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जलवायु परिवर्तन में धान के उत्पादन द्वारा अधिक आय

उत्तम कुमार दिवान, दीपीका उंजन एवं डॉ. हर्षवर्धन पुराणिक

विश्व की बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन को देखते हुये दुनिया भर मे खाद्य उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत है। 2050 तक विश्व की आबादी लगभग 9.5 अरब हो जाएगी, जिसका स्पष्ट मतलब है कि हमें दो अरब अतिरिक्त लोगो के लिए 70 प्रतिशत अधिक खाद्यान्न उत्पन्न करना पड़ेगा। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक होगा कि हमे अपने खाद्य एवं कृषि प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और ज्यादा लचीला, उपजाऊ व टिकाऊ बनाएँ। इसके लिए कृषि मे प्राकृतिक संसाधनो का उचित उपयोग करते हुये खेती मे होने वाले नुकसान को कम करने के साथ ही कटाई उपरांत ढुलाई, भंडारण, पैकेजिंग, प्रसंस्करण एवं विपणन हेतु आवश्यक बुनियादी ढांचा मे सुधार करना होगा।

वर्तमान मे बढ़ते औद्योगिकीकरण एवं वाहनो की बढ़ती संख्या से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से वैश्विक तापमान मे वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाओ ने समस्त विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2001 इतिहास का पांचवा सबसे गरम वर्ष रहा। गरम पृथ्वी का सबसे ज्यादा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। भारत के संदर्भ मे देखा जाय तो यह बात ज्यादा ध्यान देने लायक है क्योंकि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। जलवायु मे होने वाला परिवर्तन हमारे राष्ट्रीय आय को प्रभावित कर रहा है। राष्ट्रिय आय मे कृषि का हिस्सा पिछले तीन-चार सालों में 1-5 प्रतिशत तक कम हुआ है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2009 में सूखे कि वजह से 20000 करोड़ रुपए के खाद्यान्नों का नुकसान हुआ है। एक अध्ययन अनुसार यदि तापमान में 1 से 4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो खाद्य पदार्थों के उत्पादन में 24 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। भारत में चावल के उत्पादन में तापमान बढ्नेसे 2020 तक 6 से 7 प्रतिशत की कमी होगी। भारत देश की जनसंख्या बढ्ने से सभी खाद्य पदार्थों की मांग में वृद्धि होगी परिणाम स्वरूप खाद्य संकट हमारे सामने एक भयंकर समस्या होगी।

1. जलवायु परिवर्तन का जल संसाधनों पर प्रभाव: जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव जल संसाधनों पर पड़ेगा। जल आपूर्ति की भंयकर समस्या उत्पन्न होगी तथासूखे व बाढ़ की आवृत्ती मे वृद्धि होगी। अर्धशुष्क क्षेत्रों में शुष्क मौसम अधिक लंबी अवधि का होगा जिससे फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वर्षा की अनियमितता भी फसलों के उत्पादन को प्रभावित करेगी तथा जल स्रोतों के अधिक दोहन से उनके अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगेगा। अधिक तापमान व वर्षा की कमी से सिंचाई हेतु भू-जल संसाधनों का अधिक दोहन किया जाएगा। जिससे धीरे-धीरे भू-जल का स्तर इतना ज्यादा नीचे चला जाएगा कि उसका दोहन करना आर्थिक दृष्टि से नुकसानदायक होगा जैसा कि पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत से स्थानो मे हो रहा है।

2. जलवायु परिवर्तन का कीट व रोगों पर प्रभाव: जलवायु परिवर्तन से किट व रोगों कि मात्रा बदेगी। गरम जलवायु किट पतंगो कि प्रजनन क्षमता कि वृद्धि के साथ ही उनके नियंत्रण हेतु अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाएगा जो पशुओं व इन्सानों में विविध प्रकार के रोगों को जन्म देगा।

3. जलवायु परिवर्तन का धान उत्पादन पर प्रभाव: जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित होगी वरन् उनकी गुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अनाज में पोषक तत्वों और प्रोटीन की कमी पाई जाएगी जिसके कारण संतुलित भोजन लेने पर भी मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा । हमारे देश के कुल फसल उत्पादन में 42.5 प्रतिशत हिस्सा धान की खेती का है। तापमान वृद्धि के साथ-साथ धान के उत्पादन में भी गिरावट आने लगेगी। अनुमान है कि 2◦ सेल्सियस तापमान वृद्धि से धान का उत्पादन 0.75 टन प्रति हैक्टर कम हो जाएगा। देश का पूर्वी हिस्सा धान उत्पादन में ज्यादा प्रभावित होगा। अनाज की मात्रा में कमी आ जाएगी। धान वर्षा आधारित फसल है इसलिए जलवायु परिवर्तन के साथ बाढ़ एवं सूखा की स्थितियाँ बढ्ने पर इस फसल का उत्पादन गेहूं कि तुलना मे ज्यादा प्रभावित होगा।

भारत देश का विश्व प्रसिद्ध बासमती चावल भी जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बच नहीं पाएगा। तापमान वृद्धि से इसकी खुशबू प्रभावित होगी। भारत में चावल विश्व की दूसरी सर्वाधिक क्षेत्रफल पर उगाई जाने वाली फसल है। विश्व में लगभग 15 करोड़ हैक्टर भूमि पर 45 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है जिसमें से भारत में  विश्व के कुल उत्पादन का बीस फीसदी चावल पैदा किया जाता हे। भारत में  4.2 करोड़ हैक्टर भूिम पर 9.2 करोड़ मीट्रिक टन चावल का उत्पादन किया जाता है । चावल भारत की सर्र्वािधक मात्रा में उत्पादित की जाने वाली फसल है। यहां लगभग 34 फीसदी भू-भाग पर मोटे अनाज की खेती की जाती है। भारत में चावल उत्पादक राज्यों  में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, तमिलनाडु कनार्टक, उडी़सा, असम तथा पंजाब है। यह दक्षिणी और पूर्वी भारत के राज्यों  का मुख्य भोजन है । लेिकन आने वाले समय में मासैम का तापमान बढ्ने से देशों में चावल को उगाना काफी मुिश्कल हो जाएगा इससे ग्लेाबल वॉर्मिंग के चलते 2030 तक देश में चावल सकंट आ सकता है ।

भारतीय कृषि पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के अनेक उपाय हैं जिनको अपनाकर हम कुछ हद तक जलवायु परितर्वन के प्रभावों से अपनी कृषि को बचा सकते हैं। प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं :.

भूमि की तैयारी: जिससे खेती का खर्च भी कम रहता है एवं मिट्टी की प्राकृतिक संरचना भी बनी रहती है जो कि भूसंरक्षरण एवं पर्यावरण बचाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। गर्मी में उपयुक्त समय मिलने पर खते की गहरी जतुाई मिट्टी पलट हल से अवश्य कर लंे गोबर या कम्पोस्ट की खाद 10 से 12 टन प्रति हैक्टर अंतिम  जुताई या वर्षा पूर्व खेत में फैलाकर मिलायें।

उन्नत किस्मों का उपयोग: जलवायु परिवतर्न के गम्भीर दूरगामी प्रभावों को देखते हएु ऐसे बीजों की किस्मों का विकास करना पड़ेगा जो नये मौसम के अनुकूल हों । हमें ऐसी किस्मों का विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे व बाढ़की विभिषिकाओं को सहन करने में सक्षम हो।
धान की खेती की प्रचलित पद्धतियाँ:
क. सीधे बीज बोने की पद्धतियां: खेत में सीधे बीज बोकर निम्न तरह से धान की खेती की जाती है-

  • छिटकवां बुवाई।
  • सीडड्रिल से कतारों में बुवाई।
  • बियासी पद्धति (छिटकवां विधि) से सवा गुना अधिक बीज बोकर बुवाई के एक महीने बाद फसल की पानी भरे खेत में हल्की जुताई।
  • लेही पद्धति (धान के बीजों को अंकुरित करके मचाई किये गये खेतों में सीधे छिटकवां विधि से बुवाई)

ख. रोपा विधि: इस विधि द्वारा पहले धान की पौध सीमित क्षेत्र में तैयार की जाती है तथा 25 से 30 दिन के पौध को खेत को मचाकर रोपाई की जाती है।

 

बीजोपचार: बीज को थायरम

या डायथेन एम 45 दवा के 2.5 से 3 ग्राम प्रति किला ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करके करें। बैक्टीरियल बीमारियों के बचाव के लिये बीजों को 0.02 प्रतिशत स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में डुबाकर उपचारित करना लाभप्रद होता है।
बुआई समय: वर्षा प्रारंभ होते ही धान की बुआई का कार्य प्रारंभ कर दें। जून मध्य से जुलाई प्रथम सप्ताह तक बोनी का समय सबसे उपयुक्त होता है। रोपाई के बीजों की बुवाई रोपणी में जून के प्रथम सप्ताह से ही सिंचाई के उपलब्ध स्थानों पर कर दें क्योंकि जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई मध्य तक की रोपाई से अच्छी पैदावार मिलती है।

खाद एवं उर्वरकों का उपयोग:
गोबर की खाद या कम्पोस्ट: धान की फसल में 5 से 10 टन/हैक्टर तक अच्छी सड़ी गोबर खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करने से महंगे उर्वरकों के उपयोग में बचत की जा सकती है। हर वर्ष इसकी पर्याप्त उपलब्धता न होने पर कम से कम एक वर्ष के अंतर से इसका उपयोग करना बहुत लाभप्रद होता है।

हरी खाद का उपयोग: रोपाई वाली धान में हरी खाद के उपयोग में सरलता होती है, क्योंकि मचाई करते समय इसे मिट्टी में आसानी से बिना अतिरिक्त व्यय के मिलाया जासकता है। हरी खाद के लिए ढैंचा का 50-60 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के एक महिना पहले बोना चाहिए। लगभग एक महीने की खडी ढैंचा की फसल को खेत मे मचाकर समय पर मिला देना चाहिए। यह 3-4 दिन मे सड़़ जाती है। ऐसा करने से लगभग 50-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरकों की बचत होती है।

जैव उर्वरकों का उपयोग: कतारों में बोने वाली धान में 500 ग्राम प्रति हैक्टर प्रत्येक एजोटोवेक्टर और पीएसबी जीवाणु उर्वरक का उपयोग करने से लगभग 15 किलोग्राम प्रति हैक्टर नत्रजन और फास्फोरस उर्वरक बचाए जा सकते हैं। इन दोनों जीवाणु उर्वरकों को 50 किलोग्राम/हैक्टर गोबर खाद में मिलाकर बवुाई करते समय कुडों में  डालने से इनका उचित लाभ मिलता है । सीधी बुवाई वाली धान में उगने के 20 दिनों  तथा रोपाई के 20 दिनों की अवस्था में 15 किलेागा्रम/हैक्टर हरी नीली काई (एल्गी) का बरुकाव करने से लगभग 20 किलोगेा्रम/हेक्टर नत्रजन उवर्रक की बचत की जा सकती है ध्यान रहे काई (एल्गी) का बुरकाव करते समय खेत  में पर्याप्त नमी या हल्की नमी की सतह रहनी चाहिए।

उर्वरकों का उपयोग: धान की फसल में उर्वरकों का उपयोग बोई जाने वाली प्रजाति के अनुसार करना चाहिए। भूमि परिक्षण द्वारा उर्वरकों की मात्रा का निधार्रण वांंछित उत्पादन के लिए किया जाना लाभप्रद हेागा। नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में बोनी/रोपाई के पूर्व खेत तैयार करते समय अथवा कीचड़ मचाते समय बुरकाव मिट्टी में मिलायें शेष नत्रजन की 1/4 मात्रा कल्ले फूटने की अवस्था में (रोपाई के 20 दिन बाद) तथा 1/4 मात्रा गभोट की अवस्था में दनेा चाहिए। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में खेत की तैयारी करते समय (बोनी पूर्व ) जिकं सल्फेट 25 किलेागा्रम/हैक्टर की दर से 3 साल में एक बार प्रयागे करें। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में गंधक युक्त उवर्रको (जसै सिगंल सुपर फास्फेट आदि) का प्रयाग करें।

जल प्रबंध: धान की फसल में जल प्रबंध का विशेष महत्व है। अधिक कल्ले प्राप्त करने हेतु नत्रजन की अधिक उपयाेिगता एवं नीदंा कम करने हेेतु उचित जल प्रबंध आवश्यक है। रापेाई से कल्ले निकलने की अवस्था तक खेत में पानी की सतह 2-5 सेमी. रखना चाहिए। कसंे निकलने के बाद से गभेाट की अवस्था तक 10-15 से. मी. पानी की सतह रखें । धान की फसल में आवश्यकता से अधिक पानी भरना अच्छी पदैावार प्राप्त करने में बाधक है । उन्नत सिंचाई साधनों के इस्तमेाल से किसान समय, श्रम व पानी की बचत कर सकता है आरै इससे पौधों का विकास भी बहेतर हातेा है। कतार (अल्टरनेट) सिंचाई फव्वारा सिंचाई (स्प्रिकंलर), टपका सिंचाई (ड्रिप) आदि सिंचाई विधियों का प्रयागे और फसल की कतारों के बीच अवरोध (मल्च) परत आदि तकनीकों का उपयागे करके सिंचाई करनी चाहिए। सीमित पानी की उपलब्धता के तहत वैकल्पिक फसल या फसल प्रणाली का प्रयागे करें। यद्यपि टपका एवं फव्वारा सिंचाई तकनीक महँगी हातेी है फिर भी पानी की बचत के दृिष्टकोण से इनका प्रयागे करना जरूरी है।

पौध संरक्षण: समेकित नाशी जीव प्रबंधन (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट) पौध संरक्षण की एक ऐसी प्रणाली है जिसमे जैविक, यांत्रिक और रासायनिक पद्धतियों से कीटों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। इसमे कीटों का सम्पूर्ण उन्मूलन करने का प्रयास नहीं किया जाता अपितु उन्हें इस स्तर पर रखा जाता है की वो नुकसान के न्यूनतम स्तर को पार न कर पायें। इस प्रणाली से कृषि पर खर्च भी कम होता है और पर्यावरण भी तुलात्मक रूप से सुरक्षित रहता है। इनके नियंत्रण के लिए स्वच्छ कृषि, परजीवी व शिकारी कीड़ों व कीड़ों को हानि पहुँचाने वाले फफूंदों व वायरस का प्रयोग किया जाता है।

समेकित कृषि प्रणाली: इस प्रकार की व्यवस्था में कृषि उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन, मछलीपालन, वानकी, रेशम-उत्पादन इत्यादि को भी सम्मिलित किया जाता है। जिससे प्रति ईकाई बेहतर उत्पादकता अर्जित की जा सकती है। समेकित कृषि से किसान की लाभप्रदता में वृद्धि होती है क्योंकि इसमे खाद और चारे का इंतजाम खरीद कर नहीं करना होता है क्योंकि यह किसान को अपनी कृषि क्रियाओं से ही प्राप्त हो जाता है। इस व्यवस्था के तहत कई तरह की फसलों को उगाने से और अन्य माध्यमों से किसान को संतुलित आहार प्राप्त होता है।

कटाई, छंटाई एवं भंड़ारण: सही समय पर कटी फसल सही तरीके से पक जाती है जिसका अच्छा बाजार मूल्य मिलता है आरै किसान की सुखाने आरै सरंक्षित करने की मेहनत आरै खर्च बच सकता है | अनुिचत भण्डारण कारणों से उत्पाद की गुणवत्ता कम हो जाती है और फलस्वरूप अच्छा बाजार मूल्य नहीं मिल पता। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन में कमी लाना एक वैश्विक मुद्दा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित अनुकूलन रणनीतियों को लागू करना जरूरी है। भारत को अपनी बढ़ती आबादी के लिए खाद्य/गैरखाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने पर्यावरण को बचाये रखने की जरूरत है। इसमे मृदा संरक्षण पर ज़ोर देने, प्रकृतिक संसाधनो के उचित उपयोग करने की आवश्यकता है, जिसमे वर्षा जल को संग्रहीत कर सिंचाई के रूप मे उपयोग भी शामिल है। टिकाऊ विकास के लिए जलवायु परिवर्तन पर केन्द्रित करी योजना काफी अहम है। ‘जलवायु-स्मार्ट प्रणाली’ में निवेश की आवश्यकता है, जो खाद्य सुरक्षा पर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए जरूरी है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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