छत्तीसगढ़ के (भौगोलिक संकेत) Geographical indication (GI) टैग प्राप्त उत्पाद और उनके हमारे दैनिक जीवन में महत्व


भौगोलिक संकेत (GI) टैग का अर्थ: GI का मतलब Geographical Indication यानी भौगोलिक संकेत होता है। GI टैग एक तरह से बताता है कि कोई उत्पाद मूल रूप से किस क्षेत्र से संबंधित है। GI टैग वाले उत्पादों को उसी स्थान पर मूलतः बनाया गया है। यह टैग किसी वस्तु की विशिष्टता बताता है।आसान शब्दों में, जीआई टैग बताता है कि किसी विशिष्ट उत्पाद का उत्पादन या बनाने का स्थान कहां है।
किसी क्षेत्र (देश, प्रदेश या नगर) के किसी व्यक्ति, समूह या संस्था को कृषि, प्राकृतिक, मशीनरी और मिठाई जैसे उत्पादों के लिए एक नाम या प्रतीक को भौगोलिक संकेत (GI) कहा जाता है।
यद्यपि, एक संरक्षित भौगोलिक संकेत धारक किसी दूसरे को इसी तकनीक से उत्पाद बनाने से नहीं रोक सकता। लेकिन नक़ल करने वाला व्यक्ति उसी संकेत का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। भारत में, GI टैग को साल 1999 के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम के तहत विनियमित किया जाता है । 15 सितंबर, 2003 को अधिनियम लागू हो गया।
भौगोलिक संकेत (GI) टैग के उद्देश्य:
भौगोलिक संकेत टैग का मुख्य उद्देश्य दूसरों द्वारा पंजीकृत भौगोलिक संकेत का गैरकानूनी उपयोग रोकना है। GI टैग के माध्यम से उत्पादन प्रक्रिया में नयापन लाने वाले लोगों को सुरक्षा मिलती है कि उनके उत्पाद की नकल कोई और व्यक्ति या संस्था नहीं करेगी। किसी क्षेत्र में उत्पादित सामग्री को पहचानने के लिए GI टैग एक संकेत या प्रतीक है। इस GI टैग से कृषि, प्राकृतिक और निर्मित सामग्री की अच्छी गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
जीआई टैग के लाभ:
- उत्पाद की गुणवत्ता और प्रतिष्ठा इस टैग से सुरक्षित रहती है।
- इस टैग का उद्देश्य, इन उत्पादों के उत्पादन क्षेत्रों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।
- यह टैग उत्पादकों को उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों पर अधिक भुगतान करने में मदद करता है।
- उत्पाद की पहचान इस टैग से मजबूत होती है।
छत्तीसगढ़ में GI टैग्ड उत्पाद निम्नलिखित हैं:
प्रदेश के 7 उत्पादों को GI टैग और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहचान मिली है। इनमें पांच हस्तशिल्प उत्पाद हैं: बस्तर ढोकरा या हस्तशिल्प, बस्तर ढोकरा (लोगो), बस्तर काष्ठ शिल्प, बस्तर लौह शिल्प और चांपा सिल्क साड़ी और कपड़े और दो कृषि उत्पाद: जीराफुल चावल और नगरी दुबराज चावल सम्मिलित हैं।
बस्तर ढोकरा शिल्प (Bastar Dhokra Art):
ढोकरा शिल्प छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रचीन शिल्पों में से एक है। ढोकरा शिल्प बस्तर अंचल की पहचान है जो न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जाना जाता है। बस्तर ढोकरा शिल्प का मूल आधार लोगों की धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं पर आधारित है क्योंकि वे देवताओं की मूर्तियाँ और पूजा के सामान, जैसे घंटियाँ, तेल के दीपक और धूपबत्ती बनाते हैं। बस्तर क्षेत्र के कई शिल्पकारों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पुरस्कार मिले हैं। प्रदेश में ढोकरा शिल्प से लगभग 2000 परिवार जुड़े हुए हैं। कलाकार कांस्य, पीतल, तांबा, जस्ता, रांगा (टीन) और अन्य धातुओं के मिश्रण को ढलाई करके मूर्तियाँ, बर्तन और दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले अन्य सामान बनाते हैं। बस्तर का एक महत्वपूर्ण आकर्षण ढोकरा कला है। वे घड़वा समुदाय द्वारा तैयार किए जाते हैं, इसलिए इसे घड़वा कला भी कहते घड़वा एक छोटे से कारीगर समूह हैं जो पीतल या बेल मेटल की वस्तुओं का निर्माण करते हैं।घड़वा नाम “घलना” शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है पिघलना और ये लोग खोई हुई मोम तकनीक का उपयोग करके धातु को पिघलाकर शिल्प उत्पाद बनाते हैं, इसलिए उन्हें “घड़वा” नाम दिया गया है, जिसका अर्थ है आकार देना और बनाना। इस प्रक्रिया में मधुमक्खी के मोम का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए इसे मोम क्षय प्रक्रिया (Vax Loss Process) भी कहा जाता है। मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त नृत्य करती हुई लड़की की प्रसिद्ध मूर्ति इस कला प्रौद्योगिकी का सबसे पुराना प्रतिनिधित्व है। 22 अप्रेल 2008 को बस्तर ढोकरा शिल्प को GI टैग मिला।
बस्तर काष्ठ शिल्प (Bastar Wooden Craft):
छत्तीसगढ़ राज्य में पर्याप्त वन संसाधन हैं, इसलिए कारीगरों के पास लकड़ी, कच्चा माल प्रचुर मात्रा में है। इन क्षेत्रों में साल, सागौन और अन्य लकड़ियाँ बहुतायत में हैं। सागौन (सागौन की लकड़ी), सियोना, शेषम, बीजा, हलदर, साजा, धवरा, महुआ, तेंदू, आंवला, कर्रा और बाँस भी अन्य किस्में हैं। बस्तर क्षेत्र की सबसे प्राचीन शिल्पकला में काष्ठकला भी शामिल है। बस्तर के प्रमुख जनजाति हैं अबूझमाड़िया, मुड़िया भतरा, हलबा और गोड़। ये जनजाति समुदाय काष्ठ से अलग-अलग कलाकृतियां बनाते रहे हैं। जिसमें देवताओं, मानव कलाकृतियों और जनजाति संस्कृति के चित्र शामिल हैं। काष्ठ कला में मुख्य रूप से लकड़ी के फर्नीचरों में बस्तर की संस्कृति, त्योहारों, जीव जंतुओं, देवी देवताओं की कलाकृतियाँ, देवी देवताओं की मूर्तियाँ और साज-सज्जा की कलाकृतियाँ बनाई जाती हैं। बांस कला में बांस की शीखों से कुर्सियां, बैठक, टेबल, टोकरियाँ, चटाई और घरेलू साज सज्जा की सामग्री बनाई जाती हैं। 22 अप्रेल 2008 को बस्तर काष्ठ शिल्प और बस्तर ढोकरा शिल्प को भी GI टैग दिया गया।

बस्तर लौह शिल्प (Bastar Iron Craft):
लौह शिल्प प्राचीन काल से विश्व भर में लोकप्रिय है। इस तरह के शिल्पों को हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता के समय भी देखा गया है। इससे अनुमान लगाया जाता है कि यह कलाकृती बहुत पुरानी है। प्रदेश के बस्तर क्षेत्र में भी यह शिल्प काफी लोकप्रिय है। बस्तर की धातु की मूर्तियाँ न केवल ढलाई की तकनीक के लिए अद्भुत हैं, बल्कि जीवन और उत्सव की सांसारिक अभिव्यक्ति भी हैं। बस्तर के आदिवासी समाज की नींव प्रकृति, लोक कला और शिल्प से मिलती है। बस्तर लौह शिल्पकारों की जीवंत रचनात्मकता, आविष्कारशीलता और कल्पना को दर्शाता है, जिन्होंने अपने लोकाचार की जीवन शैली को नियंत्रित करने वाली मूल धारणा और मूल अवधारणाओं को बनाए रखने की कोशिश की है। यहाँ के लोग इसे विभिन्न साज-सज्जा के सामान आदि बनाते हैं। जिनकी मांग देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है। यह स्पष्ट है कि आदिवासी पहले से ही धातुकर्मियों के रूप में प्रसिद्ध थे और यह प्रथा आज भी जारी है। ये जनजातीय कलाकार जीवन, प्रकृति और देवताओं को लोहे में चित्रित करने के लिए धातु की पुरानी विधियों का उपयोग करते हैं। उनके तरीके सरल हैं – मूल रूप से, धातु को ढलाई जाती है और फिर हथौड़े से पीटी जाती है, जिससे वांछित आकृति मिलती है। 10 जुलाई 2008 को बस्तर लौह शिल्प को GI टैग दिया गया।
चांपा सिल्क साड़ी एवं कपड़े (Champa Silk Saree & Fabrics):
चांपा सिल्क साड़ी और कपड़े, जिन्हें “कोसा सिल्क साड़ी” के नाम से भी जाना जाता है, उनकी शुद्धता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और विवाह, धार्मिक समारोहों और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। कोसा सिल्क उत्पादों में बुनाई और पेंटिंग में पारंपरिक आदिवासी डिजाइन, मंदिरों, धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों, जंगलों, पशुओं, पक्षियों और स्थानीय वनस्पतियों और जीवों का चित्रण बहुत अधिक दिखाया जाता है। यहाँ इसकी प्रोसेसिंग इंडस्ट्री भी है। इन्हें यहाँ से दुनिया भर में बेचते हैं और बहुत पसंद किए जाते हैं। यहां का कोसा सिल्क छत्तीसगढ़ के GI टैग्ड उत्पादों में से एक है। इसे बहुत अधिक देखभाल की जरूरत नहीं है और इसकी शाइन और चमक वर्षों तक बनी रहती है। भारत में इस तरह का टसर सिल्क आसानी से मिल सकता है। ओरिजनल कोसा सिल्क की साड़ियां और कपड़े दो हजार रुपये से लाखों रुपये तक खरीद सकते हैं। 4 अक्टूबर 2010 को चांपा सिल्क और साड़ी को GI टैग मिला।
बस्तर ढोकरा (लोगो):
छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध उत्पाद बस्तर ढोकरा हस्तशिल्प जो कि प्राचीन शिल्प में से एक है और यह बस्तरांचल की पहचान है। किसी भी उत्पाद के पहचान के लिए एक लोगो होता है जिसे देश विदेश में उत्पाद को ख्याति प्राप्त होती है। हमारे बस्तर ढोकरा शिल्प के लिए भी ऐसा ही एक लोगो बनाया गया, जिसे उसे राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जाना गया और इस लोगो को बस्तर ढोकरा लोगो का नाम दिया गया। बस्तर ढोकरा शिल्प के लोगो (LOGO) को भी GI टैग मिला हुआ है। 3 फरवरी 2014 को इसे GI टैग मिला।
जीराफूल चाँवल (Jeeraphool Rice):
जीराफूल एक सुगन्धित स्वदेशी धान की किस्म है जो सिर्फ छत्तीसगढ़ में उगाई जाती है। छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले की एक प्राचीन चावल की किस्म है, जिसमें विशेष गुण हैं और इसकी गुणवत्ता विशेष भौगोलिक स्थिति और विशिष्ट उत्पादन विधि पर निर्भर है। यह मूल रूप से उनकी परंपराओं के अनुसार खेती की जाती है और तुलनात्मक विचारधारा के साथ सरगुजा के निचले पहाड़ी इलाकों में विशेष रूप से तैयार धान के खेतों में शुद्धता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त देखभाल दी जाती है। जीराफूल छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ियों (यानी सरगुजा जिले) में पैदा होता है और यहीं तक सीमित रहता है, जिसकी फसल और मौसम की परिस्थितियां खाना पकाने और अन्य गुणों में नरमता के साथ-साथ इसकी उच्च सुगंध में बहुत महत्वपूर्ण हैं। जीराफूल धान को नमी वाले खेतों में कम समय में उगाया जा सकता है और अधिक पानी नहीं चाहिए। इस धान से निकलने वाले चावलों का नाम जीराफूल है क्योंकि वे जीरे के फूलों के समान बहुत छोटे होते हैं और बहुत स्वादिष्ट होते हैं। 14 मार्च 2019 को जीराफूल को GI टैग मिला।

नगरी दुबराज चावल (Nagari Dubraj Rice):
नगरी दुबराज चावल छत्तीसगढ़ राज्य की दूसरी फसल है जो जीआई (GI) टैग प्राप्त कर चुकी है। ‘मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह’, जिला धमतरी का नगरी दुबराज उत्पादक महिला स्व-सहायता समूह, को 26 मार्च 2023 को नगरी दुबराज हेतु जीआई टैग दिया गया है। 2019 में प्रदेश को जीराफूल धान की किस्म का जीआई टैग मिला था।नगरी दुबराज को छत्तीसगढ़ में बासमती चावल भी कहा जाता है क्योंकि इसे सुगंधित चावल के रूप में खाया जाता है।अक्टूबर 2021 में, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर ने दुबराज को जीआई टैग देने का प्रस्ताव भेजा था। डॉ. गिरीश चंदेल, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, ने बताया कि छोटे दाने वाले चावल पूरी तरह से देशी किस्म है। उन्होंने बताया कि चावल पकने के बाद खाने में बहुत मुलायम होता है। उन्होंने बताया, “एक एकड़ में अधिकतम छह क्विन्टल उपज मिलती है। यह धान कम ऊंचाई का होता है और 140 दिनों तक पक जाता है।”









