्लेश्वरी, विक्रम-टीसीआर, इंदिरा एरोबिक-1, छत्तीसगढ़ तेजस धान, इंदिरा महेश्वरी, इम्प्रुव्ड साम्बा मासुरी, जलदुबी दुर्गेश्वरी (मध्यम प्रतिरोधी), छत्तीसगढ़ संकर धान-2, कर्मा मासुरी ( रोग सहनशील), उन्नत साम्बा मासुरी (रोग निरोधक) आदि किस्मों का प्रयोग करें ।
- मेडों पर उगे खरपतवार को साफ करें क्योंकि ये रोग के आश्रय स्थल होते है।
- पिछली फसल के बचे हुए अवशेषों और ठूंठ को नष्ट कर दें।
- यूरिया उर्वरक का छिडकाव बीमारी के नियंत्रण उपरांत करें ।
- बीज उपचार हेतु स्यूडोमोनास फलोरेसेंस का 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपयोग करे, 01 किलोग्राम स्यूडोमोनास फलोरेसेंस को प्रति हेक्टेयर की दर से पानी मे घोल बनाकर छिड़काव करे ।
- खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर पायराक्लोस्ट्रोबिन 1 किलोग्राम, प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर में 18 दिनों के अंतराल में या एजोक्सीस्ट्रोबिन 16.7% + ट्राईसाक्लाजोल 33.30% एससी का 500 मि.ली. प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर 24 दिनों के अंतराल में छिडकाव करे ।
- भूरा धब्बा (Brown Spot)
लक्षण: इस रोग के लक्षण पत्तियों एवं बालियों पर प्रमुख रूप से दिखाई देते है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर अण्डाकार भूरे रंग के धब्बे बनते है । इन धब्बों के चारो ओर पीले रंग का वृत दिखाई देता है जो इस रोग का प्रमुख पहचान है बाद मे इन धब्बों का रंग गहरा भूरा या बैंगनी भूरा हो जाता है दानों के ऊपर भी इस रोग के कारण छोटे-छोटे गहरे या काले रंग के धब्बे बनते है।

रोग नियंत्रणः
- रोगरोधी किस्मों जैसे- जिंको राइस एमएस, आईजीकेवी आर-1 (मध्यम प्रतिरोधी) बम्लेश्वरी (रोग सहनशील ) जिंक राइस-2( मध्यम सहनशील ) आदि किस्मों का प्रयोग करें ।
- ट्राईकोडर्मा विरडी के 5- 10 ग्राम से प्रति कि. बीज का उपचार करे ।
- बेसिलस सबटिलीस का छिडकाव करे ।
- फसल की कटाई के बाद खेत में बचे अवशेषों को नष्ट कर दें या खेत में गहरी जुताई करें ताकि फफूंद खेत में पनप ना सके।
- हैक्साकोनाजोल 4% + जीनेब 68% डब्लू पी 1000-1250 ग्राम, प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर में 34 दिनों के अंतराल में या एजोक्सीस्ट्रोबिन 16.7% + ट्राईसाक्लाजोल 33.30% एससी का 500 मि.ली. प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर 24 दिनों के अंतराल में छिडकाव करे ।
3- धान का पर्णच्छद अंगमारी (Sheath Blight)
लक्षण: रोग का प्रकोप खेत में पानी की सतह से आरम्भ होकर ऊपर की ओर फैलता है इस रोग के लक्षण तनों पर अनियमित आकार के गहरे भूरे रंग के धब्बो के रूप मे दिखाई देते है। प्रारंभ मे इनका रंग हरा मटमैला से तामियां होता है बाद में बीच का भाग भी मटमैला हो जाता है यह रोग उग्र अवस्था मे तने के चारो ओर फैल जाता है जिसके कारण तना कमजोर हो जाता है रोग ग्रस्त पौधों में दाने पूर्ण रूप से नही भर पाते है फलरूवरूप बदरा अधिक हो जाता है जिससे पैदावार प्रभावित होती है ।

रोग नियंत्रण:
- खेत में लगातार जलभराव की स्थिति ना रखें बीच बीच में खेत का पानी सुखाते रहने से रोग का फैलाव रूकता है।
- रोपाई करते समय पंक्तियों और पौधों के बीच उचित दूरी (15×20 सेमी) बनाये रखें ताकि खेत में हवा का संचार ठीक रहे।
- बेसिलस सबटिलीस के 5-10 ग्राम से प्रति कि. बीज को उपचारित करे, 10 ग्राम बेसिलस सबटिलीस को प्रति लीटर पानी मे घोल बनाकर धान की थरहा को उपचारित करे ।
- बेसिलस सबटिलीस के 1 कि. ग्राम मात्रा को 100 कि. गोबर कि खाद मे मिलाकर छिडकाव करे ।
- हैक्साकोनाजोल 4% + जीनेब 68% डब्लू पी 1000-1250 ग्राम, प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर में 34 दिनों के अंतराल में या एजोक्सीस्ट्रोबिन 7.1% + प्रोपीकोनाजोल 11.9% एसई का 500 मि.ली. प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर 43 दिनों के अंतराल में छिडकाव करे ।
- धान का पर्णच्छद विगलन (Sheath Rot)
लक्षण: इस रोग के लक्षण फसल की गभोट (पोटरी) अवस्था मे दिखाई देते है। इस रोग के लक्षण कंसों के ऊपरी शीथ पर कत्थई रंग के धब्बो के रूप मे दिख जाते है रोग का प्रकोप अधिक होने पर बालियाँ की ढकी हुई पत्ती पर व बाली के निचले कंसे वाले भाग मे भी कत्थई रंग के धब्बे बनते है जिससे बाली पोटरी से बाहर नही निकल पाता है और यदि बाली का कुछ हिस्सा बाहर निकल भी आता है तो उसमे दाने नही भरते है और वह पौचे रह जाते है इस रोग से बदरा बढ़ जाता है ।

रोग नियंत्रण:
- रोगरोधी किस्मों जैसे- इंदिरा एरोबिक-1, छत्तीसगढ़ तेजस धान (मध्यम प्रतिरोधी) आईजीकेवी आर-2, दुर्गेश्वरी) का प्रयोग करे।
- स्यूडोमोनास फलोरेसेंस, बेसिलस सबटिलीस से बीज को उपचारित करे।
- मेडों पर उगे खरपतवार को साफ करें क्योंकि ये रोग के आश्रय स्थल होते है।
- खेत में पानी को अधिक समय तक ना रूकने दें और जल निकासी की अच्छी व्यवस्था करें।
- गभेाट (पोटरी) अवस्था के समय हिनोसान 1 मि. ली., बाविस्टन 1 ग्राम., मैन्कोजेब 3 ग्राम, प्रति लीटर पानी के हिसाब से 10-15 दिन के अंतराल मे छिडकाव करे।
5- जीवाणु जनित झुलसन (Bacterial Leaf Blight)
लक्षणः रोग के लक्षण पत्तियों पर दिखाई पडते है सबसे पहले पत्ती का ऊपरी भाग संतरे रंग से सुखता हुआ पैरा रंग लिए निचले हिस्से की ओर तेजी से बढता है इस कारण पूरे पौधों की पत्तियां झुलसकर सुखने लगती है पत्तियों के सूखे हुये भाग के बीच मे कुछ भाग हरा रहता है । रोग ग्रसित पौधे कमजोर हो जाते है जिनसे कंसे कम निकलते है दाने पुरी तरह नही भरते व पैदावार कम हो जाती है ।

नियंत्रण:
- संतुलित खाद का प्रयोग करे । पोटाश 10 कि. ग्रा. प्रति हे. का छिडकाव रोग की तीव्रता कम करता है ।
- जिन खेतों मे पानी भरने की सुविधा हो वहा पर खेत का पानी निकाल ले व 6-7 दिन तक खेत सुखा रखे ।
- रोग प्रतिरोधी किस्मे: महामाया, आई. आर. 36, आई. आर. 64, जिंकों राइस एमएस, कर्मा मासुरी इम्प्रुव्ड साम्बा मासुरी को लगाना चाहिए ।
- बेसिलस सबटिलीस से बीज को उपचारित करे, बेसिलस सबटिलीस के घोल से धान के थरहा को बोने के पुर्व डुबाये , बेसिलस सबटिलीस एवं स्यूडोमोनास फलोरेसेंस के घोल से छिड़काव करे ।
- कापरहाइड्रोक्साइड 53.8% डीएफ 1500 ग्राम 500 लीटर पानी के हिसाब से 10 दिनों के अंतराल मे छिडकाव करे।
- लाई फूटना (False Smut)
लक्षणः रोग के लक्षण बाली निकल आने के बाद दानों के ऊपर दिखाई देते है बालियों में दानों की जगह स्मट बाल (गेंद) बन जाता है (लाई के समान) जो कि पहले मटमैला हरा उसके बाद नारंगी व धान पकने की अवस्था मे काला हो जाता है ।

नियंत्रण:
- एक ही खेत में लगातार धान की फसल लेने से बचें। दलहन या अन्य फसलों को अपनायें।
- फूल आने व दाने भरते समय खेत में जलभराव को नियंत्रित रखें, उचित जल निकासी की व्यवस्था करे।
- खेत में नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्याधिक उपयोग ना करें। फास्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्रा का ही प्रयोग करें।
- बाली निकलने की अवस्था मे कापरहाइड्रोक्साइड 53.8% डीएफ 1500 ग्राम 500 लीटर पानी के हिसाब से 10 दिनों के अंतराल में या ट्राईसाइक्लाजोल 20.4% + एजोक्सीस्ट्रोबिन 6.8% डब्लू/डब्लू एससी 01 लीटर प्रति 500 लीटर पानी के हिसाब से प्रति हेक्टेयर में 10 दिनों के अंतराल में छिडकाव करे।
लेखक :
धनेश्वरी साहू, डॉ. विनोद कुमार निर्मलकर, डॉ. आर.के.एस. तिवारी एवं डॉ. एस.के.वर्मा
क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र बिलासपुर, छत्तीसगढ़











