उद्यानिकी

आंवला की खेती (Aonla or Indian gooseberry)

वैभव शर्मा , श्री राम कुमार देवांगन क्रन्तिकारी डेबरीधुर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जगदलपुर, बस्तर

परिचय- आंवला, जिसे भारतीय करौंदा या इंडियन गूसबेरी भी कहा जाता है, भारत का एक महत्वपूर्ण फलादार वृक्ष है। इसका वैज्ञानिक नाम Phyllanthus emblica तथा नया वैज्ञानिक नाम Emblica officinalis तथा कुल Euphorbiaceae है। यह वृक्ष मुख्यतः उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधिय क्षेत्रों में पाया जाता है और भारत के विभिन्न राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

आंवला का फल गोल, हरे रंग का तथा खट्टे स्वाद वाला होता है। यह विटामिन ‘C‘ का अत्यंत समृद्ध स्रोत है और इसमें कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस तथा एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। आयुर्वेद में आंवला को ‘‘रसायन‘‘ माना गया है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है। इसके फल का स्वाद अम्लीय तथा कड़ुवाहट लिये हुए होता है। फल को दवाई के रूप में अधिक प्रयोग करते है। इसको अधिकतर मुरब्बा तथा चटनी के रूप मे प्रयोग करते है।

आँवले का आचार भी अधिक स्वादिष्ट एवं गुणकारी होता है। भारतवर्ष मे आँवले के उ़द्यान नहीं पाये जाते है। इसके पेड़ बाग की बाउन्ड्री पर या घर के आस-पास लगे पाये जाते है। सुंदर पत्तियों के कारण इसके पौधे ग्रीन हाऊस मे भी उगाए जाते है।

आहार मूल्य (Nutritive Value)

प्रोटीन 0.5%
खनिज पदार्थ 0.7%
रेशा 3.4%
कार्बोहाइड्रेट 14.1%
कैल्शियम 0.05%
फॉस्फोरस 0.02%
विटामिन 600 mg/100gm
आयरन 1.2  mg/100gm

वानस्पतिक विशेषताएँ –

  • सह मध्यम आकार का पर्णपाती वृक्ष है।
  • इसकी ऊँचाई लगभग 8-10 मीटर तक होती है।
  • पत्तियाँ छोटी और हरे रंग की होती है।
  • फल सर्दियों में पकते हैं।

जलवायु (Climate)- यह नम तथा सूखी दोनों प्रकार की जलवायु में सफलतापूर्वक पैदा किया जाता है। यह पौधा गर्मी और सर्दी दोनों को सहन कर सकता है। छत्तीसगढ़ की गर्म एवं मध्यम वर्षा वाली जलवायु आंवला उत्पादन के लिए उपयुक्त है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जल निकास की उचित व्यवस्था हो गर्मियों में 45°C तक का तापमान सह लेता है, जबकि सर्दियों में हल्की ठंड भी सहन कर लेता है। आंवला के लिए 600-800 मिमी वार्षिक वर्षा पर्याप्त होती है, परंतु जलभराव हानिकारक होता है।

मिट्टी (Soil) – इसके वृक्ष अधिक सहिष्णु होने के कारण विभिन्न प्रकार की मिट्टियो में उत्पन्न किये जा सकते हैं। अधिक बलुई मिट्टी मे  इसके वृक्ष अच्छी तरह नही पनप पाते हैं। इसकी अच्छी वृद्धि एवं सफल पैदावार के लिये हल्की बलुई मिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी का pH मान 6.5 से 8.5 के बीच उपयुक्त रहता है। हल्की क्षारीय (alkaline) भूमि में भी इसकी खेती सफल रहती है। छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली हल्की से मध्यम दोमट भूमि आंवला उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है, बशर्ते खेत में पानी निकास की सही व्यवस्था हो।

किस्में (Varieties)-

(1) देशी या बीजू किस्म– इसके पेड़ अधिक विस्तृत होते है तथा इन पर फलत होती है, किन्तु फलों का आकार छोटा होता है। फल अधिक हरे या हरे रंग के होते है। इनमें बीज बड़े आकार में मिलते है तथा इनकी किस्म अच्छी नहीं होती हैं।

(2) बनारसी आँवला – इसके पेड़ प्रसारण द्वारा तैयार किये जाते है। फलों का आकार बड़ा होता है। फल पकने पर हरे या कुछ किस्मों में हल्के लाल हो जाते हैं कुछ फल सफेद से रहते हैं। सफेद रंग वाले फलों मे ं ऐसी किस्में हैं, जिसमें फलों के ऊपर अधिक गहरी लाइन फासले से होती है।

उपर्युक्त तत्वों के आधार पर इनकी पाँच किस्में कही जा सकती हैं।
1. हरी 2. सफेद 3. मटमैली 4. लाल
इसके अतिरिक्त फ्रान्सिस या हाथी झूल तथा चकइया उत्पन्न की जाती हैं।

  • अगेती किस्में बनारसी, कृष्णा, एन. ए. 9, एन. ए. 10
  • मध्यम किस्में चकइया, कंचन ।
  • पछेती किस्में फ्रान्सिस, नरेन्द्र आँवला 7।
  • फैजाबाद में फलों वाली (42 ग्राम) आँवलें की “एन. ए. 6” तथा “एन. ए. 10” किस्मों को निकाला गया है।
  • इसके अतिरिक्त (विचपुरी) आगरा से निकाली गई किस्म बलवन्त आँवला तथा (आनन्द) गुजरात से विकसित आनन्द-1, आनन्द-2 तथा आनन्द-3 है।

भूमि की तैयारी – आंवला की अच्छी वृद्धि और अधिक उत्पादन के लिए भूमि की सही तैयारी बहुत जरूरी है। छत्तीसगढ़ की जलवायु को ध्यान में रखते हुए निम्न तैयारी करें:

1. खेत की जुताई

  • गर्मियों में 1-2 गहरी जुताई करें।
  • इसके बाद 2-3 बार हल्की जुताई कर खेत समतल करें।
  • खरपतवार पूरी तरह निकाल दें।

2. गड्ढों की तैयारी

  • गड्ढे का आकाररू 60 × 60 × 60 सेमी (या 1×1×1 मीटर, यदि मिट्टी कमजोर हो)।
  • गड्ढे मई-जून में खोद लें और 15-20 दिन धूप में खुला छोड़ दें।

3. खाद भराई – प्रत्येक गड्ढे में 15-20 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM), 1 किलो नीमखली, 50-100 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट
अच्छी तरह मिट्टी में मिलाकर भरें।

4. दूरी (Spacing)

  • सामान्यतः 8×8 मीटर या 7×7 मीटर दूरी रखें।
  • इससे पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है।

5. जल निकास

  • खेत में पानी रुकना नहीं चाहिए।
  • हल्की ढलान या नालियों की व्यवस्था करें।

रोपण – उपयुक्त रोपण समय जूनदृजुलाई (मानसून की शुरुआत) कृ सबसे अच्छा समय वर्षा होने से पौधों को पर्याप्त नमी मिलती है सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है | वैकल्पिक समय फरवरी-मार्च (यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो)

खाद प्रबंधन – आंवला की अच्छी बढ़वार और ज्यादा फल लेने के लिए सही समय पर खाद और उर्वरक देना बहुत जरूरी होता है। छत्तीसगढ़ की जलवायु में आंवला अच्छी तरह उगता है, इसलिए किसान सही खाद प्रबंधन अपनाकर अच्छी पैदावार ले सकते हैं।

1. गोबर की खाद

  • हर पौधे को 20-25 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद देना चाहिए।
  • पौधा बड़ा होने पर 40-50 किलो तक गोबर की खाद दी जा सकती है।
  • इसे जून-जुलाई (बरसात की शुरुआत) में पौधे के चारों ओर मिट्टी में मिला दें।

2. रासायनिक उर्वरक की मात्रा

एक पौधे के लिए लगभग यह मात्रा दी जा सकती है:
नाइट्रोजन (यूरिया) – 500 से 1000 ग्राम, फास्फोरस (DAP या SSP) – 250 से 500 ग्राम, पोटाश (MOP) – 250 से 500 ग्राम

3. खाद देने का सही समय
आधी नाइट्रोजन, पूरी फास्फोरस, पूरी पोटाश → जूनदृजुलाई में दें।
बाकी आधी, नाइट्रोजन → सितंबर-अक्टूबर में दें।

4. खाद देने की विधि

  • पौधे के तने से 1-1.5 मीटर दूर गोलाई में हल्की खुदाई करें।
  • उसमें खाद और उर्वरक डालकर मिट्टी से ढक दें।
  • इसके बाद हल्की सिंचाई कर दें।

5. सूक्ष्म तत्व (Micronutrients)
अगर पत्तियाँ पीली दिखें या फल कम लगें तो:
जिंक सल्फेट 0.5ः का छिड़काव करें।
बोरॉन 0.2ः का छिड़काव करने से फल गिरना कम होता है और फल अच्छे बनते हैं।

✅ किसानों के लिए सलाह:

  • हर साल बरसात के समय खाद जरूर दें।
  • खेत में नमी बनाए रखें और समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहें।
  • संतुलित खाद देने से आंवला के पेड़ मजबूत बनते हैं और ज्यादा उत्पादन मिलता है।

सिंचाई प्रबंधन- आंवला एक सूखा सहन करने वाला फलदार पौधा है, इसलिए इसमें ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। लेकिन सही समय पर सिंचाई करने से पौधे की बढ़वार अच्छी होती है और फल की संख्या भी बढ़ती है।

1. पौधे लगाने के बाद सिंचाई
पौधे लगाने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए।
इसके बाद 7-10 दिन के अंतराल पर पानी देना चाहिए, ताकि पौधा अच्छी तरह जम जाए।

2. छोटे पौधों में सिंचाई
पहले 1-2 साल तक पौधों को 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
गर्मी के समय में 7-10 दिन में पानी देना अच्छा रहता है।

3. बड़े पेड़ों में सिंचाई

  • बड़े आंवला के पेड़ों को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती।
  • 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त होती है।
  • बरसात के मौसम में सामान्यतः सिंचाई की जरूरत नहीं होती।

4. फल बनने के समय सिंचाई

  • नवंबर से जनवरी के समय फल का विकास होता है।
  • इस समय खेत में नमी बनाए रखना जरूरी है, इसलिए जरूरत के अनुसार सिंचाई करें।

5. सिंचाई की विधि

  • आंवला में ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) सबसे अच्छी मानी जाती है।
  • इससे पानी की बचत होती है और पौधे को धीरे-धीरे पर्याप्त नमी मिलती है।

✅ किसानों के लिए सलाह:

  • खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए, इससे पौधे की जड़ खराब हो सकती है।
  • गर्मी के समय मल्चिंग (सूखी घास या पत्तियां) डालने से मिट्टी की नमी बनी रहती है।

कीट एवं उनका नियंत्रण – आंवला की फसल में कुछ कीट पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे फल की गुणवत्ता और उत्पादन कम हो सकता है। समय पर पहचान और नियंत्रण करने से किसान नुकसान से बच सकते हैं।

1. छाल खाने वाला कीट (Bark Eating Caterpillar)

लक्षण:

  • यह कीट पेड़ की छाल में छेद बनाकर अंदर रहता है।
  • छेद के आसपास सूखी लकड़ी का चूरा और गोंद जैसा पदार्थ दिखाई देता है।
  • पेड़ की टहनियां धीरे-धीरे सूखने लगती हैं।

नियंत्रण:

  • छेद में केरोसिन या पेट्रोल में भीगी रूई डालकर छेद को मिट्टी से बंद कर दें।
  • या क्लोरपायरीफॉस 20 EC दवा को पानी में मिलाकर छेद में डालें।

2. फल छेदक कीट (Fruit Borer)

लक्षण:

  • यह कीट फल में छेद करके अंदर का गूदा खाता है।
  • प्रभावित फल सड़ने लगते हैं और गिर जाते हैं।

नियंत्रण:

  • खेत में गिरे हुए खराब फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  • नीम तेल 2-3 मिली/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • जरूरत होने पर स्पिनोसैड या क्विनालफॉस का छिड़काव करें।

3. पत्ती खाने वाला कीट (Leaf Eating Caterpillar)

लक्षण:

  • यह कीट पत्तियों को खाकर पौधे को कमजोर कर देता है।
  • ज्यादा प्रकोप होने पर पेड़ लगभग नंगा दिखाई देने लगता है।

नियंत्रण:

  • कीट दिखाई देने पर नीम आधारित कीटनाशक का छिड़काव करें।
  • अधिक प्रकोप होने पर क्लोरपायरीफॉस या साइपरमेथ्रिन का छिड़काव करें।

4. माहू (Aphid)

लक्षण:
यह छोटे कीट पत्तियों और कोमल टहनियों से रस चूसते हैं।
पत्तियां मुड़ने लगती हैं और पीली पड़ जाती हैं।

नियंत्रण:
नीम तेल 3 मिली/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
जरूरत होने पर इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव करें।

✅ किसानों के लिए सलाह:

  • समय-समय पर बाग का निरीक्षण करते रहें।
  • प्रभावित टहनियों और फलों को हटाकर नष्ट करें।
  • नीम आधारित दवाओं का उपयोग करने से कीट नियंत्रण के साथ-साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।

रोग एवं उनका नियंत्रण- आंवला की फसल में कुछ रोग (Disease) लग जाते हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और फल की गुणवत्ता कम हो जाती है। यदि किसान समय पर पहचान कर नियंत्रण करें तो नुकसान कम किया जा सकता है।

1. फल सड़न रोग (Fruit Rot)

लक्षण:
इस रोग में आंवला के फल पर भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं।
धीरे-धीरे फल सड़ने लगते हैं और गिर जाते हैं।

नियंत्रण:
संक्रमित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

2. पत्ती धब्बा रोग (Leaf Spot)

लक्षण:

  • पत्तियों पर भूरे या काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।
  • अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं।

नियंत्रण:

  • रोगग्रस्त पत्तियों को हटाकर नष्ट करें।
  • मैनकोजेब 2 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

3. जंग रोग (Rust Disease)
लक्षण:

  • पत्तियों के नीचे पीले या नारंगी रंग के छोटे-छोटे धब्बे दिखाई देते हैं।
  • इससे पत्तियां कमजोर होकर गिरने लगती हैं।

नियंत्रण:

  • सल्फर या मैनकोजेब का छिड़काव करें।
  • बाग में साफ-सफाई बनाए रखें।

4. डाइबैक रोग (Dieback)
लक्षण:

  • इस रोग में पेड़ की टहनियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं।
  • धीरे-धीरे पूरी शाखा सूख सकती है।

नियंत्रण:

  • सूखी टहनियों को काटकर जला दें।
  • कटे हुए स्थान पर बोर्डो पेस्ट लगाएं।
  • जरूरत होने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव करें।

✅ किसानों के लिए सलाह:

  • बाग में साफ-सफाई और उचित दूरी बनाए रखें।
  • समय-समय पर निराई-गुड़ाई और छंटाई करते रहें।
  • रोग दिखते ही तुरंत दवा का छिड़काव करें।

फलों की तोड़ाई एवं पैदावार (Harvesting and yield) – आंवला के फल सामान्यतः नवंबर से जनवरी के बीच पककर तैयार हो जाते हैं। जब फल पूरे आकार के, कठोर और हल्के पीले-हरे रंग के हो जाएं तब तुड़ाई करनी चाहिए। तुड़ाई हाथ से या फल तोड़ने वाले उपकरण की मदद से करनी चाहिए। पेड़ को डंडे से मारकर फल नहीं गिराना चाहिए, इससे फल और पेड़ दोनों को नुकसान होता है। तुड़ाई के बाद फलों को छाया में इकट्ठा करना चाहिए ताकि गुणवत्ता बनी रहे।

उपज/(Yield)

  • आंवला का पेड़ सामान्यतः 4-5 वर्ष बाद फल देना शूरू करता है।
  • 8-10 वर्ष के पेड़ से अच्छी उपज मिलने लगती है।
  • एक विकसित पेड़ से लगभग 50-100 किलोग्राम फल प्राप्त हो सकता हैं।
  • अच्छी देखभाल और उन्नत किस्मों में 150 किलोग्राम तक फल मिल सकते है।
  • प्रति हेक्टेयर आंवला की औसत उपज 8-12 टन तक हो सकती है।

ग्रेडिंग (Grading)

  • तुड़ाई के बाद फलों को आकार और गुणवत्ता के आधार पर अलग किया जाता है।
  • बड़े आकार के फल -मुरब्बा और प्रसंस्करण के लिये सबसे अच्छे होते है।
  • मध्यम आकार के फल -आचार और कैंडी बनाने में उपयोग होते है।
  • छोटे या खराब फल-जूस या पाउडर बनाने में उपयोग किए जाते है।
  • ग्रेडिंग करने से बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।

पैकिंग (Packing)

  • आंवला को बांस की टोकरी , प्लास्टिक क्रेट या कार्ड बोर्ड बॉक्स में पैक किया जाता है।
  • पैकिंग से पहले फलों को साफ और सूखा होना चाहिए ।
  • पैकिंग करते समय खराब सा सड़े फल अलग कर देने चाहिए।
  • सही पैकिंग से फल परिवहन के दौरान खराब नहीं होते ।

विपणन (Marketing)
आंवला का विपणन कई तरीकों से किया जा सकता है: स्थानीय मंडी में बिक्री – किसान अपने नजदीकी बाजार में आंवला बेच सकते हैं। प्रसंस्करण उद्योग को बिक्री – कई कंपनियां जैसे Patanjali Ayurved और Dabur आंवला खरीदती हैं। प्रसंस्करण करके बिक्री – मुरब्बा, अचार, कैंडी, जूस आदि बनाकर अधिक लाभ कमाया जा सकता है। सीधी बिक्री – किसान हाट बाजार या शहरों में सीधे उपभोक्ताओं को बेच सकते हैं।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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