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छत्तीसगढ़ बजट 2026-27 और कृषि क्षेत्र: राहत की राजनीति या टिकाऊ कृषि की ओर कदम

नीलम सिन्हा, कृषि अर्थशास्त्री एवं शोधार्थी,  कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय

छत्तीसगढ़ एक कृषि-प्रधान राज्य है, जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती और उससे जुड़े सहायक क्षेत्र हैं। राज्य की लगभग दो-तिहाई आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में राज्य का बजट केवल एक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका, कृषि संरचना और ग्रामीण विकास की दिशा तय करने वाला नीति-पत्र बन जाता है। वर्ष 2026-27 का छत्तीसगढ़ बजट, जिसे वित्त मंत्री ओ. पी. चौधरी ने प्रस्तुत किया, कृषि एवं सहायक क्षेत्रों के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाओं के साथ सामने आया है। सरकार ने इसे किसान-हितैषी बजट बताया है, किंतु एक कृषि अर्थशास्त्री के दृष्टिकोण से इसका विश्लेषण करना आवश्यक हो जाता है कि यह बजट तात्कालिक राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालिक कृषि परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है या नहीं।

धान-केन्द्रित समर्थन नीति: आय सुरक्षा या संरचनात्मक जड़ता

बजट का सबसे प्रमुख प्रावधान ‘कृषक उन्नति योजना’ के अंतर्गत धान की खरीदी पर ₹3,100 प्रति क्विंटल की दर सुनिश्चित करना है। अल्पकाल में यह निर्णय किसानों को नकद आय सुरक्षा प्रदान करता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में क्रय-शक्ति बढ़ती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह राशि कर्ज चुकाने और घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक बनती है।

परंतु अर्थशास्त्रीय दृष्टि से यह नीति कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है। छत्तीसगढ़ पहले से ही धान-प्रधान कृषि संरचना से जूझ रहा है। ऊँचा समर्थन मूल्य किसानों को फसल विविधीकरण की ओर प्रेरित करने के बजाय एक ही फसल पर निर्भर बनाए रखता है। इसका परिणाम जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव, मृदा स्वास्थ्य में गिरावट और दीर्घकालिक कृषि जोखिम के रूप में सामने आता है। इस दृष्टि से यह नीति आय सुरक्षा तो देती है, लेकिन कृषि संरचना को अधिक लचीला और टिकाऊ बनाने में सीमित भूमिका निभाती है।

सब्सिडी आधारित दृष्टिकोण: लागत में कमी, पर दक्षता पर प्रश्न

बजट में कृषि पंपों, विद्युत सहायता और ब्याज-मुक्त ऋण जैसी मदों पर बड़ा व्यय प्रस्तावित किया गया है। ये उपाय किसानों की उत्पादन लागत कम करने में सहायक हैं, किंतु यह पूरा ढाँचा मुख्यतः इनपुट-सब्सिडी आधारित है। कृषि अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि अत्यधिक सब्सिडी अल्पकालिक राहत तो देती है, परंतु दीर्घकाल में संसाधनों के कुशल उपयोग और उत्पादकता वृद्धि को सीमित कर देती है।

विशेष रूप से सिंचाई पंपों पर भारी निवेश, यदि जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई और फसल-जल अनुकूलता से नहीं जुड़ा हो, तो यह सतत कृषि के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। ऐसे में यह निवेश भविष्य में संसाधन संकट को और गहरा कर सकता है।

प्राकृतिक खेती: स्वीकार्यता तो है, प्राथमिकता नहीं

बजट में प्राकृतिक खेती का उल्लेख किया गया है, जो एक सकारात्मक संकेत है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती उत्पादन लागत और पर्यावरणीय क्षरण के संदर्भ में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक वैकल्पिक नहीं, बल्कि आवश्यक मॉडल बनती जा रही है। यह खेती किसानों की लागत घटाने के साथ-साथ जोखिम प्रबंधन में भी सहायक हो सकती है।

हालाँकि, इसके लिए सीमित बजटीय प्रावधान यह दर्शाते हैं कि सतत कृषि अभी भी नीति की प्राथमिकता सूची में पीछे है। यदि प्राकृतिक खेती को प्रशिक्षण, संक्रमण अवधि सहायता और बाजार प्रोत्साहन से जोड़ा जाए, तो यह किसानों की आय स्थिरता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

पशुपालन और सहायक क्षेत्र: आय विविधीकरण की अधूरी संभावना

कृषि अर्थशास्त्र में यह सर्वमान्य है कि पशुपालन, डेयरी और अन्य सहायक गतिविधियाँ किसानों की आय को स्थिर करने का सबसे प्रभावी साधन हैं। बजट में इन क्षेत्रों के लिए प्रावधान किए गए हैं, जो यह संकेत देते हैं कि सरकार कृषि के साथ-साथ सहायक क्षेत्रों को भी महत्व दे रही है।

परंतु इन क्षेत्रों को वास्तविक आय-स्रोत बनाने के लिए प्रसंस्करण, शीत भंडारण, मूल्य संवर्द्धन और बाजार संपर्क में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है। इन संरचनात्मक पहलुओं पर बजट में अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है, जिससे इन क्षेत्रों की संभावनाएँ पूरी तरह साकार नहीं हो पातीं।

 कृषि एवं सहायक क्षेत्रों के लिए बजटीय आवंटन (2026-27)

योजना / मद आवंटन (₹ करोड़)
कृषक उन्नति योजना 10,000
कृषि पंप एवं सिंचाई सहायता 5,500
अन्य कृषि योजनाएँ (मार्कफेड आदि) 6,000
भूमिहीन कृषि परिवार सहायता 600
ब्याज-मुक्त कृषि ऋण योजना 300
कुल कृषि एवं सहायक क्षेत्र ≈ 23,357

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुल कृषि आवंटन का बड़ा हिस्सा आय समर्थन और सब्सिडी आधारित योजनाओं पर केंद्रित है। संरचनात्मक निवेश—जैसे विपणन अवसंरचना, भंडारण, प्रसंस्करण और फसल विविधीकरण—के लिए पृथक और स्पष्ट प्रावधान अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देते हैं।

विपणन और जोखिम प्रबंधन: नीति की सबसे बड़ी कमी

कृषि अर्थशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है कि किसान की आय उत्पादन से नहीं, बल्कि बाजार से तय होती है। इसके बावजूद बजट में कृषि विपणन सुधार, कोल्ड स्टोरेज, ग्रामीण गोदाम और प्रसंस्करण इकाइयों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। इसके साथ ही जलवायु जोखिम, मौसम आधारित सलाह और कृषि तकनीक के उपयोग पर ठोस रणनीति का अभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है।

विशेष टिप्पणी

एक कृषि अर्थशास्त्री के रूप में मेरा मानना है कि छत्तीसगढ़ बजट 2026-27 किसानों को तात्कालिक आर्थिक राहत प्रदान करने में सफल है, किंतु कृषि क्षेत्र को दीर्घकालिक रूप से सशक्त और टिकाऊ बनाने की दिशा में यह अभी सीमित कदम ही उठाता है। समर्थन मूल्य और सब्सिडी आधारित उपाय अल्पकाल में लाभकारी हैं, परंतु कृषि विकास की स्थायित्व क्षमता फसल विविधीकरण, कृषि-सहायक क्षेत्रों के विस्तार, प्रभावी बाजार सुधार तथा सतत कृषि निवेश पर निर्भर करती है। यदि राज्य सरकार इन संरचनात्मक पहलुओं को नीति के केंद्र में लाने में सफल होती है, तो यही बजट आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत और दूरदर्शी आधार सिद्ध हो सकता है।

नीलम सिन्हा,
कृषि अर्थशास्त्री एवं शोधार्थी,
कृषि अर्थशास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय

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