पशुपालन

सेक्स सॉर्टेड सीमेन (Sex Sorted Semen): डेयरी एवं पशुपालन उद्योग में एक क्रांतिकारी तकनीक

डॉ. वर्षा रानी गिलहरे, डॉ नेहा साहू, डॉ गोविना देवांगन

प्रस्तावना : आधुनिक पशुपालन में उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नस्ल सुधार करने तथा किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए अनेक वैज्ञानिक तकनीकों का विकास किया गया है। कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) ऐसी ही एक महत्वपूर्ण तकनीक है जिसने पशुधन विकास के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इसी क्रम में “सेक्स सॉर्टेड सीमेन” या “लिंग-निर्धारित वीर्य” एक अत्याधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी है, जिसके माध्यम से पशुपालक अपनी आवश्यकता के अनुसार नर अथवा मादा बछड़े प्राप्त करने की संभावना को काफी हद तक बढ़ा सकते हैं। डेयरी उद्योग में सामान्यतः मादा बछियों की मांग अधिक होती है क्योंकि भविष्य में वे दूध उत्पादन करती हैं। दूसरी ओर, मांस उत्पादन या प्रजनन कार्यक्रमों में कुछ परिस्थितियों में नर संतानों की आवश्यकता हो सकती है। सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक पशुपालकों को इस दिशा में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करती है। यह तकनीक विश्व के अनेक देशों में सफलतापूर्वक अपनाई जा चुकी है और भारत में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसके माध्यम से डेयरी फार्मों की उत्पादकता बढ़ाने, अनावश्यक पशुओं की संख्या कम करने तथा बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त करने में सहायता मिल रही है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन क्या है?

सेक्स सॉर्टेड सीमेन वह वीर्य है जिसमें शुक्राणुओं को उनके द्वारा वहन किए जाने वाले गुणसूत्र (Chromosome) के आधार पर अलग किया जाता है। सामान्यतः प्रत्येक शुक्राणु में या तो X गुणसूत्र होता है या Y गुणसूत्र। X गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु को निषेचित करता है तो मादा (Female) संतान उत्पन्न होती है। Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु को निषेचित करता है तो नर (Male) संतान उत्पन्न होती है। सामान्य वीर्य में लगभग 50 प्रतिशत X और 50 प्रतिशत Y शुक्राणु होते हैं। इसलिए प्राकृतिक गर्भाधान अथवा साधारण कृत्रिम गर्भाधान में नर और मादा संतान होने की संभावना लगभग बराबर रहती है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक द्वारा X और Y शुक्राणुओं को अलग कर दिया जाता है। डेयरी उद्योग में मुख्यतः X-क्रोमोसोम युक्त शुक्राणुओं का उपयोग किया जाता है जिससे लगभग 90 प्रतिशत तक मादा बछिया प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है।

सेक्स सॉर्टिंग का वैज्ञानिक आधार

X और Y गुणसूत्र वाले शुक्राणुओं में डीएनए (DNA) की मात्रा समान नहीं होती। गाय एवं भैंस में X शुक्राणु में अधिक डीएनए होता है। Y शुक्राणु में अपेक्षाकृत कम डीएनए होता है। दोनों के बीच लगभग 3 से 4 प्रतिशत डीएनए का अंतर पाया जाता है। यही अंतर वैज्ञानिकों को दोनों प्रकार के शुक्राणुओं को अलग करने में मदद करता है। विशेष फ्लो साइटोमेट्री (Flow Cytometry) तकनीक द्वारा शुक्राणुओं की पहचान कर उन्हें अलग किया जाता है।

फ्लो साइटोमेट्री तकनीक : सेक्स सॉर्टेड सीमेन तैयार करने की सबसे अधिक प्रचलित तकनीक फ्लो साइटोमेट्री है। इस प्रक्रिया में निम्न चरण शामिल होते हैं-

  1. वीर्य संग्रह: उच्च गुणवत्ता वाले प्रजनन बैलों से वीर्य एकत्रित किया जाता है।
  2. रंगाई (Staining): शुक्राणुओं को विशेष फ्लोरोसेंट डाई से रंगा जाता है जो डीएनए से जुड़ जाती है।
  3. लेजर विश्लेषण: शुक्राणु एक-एक करके लेजर किरण के सामने से गुजरते हैं।
  4. डीएनए मापन: लेजर के प्रभाव से उत्पन्न फ्लोरोसेंस के आधार पर प्रत्येक शुक्राणु में मौजूद डीएनए की मात्रा मापी जाती है।
  5. पृथक्करण: कंप्यूटर नियंत्रित प्रणाली X और Y शुक्राणुओं की पहचान कर उन्हें अलग-अलग समूहों में विभाजित कर देती है।
  6. सीमेन प्रोसेसिंग: अलग किए गए शुक्राणुओं को संरक्षित कर स्ट्रॉ (Straw) में भरकर तरल नाइट्रोजन में संग्रहित किया जाता है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन का इतिहास : लिंग-निर्धारण तकनीक पर अनुसंधान कई दशकों से चल रहा था।

महत्वपूर्ण पड़ाव:

  • 1970 के दशक में शोध प्रारंभ।
  • 1980 के दशक में फ्लो साइटोमेट्री तकनीक विकसित हुई।
  • 1990 के दशक में व्यावसायिक उपयोग शुरू हुआ।
  • 2000 के बाद डेयरी उद्योग में बड़े पैमाने पर प्रयोग होने लगा।
  • वर्तमान में यह तकनीक विश्व के अधिकांश विकसित देशों में प्रचलित है।
  • भारत में भी राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) तथा विभिन्न सरकारी एवं निजी संस्थानों द्वारा इस तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन की आवश्यकता

  1. अधिक मादा बछियों का उत्पादन: डेयरी व्यवसाय में मादा पशुओं की आवश्यकता अधिक होती है क्योंकि वे दूध उत्पादन करती हैं।
  2. नस्ल सुधार: उच्च आनुवंशिक क्षमता वाली मादा संतानों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
  3. पशुधन प्रबंधन: अनावश्यक नर बछड़ों की संख्या कम की जा सकती है।
  4. आर्थिक लाभ: दूध उत्पादन बढ़ने से किसान की आय में वृद्धि होती है।
  5. संसाधनों का बेहतर उपयोग: चारा, पानी तथा अन्य संसाधनों का उपयोग अधिक उत्पादक पशुओं पर किया जा सकता है।

डेयरी उद्योग में महत्व : डेयरी उद्योग का मुख्य उद्देश्य दूध उत्पादन बढ़ाना है। यदि किसी फार्म में 100 गर्भाधान किए जाते हैं तब सामान्य सीमेन से लगभग 50 नर और लगभग 50 मादा बच्चा होने की संभावना होती है। जबकि सेक्स सॉर्टेड सीमेन से लगभग 90% तक मादा होने की संभावना होती है। इस प्रकार फार्म में दूध देने वाले पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सकती है।

भारत में सेक्स सॉर्टेड सीमेन : भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। भारत में गिर, साहिवाल, थारपारकर, हरियाणा, मुर्रा, भैंस, जर्सी क्रॉस, होल्स्टीन फ्रिजियन (HF) जैसी नस्लों के लिए सेक्स सॉर्टेड सीमेन उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को इस तकनीक का लाभ पहुंचाया जा रहा है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन के लाभ

  1. मादा बछियों की संख्या में वृद्धि: डेयरी फार्म के लिए सबसे बड़ा लाभ है।
  2. तेजी से झुंड विस्तार: कम समय में अधिक दूध देने वाले पशु प्राप्त होते हैं।
  3. आनुवंशिक सुधार: श्रेष्ठ बैलों की आनुवंशिक क्षमता का अधिक उपयोग।
  4. आर्थिक लाभ: भविष्य में अधिक दूध उत्पादन।
  5. पशु कल्याण: अनावश्यक नर बछड़ों की संख्या कम होती है।
  6. प्रबंधन में सुविधा: पशुधन की योजना बनाना आसान हो जाता है।
  7. संसाधनों की बचत: कम उत्पादक पशुओं पर खर्च कम होता है।
  8. पर्यावरणीय लाभ: कम संसाधनों में अधिक उत्पादन संभव होता है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन की सीमाएँ

  1. अधिक कीमत: यह सामान्य सीमेन की तुलना में महंगा होता है।
  2. कम गर्भधारण दर: कुछ परिस्थितियों में गर्भधारण प्रतिशत कम हो सकता है।
  3. विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता: कृत्रिम गर्भाधान करने वाले तकनीशियन को प्रशिक्षित होना चाहिए।
  4. समय पर गर्भाधान जरूरी: हीट डिटेक्शन में गलती होने पर सफलता कम हो सकती है।
  5. सीमित उपलब्धता: कुछ क्षेत्रों में अभी भी इसकी उपलब्धता कम है।

सेक्स सॉर्टेड सीमेन के उपयोग हेतु सावधानियाँ : ऐसे पशु का का चयन करे जिनमे प्रजनन संबंधी रोग न हों, पशु स्वस्थ और उचित आयु का हो, हीट पहचान आसानी से हो। सही समय पर गर्भाधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पशु को संतुलित आहार दिया जाना चाहिए। टीकाकरण और कृमिनाशन समय पर होना चाहिए।

किस पशु में अधिक उपयोगी?

सेक्स सॉर्टेड सीमेन विशेष रूप से हीफर (पहली बार गर्भधारण करने वाली बछिया), स्वस्थ गाय, उच्च उत्पादन वाली गाय, अच्छे प्रजनन इतिहास वाले पशु में अधिक प्रभावी माना जाता है:

सरकारी पहल : भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम चला रही हैं। नस्ल सुधार योजनाएँ लागू कर रही हैं। सेक्स सॉर्टेड सीमेन को प्रोत्साहित कर रही हैं। किसानों को सब्सिडी उपलब्ध करा रही हैं।

भविष्य की संभावनाएँ : आने वाले वर्षों में तकनीक और सस्ती होगी। सफलता दर बढ़ेगी। अधिक नस्लों के लिए उपलब्ध होगी। ग्रामीण क्षेत्रों तक इसकी पहुँच बढ़ेगी। जीनोमिक चयन (Genomic Selection) तथा उन्नत प्रजनन तकनीकों के साथ इसका संयोजन पशुधन विकास को नई दिशा देगा।

निष्कर्ष : सेक्स सॉर्टेड सीमेन आधुनिक पशुपालन विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह तकनीक डेयरी उद्योग में मादा बछियों की संख्या बढ़ाने, नस्ल सुधार को गति देने तथा किसानों की आय में वृद्धि करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है। यद्यपि इसकी लागत सामान्य सीमेन की तुलना में अधिक है और गर्भधारण दर कुछ कम हो सकती है, फिर भी दीर्घकालिक लाभ इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं। भारत जैसे दुग्ध उत्पादन प्रधान देश में सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, पशुधन की गुणवत्ता सुधारने तथा दूध उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उचित प्रशिक्षण, बेहतर प्रबंधन और सरकारी सहयोग के साथ यह तकनीक भविष्य में पशुपालन क्षेत्र की आधारशिला बन सकती है। इस प्रकार सेक्स सॉर्टेड सीमेन केवल एक प्रजनन तकनीक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पशुपालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है जो किसानों, डेयरी उद्योग और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था सभी के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है।

लेखक:
डॉ. वर्षा रानी गिलहरे (पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ)
डॉ. नेहा साहू (पशु चिकित्सा सहायक शल्यज्ञ)
डॉ. गोविना देवांगन (सहायक प्राध्यापक)

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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