

परिचयर : तेंदू एक महत्वपूर्ण वानिकी वृक्ष है, जो पोषण तथा आर्थिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी माना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम Diospyros melanoxylon है और यह Ebenaceae कुल से संबंधित है। तेंदू के पत्तों का उपयोग बीड़ी निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जिससे यह भारत की एक प्रमुख लघु वनोपज बन गया है। इसके पत्तों में लचीलापन और मजबूती होती है, जो बीड़ी बनाने के लिए उपयुक्त होती है। तेंदू का फल भी खाने योग्य होता है, जो पकने पर पीले या नारंगी रंग का तथा मीठा होता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, विटामिन तथा खनिज तत्व पाए जाते हैं, जिससे यह पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा तेंदू की छाल, पत्तियाँ एवं अन्य भागों का उपयोग पारंपरिक औषधि के रूप में किया जाता है, जो कई रोगों के उपचार में सहायक होते हैं।
तेंदू की खेती मुख्यत: भारत के उष्णकटिबंधीय वनों में पाई जाती है। यह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड और ओडिशा राज्यों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह वृक्ष सूखा सहनशील होता है और कम उपजाऊ भूमि में भी आसानी से उग सकता है। विशेष रूप से आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में तेंदू के पत्तों का संग्रहण आय का प्रमुख स्रोत है। छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा क्षेत्र तेंदू उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं, जहाँ यह न केवल प्राकृतिक रूप से उगता है बल्कि ग्रामीण लोगों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत भी है।
| पोषक तत्व | मात्रा |
| ऊर्जा | 80-100 kcl |
| कार्बोहाइड्रेट | 18-22g |
| प्रोटीन | 0.5-1.0 g |
| वसा | 0.2-0.5 g |
| फाइबर | 2-4 g |
| कैल्शियम | 20-30mg |
| फास्फोरस | 15-25mg |
| आयरन | 0.5-1.2mg |
| विटामिन | 5-15mg |
| पानी | 70-80 |
तेंदू के आर्थिक उपयोग : बीड़ी उद्योगरू तेंदू के पत्तों का सबसे बड़ा उपयोग बीड़ी बनाने में होता है। भारत में बीड़ी उद्योग तेंदू पत्तों पर निर्भर है, जिससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता है।
रोजगार का स्रोत: पत्तों की तुड़ाई, संग्रहण और प्रसंस्करण में ग्रामीण एवं आदिवासी लोगों को मौसमी रोजगार मिलता है।
सरकारी राजस्वरू तेंदू पत्तों की खरीद और बिक्री से राज्य सरकार को अच्छा राजस्व प्राप्त होता है, खासकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में।
फल का उपयोग : तेंदू के फल खाने योग्य होते हैं और इनमें पोषक तत्व पाए जाते हैं। स्थानीय बाजार में इनकी बिक्री भी होती है।
लकड़ी का उपयोगरू तेंदू की लकड़ी मजबूत होती है, जिसका उपयोग ईंधन (पितमूववक) और छोटे कृषि उपकरण बनाने में किया जाता है।
औषधीय उपयोग : पत्तियाँ और छाल का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है। कुछ रोगों के उपचार में इसका उपयोग लाभकारी माना जाता है।
लघु वनोपज : तेंदू को लघु वनोपज के रूप में माना जाता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
जलवायु: तेंदू उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है, जो गर्म और शुष्क परिस्थितियों में भी अच्छी तरह विकसित हो सकता है। तेंदू के लिए 20° से 40° तक का तापमान उपयुक्त होता है। यह उच्च तापमान को सहन कर सकता है, लेकिन बहुत अधिक ठंड इसके लिए हानिकारक होती है। 800 से 1200 मिमी वार्षिक वर्षा इसके विकास के लिए आदर्श मानी जाती है। यह मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी वृद्धि करता है, जबकि अधिक जलभराव इसकी जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। मध्यम आर्द्रता इसकी वृद्धि के लिए अनुकूल होती है। अत्यधिक आर्द्रता से रोगों का खतरा बढ़ सकता है। तेंदू एक सूर्य-प्रिय पौधा है, जिसे पूर्ण धूप की आवश्यकता होती है। छायादार स्थानों में इसकी वृद्धि प्रभावित होती है। तेंदू में सूखा सहन करने की क्षमता अधिक होती है, इसलिए यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
मिट्टी: तेंदू विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, लेकिन कुछ विशेष मृदा परिस्थितियाँ इसकी अच्छी वृद्धि के लिए आवश्यक होती हैं। हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी, लाल मिट्टी और बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। अच्छी जल निकासी वाली भूमि आवश्यक है। जलभराव वाली मिट्टी में इसकी जड़ें सड़ सकती हैं, जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है। तेंदू कम उर्वरक वाली मिट्टी में भी उग सकता है, लेकिन जैविक पदार्थ युक्त मिट्टी में इसकी वृद्धि बेहतर होती है। 6.0 से 7.5 pH वाली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त होती है
नर्सरी की तैयारी : तेंदू की सफल खेती के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों का चयन एवं नर्सरी प्रबंधन अत्यंत आवश्यक होता है। इसके लिए स्वस्थ एवं पके फलों से प्राप्त ताजे बीजों का उपयोग करना चाहिए। बीजों के अच्छे अंकुरण हेतु उन्हें बोने से पहले 24 घंटे तक पानी में भिगोना लाभकारी होता है। अंकुरण के लिए गर्म एवं नम वातावरण 25-35°C उपयुक्त माना जाता है। अंकुरित बीजों को 20-25 सेमी आकार के पॉलीबैग में बोया जाता है, जिसमें मिट्टी, गोबर की सड़ी खाद और बालू का उचित मिश्रण भरा जाता है। नर्सरी को आंशिक छायादार स्थान पर रखना चाहिए तथा नियमित हल्की सिंचाई करनी चाहिए। पौधों को 3-4 माह तक नर्सरी में रखा जाता है, जब तक वे रोपण योग्य न हो जाएं। इस दौरान खरपतवार नियंत्रण एवं पौधों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
खेत की तैयारी : तेंदू की अच्छी वृद्धि एवं उत्पादन के लिए खेत की समुचित तैयारी अत्यंत आवश्यक होती है। सबसे पहले खेत की साफ-सफाई कर खरपतवार, झाड़ियां एवं पत्थरों को हटा दिया जाता है। इसके बाद मिट्टी को भुरभुरी एवं समतल बनाने के लिए 2-3 बार गहरी जुताई की जाती है। तेंदू पौधे जलभराव को सहन नहीं कर पाते, इसलिए खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था करना आवश्यक है। आवश्यकता अनुसार खेत को हल्की ढाल दी जाती है ताकि पानी का ठहराव न हो। रोपण से पूर्व निर्धारित दूरी (4 × 4 मीटर या 5 × 5 मीटर) पर गड्ढों का चिन्हांकन किया जाता है, जिससे पौधों को पर्याप्त स्थान मिल सके और उनका विकास अच्छा हो।
गड्ढों की खुदाई एवं भराई रू प्रत्येक पौधे के लिए लगभग 45 × 45 × 45 सेमी या 60 × 60 × 60 सेमी आकार के गड्ढे खोदे जाते हैं। इन गड्ढों को रोपण से 1-2 माह पहले खोदकर धूप में खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे कीट एवं रोग नष्ट हो जाते हैं। गड्ढों की भराई के समय ऊपरी उपजाऊ मिट्टी में 10-15 किग्रा गोबर की सड़ी खाद, 100-200 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 50-100 ग्राम नीम खली मिलाकर गड्ढों में भरा जाता है। इससे पौधों को प्रारंभिक वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। रोपण वर्षा ऋतु (जूनदृजुलाई) में किया जाता है। पौधे को गड्ढे के बीच में लगाकर चारों ओर मिट्टी दबा दी जाती है तथा हल्की सिंचाई की जाती है।
रोपाई का समय एवं विधि: तेंदू की रोपाई का उपयुक्त समय वर्षा ऋतु (जून से अगस्त) माना जाता है, क्योंकि इस समय मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है, जिससे पौधों की जड़ों का विकास अच्छे से होता है। रोपाई के लिए 4 × 4 मीटर या 5 × 5 मीटर की दूरी पर गड्ढों में पौधों को लगाया जाता है। रोपण करते समय पौधे को गड्ढे के बीच में सीधा रखकर मिट्टी से भरकर हल्का दबाव देना चाहिए, ताकि जड़ों के आसपास वायु स्थान न रहे। रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना आवश्यक होता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन: तेंदू कम उर्वरता वाली मिट्टी में भी उग सकता है, फिर भी अच्छे विकास के लिए संतुलित पोषण आवश्यक है। रोपण के समय प्रति गड्ढा 10-15 किग्रा गोबर की सड़ी खाद डालें प्रारंभिक वर्षों में प्रति पौधा लगभग 50-100 ग्राम नाइट्रोजन, 25-50 ग्राम फॉस्फोरस और 25-50 ग्राम पोटाश देना लाभकारी होता है जैविक खाद एवं नीम खली का उपयोग पौधों की वृद्धि को बढ़ाता है
सिंचाई प्रबंधनरू तेंदू एक सूखा सहनशील पौधा है, फिर भी प्रारंभिक अवस्था में सिंचाई आवश्यक होती है। रोपण के बाद तुरंत हल्की सिंचाई करें, पहले 1-2 वर्ष में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें वर्षा ऋतु में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती जलभराव से बचाव अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे जड़ सड़न हो सकती है
खरपतवार प्रबंधन: पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए खरपतवार नियंत्रण जरूरी है। प्रारंभिक 2-3 वर्षों तक नियमित निराई-गुड़ाई करें, वर्ष में 2-3 बार खरपतवार हटाएं मल्चिंग (सूखी घासध्पत्तियों) का उपयोग करने से नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं
कीट एवं रोग प्रबंधन :
प्रमुख कीट:
1. पत्ती खाने वाले कीट पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं, इसके नियंत्रण के लिए नीम तेल (5 मिली प्रति लीटर पानी ) का छिड़काव करें।
2. तना छेदक तने में छेद करके पौधे को कमजोर बनाता है, इसके नियंत्रण के लिए प्रभावित भाग को काटकर नष्ट करें, कीटनाशक का प्रयोग करें।
प्रमुख रोग:
1. पत्ती धब्बा रोग पत्तियों पर भूरे धब्बे दिखाई देते हैं, इसके नियंत्रण के लिए बोर्डो मिश्रण या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (2-3 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
2. जड़ सड़न अधिक पानी के कारण जड़ें सड़ जाती हैं, इसके नियंत्रण के लिए जल निकास की उचित व्यवस्था रखें।
तुड़ाई: तेंदू में मुख्यतः पत्तों की तुड़ाई आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। पत्तों की तुड़ाई अप्रैल से मई माह में की जाती है, जब नई, कोमल एवं पूर्ण विकसित पत्तियाँ निकलती हैं। बीड़ी निर्माण के लिए मध्यम आकार की, बिना क्षतिग्रस्त पत्तियाँ सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। तुड़ाई प्रातः या सायं के समय की जाती है ताकि पत्तियाँ ताजा एवं लचीली बनी रहें। तुड़ाई के बाद पत्तों को छाया में सुखाया जाता है और फिर गड्डियों में बांधकर संग्रहित किया जाता है। तेंदू के फल मई जून में पकते हैं, जिन्हें स्थानीय उपयोग एवं बाजार में बिक्री के लिए एकत्र किया जाता है।
उत्पादन: तेंदू का उत्पादन मुख्यतः पत्तों के रूप में लिया जाता है। एक परिपक्व वृक्ष से औसतन 2000-4000 पत्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं प्रति हेक्टेयर लगभग 10-20 क्विंटल सूखी पत्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं। फल उत्पादन भी होता है, लेकिन इसका व्यावसायिक उपयोग सीमित होता है उचित देखभाल एवं प्रबंधन से उत्पादन में वृद्धि संभव है।
लागत: तेंदू की खेती में प्रारंभिक लागत कम होती है, क्योंकि यह वन आधारित एवं कम इनपुट वाली फसल है। औसतन 1 हेक्टेयर में प्रारंभिक लागत 15,000 से 30,000 रुपये तक हो सकती है।
मुनाफा: तेंदू की खेती से अच्छा लाभ प्राप्त होता है, विशेषकर पत्तों की बिक्री से। तेंदू पत्तों की सरकारी खरीद होती है, जिससे उचित मूल्य मिलता है प्रति हेक्टेयर 30,000 से 80,000 रुपये या इससे अधिक आय प्राप्त हो सकती है ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में यह आय का प्रमुख स्रोत है
लेखक :
लिशा तंबोली एवं डॉ. संगीता
महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, सांकरा, दुर्ग (छ.ग.)









