डेयरी पशुओं के लिए पोषण प्रबंधन: एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका
डॉ. मोहम्मद काशिफ रज़ा, डॉ. शैलेश विशाल, डॉ. देवेश कुमार गिरी, डॉ. गोविना देवांगन


भारत में डेयरी व्यवसाय किसानों की आय का एक महत्वपूर्ण आधार है, परंतु इसके सफल संचालन के लिए वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। इस लेख में सांड, सूखी, गर्भवती तथा दुधारू गायों की पोषण आवश्यकताओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। हरे चारे की मौसमी उपलब्धता की समस्या को देखते हुए चारे के संरक्षण की तकनीकें – जैसे हे और साईलेज बनाना – विस्तार से बताई गई हैं। साथ ही, धान के पैरे का यूरिया उपचार करके उसकी पौष्टिकता बढ़ाने की विधि और आवश्यक सावधानियाँ बताई गई हैं। लेख में व्यावहारिक सुझाव भी दिए गए हैं, जैसे संतुलित आहार, पानी की उपलब्धता और चारे में अचानक परिवर्तन से बचाव। समग्र रूप से यह लेख किसानों को पशुओं की स्वास्थ्य रक्षा और दूध उत्पादन में सुधार के लिए प्रभावी पोषण प्रबंधन की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
- पशु के प्रकार के अनुसार पोषण प्रबंधन
सांड (ब्रीडिंग बुल)
उद्देश्य: ताकत और प्रजनन क्षमता को बनाए रखना।
आवश्यकताएँ:
- ऊर्जा: केवल रख-रखाव के लिए
- प्रोटीन: मांसपेशियों के लिए मध्यम मात्रा में
- खनिज: कैल्शियम, फॉस्फोरस, जिंक, सेलेनियम
चारा योजना:
- हरी घास: 6–8 किग्रा
- सूखा चारा: 4–5 किग्रा
- कंसंट्रेट (सघन चारा): 1.5–2.5 किग्रा/दिन
उदाहरण आहार:
- गेहूं भूसा, बर्सीम/मक्का, 1.5 किग्रा भूसी + 1 किग्रा खली
- खनिज मिश्रण: 50 ग्राम/दिन
सूखी गायें
उद्देश्य: शरीर की स्थिति बनाए रखना, अगली गर्भावस्था की तैयारी
चारा योजना:
- सूखा चारा: 6–7 किग्रा
- हरा चारा: 3–4 किग्रा
- कंसंट्रेट(सघन चारा): आवश्यकता अनुसार
- खनिज मिश्रण: 30–40 ग्राम/दिन
गर्भवती गायें (अंतिम 2–3 माह)
उद्देश्य: भ्रूण की वृद्धि और कोलोस्ट्रम उत्पादन की तैयारी
आहार योजना:
- सूखा चारा: 4–5 किग्रा
- हरा चारा: 8–10 किग्रा
- कंसंट्रेट(सघन चारा): 2.5–3.5 किग्रा (धीरे-धीरे बढ़ाएं)
- बाईपास प्रोटीन: 100 ग्राम/दिन
- खनिज मिश्रण: 50–60 ग्राम/दिन
दुधारू गायें
उद्देश्य: उच्च दूध उत्पादन और स्वास्थ्य बनाए रखना
चारा योजना:
- सूखा चारा: 4–5 किग्रा
- हरा चारा: 10–15 किग्रा
- कंसंट्रेट (सघन चारा): 1 किग्रा प्रति 2.5 लीटर दूध पर
- खनिज मिश्रण: 60–70 ग्राम/दिन
- नमक: इच्छानुसार
उदाहरण (10 लीटर दूध देने वाली गाय के लिए):
- 4 किग्रा भूसा, 12 किग्रा बर्सीम, 4 किग्रा कंसंट्रेट (30% मक्का, 30% भूसी, 30% खली, 10% खनिज)
- धान के पैरे का यूरिया से उपचार
समस्या: पैरे में प्रोटीन बहुत कम (2%) होता है, जिससे दुधारू पशुओं को पूर्ण पोषण नहीं मिल पाता।
उपाय: यूरिया से उपचारित पैरा से इसकी पौष्टिकता बढ़ाई जा सकती है।
सामग्री:
- पैरा: 100 किग्रा
- यूरिया: 4 किग्रा
- पानी: 80 लीटर
- प्लास्टिक शीट/तारपोलिन
विधि:
- यूरिया + पानी मिलाकर घोल बनाएं।
- परत दर परत पैरे पर घोल छिड़कें।
- पैरा को हवा बंद जगह (बैग/गड्ढा) में रखें।
- 21–30 दिन बाद उपयोग करें।
सावधानियाँ:
- एक माह बाद ही खिलाएं।
- हवा में फैला दें ताकि अमोनिया निकल जाए।
- अत्यधिक मात्रा से विषाक्तता हो सकती है।
- 8 माह से अधिक गर्भवती या 6 माह से कम उम्र के पशु को न दें।
- चारे का संरक्षण: हे और साईलेज बनाना
क्यों जरूरी है?
हर मौसम में हरा चारा नहीं मिलता, ऐसे में संरक्षण से लागत घटती है और उत्पादन बना रहता है।
हे बनाना
- चारा को धूप में सुखाकर गट्ठों में संग्रह करें।
- कम जगह में भंडारण और स्थानांतरण आसान।
- अच्छे “हे” में हरापन व लचक होनी चाहिए।
विधि संक्षेप में:
- जई/मक्का को फूल से पहले काटें
- 2 दिन धूप + 2 दिन छाया में सुखाएं (15% नमी)
- शंकु आकार में रखें, खिलाने से पहले कुट्टी बनाएं
- 2–5 किग्रा/100 किग्रा शरीर भार अनुसार दें
सावधानियाँ:
- रोगग्रस्त या फफूंदयुक्त चारा न लें
- बारिश, दीमक, चूहे से सुरक्षित रखें
साईलेज बनाना
- नमीयुक्त चारे को बिना हवा के दबाकर संग्रह करना
- 3 माह बाद उपयोग योग्य
उदाहरण गणना:
5 गाय × 120 दिन × 20 किग्रा = 12000 किग्रा साईलेज → 18000 किग्रा हरा चारा चाहिए
साइलोपिट साइज: 8 × 5 × 5 फीट
विधि संक्षेप में:
- चारा काटकर ~60% नमी तक सुखाएं
- कुट्टी बनाएं और परत-दर-परत दबाएं
- ऊपर पैरा → मिट्टी (3–4 इंच) → गोबर का लेप
- 3 माह बाद उपयोग करें, खुलने पर 1 माह में समाप्त करें
सावधानियाँ:
- दलहनी चारा न डालें
- हवा न घुसे, नमी नियंत्रित रखें
- फफूंद, विषाक्तता से बचाएं
- किसानों के लिए पोषण संबंधी सुझाव
✅ स्वच्छ व ताजा पानी की व्यवस्था करें
✅ निश्चित समय पर चारा दें
✅ अचानक चारे में बदलाव न करें
✅ पहले रफेज (भूसा) दें, फिर कंसंट्रेट
✅ खराब या सड़ा चारा न दें
✅ संतुलित आहार (रफेज + कंसंट्रेट + खनिज) सुनिश्चित करें
निष्कर्ष:
पशुओं के विभिन्न जीवन चरणों में पोषण आवश्यकताएं बदलती हैं। यदि हम उनके अनुसार चारा व आहार प्रबंधन करते हैं और उपलब्ध संसाधनों का संरक्षण करते हैं, तो डेयरी व्यवसाय न केवल लाभदायक होगा बल्कि पशु भी स्वस्थ और उत्पादक रहेंगे।
लेखक:
डॉ. मोहम्मद काशिफ रज़ा, डॉ. शैलेश विशाल, डॉ. देवेश कुमार गिरी, डॉ. गोविना देवांगन
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
वेटरनरी पॉलिटेक्निक महासमुंद









