उद्यानिकीकृषि

मृदा (Soil) की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाने में जीवांश तत्वों का योगदान

अंजुलता सुमन पात्रे एवं नारायण वर्मा

साठ के दशक के पूर्व हम मानव संख्या व अनाज की उपज में सामंजस्य बनाने की समस्या से जूझ रहे थे। देश की आजादी के साथ हमारा मुख्य उद्देश्य जनता को भरपेट भोजन उपलब्ध कराना था। साठ के दशक के अन्त तक हरित क्रांति ने लगभग इस उद्देश्य को पूरा कर दिया और हम रसायनिंक खाद, कीटनाशक सिंचाई हेतु पानी आदि का उपयोग करते हुए अत्यधिक उपज लेते गये। जहां वर्ष 1950-51 में खाद्यान्न उत्पादन 50 मिलियन टन था वहीं 2003-04 में 211 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिससे देश न केवल आत्म निर्भर बना बल्कि 60 मि. टन का सुरक्षित भण्डार भी है, लेकिन इस क्रांति में हम जो कुछ खोते जा रहे है उसका कुप्रभाव आने वाली पीढि़यों पर पढ़ेगा। अतः यह निर्विवाद सत्य हो गया है कि कार्बनिक खादों के साथ-साथ रसायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग से न केवल अधिकतम उपज ली जा सकती है बल्कि लम्बे समय तक इनके प्रयोग से भूमि की उर्वरा स्तर में भी सुधार होता है हम यह भी कह सकते है कि मृदा की पोषण गुणवत्ता को बनाया रखा जा सकता है।

जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव होते है जो मृदा की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाते है। ये जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया के मुख्य स्त्रोत होते है। द्विबीज पत्री (लैग्यूमिनस) पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम के सहजीवी संबंध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर इसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते है, जिससे पादप इसका प्रयोग पोषकों के रूप में करते है।

खेती में रसायनिक उर्वरकों के अधिकाधिक प्रयोग से अनेक समस्याएँ जुड़ी हुई है। इसके परिणामस्वरूप जैविक खेती करने पर तथा जैव उर्वरकों के प्रयोग पर बल दिया जा रहा है। हाल ही में भारत में जैव उर्वरकों की एक बड़ी संख्या बडे़ पैमाने पर बाजार में उपलब्ध होने लगी है। किसान अपने खेतों में लगातार इनका प्रयोग कर रहे हैं। इससे मृदा पोषक तत्वों की भरपाई तथा रसायन उर्वरकों पर निर्भरता भी कम हो रही है। रसायनिक उर्वरको के प्रयोग से उपज में वृद्धि तो होती है परन्तु अधिक प्रयोग से मृदा की उर्वरता तथा संरचना पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए उर्वरकों के साथ जैव उर्वरकों के प्रयोग की संभावनाएँ बढ़ रही है। जैव उर्वरकों के प्रयोग से फसल को पोषक तत्वों की आपूर्ति होने के साथ मृदा जिससे उपज में वृद्धि होती है।

जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्म जीव- जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव होते है, जो मृदा की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाते है। ये जीवाणु कवक तथा सायनोंबैक्टीरिया के मुख्य स्त्रोत होते है। द्विबीजपत्री (लैग्यूमिनस) पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम के सहजीवी संबंध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर इसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते है, जिससे पादप इसका प्रयोग पोषकों के रूप में करते है। अन्य जीवाणु (जैसे एजोस्पाइरिलम तथा एजोटोबैक्टर) मृदा में मृक्तावस्था में रहते है। यह भी वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर सकते है। इस प्रकार मृदा में नाइट्रोजन अवयव बढ़ जाते है।

मित्र कवक (जैसे माइकोराइजा) पादपों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते है। ग्लोमस जीनस के बहुत से सदस्य माइकोराइजा बनाते है। इस सहजीवन में कवकीय सहजीवी मृदा से फॉस्फोरस का अवशोषण कर उसे पादपों में भेज देते है। ऐसे संबंधो से युक्ति पादप कई अन्य लाभ जैसे मूलवातोढ़ रोेग जनक के प्रति प्रतिरोधकता लवणता तथा सूखे के प्रति सहनशीलता तथा कुल वृद्धि तथा विकास प्रदर्शित करते है।

सायनोबैक्टीरिया स्वपोषित सूक्ष्म जीव है, जो जलीय तथा स्थलीय वायुमंडल में विस्तृत रूप से पाए जाते है। इनमें बहुत से वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर सकते है। जैसे-एनाबीना, नॉसटॉक, ऑसिलेटोरिया आदि। धान के खेत में सायनोबैक्टीरिया महत्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते है। नील हरित शैवाल भी मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ा देते है।

विभिन्न प्रकार के जैव उर्वरक-
1. राइजोबियम
2. एजोटो बैक्टर
3. एजोला
4. नील हरित शैवाल
5. एजोस्पाइरिलम
6. फॉस्फेट धुलनशील सूक्ष्मजीव (पी.एस.बी.)
7. एक्टिनोराइजा
8. माइकोराइजा

1 राजोबियम-राजोबियम सहजीवी सूक्ष्म जीवाणु है, जो लेग्युमिनेसी कुल के पौधों की जड़ों में राइजोबियम नामक ग्राम निगेटीव बैक्टीरिया पाया जाता है, जो वातावरण में मुक्त नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदलकर भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करता है। इन जीवाणुओं का दलहनी फसलों के साथ सहजीवता का संबंध पाया जाता है। ये जीवाणु फसलो की जड़ो में गं्रथियाँ बनाते है एवं प्राकृतिक नत्रजन को स्थिर करते है। दलहन सहजीवता से लगभग 40 से 50 किलोग्राम नत्रजन प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष स्थिर होती है। अलग-अलग फसलों में राइजोबियम जीवाणु की अलग-अलग फसलों प्रजातियाँ पाई जाती है। अतः अलग-अलग जीवाणु कल्चर की आवश्यकता पड़ती है इनकी अलग-अलग प्रजातियाँ निम्न प्रकार है-

जीवाणु फसल में उपयोग
1. राइजोबियम मेलिलोटाई 1. रिजका, मेथी
2. राइजोबियम लेगुमिनोसेरम 2. मटर
3. राइजोबियम जपोनिकम 3. सोयाबीन
4. राइजोबियम फेसियोलाई 4. दाल वाली फसलें

2. एजोटोबैक्टर- यह स्वतंत्र रूप से रहने वाला सूक्ष्म व वायवीय जीवाणु होते है, जो बिना किसी सहजीवन के नाइट्रोजन का मुक्त रूप जैविक स्थिरीकरण करते है एजोटो बैक्टर अतिसूक्ष्म एवं हेटरोट्रोफिक जीवाणु है। बिना दाल वाली फसलों के लिए एजोटो बैक्टर उपयोग करते है और अनाज वाली फसलों में एजोटो बैक्टर का उपयोग किया जाता है, यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ-साथ पौधों के विकास में काम आने वाले पादप वृद्धि कारक हार्मोन (इण्डोल एसिटिक एसिड एवं जिब्रेलिक अम्ल) और कुछ एंटीबायोटिक्स का भी स्त्राव करते है। जिसका बीजो के अंकुरण पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। एवं जड़ों मे होने वाली बहुत सारी बीमारियों की रोकथाम होती है।

3. एजोला-एजोला टेरिडोफाइटा समूह की एक तैरती हुई फर्न है, सामान्यतः एजोला की पंखुडियों में एनाबिना नामक नील हरित काई के जाति का एक सूक्ष्म जीव होता है, जो सूर्य के प्रकाश में वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करता है और हरे खाद की तरह फसल को नाइट्रोजन की पूर्ति करता है। एजोला की विशेषता यह है कि यह अनुकूल वातावरण में 5 दिनों में ही दुगना बड़ा हो जाता है। यदि इसे पूरे वर्ष बढ़ने दिया जाए तो 300 टन से भी अधिक एजोला प्रति हैक्टेयर पैदा किया जा सकता है। यानी 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर प्राप्त।

4. नील हरित शैवाल- नील हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया) एक जीवाणु होता है जो प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा उत्पादन करते है। यहां जीवाणु के नीले रंग के कारण इसका नाम सायनों (यूनानी अर्थ नीला) पड़ा है। सायनों बैक्टीरिया विटामिन 12 ए ऑक्सिन और एस्कार्बिक अम्ल स्त्रावित करते है जो धान के पौधे में वृद्धि में सहायक होते है।
नील हरित शैवाल वायुमंडलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर धान के फसल को आंशिक मात्रा में नाइट्रोजन की पूर्ति करता है। यह जैविक खाद नाइट्रोजन मुक्त रसायन उर्वरक का सस्ता व सुलभ विकल्प है, जो धान की फसल को न सिर्फ 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर पूर्ति करता है।

5. एजोस्पाइरिलम- यह भी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला एक सूक्ष्म जीवाणु हैं जो गैर दलहनी पौधों के लिए लाभकारी होता हैं। यह सूक्ष्म जीवाणु भी जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ-साथ पादप वृद्धि कारक हार्मोन्स का स्त्राव करते है, जो अंकुरण से लेकर पौधे की वृद्धि तक में लाभकारी होते है।

6. फॉस्फेट धुलनशील सूक्ष्म जीव (पी.एस.बी.)-यह उन सूक्ष्म जीवों का समूह है, जो कि मृदा में उपस्थित अधुलनशील फास्फेट में परिवर्तित कर उर्वरक की कार्य क्षमता को बढ़ाता है। भूमि में दिया गया या उपलब्ध फास्फोरस पौधों को पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो पाता। इसके लिए फॉस्फोरस घोलक बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है। पीएसबी के प्रयोग से फॉस्फोरस तत्व को पौधे आसानी से ग्रहण कर लेते है। इसका प्रयोग करने से 10-20 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि होती है। और साथ ही साथ मिट्टी में अनुपलब्ध फास्फोरस के उपलब्ध अवस्था में आ जाने से 30-40 प्रतिशत फॉस्फोरस उर्वरक की बचत की जा सकती है।

7. एक्टिनोराइजा- एक्टिनोमाइसिट्स समूह के जीवाणु जो अदलहनी वृक्ष की जड़ों में गांठे बनाकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते है, एक्टिनोराइजा कहलाते है, फ्रन्किया इसका बहुत अच्छा उदाहरण है। फ्रन्किया 8 विभिन्न पादप कुलो की 280 से भी ज्यादा वृक्ष जातियों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है।

8. माइकोराइजा-आधुनिक युग में माइकोराइजा का जैविक खाद के रूप में उपयोग बहुतायत से किया जाता है। माइकोराइजा विशेषतः वेसीकूलर आरबसकर माइकोराइजा भूमि में फॉस्फोरस एवं अन्य लवणों की वृद्धि कर इन्हें पौधों को अधिक मात्रा में वृद्धि कर इन्हें उपलब्ध कराते है। माइकोराइजा को भूमि में इनोकूलेट (प्रवेश) कराया जाता है। जहाँ वे गुणन कर वृद्धि करते है तथा भूमि की उर्वरता बढ़ाते है।

जैव उर्वरकों की प्रयोग विधि- जैविक उर्वरकों चार विभिन्न तरीकों से खेती में प्रयोग किया जाता है-
बीच उपचार विधि-जैव उर्वरकों के प्रयोग की यह सर्वोत्तम विधि है। 1/2 लीटर पानी में लगभग 50 ग्राम गुड़ या गोंद मिलाकर उबाल लेते है। ठण्डा होने के बाद उसमें जैव उर्वरक (200 ग्राम) को अच्छी तरह मिलाकर घोल बना लेते है। इस घोल को 10 कि.ग्रा. बीज पर छिड़ककर अच्छी तरह मिला लेते है, जिससे प्रत्येक बीज पर इसकी परत चढ़ जाये। इसके उपरांत बीजों को छायादार जगह में सुखा लेते है। उपचारित बीजों की बुवाई सूखने के तुरन्त बाद कर लेनी चाहिए।

पौध जड़ उपचार विधिः- धान तथा सब्जी बीजों वाली फसलें जिनके पौधों की रोपाई की जाती है जैसे टमाटर फूलगोभी, पत्तागोभी, प्याज इत्यादि फसलों में पौधों की जड़ों को जैव उर्वरकों द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिए किसी चौडे व छिछले बर्तनों में 5-7 लीटर पानी में एक किलोग्राम एजोटो बैंक्टर व एक कि.ग्रा. पी.एस.बी. 250 ग्राम गुड़ के साथ मिलाकर घोल बना लेते है। इसके उपरान्त नर्सरी से पौधो, की उखाड़कर तथा जड़ों में मिट्टी साफ करने के पश्चात 50-100 पौधों को बंडल में बांधकर जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबो देते है।

कन्द उपचार-गन्ना, आलू, अदकर, घुइयां (अरबी) जैसे फसलों में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों को उपचारित किया जाता है । एक किलोग्राम एजोटो बैक्टर व एक कि.ग्रा. पी.एस.बी. जैव उर्वरकों को 20-30 लीटर घोल में मिला लेते है। इसके उपरान्त कन्दों को 10 मिनट तक डुबो देते है। इसके बाद तुरंत रोपाई कर देते है।

मृदा उपचार विधि- 5-10 किलोग्राम जैव उर्वरक व 70-100 कि.ग्रा. मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण तैयार करके रात भर छोड़ दें। इसके बाद अंतिम जुताई पर खेत में मिला देते है।Soil

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