पशुपालन

पशु चिकित्सा में दवाओं के जिम्मेदार उपयोग हेतु पशुपालकों की जागरूकता एवं व्यवहार में बदलाव का महत्व

देवेश कुमार गिरी और दीपक कुमार कश्यप

पशुपालन क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, जहाँ पशुओं का स्वास्थ्य सीधे तौर पर उत्पादन, आय और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है। पशु आपदा या आर्थिक संकट में “सुरक्षा पूँजी” के रूप में काम आते हैं। पशुओं में रोगों की रोकथाम और उपचार हेतु दवाओं का उपयोग आवश्यक है । पशु चिकित्सा में दवाओं का जिम्मेदार उपयोग आधुनिक पशुपालन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। दवाओं के असामयिक, गलत मात्रा में या बिना विशेषज्ञ परामर्श के उपयोग से पशुओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और एंटीबायोटिक प्रतिरोध (AMR), दवा-अवशेष, उत्पादन हानि और पर्यावरणीय जोखिमजैसी गंभीर समस्या तेजी से फैलती है। विश्व स्तर पर AMR को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट माना जा रहा है, जो इंसानों और पशुओं दोनों के उपचार को चुनौतीपूर्ण बना देता है। ऐसे में दवाओं का सही उपयोग सुनिश्चित करने की सबसे प्रमुख कड़ी पशुपालक ही हैं, क्योंकि वे प्रतिदिन पशुओं की देखभाल करते हैं और बीमार होने पर प्रारंभिक उपचार का निर्णय भी अक्सर वे ही लेते हैं।

पशुपालकों की जागरूकता से यह सुनिश्चित होता है कि वे केवल प्रमाणित पशु चिकित्सक की सलाह पर दवा दें, पूरी खुराक और उपचार अवधि का पालन करें, तथा दवाओं के निकासी अवधि को समझकर उसका अनुपालन करें। इससे दूध, मांस और अंडों में दवा-अवशेष की समस्या कम होती है और उपभोक्ता स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है। साथ ही जिम्मेदार उपयोग से उपचार की लागत घटती है, पशुओं की मृत्यु दर कम होती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है।

व्यवहार परिवर्तन इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू है। केवल जानकारी प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है; व्यवहार में सुधार तभी आता है जब पशुपालक यह समझते हैं कि दवाओं का दुरुपयोग न सिर्फ उनके पशुओं के लिए, बल्कि उनके आर्थिक हित और समाज के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है। प्रशिक्षण, सरकारी नीतियाँ, पशु चिकित्सकों की सलाह और समुदाय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम व्यवहार परिवर्तन में सहायक साबित होते हैं।

दवाओं का जिम्मेदार उपयोग स्वास्थ्य प्रबंधन का एक समग्र दृष्टिकोण है, जिसमें पशुपालक, पशु चिकित्सक, सरकार और समाज सभी की भागीदारी आवश्यक है। यदि पशुपालक जागरूक हों और वैज्ञानिक पद्धति से दवाओं का उपयोग करें, तो पशुधन अधिक स्वस्थ रहेगा, खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी वैश्विक समस्या को भी प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकेगा।

1.पशु चिकित्सा में दवाओं की भूमिका और मौजूदा चुनौतियाँ

पशु चिकित्सा विज्ञान में दवाएँ रोग-नियंत्रण, उपचार, दर्द-निवारण और संक्रमण प्रबंधन के लिए एक अनिवार्य उपकरण हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कई समस्याएँ प्रचलित हैं—

  1. बिना चिकित्सक की सलाह स्वयं दवाएँ देना
  2. वायरल रोगों में भी एंटीबायोटिक देना
  3. एक ही दवा बार-बार देना
  4. अधूरी खुराक देना
  5. गलत दवा का गलत मात्रा में उपयोग
  6. दवाओं के बीच अंतर न जानना

ऐसी परिस्थितियाँ न केवल रोग को और बढ़ाती हैं, बल्कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध को जन्म देती हैं, जो भविष्य में दवाओं की प्रभावशीलता कम कर देता है।

  1. एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (AMR): वैश्विक संकट और इसका पशुपालन से संबंध

AMR का अर्थ है—सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि) का दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेना।

पशुपालन में AMR क्यों तेजी से फैल रहा है?

  • बिना चिकित्सकीय मार्गदर्शन के एंटीबायोटिक का भारी उपयोग
  • संक्रमण की वास्तविक प्रकृति को समझे बिना दवा का प्रयोग
  • अधूरी अवधि तक एंटीबायोटिक देना
  • पशुओं को स्वस्थ बनाने के लिए “रूटीन” या “प्रोफिलेक्टिक” एंटीबायोटिक
  • वृद्धि कारक (growth promoters) के रूप में एंटीबायोटिक का उपयोग

जागरूकता की अनुपस्थिति से क्या परिणाम होते हैं?

  • दवाएँ असर करना बंद कर देती हैं
  • उपचार लंबा और महंगा हो जाता है
  • गंभीर संक्रमण में मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है
  • मानवों में भी दवा-असफलता की संभावना बढ़ती है

AMR एक वन हेल्थ (One Health) समस्या है, इसलिए पशुपालकों की जागरूकता सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण में भी महत्वपूर्ण है।

  1. दवा-अवशेष (Drug Residues) और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव

जब पशुओं को दी गई दवाओं का एक हिस्सा उनके दूध, मांस या अंडों में रह जाता है, तो इन्हें दवा-अवशेष कहते हैं।

दवा-अवशेष के मुख्य कारण

  • withdrawal period का पालन न करना
  • दुग्ध या मांस का समय से पहले बाजार में भेज देना
  • दवा की मात्रा और प्रभाव को समझने में त्रुटि

इसके हानिकारक प्रभाव

  • उपभोक्ता स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
  • एलर्जी, दवाओं की प्रतिक्रिया और एंटीबायोटिक प्रतिरोध
  • खाद्य गुणवत्ता में गिरावट
  • निर्यात बाजारों में प्रतिबंध

जागरूकता का महत्व

जब पशुपालक withdrawal period को समझते हैं और उसका अनुपालन करते हैं, तभी उपभोक्ता को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण पशु उत्पाद मिलते हैं।

  1. पशु स्वास्थ्य और उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव

सही और जिम्मेदार दवा उपयोग सीधे पशुओं की सेहत को प्रभावित करता है।

  • उपचार जल्दी प्रभावी होता है
  • रोग की जटिलता कम होती है
  • पोषण और चयापचय क्रियाएँ बेहतर होती हैं
  • दुग्ध उत्पादन, वजन और प्रजनन दर बढ़ती है
  • रोग पुनरावृत्ति (recurrence) कम होती है

दूसरी ओर, गलत दवा उपयोग से बार-बार बीमारी, कमजोरी और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पशुपालक की आय घटती है।

  1. आर्थिक लाभ: जागरूकता का सीधा परिणाम

गलत दवा उपयोग पशुपालक के लिए एक छिपा हुआ आर्थिक नुकसान है।

  • दवाओं पर बार-बार खर्च
  • उपचार की अवधि लंबी
  • पशु उत्पादकता में कमी
  • बाजार मूल्य में गिरावट

इसके विपरीत, जागरूक पशुपालक—

  • सही दवा चुनते हैं
  • पूरी मात्रा का पालन करते हैं
  • चिकित्सक के निर्देश पर इलाज करते हैं
  • अनावश्यक खर्च से बचते हैं

इससे पशुपालन अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनता है।

  1. पर्यावरण संरक्षण और दवा उपयोग का प्रभाव

पशु दवाओं का एक हिस्सा पर्यावरण में प्रवेश कर जाता है—गोबर, मूत्र, धाराओं, नालियों और खेतों के माध्यम से।

इसके परिणाम

  • मिट्टी की सूक्ष्मजीव संरचना प्रभावित
  • जल प्रदूषण बढ़ता है
  • पर्यावरणीय बैक्टीरिया में भी प्रतिरोध विकसित
  • पारिस्थितिक असंतुलन

जागरूक पशुपालक दवा का जिम्मेदार उपयोग और अपशिष्ट का सुरक्षित निपटान अपनाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं।

  1. पशु चिकित्सक और पशुपालक के बीच बेहतर सहयोग

जब पशुपालक जानकारी रखते हैं—

  • वे उपचार में सक्रिय भागीदारी करते हैं
  • सही लक्षण बताते हैं
  • दवा का विवरण समझते हैं
  • समय पर निर्णय लेते हैं

इससे पशु चिकित्सक अधिक प्रभावी निदान और उपचार कर पाते हैं, और परिणामस्वरूप पूरी पशु-स्वास्थ्य प्रणाली बेहतर होती है।

  1. नीतिगत सहयोग और गुणवत्ता नियंत्रण

सरकार द्वारा लागू की गई कई योजनाएँ—AMR नियंत्रण कार्यक्रम, पशु दवा गुणवत्ता मानक, खाद्य सुरक्षा निर्देश—तभी प्रभावी होती हैं जब पशुपालक जागरूक हों।
उनकी जागरूकता इन कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन का मूल है।

  1. व्यवहार परिवर्तन: जागरूकता का वास्तविक परिणाम

जागरूकता तभी सफल होती है जब वह व्यवहार में लागू हो, इसलिए आवश्यकता है—

  • नियमित प्रशिक्षण
  • ग्राम स्तर पर जागरूकता अभियान
  • पशुओं के टीकाकरण, उपचार और रोग प्रबंधन की डायरियाँ रखना
  • दवाओं की खरीद और उपयोग का रिकॉर्ड रखना
  • “कम दवा–अधिक स्वच्छता” के सिद्धांत का अनुसरण

पशुपालकों का व्यवहार बदलने पर ही जिम्मेदार दवा उपयोग स्थायी रूप से संभव है।

निष्कर्ष

पशु चिकित्सा में दवाओं का जिम्मेदार उपयोग, पशुपालकों की जागरूकता और उनके व्यवहार परिवर्तन पर गहराई से निर्भर करता है। यह बदलाव केवल उपचार की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पशुपालन क्षेत्र की टिकाऊ प्रगति, उपभोक्ता सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा होता है। जागरूक और प्रशिक्षित पशुपालक वैज्ञानिक उपचार पद्धतियों को अपनाकर न केवल एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी वैश्विक समस्या को कम कर सकते हैं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले पशु-उत्पादों के उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अतः यह आवश्यक है कि प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान, नीति समर्थन और पशु-चिकित्सा सेवाओं तक आसान पहुँच सुनिश्चित की जाए, ताकि जिम्मेदार दवा-उपयोग को व्यवहार में परिवर्तित किया जा सके। जागरूक पशुपालक ही स्वस्थ पशुधन, सुरक्षित खाद्य प्रणाली और टिकाऊ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक आधारशिला हैं।

लेखक ;

देवेश कुमार गिरी और दीपक कुमार कश्यप
वेटरनरी पॉलिटेक्निक
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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