आपातकालीन स्थितियों मे कुत्ते के पिल्ले की देखभाल
डॉ गोविना देवांगन, डॉ शैलेष विशाल, डॉ काशिफ रज़ा एवं डॉ नीतेश कुंभकार


आपातकालीन स्थितियाँ अचानक ही होती हैं, इसलिए इनमें शामिल लोग और जानवर अक्सर डर जाते हैं या बहुत अधिक उत्तेजित हो जाते हैं। किसी भी आपातकालीन स्थिति में पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम है: शांत रहें (REMAIN CALM)। आपका दिमाग और सामान्य समझ (common sense) किसी भी आपात स्थिति में आपके सबसे अच्छे साधन होते हैं। इससे आप अपने पिल्ले को अधिक प्रभावी ढंग से शांत कर सकेंगे और उसकी मदद कर पाएँगे।
आपात स्थिति में अपने पिल्ले को पशु चिकित्सक (Veterinarian) के पास ले जाने से पहले वहाँ फोन करके जानकारी दे दें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि डॉक्टर उपलब्ध हैं और स्टाफ को आपके आने की तैयारी का समय मिल सके। यदि आपातकालीन अस्पताल आपके नियमित पशु चिकित्सालय से अलग है, तो उसका रास्ता पहले से जान लें।
विभिन्न आपातकालीन स्थितियाँ और प्राथमिक उपचार (First Aid)
- मधुमक्खी का डंक / कीड़े के काटने की प्रतिक्रिया
यदि डंक दिखाई दे रहा हो, तो चिमटी (tweezers) से सावधानीपूर्वक निकाल दें। प्रभावित स्थान पर ठंडी पट्टी (cool compress) रखें। यदि पिल्ले में एलर्जी के लक्षण दिखाई दें जैसे साँस लेने में कठिनाई, शरीर पर पित्ती (hives) या चेहरे का सूज जाना, तो तुरंत पशु चिकित्सक को सूचित करें और पिल्ले को वहाँ ले जाएँ।
- रक्तस्राव (Bleeding)
घाव पर गॉज़ या साफ कपड़े से सीधा दबाव डालें। यदि पहला कपड़ा खून से भीग जाए तो उसके ऊपर दूसरा कपड़ा रखें, लेकिन पहला न हटाएँ। दबाव बनाए रखें और पिल्ले को तुरंत पशु चिकित्सक के पास ले जाएँ।
- दम घुटना (Choking)
यदि पिल्ला होश में है, तो उसे शांत रखें और पशु चिकित्सक के पास ले जाएँ। यदि वह बेहोश है, तो उसका मुँह खोलकर गले में किसी अवरोध की जाँच करें। सिर और गर्दन को सीधा करें और जीभ को आगे खींचें। जीभ पकड़ने के लिए वॉशक्लॉथ का उपयोग करें ताकि काटे जाने से बचा जा सके।
- दस्त (Diarrhoea)
पिल्लों में दस्त आम समस्या है और इसका कारण पहचानना कठिन हो सकता है। उसने कूड़ा खा लिया हो, बहुत अधिक भोजन कर लिया हो, या बैक्टीरिया/वायरस संक्रमण हो सकता है । यदि अन्य बीमारी के लक्षण न हों तथा दस्त दो दिन से अधिक न रहे, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है।
उपचार:
- छोटे पिल्ले को 12 घंटे और 8 महीने से बड़े पिल्ले को 24 घंटे तक बिल्कुल खाना न दें।
- यदि उल्टी नहीं हो रही हो तो पानी देते रहें।
- बाद में हल्का भोजन दें: उबले हुए सफेद चावल और पनीर (1 पनीर : 3 चावल)।
- 1–2 दिन तक यही आहार दें, फिर 4–5 दिनों में धीरे-धीरे सामान्य आहार शुरू करें।
- लू लगना / हीट स्ट्रोक (Heat Stroke)
पिल्ले के शरीर और पैरों पर नल का साधारण पानी डालकर ठंडा करना शुरू करें। ठंडा पानी या बर्फ का प्रयोग न करें। तुरंत पशु चिकित्सक को फोन करें और पिल्ले को वहाँ ले जाएँ।
- उल्टी (Vomiting)
उल्टी इस बात का संकेत हो सकती है कि पिल्ले ने घास, सिगरेट के टुकड़े, पत्तियाँ, टहनियाँ या कूड़ा खा लिया है। कभी-कभी पीले रंग का तरल निकलना सामान्य है। यदि पिल्ला लगातार उल्टी करे, तीन घंटे से अधिक उल्टी हो, खून की उल्टी हो या बहुत उदास दिखे, तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। भोजन और मौखिक दवाएँ रोक दें। उल्टी की जाँच करें ताकि पता चल सके कि उसने क्या खाया है। ज़हरीली वस्तुओं की जानकारी के लिए पैकेट या पौधे के अवशेष सुरक्षित रखें।
- दौरे (Seizures)
दौरे देखने में डरावने हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर हानिकारक नहीं होते। दौरे के दौरान पिल्ले को न छुएँ और हस्तक्षेप न करें। बस निगरानी रखें। सीढ़ियों या पानी के पास जाने से रोकें और पशु चिकित्सक को फोन करें।
- ज़हर खाना (Poisoning)
तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। ज़हर का प्रकार, मात्रा, समय और लक्षणों की जानकारी देने के लिए तैयार रहें। यदि कहा जाए, तो ज़हर के मूल कंटेनर के साथ पिल्ले को अस्पताल ले जाएँ।
- घाव (Wounds)
हल्के घावों को साबुन और पानी से धीरे-धीरे साफ करें, गंदगी निकालें और एंटीबायोटिक मरहम लगाएँ। गहरे घावों में खून रोकें, पशु चिकित्सक से संपर्क करें और साफ, गीली पट्टी से ढककर ले जाएँ।
पशु चिकित्सक से कब संपर्क करें
- यदि पिल्ले का तापमान 103°F से अधिक हो
- यदि दस्त के साथ 12 घंटे से अधिक उल्टी हो
- यदि मल में अधिक खून दिखाई दे
- यदि दस्त दो दिन से अधिक रहे
- यदि पिल्ला बहुत उदास या कमजोर लगे
अपने पिल्ले को स्वस्थ कैसे रखें
स्वास्थ्य समस्याओं से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है उन्हें होने से रोकना। सावधानीपूर्वक निगरानी से आप अपने पिल्ले को ज़हरीली या विदेशी वस्तुएँ निगलने से बचा सकते हैं। पट्टे (leash) पर रखने से सड़क दुर्घटनाओं से बचाव होता है। बीमारी से बचाव के लिए पशु चिकित्सक की सलाह का पालन करें। रोकथाम (Prevention) इलाज से कहीं बेहतर होती है।
लेखक;
डॉ गोविना देवांगन1, डॉ शैलेष विशाल2, डॉ काशिफ रज़ा2 एवं डॉ नीतेश कुंभकार1
1 सहायक प्राध्यापक, दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकार कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ. ग.)
2 शिक्षण सहायक, दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकार कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ. ग.)









