पशुपालन

आओ मिलकर बनाएँ – रेबीज मुक्त समाज

देवेश कुमार गिरी एवं  दीपक कुमार कश्यप

मानव सभ्यता के विकास में पशुओं की भूमिका अतुलनीय रही है। दूध, मांस, ऊन, चमड़ा और कृषि कार्यों में सहायता देने वाले पशु हमारी जीवनरेखा का हिस्सा हैं। लेकिन कभी-कभी यही पशु हमें गंभीर बीमारियों का शिकार बना सकते हैं। ऐसी ही एक बीमारी है रेबीज, जिसे हिंदी में जलातंक / हाइड्रोफोबिया भी कहा जाता है। प्राचीन भारत में इसे “पागल कुत्ते की बीमारी” के नाम से जाना जाता था। रेबीज एक ऐसी संक्रामक बीमारी है जो मनुष्य और जानवर दोनों को प्रभावित करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, रेबीज़ 150 से ज़्यादा देशों और क्षेत्रों, खासकर एशिया और अफ़्रीका में, एक गंभीर जन स्वास्थ्य समस्या है। यह एक वायरल, जूनोटिक, उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग है जिससे हर साल लगभग 59,000 से अधिक मौतें होती हैं, जिनमें से 40% मौतें 15 साल से कम उम्र के बच्चों की होती हैं। भारत में तो यह संख्या सबसे अधिक है, और हर वर्ष लगभग 20,000 से अधिक लोग रेबीज से मरते हैं। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि रेबीज का एक बार लक्षण प्रकट हो जाने के बाद कोई इलाज संभव नहीं है। फिर भी राहत की बात यह है कि यह बीमारी पूरी तरह से रोकथाम योग्य है। (Let’s build a rabies-free society together)

हर साल 28 सितंबर को, हम विश्व रेबीज दिवस के रूप में रेबीज की रोकथाम और रेबीज के संचरण को कम करने के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाते हैं। यह दिवस रेबीज की रोकथाम के बारे में जागरूकता बढ़ाने और इस भयावह बीमारी को हराने में हुई प्रगति को उजागर करने के लिए प्रतिवर्ष मनाया जाता है। 28 सितंबर, फ्रांसीसी रसायनज्ञ और सूक्ष्म जीवविज्ञानी लुई पाश्चर की पुण्यतिथि भी है, जिन्होंने पहला रेबीज टीका विकसित किया था। आज, सुरक्षित और प्रभावकारी पशु और मानव टीके उन महत्वपूर्ण उपकरणों में से हैं जो रेबीज से होने वाली मानव मृत्यु को समाप्त करने के लिए मौजूद हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH/OIE) ने लक्ष्य रखा है कि सन् 2030 तक विश्व से मानव रेबीज को समाप्त किया जाए। भारत भी इस वैश्विक पहल का हिस्सा है। रेबीज की प्रभावी रोकथाम में समुदायों की सफलता के लिए जागरूकता प्रमुख प्रेरक शक्ति है। यदि समाज स्तर पर हम सब मिलकर प्रयास करें, तो निश्चित ही हम रेबीज मुक्त समाज का निर्माण कर सकते हैं।

रेबीज क्या है?

रेबीज एक विषाणु (वायरस) जनित घातक रोग है, जो मुख्यतः संक्रमित पशुओं की लार से फैलता है। इसका कारण रेबीज विषाणु है, जो रबडोविरिडे परिवार से संबंधित है। जब कोई संक्रमित पशु किसी व्यक्ति को काटता है या नोचता है, तो उसकी लार में मौजूद वायरस घाव के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाता है। यह वायरस धीरे-धीरे तंत्रिकाओं के जरिए मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी  में मेरुदंड तक पहुँचता है। संक्रमण की इस प्रक्रिया में कुछ दिन से लेकर कई महीने तक का समय लग सकता है।

संक्रमण के प्रमुख मार्ग

 (क) काटने से (Bite Transmission)

  • संक्रमित कुत्ते, बिल्ली, बंदर या अन्य जानवर के काटने से सबसे ज्यादा संक्रमण होता है।
  • काटने के दौरान लार सीधे खून और नसों के संपर्क में आती है।
  • भारत में लगभग 90% से अधिक मामले कुत्ते के काटने से होते हैं।

(ख) नोचने या खुरचने से (Scratch Transmission)

  • अगर नाखून पर संक्रमित लार लगी हो और वह त्वचा को खुरच दे तो वायरस शरीर में प्रवेश कर सकता है।
  • छोटे खरोंच या खून निकलने वाले जख्म भी खतरनाक हो सकते हैं।

(ग) चाटने से (Licking Transmission)

  • अगर संक्रमित पशु खुले घाव, कटे-फटे हिस्से या मुँह/नाक/आँख की झिल्ली पर चाट ले, तो संक्रमण हो सकता है।
  • यह कम आम है, लेकिन जोखिमपूर्ण है।

(घ) एक पशु से दूसरे पशु में

  • संक्रमित कुत्ता या जंगली जानवर जब गाय-भैंस, बकरी या अन्य पालतू पशु को काट लेता है तो संक्रमण फैलता है। इसलिए किसान के पशु भी सुरक्षित नहीं हैं।

पशुओं में रेबीज के लक्षण

रेबीज का वायरस दिमाग और नसों पर असर डालता है। इसलिए पशुओं में व्यवहार, आवाज़, खाने-पीने और चलने-फिरने में बदलाव देखने को मिलता है। लक्षण शुरू होने के बाद आमतौर पर 4–7 दिनों के भीतर मृत्यु हो जाती है।

कुत्तों और बिल्लियों में लक्षण

(क) प्रारंभिक अवस्था (Prodromal Stage – 1 से 3 दिन)

  • स्वभाव अचानक बदल जाना (शांत कुत्ता आक्रामक हो सकता है, या हिंसक कुत्ता अचानक सुस्त पड़ सकता है)।
  • ज़्यादा चाटना, बेचैनी, भूख कम होना।
  • आवाज़ बदलना (भौंकने या म्याऊँ करने का स्वर भारी/अजीब हो जाना)।
  • अंधेरे कोनों में छिपना या इधर-उधर भटकना।

(ख) उग्र अवस्था (Furious Stage – 3 से 4 दिन)

  • बिना कारण हर चीज़ को काटना (लकड़ी, पत्थर, रस्सी, इंसान, दूसरे पशु)।
  • लगातार आक्रामक भौंकना।
  • जीभ बाहर निकालकर बार-बार मुँह से लार टपकना।
  • ज़्यादा दौड़ना, भागना और अचानक चिल्लाना।
  • आँखें लाल और डरावनी हो जाना।

(ग) लकवा अवस्था (Paralytic Stage – 2 से 4 दिन)

  • धीरे-धीरे शरीर ढीला पड़ना।
  • जबड़ा लटक जाना, मुँह से झाग निकलना।
  • पानी पीने और खाना निगलने में दिक्कत।
  • पीछे के पैर काम करना बंद कर देते हैं।
  • अंत में सांस रुकने से मृत्यु।

गाय, भैंस और अन्य पालतू पशुओं में लक्षण

(क) प्रारंभिक लक्षण

  • दूध देना अचानक कम हो जाना।
  • बार-बार ज़ोर से रंभाना।
  • खाने-पीने में परेशानी।
  • जीभ बार-बार बाहर निकालना और लार टपकाना।
  • बार-बार पूँछ हिलाना और बेचैनी दिखाना।

(ख) उग्र लक्षण

  • अचानक आक्रामक हो जाना (सींग मारना, रस्सी तोड़कर भागना)।
  • ज़मीन खोदना और बिना कारण हमला करना।
  • कभी-कभी मुँह में झाग और लार ज़्यादा निकलना।
  • पानी और खाना निगलने से डरना।

(ग) अंतिम लक्षण

  • चलने-फिरने में दिक्कत, पिछला हिस्सा लकवाग्रस्त होना।
  • बार-बार गिरना और उठ न पाना।
  • अंततः कुछ ही दिनों में मौत।

अन्य पशुओं में लक्षण

  • बकरी/भेड़ – अचानक बेचैनी, बार-बार मिमियाना, मुँह से लार आना, सींग से मारना।
  • घोड़े – अचानक डरना, दाँत पीसना, हिंसक व्यवहार, पानी से बचना।
  • सूअर – आक्रामक होना, लगातार चीखना, लकवा आना।

मनुष्यों में रेबीज के लक्षण

1. संक्रमण के बाद समय

रेबीज का वायरस शरीर में आने के बाद तुरंत लक्षण नहीं दिखाता। सामान्यतः 1 से 3 महीने बाद लक्षण शुरू होते हैं। कभी-कभी यह समय 4 दिन से लेकर 1-2 साल तक भी हो सकता है। काटने की जगह अगर चेहरे या गर्दन पर हो, तो लक्षण जल्दी दिखाई देंगे (क्योंकि दिमाग के पास है)।

2. बीमारी के चरण

(क) प्रारंभिक लक्षण (Prodromal Stage – 2 से 10 दिन)

  • काटने की जगह पर दर्द, जलन, खुजली या झनझनाहट
  • सामान्य बुखार, सिरदर्द और थकान।
  • चिड़चिड़ापन और नींद न आना।
  • शरीर में कमजोरी और बेचैनी।
    👉 किसान अक्सर इस अवस्था को सामान्य बुखार या घाव की तकलीफ समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

(ख) उग्र अवस्था (Excitative/Furious Stage – 2 से 7 दिन)

  • रोगी अचानक बेचैन, चिड़चिड़ा और डरपोक हो जाता है।
  • पानी से डरना (Hydrophobia) – पानी देखते ही गले और छाती में ऐंठन होने लगती है।
  • हवा से डरना (Aerophobia) – हल्की हवा लगते ही डर और ऐंठन होती है।
  • गले की मांसपेशियों में तेज़ दर्द और झटके।
  • मुँह से झाग और लगातार लार टपकना।
  • हल्की-सी आवाज़, रोशनी या हवा से रोगी घबरा जाता है।
  • बहुत बार मरीज हिंसक या असामान्य व्यवहार करने लगता है।

(ग) लकवा अवस्था (Paralytic Stage – 2 से 4 दिन)

  • शरीर के हिस्सों में धीरे-धीरे लकवा (Paralysis) आना शुरू हो जाता है।
  • बोलने, निगलने और सांस लेने में कठिनाई।
  • रोगी बिस्तर पर बेहोश या अर्ध-बेहोश हो जाता है।
  • अंत में सांस रुकने से मृत्यु हो जाती है।

अन्य सामान्य लक्षण

  • तेज़ प्यास लगना, लेकिन पानी न पी पाना।
  • भ्रम (Delirium) और डरावने सपने।
  • बार-बार चीखना या चिल्लाना।
  • तेज़ हृदय गति और पसीना आना।

एक बार जब रेबीज के लक्षण दिखने लगते हैं, तो मरीज़ को बचाना लगभग असंभव है।इसलिए इस बीमारी को “100% घातक रोग” कहा जाता है। लेकिन, काटने के तुरंत बाद अगर टीका लगाया जाए तो 100% बचाव संभव है

भारत में रेबीज की स्थिति

भारत दुनिया में सबसे अधिक रेबीज प्रभावित देशों में से एक है।

  • हर साल लगभग 20,000 लोग रेबीज से मरते हैं
  • लगभग 36% वैश्विक मौतें भारत में होती हैं
  • पीड़ितों में सबसे अधिक बच्चे और ग्रामीण क्षेत्र के लोग शामिल हैं।
  • गाँवों में जागरूकता की कमी और टीकाकरण की अनदेखी प्रमुख कारण है।

रोकथाम/ बचाव के उपाय

बचाव का सबसे बड़ा हथियार है:

    1. समय पर टीकाकरण (Vaccination)
    2. सही प्राथमिक उपचार (First Aid)
    3. जागरूकता और सावधानियाँ

पशुओं में बचाव

(क) पालतू कुत्ते और बिल्लियाँ

  • हर साल रेबीज का टीका (Anti-rabies vaccine) अवश्य लगाएँ।
  • पहली बार टीका 3 महीने की उम्र में और उसके बाद हर साल बूस्टर डोज़।
  • अगर गाँव में सामूहिक टीकाकरण अभियान हो तो अपने कुत्तों को ज़रूर ले जाएँ।

(ख) गाय, भैंस और अन्य पशु

  • जिन क्षेत्रों में रेबीज का खतरा ज़्यादा है, वहाँ पशुओं को भी रेबीज वैक्सीन लगाई जा सकती है।
  • संक्रमित पशु को तुरंत अलग रखें, दूध का उपयोग न करें और सूचना पशु चिकित्सक को दें।

(ग) आवारा और जंगली जानवर

  • गाँव में आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करें।
  • पशु विभाग के सहयोग से Stray Dog Control Program चलाएँ।
  • जंगली जानवरों (लोमड़ी, सियार, बंदर आदि) से पालतू पशुओं को सुरक्षित रखें।

मनुष्यों में बचाव

(क) प्राथमिक उपचार (First Aid after Bite/Scratch)

  1. काटने/खुरचने के तुरंत बाद घाव को 15 मिनट तक साबुन और बहते पानी से धोएँ
  2. घाव पर आयोडीन या स्पिरिट लगाएँ।
  3. घाव पर मिट्टी, हल्दी, तेल, मिर्च या झाड़-फूंक बिल्कुल न करें।
  4. घाव को ढकें नहीं, खुला छोड़ें और तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ।

(ख) टीकाकरण (Vaccination in Humans)

  1. काटने से पहले बचाव (Pre Exposure Prophylaxis):

जिन लोगों का जानवरों से रोज़ संपर्क होता है (जैसे किसान, पशु चिकित्सक, पशु पालक, पशु पकड़ने वाले कर्मचारी) उन्हें पहले से रेबीज का टीका लगवाना चाहिए।

  1. काटने के बाद टीका (Post Exposure Prophylaxis ):
    • यदि किसी भी जानवर ने काटा, नोचा या चाटा → तुरंत अस्पताल जाकर रेबीज वैक्सीन लगवाएँ।
    • ज़रूरत पड़ने पर Rabies Immunoglobulin (RIG/Anti-rabies serum) भी लगाया जाता है (गहरे या गंभीर घाव में)।
    • टीका पूरा कोर्स समय पर लगवाना बहुत ज़रूरी है (कभी बीच में न छोड़ें)।

पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) रेबीज़ के संपर्क में आने पर आपातकालीन प्रतिक्रिया है। यह वायरस को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में प्रवेश करने से रोकता है। एक अच्छी तरह से किया गया घाव जोखिम मूल्यांकन और पीईपी प्रोटोकॉल में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • किसी भी प्रकार के संपर्क के तुरंत बाद घाव को कम से कम 15 मिनट तक पानी और साबुन से अच्छी तरह धोना;
  • रेबीज वैक्सीन का एक कोर्स; और
  • यदि संकेत दिया जाए तो घाव में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन या मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का प्रशासन।

 

जोखिम की गंभीरता के आधार पर, पूर्ण पीईपी कोर्स के प्रशासन की सिफारिश इस प्रकार की जाती है:

संदिग्ध पागल जानवर के संपर्क की श्रेणियाँ एक्सपोजर के बाद प्रोफिलैक्सिस उपाय
श्रेणी I  – जानवरों को छूना या खिलाना, जानवरों द्वारा उनकी त्वचा को चाटना (कोई संपर्क नहीं) खुली त्वचा की सतहों को धोना, पीईपी का प्रयोग नहीं करना
श्रेणी II  – खुली त्वचा को कुतरना, मामूली खरोंच या बिना खून निकले घर्षण (एक्सपोज़र) घाव धोना और तत्काल टीकाकरण
श्रेणी III  – एकल या एकाधिक ट्रांसडर्मल काटने या खरोंच, जानवरों के चाटने से लार के साथ श्लेष्म झिल्ली या टूटी हुई त्वचा का संदूषण, चमगादड़ के साथ सीधे संपर्क के कारण जोखिम (गंभीर जोखिम) घाव धोना, तत्काल टीकाकरण और रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन/मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का प्रशासन

नोट: श्रेणी II और III के जोखिम के लिए मानव रेबीज टीकाकरण की आवश्यकता होती है।

सामुदायिक बचाव

  • गाँव में सामूहिक कुत्तों और बिल्लियों का टीकाकरण करवाएँ।
  • आवारा कुत्तों की नसबंदी (Sterilization) और संख्या नियंत्रण।
  • बच्चों को स्कूल और घर पर समझाएँ कि वे अजनबी कुत्तों या जानवरों के पास न जाएँ
  • पशु मेलों, हाट-बाज़ार और गाँव की चौपाल में रेबीज जागरूकता अभियान चलाएँ।
  • अगर किसी क्षेत्र में रेबीज का प्रकोप हो तो पशु विभाग और स्वास्थ्य विभाग को तुरंत सूचित करें।

सरकार और विभागों की भूमिका

  • भारत सरकार ने राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (National Rabies Control Programme – NRCP) शुरू किया है।
  • इसके अंतर्गत:
    • ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ़्त रेबीज टीकाकरण
    • आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रण।
    • जनजागरूकता अभियान।
श्रेणी क्या करें (Do’s) क्या न करें (Don’ts)
पालतू पशु और कुत्ते • कुत्तों/बिल्लियों का हर साल रेबीज टीका लगवाएँ।
• पिल्लों को 3 माह की उम्र में पहला टीका दें।
• गाय-भैंस को आवारा कुत्तों से बचाएँ।
• बीमार पशु को अलग रखें।
• टीकाकरण को हल्के में न लें।
• बीमार/संदिग्ध पशु का दूध-मांस उपयोग न करें।
• आवारा कुत्तों को बहुत पास से खाना न खिलाएँ।
काटने/खुरचने पर • घाव को तुरंत 15 मिनट तक साबुन-पानी से धोएँ।
• आयोडीन/स्पिरिट लगाएँ।
• तुरंत डॉक्टर से मिलकर पूरा टीका लगवाएँ।
• ज़रूरत पड़ने पर RIG लगवाएँ।
• घाव पर मिट्टी, तेल, हल्दी, राख या मिर्च न लगाएँ।
• झाड़-फूंक या घरेलू उपाय पर भरोसा न करें।
• “थोड़ा ही काटा है” सोचकर टीका में देर न करें।
बच्चे और परिवार • बच्चों को अजनबी कुत्तों/जानवरों से दूर रखें।
• स्कूल/गाँव में जागरूकता कार्यक्रम कराएँ।
• रोज़ जानवरों से जुड़े लोगों को Pre-exposure vaccine लगवाएँ।
• बच्चों को आवारा कुत्तों के साथ खेलने न दें।
• हिंसक या संदिग्ध पशु को पकड़ने की कोशिश न करें।
गाँव और समुदाय • पंचायत/पशुपालन विभाग के सहयोग से आवारा कुत्तों पर नियंत्रण करें।
• सालाना सामूहिक टीकाकरण अभियान चलाएँ।
• संदिग्ध पशु मिलने पर तुरंत सूचना दें।
• गाँव में जागरूकता पोस्टर और चौपाल बैठकें करें।
• रेबीज के मामले छिपाएँ नहीं।
• संक्रमित पशु को दूसरे गाँव/हाट-बाज़ार में न बेचें।

रेबीज जागरूकता – मुख्य संदेश और निष्कर्ष

मुख्य संदेश

  1. रेबीज 100% घातक है, लेकिन 100% रोके जाने योग्य है।
  2. इसका मुख्य स्रोत कुत्तों और अन्य जानवरों का काटना, नोचना या चाटना है।
  3. रेबीज का कोई इलाज नहीं है – केवल टीकाकरण और बचाव ही जीवन बचाता है।
  4. काटने या खुरचने पर सबसे पहला कदम है 15 मिनट तक साबुन और बहते पानी से घाव धोना
  5. काटने के बाद तुरंत डॉक्टर से मिलकर पूरा टीकाकरण कोर्स कराना ज़रूरी है।
  6. बच्चों को आवारा कुत्तों और जंगली जानवरों से दूर रखना चाहिए।
  7. हर किसान को अपने कुत्तों और पालतू पशुओं का हर साल टीकाकरण करवाना चाहिए।
  8. गाँव स्तर पर सामूहिक जागरूकता और टीकाकरण अभियान ही रेबीज को रोक सकते हैं।

निष्कर्ष

रेबीज का कोई इलाज नहीं है, लेकिन सावधानी और जागरूकता से इसे पूरी तरह से रोका जा सकता है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने परिवार, बच्चों और पशुओं को सुरक्षित रखें और समाज में जागरूकता फैलाएँ।इसके लिए आवश्यक है कि हम सभी व्यक्तिगत, सामाजिक और सरकारी स्तर पर मिलकर प्रयास करें। यदि हर किसान अपने कुत्तों और पालतू पशुओं का टीकाकरण कराए, हर नागरिक काटने पर तुरंत चिकित्सा ले, और गाँव-गाँव में जागरूकता फैले, तो निश्चित ही हम रेबीज को समाप्त कर सकते हैं।
आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें – “रेबीज मुक्त समाज बनाएँ, सुरक्षित भविष्य की राह अपनाएँ।”

लेखक :
देवेश कुमार गिरी एवं  दीपक कुमार कश्यप
वेटनरी पॉलिटेक्निक, दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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