पशुपालन से समृद्ध होगा छत्तीसगढ़
डॉ. नितीन गाडे, डॉ. निधि रावत, डॉ. चंद्राहस सन्नाट एवं डॉ. जसमीत सिंह


छत्तीसगढ़ के गांवों की पहचान खेत, जंगल और पशुधन से होती है। यहां सुबह की शुरुआत गाय-भैंस के रंभाने, बकरियों की आवाज और मुर्गियों की चहचहाहट से होती है। गांव का जीवन पशुओं के बिना अधूरा है। लेकिन आज भी अधिकांश ग्रामीण परिवार पशुपालन को केवल परंपरा समझते हैं, व्यवसाय नहीं। यही कारण है कि वर्षों तक पशुपालन करने के बावजूद कई किसान आर्थिक रूप से मजबूत नहीं बन पाते। आज समय बदल चुका है। खेती की लागत बढ़ रही है। मौसम अनिश्चित हो गया है। कभी सूखा, कभी अत्यधिक बारिश, कभी फसल का कम दाम इन सबने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे समय में पशुपालन किसानों के लिए सबसे भरोसेमंद सहारा बन सकता है। यदि इसे वैज्ञानिक तरीके और सही योजना के साथ किया जाए तो पशुपालन गांव के गरीब परिवार को भी आत्मनिर्भर बना सकता है। छत्तीसगढ़ में पशुधन की कोई कमी नहीं है। गांव-गांव में गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी और सूकर मौजूद हैं। जरूरत केवल इस बात की है कि किसान इन पशुओं को “संपत्ति” की तरह देखें और उनसे नियमित आय प्राप्त करने की योजना बनाएं।
क्यों जरूरी है पशुपालन?
खेती साल में एक-दो बार आय देती है, लेकिन पशुपालन हर दिन कमाई का अवसर देता है। दूध रोज बिकता है। अंडे रोज बिकते हैं। बकरी और मुर्गी जरूरत पड़ने पर तुरंत नकद पैसा देते हैं। यही कारण है कि पशुपालन को गरीब किसान का “चलता-फिरता बैंक” कहा जाता है।
पशुपालन किसान कोः
- नियमित आय देता है
- परिवार को दूध, अंडा और मांस से पोषण देता है
- खेत के लिए गोबर खाद देता है
- महिलाओं और युवाओं को रोजगार देता है
- और संकट के समय आर्थिक सुरक्षा देता है
जब फसल खराब हो जाए तब भी पशु किसान का साथ नहीं छोड़ते।
केवल दूध बेचने से आगे बढ़ना होगा
आज अधिकांश पशुपालक केवल दूध बेचकर ही आय कमाने की कोशिश करते हैं। इससे सीमित लाभ मिलता है। अब समय है कि किसान पशुपालन को “बहुआयामी व्यवसाय” बनाएं।
उदाहरण के लिएः
- दूध से घी, पनीर और दही बनाएं
- गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार करें
- गोमूत्र से जैविक घोल बनाएं
- बकरी पालन के साथ मुर्गी पालन जोड़ें
- खेत में हरा चारा उगाएं
यदि किसान केवल दूध बेचने के बजाय उससे बने उत्पाद बेचें, तो उनकी आय कई गुना बढ़ सकती है।
आज शहरों में शुद्ध देसी घी और जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। गांव का किसान सीधे ग्राहक तक पहुंचकर अच्छा लाभ कमा सकता है।
बकरी पालन: छोटे किसान की बड़ी ताकत
छत्तीसगढ़ के आदिवासी और वन क्षेत्रों के लिए बकरी पालन बहुत उपयोगी व्यवसाय है। कम जमीन वाले किसान भी इसे आसानी से कर सकते हैं।
बकरी पालन की खास बातेंः
- कम खर्च
- कम जगह
- जल्दी बच्चे देना
- मांस की लगातार मांग
- और जल्दी नकद आय
ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवार 10 से 15 बकरियों से शुरुआत करके अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। लेकिन केवल बकरी खरीद लेना पर्याप्त नहीं है, सही प्रबंधन बहुत जरूरी है।
सफल बकरी पालन के लिए ध्यान रखेंः
- समय पर टीकाकरण करवाएं
- हर 3 से 4 महीने में कृमिनाशक दवा दें
- साफ और सूखी जगह रखें
- हरा चारा और संतुलित आहार दें
- बीमार पशु को अलग रखें
- यदि वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं, तो बकरी पालन गांव के गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
देशी मुर्गी पालन: कम लागत में अच्छी कमाई
छत्तीसगढ़ के गांवों में देशी मुर्गी पालन पहले से होता आया है। लेकिन अब इसे व्यवसाय के रूप में अपनाने की जरूरत है। आज गांव और शहर दोनों जगह देशी अंडे और देशी चिकन की मांग बहुत अधिक है। लोग इसके लिए ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं।
देशी मुर्गी पालन की विशेषताएंः
- कम खर्च
- कम जगह
- महिलाओं के लिए आसान
- जल्दी आय
- और कम जोखिम
यदि गांव की महिलाएं स्वयं सहायता समूह बनाकर मुर्गी पालन करें, तो यह उनके लिए मजबूत आय का स्रोत बन सकता है।
चारा उत्पादन: पशुपालन की असली कुंजी
कई पशुपालक अपनी आधी कमाई पशु आहार खरीदने में खर्च कर देते हैं। यही सबसे बड़ी समस्या है।
जो किसान अपना चारा खुद उगाते हैं, वे ज्यादा लाभ कमाते हैं।
किसान क्या करें?
- खेत का एक हिस्सा चारा उत्पादन के लिए रखें।
- नेपियर घास लगाएं।
- मक्का और बरसीम चारा उगाएं।
- अजोला उत्पादन शुरू करें।
- बारिश के समय साइलेज बनाकर रखें।
अक्सर गर्मियों में चारे की भारी कमी हो जाती है। यदि किसान पहले से तैयारी कर लें, तो उन्हें नुकसान नहीं होगा।
याद रखिए-
“जिस किसान के पास चारा सुरक्षित है, उसका पशुपालन सुरक्षित है।”
देसी पशु ही गांव के लिए ज्यादा उपयोगी
आज कई किसान अधिक दूध के लालच में विदेशी नस्लों के महंगे पशु खरीद लेते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ की गर्म जलवायु में ये पशु जल्दी बीमार पड़ जाते हैं और इनके रखरखाव में बहुत खर्च आता है।
इसके विपरीत देसी नस्लेंः
- गर्मी सहन कर लेती हैं
- कम चारे में भी चल जाती हैं
- बीमार कम पड़ती हैं
- और पालन में सस्ती होती हैं
कम उत्पादन लेकिन कम खर्च वाला पशुपालन अक्सर ज्यादा लाभ देता है।
पशु स्वास्थ्य पर ध्यान देना बहुत जरूरी
ग्रामीण क्षेत्रों में कई किसान बीमारी होने के बाद ही डॉक्टर बुलाते हैं। इससे नुकसान बढ़ जाता है।
एक अच्छे पशुपालक कोः
- समय पर टीकाकरण
- नियमित कृमिनाशन
- साफ पानी
- खनिज मिश्रण
- और साफ पशुशाला
आदि पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
गर्मी के दिनों में पशुओं को छाया और पर्याप्त पानी देना जरूरी है। लापरवाही से दूध उत्पादन कम हो जाता है और बीमारी बढ़ती है।
गोबर को बेकार मत समझिए
आज भी गांवों में बहुत सारा गोबर व्यर्थ चला जाता है, जबकि यही गोबर किसानों के लिए अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत बन सकता है।
गोबर सेः
- वर्मी कम्पोस्ट
- जैविक खाद
- बायोगैस
- और प्राकृतिक खेती के उत्पाद
तैयार किए जा सकते हैं।
आज जैविक खेती की मांग तेजी से बढ़ रही है। किसान यदि गोबर खाद तैयार करके बेचें, तो अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं।
महिलाओं की भागीदारी से बदलेगी गांव की अर्थव्यवस्था
ग्रामीण महिलाओं का पशुपालन में सबसे बड़ा योगदान होता है। वे पशुओं को चारा खिलाती हैं, दूध निकालती हैं और देखभाल करती हैं।
यदि महिलाओं कोः
- प्रशिक्षण
- बैंक ऋण
- सरकारी योजनाओं की जानकारी
- और बाजार से जुड़ाव
मिले, तो वे सफल पशु उद्यमी बन सकती हैं।
आज कई महिला समूहः
- मुर्गी पालन
- बकरी पालन
- दुग्ध उत्पाद निर्माण
- और वर्मी कम्पोस्ट
से अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं।
गांव का युवा बने “स्मार्ट पशुपालक”
आज का युवा मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग करना जानता है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
आज पशुपालन मेंः
- ऑनलाइन प्रशिक्षण
- मोबाइल ऐप,
- डिजिटल भुगतान,
- सोशल मीडिया मार्केटिंग,
- और ऑनलाइन ग्राहक संपर्क
बहुत महत्वपूर्ण हो चुके हैं।
गांव का युवा यदि वैज्ञानिक पशुपालन अपनाए, तो वह नौकरी खोजने के बजाय गांव में ही रोजगार पैदा कर सकता है।
समूह बनाकर काम करना जरूरी
छोटे किसान अकेले बाजार में मजबूत नहीं बन सकते। इसलिए गांव में डेयरी समूह, बकरी पालन समूह, महिला स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन बहुत जरूरी हैं। यदि किसान मिलकर दाना खरीदें, दवा खरीदें और उत्पाद बेचें तो लागत कम होगी और लाभ बढ़ेगा।
सरकारी योजनाओं का लाभ उठाइए
सरकार पशुपालकों के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन जानकारी के अभाव में कई किसान उनका लाभ नहीं उठा पाते।
किसानों को चाहिए कि वे पशुपालन विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र, बैंक, और पंचायत से जानकारी लें। आज बकरी पालन, डेयरी, पोल्ट्री, चारा विकास और पशु शेड निर्माण के लिए विभिन्न योजनाओं में सहायता उपलब्ध है।
पशुपालन और प्राकृतिक खेती साथ-साथ
आज खेती में रासायनिक खाद और दवाओं का खर्च बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में पशुपालन प्राकृतिक खेती का मजबूत आधार बन सकता है। गोबर और गोमूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत, जैविक खाद तैयार करके खेती की लागत घटाई जा सकती है। इससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है और खेती टिकाऊ बनती है।
बदलती सोच ही बदलेगी भविष्य
आज आवश्यकता केवल पशु बढ़ाने की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है। पशुपालन को अब “मजबूरी” नहीं बल्कि “व्यवसाय” की तरह अपनाना होगा।
भविष्य उसी किसान का होगाः
- जो वैज्ञानिक जानकारी अपनाएगा
- जो कम लागत पर ध्यान देगा
- जो बाजार से जुड़ेगा
- और जो मेहनत के साथ योजना भी बनाएगा
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ के गांवों में पशुधन केवल जानवर नहीं हैं, बल्कि गांव की आर्थिक ताकत हैं। यदि किसान वैज्ञानिक सोच, सही प्रबंधन और आधुनिक तरीके अपनाएं, तो पशुपालन लाखों परिवारों को गरीबी से निकालकर समृद्धि की ओर ले जा सकता है। आज जरूरत है जागरूकता की, प्रशिक्षण की, संगठन की और आत्मविश्वास की। यदि गांव का किसान बदलने का निर्णय ले ले, तो पशुपालन छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई क्रांति ला सकता है। पशुधन गांव की असली पूंजी है, और वैज्ञानिक पशुपालन समृद्ध किसान का सबसे मजबूत रास्ता।
लेखक :
डॉ. नितीन गाडे, डॉ. निधि रावत, डॉ. चंद्राहस सन्नाट एवं डॉ. जसमीत सिंह
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग









