कृषि

ग्रामीण कृषि उद्यमिता में रोजगार की अपार संभावनाएँ

डॉ. सेवक अमृत ढेंगे व डॉ. अरविंद कुमार नंदनवार

भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित क्षेत्र पर केन्द्रित है I देखा जाए तो लगभग 70 प्रतिशत भारत की आबादी ग्रामीण क्षेत्र में जीवन यापन कर रही हैं और उनकी आजीविका का प्रमुख स्रोत कृषि और सबंधित क्षेत्र है I आजीविका के साथ-साथ कच्ची  सामग्री के लिए विभिन्न उद्योग कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं I पहले कृषक पारीवारीक आवश्यकतों की पूर्ति हेतु खेती करता था एवं बचे हुए उत्पादों को बाजार मे बेचकर आय प्राप्त करता था I लेकिन आज के समय मे कृषि को उद्यम के नजरिये से देखा जा रहा है I आधुनिक तकनीकों द्वारा विभन्न मोबाईल एप एवं पोर्टल के माध्यम से साथ विभिन्न शासकीय योजनाओ के तहत व्यापार के तौर पे कृषि की जा रही है I कृषि मे उच्च शिक्षित व्यक्तियों एवं कृषि मे रुचि रखनेवाले कृषकों द्वारा उन्नत तकनीकों से कृषि करके, कृषि आधारित उत्पाद को बढ़ाने के साथ साथ बेरोजगारों को रोजगार के अवसर प्रदान कर देश की आर्थिक विकास को दिन प्रतिदिन आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे है I साथ ही लघु, मध्यम एवं वृहद उद्यम निर्माण कर कृषि आधारित गतिविधयो द्वारा कृषिउद्यमिता को आगे बढ़ाया जाता है I जिसमे कृषि उत्पादों के उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिग, विपणन एवं परिवहन मे आसानी होती है I कृषिउद्यमिता कृषि गतिविधियो कों उद्यमशील गतिविधियो में परिवर्तित करती हैं I कृषिउद्यमिता के माध्यम से कई सामाजिक एवं आर्थिक विकास करने की उच्चतम क्षमता, विदेश मे निवेशकर्ता के लिए नए बाजार, साथ ही साथ बेरोजगारों के लिए रोजगार एवं  लोगों की ग़रीबी कों दूर करके उनका जीवन स्थर बढ़ाना, स्वास्थ, पोषण एवं खाद्य सुरक्षा में सुधार ही महत्वपूर्ण लक्ष्य है I आज के समय मे तो उद्यमशीलता पारिस्थितकी तंत्र की वैश्विक स्तर पर अपनाने के योगदान के लिए भारत देश की एक अहम भूमिका हैं I जो   भारत देश को वर्ष 2047 तक एक सबसे बढ़ी अर्थव्यवस्था वाला देश के साथ नवाचार और नवाचार आधारित बाजार निर्माण रूप मे विश्वभर मे विकसित भारत के नाम से जाना जाएगा I

कृषि उद्यमिता के महत्व

  • कृषि और बागवानी उत्पादों की विश्व स्तर पर पहचान निर्माण कराना
  • ग्रामीण क्षेत्र के लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों को विकास कराना
  • ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर निर्माण कराना
  • ग्रामीण युवाओं कों गांवों से शहरों की ओर प्रवास कों कम कराना
  • ग्रामीण युवाओं को ग्रामीण क्षेत्र में रहकर उद्यम के माध्यम से आय प्राप्त कराना
  • ग्रामीण क्षेत्र में औद्योगिक विकास कों बढ़ावा देना
  • खाद्य सुरक्षा कों बढ़ावा देना
  • भुखमरी को जड़ से समाप्त करना
  • शिक्षित एवं कुशल युवाओं की रचनामत्कता कों प्रोत्साहन देना
  • आधुनिक तकनीकों का कृषि क्षेत्र में शीघ्र से अतिशीघ्र प्रचार प्रसार कराना
  • कृषि क्षेत्र में विदेश निवेश के अवसर निर्माण कराना
  • राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उत्पादों की विक्री कराना
  • शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र में पोषणयुक्त उत्पादों की उपलब्धता कराना
  • प्रसंस्करण उत्पादो से अतिरिक्त आय में बढ़ोतरी कराना
  • आपूर्ति शृंखला का विकास कराना
  • लोगोंका जीवन स्तर बढ़ाने में मदद करना

 कृषिउद्यमिता के प्रकार

  • फसल उत्पादक: उपलब्ध संसाधनों जैसे आधुनिक प्रौद्योगिकी उपकरण, उच्च गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री (जैसे बीज, खाद आदि), और बाजारों की बढ़ती मांग कों देखकर व्यक्तिगत परिवार के स्तर पर व्यवसायिक रूप में उत्पादकता कों बढ़ाया जाता हैं।
  • सेवा प्रदाता: ग्रामीण स्तर पर कृषि व्यवसाय कों अनुकूलित करने के लिए विभिन्न प्रकार के  सेवाओं की समय समय पर आवश्यकता होती हैं। कृषि यंत्र कों किराये मे जैसे, ट्रैक्टर, स्प्रेयर, बुआईयंत्र, सीड ड्रिल, थ्रेशर, हार्वेस्टर, कृषि यंत्र आदि को दिए जाते है, उचित वैज्ञानिक तकनिकी सेवाए प्रदान करना जैसे टपक एवं फव्वारा सिंचाई सुविधायें स्थापित करना, खरपतवार का प्रबंधन करना, पौधों की सुरक्षा एवं देखभाल, फसल की उचित समय में कटाई, उत्पादो को  परिवहन एवं गोदामों का प्रबंधन करना। इनके आलावा पशु के स्वास्थ्य, आहार, टीकाकरण, बीमारी एवं उपचार आदि के लिय उचित सेवाए देकर आय प्राप्त करने के अवसर उपलध होते हैं।
  • सामग्री निर्माता: व्यवसायों को सफल एवं आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सामग्री की आवश्यकता होती हैं। इनमे कीटनाशक, मिट्टी सुधारक, जैव उर्वरक, वर्मीखाद, फलों, सब्जियों, सजावटी पौधों की विभिन्न प्रजातियों के पौधों का निर्माण, गमलों में पौधे कों उगाने के लिए रूट मिडिया, पशु चारा, कृषि उपकरण, सिंचाई सहायक उपकरणो आदि सामग्री का ग्रामीण स्तर पर निर्माण कर उद्यम विकसित कर सकते हैं।
  • कृषि उत्पाद का प्रसंस्करण और विपणन: कृषि उत्पाद का प्रसंस्करण और विपणन के प्रबंधन के लिए उच्च स्तर के ज्ञान के साथ-साथ निवेश की भी आवश्यकता होती है। इस प्रकार के उद्यम को जन संगठनों, सहकारी समितियों, सेवा संयुक्त कंपनियों का निर्माण के रूप में नियंत्रित किया जा सकता है। सबसे सफल उदाहरण डेयरी सहकारी, शुगर सहकारी, फल उत्पादक सहकारी समितियाँ आदि का नाम आगे आता हैं। इस तरह के सहकारी समितियों का निर्माण करके संयुक्त रूप से कृषि उत्पादों  का प्रसंस्करण करके  आसानी से बिक्री कर आय प्राप्त किया जाता हैं।
  • पौधे एवं फसल सुरक्षा तकनीकी : अच्छे उत्पादन के लिए रोगरहित पौधों एवं फसलों को  समय पर संरक्षण के लिए उच्चित जानकारी की आवश्कता होती हैं। कृषि में हर दिन नए नए तकनीको का विकास के साथ साथ कृषकजन उनका अपने खेता में बढ़े पैमाने में अंगीकरण कर रहे हैं। इसमें सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग कर समय पर कृषकों द्वारा उनकें समस्यायों का निराकरण किया जाता। इनमे मोबाइल एप्प, वैज्ञानिक प्रणाली, पोर्टल, मोबाईल के माध्यम से कृषि सलाह आदि का उपयोग करके समय पर पौधे एवं फसलों की उचित जानकारी साजा करके संरक्षण किया जाता हैं।
  • कृषि आपूर्ति श्रुखला प्रबंधन: उत्पाद निर्माण होने के बाद उसकी समय पर विक्री के लिए आवश्यक प्लेटफार्म होना चाहिए। इसकी मदद से ग्राहकों को उत्पादों की उपलब्धता एवं कीमत की जानकारी मिलती हैं। इससे उत्पादक अपने उत्पाद सही समय पर बिक्री कर सकते हैं। साथ ही व्यवसाय के लिए उत्पाद निर्माण हेतु आवश्यक गुणवत्तापूर्ण सामग्री एवं उनका निरंतर विश्वस्त स्त्रोत होना जरुरी हैं। इस हेतु अनेक कृषि उद्यमी आपूर्ति श्रुखला का प्रबंधन करते हैं। जिसमे थोक विक्रेता, फुटकर विक्रेता आदि उद्यम के अवसर की निर्मिती होती हैं। साथ ही ऑनलाइन से बिक्री करने के लिए ई-बाज़ार जैसे प्लेटफार्म तैयार करके उत्पादों की बिक्री की जा सकती हैं।

ग्रामीण कृषिउद्यमिता अवसर के विभिन्न क्षेत्र

  • मधुमक्खी पालन
  • बकरी पालन
  • कुक्कुट पालन
  • बद्दक पालन
  • बटेर पालन
  • सूअर पालन
  • मत्स पालन
  • झींगा पालन
  • रेशम उत्पादन एवं विपणन
  • फल, सब्जी एवं फलों की खेती
  • फल, सब्जी एवं फलों के प्रसंस्करण उत्पादों का निर्माण
  • वर्मी खाद निर्माण एवं विपणन
  • जैविक खाद निर्माण एवं विपणन
  • मशरूम उत्पादन
  • कृषि उपकरण विपणन
  • दुग्ध प्रसंस्करण उत्पाद निर्माण
  • वन उत्पाद निर्माण
  • मसाला एवं सगंध उत्पादन निर्माण एवं विपणन
  • जैविक कीटनाशक उत्पाद निर्माण एवं विपणन
  • कीटनाशक विपणन
  • कृषि परामर्श सेवाए
  • नर्सरी पौध उत्पादन एवं विपणन
  • बगीचा विकास एवं प्रबंधन
  • बीज उत्पादन एवं विपणन

कृषिउद्यमिता के लिए आवश्यक गुण और कौशल

  • आवश्यक गुण : एक सफल उद्यमी बनने के लिए आवश्यक गुणों का अपने भीतर विकास करना जरुरी होता हैं। उनके गुणों से उद्यमी एक अलग अपनी पहचान बना लेता हैं। रचनात्मकता, उच्च उपलब्धि की चाहत, अत्यधिक आशावादी, नवप्रवर्तक, समस्या का निपटारा करने की क्षमता, समय पर निर्णय लेने की क्षमता, उत्तम पारस्परिक कौशल, व्यवहारिकता, आत्मविश्वास, साहसी, निडर, जोखीम लेने की प्रवृति, स्वतंत्रता, स्वायत्तता, दृढ़ता, कुशल नेतृव, दूरदर्शिता, भावनात्मक स्थिरता, अच्छा आयोजक, बाजार जागरूकता, लक्ष्य निरधारण, अवसरों की पहचान, मजबूत सामाजिक नेटवर्क आदि गुण एक सफल उद्यमी में पाए जाते हैं।
  • आवश्यक कौशल: कृषिउद्यमिता का विकास के लिए कृषक एवं उद्यमी के पास उत्तम कृषिउद्यमिता कौशल होना जरुरी हैं। समय समय पर आवश्यक कौशल का विकास करना भी अति आवश्यक होता हैं। देखा जाए तो व्यवसाय कौशल, प्रबंधन कौशल में मानव संसाधन प्रबंधन कौशल, प्रसाशकिय कौशल, योजना कौशल, वित्तीय कौशल, उत्पाद रचना कौशल, विपणन कौशल, जोखिम प्रबंधन कौशल, योग्य रणनिति योजना प्रबंधन कौशल, देखरेक एवं मुल्यांकन  कौशल, योग्य एवं समय पर निर्णय लेने का कौशल, संकल्पना रचना कौशल, लक्ष्य निर्धारण कौशल, नेतृत्व कौशल, समूह में कार्य करने का कौशल, सादरीकरण कौशल, उत्तम संचार कौशल आदि जैसे उत्तम कौशल के मदद  से ही उद्यमी कृषिउद्यमिता का विकास करके अच्छी आय प्राप्त करता हैं एवं अपने उद्यम कों आगे लेकर जाता हैं।

कृषिउद्यमिता कों बढ़ावा देने हेतु विविध संस्थाए

कृषिउद्यमिता कों बढ़ावा देने हेतु भारत में राष्ट्रीय स्तर पर विविध संस्थानों की स्थापना  की गयी हैं। इस संस्थानों के माध्यम से कृषिउद्यमिता विकास हेतु समय समय पर इच्छुकों को प्रशिक्षण, कार्यशाला, शैक्षणिक गतिविधिया आदि का आयोजन किया जाता हैं।

  • राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी उद्यमिता विकास बोर्ड, नई दिल्ली
  • भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान, अहमदाबाद, गुजरात
  • भारतीय उद्यमिता संस्थान, गुवाहाटी, असम
  • राष्ट्रीय उद्यमिता और लघु व्यवसाय विकास संस्थान, नोयडा, उत्तर प्रदेश
  • राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान (मैनेज), हैदराबाद, तेलंगाना
  • राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (नार्म), हैदराबाद, तेलंगाना
  • राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), मुख्य कार्यालय,मुंबई
  • एग्री-क्लिनिक और एग्री-बिजनेस सेंटर, मैनेज, हैदराबाद (टोल फ्री क्र. १८००४२५ १५५६)

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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