

परिचयः कटहल एक महत्वपूर्ण उष्णकटिबंधीय फल है जो न केवल अपने बड़े आकार और अनोखे स्वाद के लिए जाना जाता है बल्कि अपने पोषण मूल्य और विविध उपयोगों के लिए भी जाना जाता है जो किसानों के लिए एक लाभदायक फसल है। कटहल को सब्जी और पके फल दोनों के रूप में खाया जाता है। यह मोरेसी परिवार से संबंधित है। कटहल का उदगम स्थान भारतवर्ष है। कटहल की खेती उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड छत्तीसगढ़ पश्चिम बंगाल केरल तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई भारतीय राज्यों में की जाती है। कटहल (Advanced technology of jackfruit cultivation)
पोषक तत्व
| पोषक तत्व प्रति 100 ग्राम | कच्चे फल | पके फल | बीज |
| नमी प्रतिशत | 84 | 84 | 84 |
| कार्बोहाइड्रेड | 9.4 | 9.4 | 9.4 |
| प्रोटीन | 2.6 | 2.6 | 2.6 |
| कुल खनिज पदार्थ | 0.9 | 0.8 | 1.2 |
| कैल्शियम मि.ग्रा. | 50 | 50 | 50 |
| फॉस्फोरस | 97 | 97 | 97 |
| लौह तत्व मि.ग्रा. | 1.5 | 1.5 | 1.5 |
| विटामिन ए आइ.यू. | 20-50 | 110-200 | 0 |
| थायमिन मि.ग्रा. | 0-3 | 30 | 17 |

कटहल के उपयोग
- कच्चे कटहल को सब्जी के रूप में पकाया जाता है। इसे विभिन्न मसालों और सब्जियों के साथ मिलाकर स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं।
- पका हुआ कटहल मीठा और स्वादिष्ट होता है जिसका उपयोग मिठाई जैसे कि हलवा और खीर बनाने में किया जाता है। पके फलों के बीज पकने के बाद खाने योग्य होते हैं और इनका दूधिया मीठा स्वाद के कारण अक्सर ब्राजील नट्स से तुलना की जाती है।
- कटहल में फाइबर की उच्च मात्रा होती है जो पाचन में सहायक होती है और कब्ज से राहत दिलाती है।
- कटहल में कैलोरी की मात्रा कम होती है लेकिन फाइबर की मात्रा उच्च होती है जिससे यह वजन घटाने में सहायक होता है।
जलवायुः कटहल उष्ण कटिबन्धीय फल हैं। इसे शुष्क तथा नम दोनों प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। इसकी बागवानी मैदानी भागों से लेकर समुद्र तल से लगभग 1000 मी ऊँचाई तक पहाड़ों पर की जा सकती है। इसके विकास के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे अच्छा है। पाला और अत्यधिक ठंड पौधे को नुकसान पहुंचा सकती है।
मिट्टीः इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है लेकिन गहरी दोमट तथा बलुई दोमट मिट्टी इसकी बागवानी के लिए सबसे उपयुक्त है। इसके लिए जल विकास का अच्छा प्रबंध होना आवश्यक है क्योंकि इनकी जड़े भूमि में अधिक पानी के जमाव को सहन नहीं कर सकती जिसके फलस्वरूप जल स्तर ऊपर उठने पर पौधे सूखने लगते हैं। अच्छी जल निकासी वाली दोमट या हल्की रेतीली-दोमट मिट्टी आदर्श है। मिट्टी का पीएच 6 से 7-5 के बीच होना चाहिए।
किस्में
- नरेंद्र कटहल-1
- कोहिमा कटहल पूर्वोत्तर भारत में लोकप्रिय
- सिंगापुर कटहल – जल्दी पकने वाली किस्म
- सबरी – बढ़िया स्वाद और आकार के लिए जाना जाता है
- स्वर्ण
- रुद्राक्षी – पुमेलो आकार का फल
- गोल्डन नगेट
- चम्पा – चम्पक जैसा स्वाद
- हज़ार – बहुत अधिक मात्रा में फल देने वाला
- गुलाबी – गुलाब की खुशबू वाली किस्म
प्रवर्धनः इसका प्रसारण अधिकतर बीज के द्वारा किया जाता है। इसका प्रसारण इनार्चिग और गूटी द्वारा भी सफल पाया गया है। कटहल के पौधे को पैच बडिंग या क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है। छोटानागपुर क्षेत्र में बडिंग के लिए फरवरी-मार्च तथा ग्राफ्टिग के लिए अक्टूबर-नवम्बर का महीना उचित पाया गया है।
पौधा रोपण एवं देखरेख : कटहल का पौधा आकार में बड़ा तथा अधिक फैलावदार होता है अत इसे 10×10 मी. की दूरी पर लगाया जाता है। जब ग्राफ्ट लगाए जाते हैं तो अंतराल 6 से 8 मीटर तक कम हो जाता है, पौध रोपण के लिए समुचित रेखांकन के बाद निर्धारित स्थान पर मई-जून के महीने में 1x1x1 मीटर आकार के गड्ढे तैयार किये जाते हैं। इन गड्डों को 15 दिन खुला रखने के बाद ऊपरी मिट्टी में 20-30 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद 1-2 कि.ग्रा. करंज की खली तथा 100 ग्रा. एन.पी. के. मिश्रण अच्छी तरह मिलाकर भर देना चाहिए। दीमक को नियंत्रित करने के लिए आप मिट्टी को क्लोरपाइरीफोस 20 ई.सी. से उपचारित कर सकते हैं। प्राकृतिक तरीकों के लिए आप नीम का तेल या अन्य प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग कर सकते हैं। जब गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह दब जाये तब उसके बीचो-बीच में पौधे के पिण्डी के आकार का गड्डा बनाकर पौधा लगा दें।
सिंचाईः नवजात पौधों को कुछ दिन तक बराबर पानी देते रहें। पौधा लगाने के बाद प्रारंभिक वर्ष में पौधों की गर्मियों में प्रति सप्ताह और जाड़े में 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। बड़े पेड़ों की गर्मी में 15 दिन और जाड़े में एक महीने के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए। नवम्बर-दिसम्बर माह में फूल आते हैं। इसलिए इस अवधि में सिंचाई नहीं करना चाहिए।
सधाई एवं कटाई-छंटाईः युवा कटहल के पेड़ों को उनके पहले वर्ष में छंटाई की आवश्यकता नहीं होती है। वसंत और गर्मियों के दौरान एक या दो बार शूट टिप सबसे ऊपर की कली को तोड़कर या काट कर छंटाई करें। इससे पार्श्व कलियों को फूटने में मदद मिलेगी और पेड़ अधिक कॉम्पैक्ट बनेगा। बिना छंटाई वाले पेड़ आमतौर पर एक मजबूत केंद्रीय तना विकसित करते हैं। पौधों में 3 वर्ष तक उचित ढांचा देने के लिए काट-छांट करना चाहिए ढांचा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तने पर 1.5-2.0 मी ऊँचाई तक किसी भी शाखा को नहीं निकलने देना चाहिए।
निकाई-गुड़ाईः निकाई-गुड़ाई करके पौधे के थाले साफ रखने चाहिए। बड़े पेड़ों के बागों की वर्ष में दो बार जुताई करनी चाहिए। कटहल के बाग में बरसात आदि में पानी बिल्कुल नहीं जमना चाहिए।
पुष्पण एवं फलनः कटहल एक मोनोसियस पौधा है जिसमें नर एवं मादा पुष्पक्रम (स्पाइक एक ही पेड़ पर परन्तु अलग-अलग स्थानों पर आते हैं। फल जनवरी-फरवरी से जून-जुलाई तक विकसित होते रहते हैं। इसी समय में फल के अंदर बीज कोया इत्यादि का विकास होता है और अंततः जून-जुलाई में फल पकने लगते हैं।
खाद एवं उर्वरकः कटहल के पेड़ में प्रत्येक वर्ष फलन होती है अतः अच्छी पैदावार के लिए पौधे को खाद एवं उर्वरक पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए। प्रत्येक पौधे को 20-25 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद 100 ग्रा. यूरिया 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 100 ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति वर्ष की दर से जुलाई माह में देना चाहिए। जब पौधे 10 वर्ष के हो जाये तब उसमें 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद 1 कि.ग्रा. यूरिया 2 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति वर्ष देते रहना चाहिए।
प्रमुख रोग
फल गलनः कटहल में कीट एवं रोग का प्रकोप बहुत कम होता है। इसमें लगने वाले प्रमुख रोग फल गलन है। यह रोग राइजोपस आर्टोकारपाई नामक कवक के कारण होता है। इसका प्रकोप फल की छोटी अवस्था में होता है। इसके कारण कटहल के फल सडकर गिरने लगते हैं इस बीमारी की रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 के 2 ग्राम प्रति लीटर में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए। कीटों में मिली बग एवं तना छेदक प्रमुख हैं।
प्रमुख कीट
मिली बगः यह कीट नवविकसित फल फूल और डंठलों से रस चूसता है जिससे फल झड़ जाते हैं। नियंत्रण हेतु क्लोरपायरीफॉस इमिडाक्लोप्रिड और बुप्रोफेज़िन शामिल हैं।
तना छेदकः यह कीट तने को छेदकर आंतरिक जीवित ऊतकों को नष्ट करता है जिससे शाखाएं सूखने लगती हैं। नियंत्रण के लिए छेद में रुई द्वारा मिट्टी के तेल अथवा क्लोरोपायरीफॉस भरें और मिट्टी से बंद करें।
तुड़ाईः कटहल की कटाई में काफी अंतर होता है जो इस बात पर निर्भर करता है कि फल को पका हुआ खाया जाना है या कच्चा (सब्जी के रूप में पके हुए कटहल की कटाई तब की जाती है जब उसका छिलका नरम हो डंठलदार पत्तियां पीली हों तथा उसमें से मीठी सुगंधित गंध निकलती हो। पाककला में उपयोग के लिए कच्चे कटहल की कटाई तब की जाती है जब उसका छिलका सख्त हो कांटे अच्छी तरह विकसित हों और एक दूसरे से दूरी पर हों तथा फल का गूदा हल्का पीला और कुरकुरा हो
परिपक्वता एवं उपजः सामान्यतः फल पुष्पन के 100 से 120 दिन बाद तुड़ाई योग्य परिपक्वता प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में फल की डंठल कठोर हो जाती है बाह्य सतह के कांटे चपटे हो जाते हैं एवं छिलके का रंग गहरे हरे से हल्के पीले में परिवर्तित हो जाता है। साथ ही फल से विशिष्ट सुगंध निकलने लगती है तथा थपथपाने पर मद्धम ध्वनि उत्पन्न होती है जो उसकी परिपक्वता के प्रमुख संकेतक हैं। कटहल के पौधे सामान्यतः रोपण के 7-8 वर्षों बाद फल देना प्रारंभ करते हैं जबकि बौने अथवा कलमी पौधों में यह अवधि 4-5 वर्ष तक सीमित हो सकती है। पौधा लगभग 15 वर्षों में पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है। एक पूर्ण विकसित स्वस्थ वृक्ष से प्रति वर्ष औसतन 150 से 250 किलोग्राम तक फल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है बशर्ते समुचित कृषि प्रबंधन तकनीकों का पालन किया गया हो।
लेखक :
संस्कृति शुक्ला डॉ संगीता एवं लिशा तंबोली
पंडित किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र राजनांदगांव (छ.ग.)










