पशुपालन

पशुधन स्वास्थ्य पर विषैले पौधों का प्रभाव एवं नियंत्रण रणनीतियाँ

डॉ. सुरेन्द्र कुमार, डॉ. ओम प्रकाश, डॉ. दीपक कुमार कश्यप एवं डॉ. मोहमद काशिफ रज़ा

सारांश : भारत में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार है, जहाँ पशु प्रायः खुले चारागाहों में चरते हैं और अनजाने में विषैले पौधों का सेवन कर लेते हैं। इससे पशुओं के स्वास्थ्य, उत्पादन तथा प्रजनन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। विभिन्न विषैले पौधों में उपस्थित एल्कलॉइड, ग्लाइकोसाइड, प्रोटीन तथा अन्य विषैले तत्व शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित करते हैं। इस समीक्षा लेख में प्रमुख विषैले पौधों, उनके विषैले प्रभावों, लक्षणों तथा उनके वैज्ञानिक प्रबंधन एवं उपचार प्रोटोकॉल का विस्तृत वर्णन किया गया है।

परिचय : भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ पशुपालन किसानों की आय और पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। गाय, भैंस, बकरी तथा भेड़ जैसे पशु सामान्यतः खुले क्षेत्रों में चरते हैं, जहाँ वे कई बार अनजाने में विषैले पौधों का सेवन कर लेते हैं। प्राकृतिक रूप से अनेक पौधों में ऐसे रसायन पाए जाते हैं जो यकृत, हृदय, तंत्रिका तंत्र तथा पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं। विषाक्तता की तीव्रता पौधे के प्रकार, सेवन की मात्रा तथा पशु की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है।

पशुपालन पर विषैले पौधों का प्रभाव

विषैले पौधों का प्रभाव सबसे पहले पशुओं के स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। इन पौधों में उपस्थित विषैले तत्व शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप दस्त, उल्टी, कमजोरी, त्वचा रोग, श्वसन कष्ट तथा तंत्रिका विकार जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं। गंभीर मामलों में पशु की मृत्यु भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त विषाक्तता का प्रभाव पशु उत्पादन पर भी पड़ता है, जिससे दूध उत्पादन तथा उसकी गुणवत्ता में कमी आती है और मांस उत्पादन में वृद्धि दर घट जाती है।

प्रजनन क्षमता भी इससे प्रभावित होती है, जिससे गर्भपात, बांझपन तथा नवजात शिशुओं की कमजोरी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। आर्थिक दृष्टि से यह समस्या किसानों के लिए अत्यंत हानिकारक है क्योंकि उपचार खर्च बढ़ जाता है और पशुओं की मृत्यु से सीधी आर्थिक हानि होती है।

सामान्य विषैले पौधे एवं उनका उपचार

  1. धतूरा (Datura stramonium) भारत के लगभग सभी भागों में पाया जाता है और इसमें एट्रोपीन, स्कोपोलामीन तथा हायोसायमीन जैसे एल्कलॉइड होते हैं, जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं। इसके सेवन से पशुओं में उत्तेजना, पुतलियों का फैलना, मुंह का सूखना तथा असामान्य व्यवहार देखा जाता है। उपचार के अंतर्गत प्रारंभिक अवस्था में गैस्ट्रिक लैवेज या पेट की सफाई की जाती है। सक्रिय चारकोल 1–2 ग्राम/किग्रा शरीर भार के अनुसार दिया जाता है ताकि विष का अवशोषण कम हो सके। विशिष्ट उपचार के रूप में फिजोस्टिग्मीन02–0.06 mg/kg धीमी गति से दिया जाता है। इसके साथ तरल चिकित्सा तथा शांति बनाए रखना आवश्यक होता है।
  2. बेशरम (Ipomoea carnea) मुख्यतः नमी वाले क्षेत्रों में पाया जाता है और इसमें स्वेनसोनिन पाया जाता है, जो दीर्घकालिक सेवन पर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। प्रभावित पशुओं में सुस्ती, असामान्य चाल तथा वजन में कमी देखी जाती है। उपचार में सबसे पहले इस पौधे का सेवन बंद कराया जाता है। इसके पश्चात संतुलित एवं पौष्टिक आहार दिया जाता है तथा विटामिन-खनिज सप्लीमेंट दिए जाते हैं। गंभीर मामलों में सहायक चिकित्सा जैसे नसों में तरल पदार्थ और तंत्रिका-सुरक्षात्मक अनुपूरकों दिए जाते हैं।
  3. लैंटाना (Lantana camara) एक सामान्य झाड़ी है जिसमें लैंटाडीन पाया जाता है, जो यकृत को प्रभावित करता है। इसके सेवन से पीलिया, कब्ज तथा फोटोसेंसिटिविटी देखी जाती है। उपचार में पशु को छायादार स्थान पर रखा जाता है और लिवर टॉनिक जैसे सिलीमारिन 10–20 mg/kg दिया जाता है। सक्रिय चारकोल का उपयोग तथा तरल चिकित्सा भी आवश्यक होती है। एंटीहिस्टामिन और एंटीऑक्सीडेंट भी लाभकारी होते हैं।
  4. कनेर (Nerium oleander) एक अत्यंत विषैला सजावटी पौधा है जिसमें कार्डियक ग्लाइकोसाइड्स होते हैं। इसके सेवन से हृदय गति में अनियमितता, दस्त तथा अचानक मृत्यु हो सकती है। उपचार में तुरंत गैस्ट्रिक डीकंटैमिनेशन किया जाता है और सक्रिय चारकोल दिया जाता है। एट्रोपीन04 mg/kg तथा आवश्यकतानुसार एंटी-अरिदमिक दवाएं दी जाती हैं। नसों में तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है।
  5. गाजर घास (Parthenium hysterophorus) एक सामान्य खरपतवार है जिसमें पार्थेनिन पाया जाता है, जो त्वचा एवं श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। इसके संपर्क से त्वचा रोग एवं मुंह के छाले उत्पन्न होते हैं। उपचार में एंटीहिस्टामिन, एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं तथा प्रभावित क्षेत्र की सफाई की जाती है। गंभीर मामलों में कॉर्टिकोस्टेरॉयड का उपयोग किया जा सकता है।
  6. अरंडी (Ricinus communis) के बीजों में राइसिन नामक अत्यंत विषैला प्रोटीन होता है, जो तीव्र जठरांत्र संबंधी लक्षण उत्पन्न करता है। उपचार में सक्रिय चारकोल 1–2 gm/kg दिया जाता है और नसों में तरल पदार्थ के माध्यम से निर्जलीकरण को नियंत्रित किया जाता है। इलेक्ट्रोलाइट संतुलन एवं एंटी-डायरियल दवाएं भी दी जाती हैं।
  7. कुचला (Strychnos nux-vomica) में स्ट्राइकिनीन पाया जाता है, जो तंत्रिका तंत्र को अत्यधिक उत्तेजित करता है। इसके सेवन से मांसपेशियों में ऐंठन तथा दौरे आते हैं। उपचार में पशु को अंधेरे और शांत वातावरण में रखा जाता है। डायजेपाम5 mg/kg या बार्बिट्यूरेट्स देकर दौरे नियंत्रित किए जाते हैं। सहायक देखभाल एवं नसों में तरल पदार्थ भी दिए जाते हैं।
  8. ब्रैकन फर्न (Pteridium aquilinum) में थायमिनेज पाया जाता है, जो विटामिन B1 की कमी उत्पन्न करता है। इसके सेवन से कमजोरी, रक्तस्राव तथा तंत्रिका विकार उत्पन्न होते हैं। उपचार में थायमिन (विटामिन बी1) 10 mg/kg प्रतिदिन कई दिनों तक दिया जाता है। साथ ही संतुलित आहार और सहायक चिकित्सा आवश्यक होती है।

प्रबंधन एवं नियंत्रण : विषैले पौधों के नियंत्रण के लिए उनकी सही पहचान अत्यंत आवश्यक है। चारागाहों की नियमित सफाई, संतुलित आहार की उपलब्धता तथा पशुओं को संदिग्ध क्षेत्रों से दूर रखना प्रमुख निवारक उपाय हैं। विषाक्तता के लक्षण दिखाई देने पर पशु को तुरंत सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहिए और प्रारंभिक उपचार के रूप में सक्रिय चारकोल दिया जा सकता है। स्थिति के अनुसार विशिष्ट प्रतिविष जैसे मेथिलीन ब्लू या सोडियम नाइट्राइट एवं सोडियम थायोसल्फेट का उपयोग किया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक उपाय जैसे नीम, हल्दी एवं छाछ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं, लेकिन गंभीर स्थिति में पशु चिकित्सक की सहायता अनिवार्य है।

निष्कर्ष : विषैले पौधे पशुपालन के लिए एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। इनके प्रभाव से पशुओं का स्वास्थ्य, उत्पादन तथा प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। उचित पहचान, समय पर उपचार तथा प्रभावी प्रबंधन द्वारा इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। किसानों में जागरूकता बढ़ाना तथा वैज्ञानिक एवं पारंपरिक ज्ञान का समन्वय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

लेखक:
डॉ. सुरेन्द्र कुमार, डॉ. ओम प्रकाश, डॉ. दीपक कुमार कश्यप एवं डॉ. मोहमद काशिफ रज़ा
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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