पशुपालन

जैविक डेयरी फार्मिंग : संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ

डॉ.  शुभांगी निगम ,  डॉ. नमिता शुक्ला, डॉ. क्रांति शर्मा, एवं डॉ. आशुतोष तिवारी  

प्रस्तावना
21वीं सदी में जब रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं, तो जैविक डेयरी फार्मिंग एक सशक्त विकल्प के रूप में उभर रही है। बदलती जीवनशैली, स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता तथा रासायनिक अवशेषों से मुक्त खाद्य पदार्थों की मांग ने “जैविक डेयरी फार्मिंग” को एक नई दिशा प्रदान की है। वर्तमान समय में उपभोक्ता ऐसे दूध एवं दुग्ध उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो एंटीबायोटिक, हार्मोन तथा रासायनिक अवशेषों से मुक्त हों। इसी कारण जैविक डेयरी फार्मिंग का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। जैविक डेयरी फार्मिंग वह पद्धति है जिसमें पशुओं को रासायनिक रहित चारा खिलाया जाता है, उन्हें प्राकृतिक वातावरण में रखा जाता है और उनके दूध, मांस एवं अन्य उत्पादों में किसी भी कृत्रिम हार्मोन या एंटीबायोटिक का उपयोग नहीं किया जाता।

भारत जहाँ विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, वहाँ इस क्षेत्र में जैविक पद्धतियाँ अपनाकर न केवल किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है, बल्कि उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

जैविक डेयरी फार्मिंग क्या है?
जैविक डेयरी फार्मिंग एक समग्र दृष्टिकोण है जो पशु कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और मानव स्वास्थ्य — तीनों को एक साथ ध्यान में रखता है। इसमें निम्नलिखित मूलभूत सिद्धांत अपनाए जाते हैं —

  • जैविक चारा: पशुओं को केवल रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक रहित चारा दिया जाता है। हरा चारा, पुआल, खली आदि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त किए जाते हैं।
  • प्राकृतिक आवास: पशुओं को खुले, हवादार और स्वच्छ वातावरण में रखा जाता है। उन्हें चरागाह में चरने का अवसर दिया जाता है।
  • बिना हार्मोन-एंटीबायोटिक के पालन: उत्पादन बढ़ाने के लिए कोई कृत्रिम हार्मोन नहीं दिया जाता। बीमारी में भी प्राकृतिक/आयुर्वेदिक उपचार को प्राथमिकता।
  • प्रमाणीकरण: APEDA, NPOP (National Programme for Organic Production) या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा प्रमाणित उत्पाद ही ‘जैविक’ कहलाते हैं।

जब हम जैविक डेयरी अपनाते हैं, तो हम केवल दूध नहीं बेचते — हम स्वास्थ्य, विश्वास और भविष्य की एक पीढ़ी को सुरक्षित करते हैं।”

संभावनाएँ और अवसर

१. आर्थिक दृष्टि से लाभकारी

  • जैविक दूध व उत्पादों की कीमत सामान्य उत्पादों से 30–40% अधिक होती है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
  • निर्यात बाजार में भारतीय जैविक उत्पादों की मांग यूरोप, अमेरिका, जापान जैसे देशों में तेजी से बढ़ रही है।
  • लंबे समय में रासायनिक उपकरणों पर निर्भरता कम होने से उत्पादन लागत घटती है।

२. स्वास्थ्य एवं पोषण

  • जैविक दूध में ओमेगा-3 फैटी एसिड, CLA (Conjugated Linoleic Acid) और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक पाई जाती है।
  • एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antibiotic Resistance) की समस्या कम होती है, जो वर्तमान में एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट है।
  • उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ने के साथ जैविक उत्पादों की माँग तेज़ी से बढ़ रही है।

३. पर्यावरणीय लाभ

  • रासायनिक उर्वरकों के अभाव में भूमि की उर्वरता दीर्घकाल तक बनी रहती है।
  • जल प्रदूषण और मृदा क्षरण की समस्या कम होती है।
  • कार्बन फुटप्रिंट कम होने से जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायता मिलती है।

४. सरकारी नीति एवं समर्थन

  • परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY) और राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना (NPOF) के तहत किसानों को सहायता मिलती है।
  • PGS-India (Participatory Guarantee System) से छोटे किसान कम लागत पर जैविक प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकते हैं।

प्रमुख चुनौतियाँ

१. आर्थिक एवं बाजार संबंधी

  • प्रमाणीकरण की प्रक्रिया महंगी व जटिल है, छोटे किसानों के लिए दुर्गम।
  • संक्रमण काल (2–3 वर्ष) में उत्पादन घटता है, आय प्रभावित होती है।
  • संगठित विपणन तंत्र का अभाव, मध्यस्थों पर निर्भरता।

२. तकनीकी एवं ज्ञान संबंधी

  • जैविक पशु चिकित्सा और रोग प्रबंधन की जानकारी सीमित है।
  • प्रशिक्षित कृषि विस्तार कर्मियों की भारी कमी।
  • जैविक चारे की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना कठिन।

३. सामाजिक एवं ढांचागत

  • किसानों में जागरूकता एवं पारंपरिक मानसिकता बदलने की चुनौती।
  • कोल्ड चेन, प्रसंस्करण और भंडारण की अपर्याप्त व्यवस्था।
  • नकली ‘जैविक’ उत्पादों से उपभोक्ता विश्वास को खतरा।

४.  नीतिगत

  • एकीकृत राष्ट्रीय नीति का अभाव, राज्यों में असमानता।
  • ऋण एवं बीमा सुविधाएँ जैविक किसानों तक पर्याप्त नहीं पहुँचतीं।
  • अनुसंधान एवं विकास में निवेश अपेक्षाकृत कम।

समाधान के उपाय

  • किसान उत्पादक संगठन (FPO): समूह में प्रमाणीकरण कराने से लागत कम होती है और सामूहिक विपणन शक्ति बढ़ती है।
  • डिजिटल बाजार: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म (जैसे — Organic Mandya, 24Mantra) के जरिए सीधे उपभोक्ता को बेचने की व्यवस्था।
  • आयुर्वेदिक पशु चिकित्सा: पंचगव्य आधारित चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देकर दवाओं की लागत घटाई जा सकती है।
  • कृषि विज्ञान केंद्र (KVK): जैविक डेयरी पर व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं प्रदर्शनी कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए।
  • सरकारी खरीद नीति: मध्याह्न भोजन और आँगनवाड़ी जैसी योजनाओं में जैविक दूध को प्राथमिकता देकर बाजार की माँग सुनिश्चित हो।
  • अनुसंधान एवं नवाचार: ICAR, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा जैविक डेयरी पर अनुसंधान को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में जैविक डेयरी फार्मिंग की संभावनाएँ
छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधनों, वन आधारित चारा, पारंपरिक पशुपालन ज्ञान एवं कम रासायनिक कृषि के कारण जैविक डेयरी फार्मिंग की अपार संभावनाएँ हैं। आदिवासी क्षेत्रों में पशुपालन आज भी काफी हद तक पारंपरिक एवं प्राकृतिक प्रणाली पर आधारित है। स्थानीय नस्लों की सहनशीलता एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता जैविक प्रणाली के लिए अनुकूल मानी जाती है।

सफल उदाहरण

सिक्किम मॉडल: सिक्किम देश का पहला पूर्णतः जैविक राज्य बना। यहाँ के किसानों ने प्रमाणित जैविक उत्पाद बेचकर आय दोगुनी की और पर्यटन से भी लाभ उठाया।

मध्यप्रदेश — देशी गाय पालन: राज्य सरकार की देशी गाय-गोपालन प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत कई किसान जैविक A2 दूध उत्पादन में सफल हो रहे हैं जो नगरीय बाजारों में प्रीमियम मूल्य पर बिक रहा है।

गुजरात — अमूल का प्रयोग: अमूल ने जैविक दुग्ध उत्पाद श्रृंखला शुरू की है जो सहकारी मॉडल के माध्यम से छोटे किसानों को लाभान्वित कर रही है।

निष्कर्ष

जैविक डेयरी फार्मिंग केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि यह एक दर्शन है — जो मनुष्य, पशु और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। भारत जैसे देश में जहाँ लाखों किसानों की आजीविका पशुपालन पर निर्भर है, जैविक डेयरी उन्हें न केवल आर्थिक सशक्तिकरण दे सकती है, बल्कि एक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य की नींव भी रख सकती है।

आवश्यकता है — सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक शोध, उपभोक्ता जागरूकता और किसान संगठन का समन्वित प्रयास। यदि ये सभी मिलकर काम करें तो जैविक डेयरी फार्मिंग भारतीय कृषि की कायाकल्प कर सकती है।

लेखक :
डॉ.  शुभांगी निगम ,  डॉ. नमिता शुक्ला, डॉ. क्रांति शर्मा, एवं डॉ. आशुतोष तिवारी
दुग्ध विज्ञान एवं खाद्य प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, रायपुर
दाऊ श्री वासुदेव चंद्रकार छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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