पशुपालन

पशुओं में होने वाले थनैला रोग का आर्थिक महत्व, पारंपरिक उपचार एवं बचाव

श्वेता जैन एवं विनिता वासनिक

दुधारू पशुओं में थनैला एक बड़ा संक्रामक रोग है यह सामान्यतः अधिक दूध उत्पादन करने वाले पशुओं में देखा जाता है। इस रोग से ग्रसित पशु के दूध उत्पादन में कमी आती है, वसा की मात्रा प्रभावित होती है। कई बार रोग के कारण पशुओं के थन भी बेकार हो जाते हैं और पशु की दूध देने की क्षमता आंशिक या पूरी तरह से समाप्त हो जाती है। यह रोग भैंसों की अपेक्षा संकर गायों में मुख्यतः अधिक पाया जाता है।

थनैला आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि –

  1. इससे प्रभावित पशुओं का दूध उपयोग के लिए ठीक नहीं रहता एवं दूध को फेंकना पड़ता है। मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो थनों से दूध के जरिए कई संक्रामक रोगों के कारक जैसे क्षय रोग, संक्रामक गर्भपात/ब्रुसेलोसिस, पेट से संबंधित बीमारियों के कारक मनुष्य को प्रभावित या ग्रसित करते हैं। अतः जन स्वास्थ्य की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है।
  2. दूध का उत्पादन व वसा की मात्रा कम हो जाता है। इस तरह यह किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का एक बड़ा कारक है।
  3. थनैला से प्रभावित पशु का बाजार मूल्य कम हो जाता है।
  4. पशु चिकित्सा व सेवा में खर्च होता है तथा प्रभावित पशु की देखभाल के लिए अतिरिक्त श्रम व श्रमिक पर खर्च होता है।
    थनैला के मुख्य लक्षण – थन /अयन में सूजन, गर्माहट, दर्द होना, अयन का सख्त होना। दूध की गुणवत्ता में परिवर्तन जैसे- रंग में परिवर्तन, दूध फटा हुआ, पानी जैसा स्राव आदि। कई बार इस स्थिति का कोई लक्षण नहीं दिखता लेकिन पशु इससे प्रभावित होते हैं।

पारंपरिक पद्धति से उपचार –
घृतकुमारी/घीकवर/ एलोय वेरा – 250 ग्राम जेल
हल्दी – 50 ग्राम
चूना – 15 ग्राम
नींबू – 6 (वैकल्पिक)
तीनों को मिलाकर मिक्सर में या खरल में पीस लें, इस पेस्ट में पानी मिलाकर लेप की भांति बना लें। अयन या थनों को अच्छी तरह धो लें एवं प्रभावित थनों से दूध पूरी तरह निकाल लें। तैयार लेप को थनों पर लगाएँ। 1 दिन में 8 -10 बार 5 दिन तक लगाएं।

दो भाग आधा आधा नींबू प्रतिदिन तीन दिन तक खिलाएं। इस उपचार से सूजन व दर्द कम होगा हल्दी व एलोवेरा संक्रमण रोकने में सहायक है।

  • हर्बल स्प्रे का छिड़काव करें – घृतकुमारी, नीम या चाय के पेड़ का तेल (टी ट्री तेल) से बने हुए स्प्रे में जीवाणुरोधी, चिकनाहट एवं सुखदायक गुण होते हैं। ऐसे स्प्रे जीवाणुओं की संख्या घटाते हैं जिससे थनैला ग्रसित अयन सामान्य अवस्था में आते हैं ।
  • प्रभावित आयन की तेल मालिश करें – नीलगिरी, पिपरमेंट या अरंडी का तेल शोथनाशक होते हैं एवं रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं। इन तीनों की कुछ मात्रा/बूंदें सामान्य तेल जैसे- नारियल तेल में मिलाकर प्रभावित अयन में, दिन में दो बार धीरे-धीरे मालिश करने से थनैला में लाभ होता है, सूजन व दर्द कम होता है एवं अयन सामान्य अवस्था में आते हैं ।
  • पशु को शोथहारी औषधियाँ जैसे- हल्दी, लहसुन आदि खिलाएं; यह जीवाणु रोधी भी होती है – हल्दी, लहसुन आदि रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करते हैं और सूजन को कम करते हैं । अतः पशु के दाने में इन्हें मिलाकर खिलाना थनैला में लाभदायक है ।
  • ठंडी गर्म सेंक करना – प्रभावित अयन पर गरम सेंक करने से दुग्ध नलिकाएं खुलती हैं, दर्द कम होता है एवं अयन में दुग्ध बहाव ठीक होता है । गरम ठंडा सेंक करने से सूजन भी कम होती है एवं पशु को आराम मिलता है ।

थनैला से बचाव एवं रोकथाम के उपाय

  • गौशाला एवं दूध दोहन संबंधित स्वच्छता रखना- पशु के बाँधने की जगह/पशुशाला को साफ रखें क्योंकि थनों के मार्ग से संक्रमण फैल सकता है। दूध हमेशा स्वच्छ हाथों से दुहें। थनों व हाथों को दोहन के पहले व बाद मंे अच्छे से साफ करें। दोहन के पष्चात थनांे को एंटीसेप्टिक घोल में डुबोएं। इसके लिए आयोडीन, पोटेषियम परमेंग्नेट या कोई घरेलू हर्बल घोल का उपयोग कर सकते हैं। रोगग्रस्त पषु के थन का दूध सबसे अंत में दुहें।
  • दोहन का सही तरीका अपनाना- दूध के झाग या गीले हाथों से दोहन ना करें।
    – दोहन हमेशा सही विधि से करें।
    – हमेशा दूध का पूर्ण दोहन करें, थनों में दूध ना छोड़े।
    – थनों में चोट लगने से बचाव करें।
    – दोहन काल के अंत में गायों को सही विधि से सुखायंे।
  • पर्याप्त पोषक तत्व देना – संतुलित आहार एवं पोषक तत्व पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता दुरुस्त करते हैं । अतः पशुओं को संतुलित राशन देना चाहिए , जिसमें आवश्यक पोषक तत्व विटामिन ए, डी, ई एवं लवण जैसे जिंक एवं सेलेनियम आवश्यक रूप से शामिल हों ।
  • दूध की निरंतर जांच करना – थनैला से बचाव के लिए, पशुओं की निरंतर जांच/स्क्रीनिंग करनी चाहिए। इसके लिए सीएमटी (केलिफोर्निया मेस्टाइटिस टेस्ट) एक बहुत ही आसान तरीका है। यह थनैला की उस अवस्था की पहचान भी कर लेता है, जबकि लक्षण बहुत हल्के हों या बिल्कुल भी दिखाई न दें, लेकिन रोग की शुरुआत हो चुकी हो।

थनैला के प्रबंधन में बचाव एवं प्राकृतिक उपचार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । गौशाला एवं थनों की स्वच्छता, संपूर्ण पोषण, लगातार जांच और प्राकृतिक औषधियों के उपयोग से पशु के स्वास्थ्य में सुधार होता है और रोग की आशंका कम रहती है । इससे न केवल दुग्ध उत्पादन की लागत कम होती है, उसकी गुणवत्ता और बाजार मांग में वृद्धि होती है । तथा जन स्वास्थ्य की दृष्टि से यह भी उत्तम है क्योंकि इसमें एलोपेथिक जीवाणुरोधी औषधियाँ की उपस्थित नहीं होती, जो ए.एम.आर (एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंन्स) विकास को रोकती है ।

श्वेता जैन एवं विनिता वासनिक
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकऱ कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Related Articles

Back to top button