फसलों में बीजोपचार करके, कम लागत में अधिक लाभ
डाॅ. प्रीति पैंकरा, डाॅ. भारती बघेल, डाॅ. सरिता शर्मा, डाॅ. संदीप भंडारकर, रेवेन्द्र सिंह वर्मा


बीजोपचार क्या हैः– बीजों के द्वारा कई प्रकार के रोगों एवं कीटों का वहन आगामी फसल में हो जाता है जिससे की हमारी उपज को बहुत नुकसान होता है। इस नुकसान को कम करने के लिए हमें बीजोपचार करना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो बीज बोने से पहले की जाती है ताकि फसल की बेहतर अंकुरण, रोगों से सुरक्षा और अच्छी पैदावार सुनिश्चित की जा सके।
बीज बोने से पहले उसे रासायनिक, जैविक या भौतिक पदार्थो से उपचारित करना ताकि बीज को मिट्टी एवं बीजजनित रोगों, कीटों तथा अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाया जा सके।
मुख्य उद्देश्यः-
1. बीजों को बीजजनित रोगों से सुरक्षा (जैसे- फफूंद, बैक्टीरिया, वायरस)।
2. मिट्टी जनित रोगों से बचाव।
3. बीज की अंकुरण दर की वृद्धि।
4. पौधों की प्रारंभिक वृद्धि में सुधार।
5. कीट एवं दीमक से सुरक्षा।
6. सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति।
7. नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायता (जब जैव उर्वरकों से उपचार हो)
8. विपरीत परिस्थितियों जैसे- सूखा, गर्मी आदि में अपने आप को प्रतिरोधी बनाते है।
इसलिये बीज उपचार में कई प्रकार के जैव उर्वरकों का प्रयोग भी फसल को विभिन्न पोषक तत्व प्रदान करने में सहायक होते हैं।
पुष्ट बीज का चयनः- स्वस्थ एवं पुष्ट बीज अच्छी फसल की प्राथमिक आवश्यकता है बीज उपचार के लिए सर्वप्रथम पुष्ट बीजों का चयन करें जो एक समान, रोग रहित चमकदार एवं सुडौल हो तथा उनमें टूट-फूट या अन्य पदार्थो का मिश्रण न हो। बीज की अंकुरण क्षमता भी 1000 दाने अंकुरित कर परखी गई हो। पुष्ट बीजों के चयन हेतु धान में 17 प्रतिशत नमक घोल उपचार किया जा सकता है जिसे 100 लीटर पानी में 17 किग्रा. नमक घोलकर तैयार किया जाता है इस घोल में धान के बीज डालने से स्वस्थ एवं पूर्ण भरे बीज तल में जमा हो जाते है। तथा शेष बीज तैरते रहते हैं। तैरते हुए बीजों को निकाल कर स्वस्थ बीजों को 3-4 बार साफ पानी में धो कर सूखा लें, इसके बाद फफूंदनाशक दवा से बीजोपचार करें।
बीजोपचार के प्रकारः-
1. रासायनिक बीजोपचार
- फफूंदनाशक
- थायरम 2.5-3 ग्राम/किग्रा बीज
- कार्बेन्डाजिम – 2-0.5 ग्राम/किग्रा बीज
- मैनकोजेब- 2.5ग्राम/किग्रा बीज
- कैप्टान- 2.5 ग्राम/किग्रा बीज
- कीटनाशक
- क्लोरोपाइरीफाॅस या इमिडाक्लोप्रिड- दीमक या रसचूसक कीटों से बचाव हेतु।
2. जैविक बीजोपचार
- राइजोबियम- दलहनी फसलों के लिए।
- एज़ोटोबैक्टर – गैर दलहनी फसलों के लिए।
- फाॅस्फेट घुलनशील जीवाणु – सभी फसलों में उपयोगी।
- क्रमः पहले रासायनिक उपचार -फिर जैविक उपचार (कम से कम 24 घंटे बाद)।
3. सूक्ष्म पोषक तत्वों से बीजोपचार
- जिंक सल्फेट , बोराॅन, मोलिब्डेनम आदि का हल्का घोल बनाकर बीज को उपचारित किया जाता है।ं
4. गर्म पानी या भौतिक बीजोपचार
- कुछ बीजजनित रोगों (जैसे- धान का झुलसा) से बचाव के लिए बीज को नियंत्रित तापमान के पानी में 10-30 मिनट तक रखा जाता है।
- गर्म हवा उपचारः- इसमें बीजों को गर्म हवा में रखा जाता है, जो कुछ रोगों को नियंत्रित करने में प्रभावी होता है।
बीज उपचार का सही क्रम
बीज उपचार के लिए एक निश्चित क्रम का पालन करना महत्वपूर्ण है।
1. कवकनाशी:- सबसे पहले कवकनाशी का उपयोग करें।
2. कीटनाशी:- उसके बाद कीटनाशी का उपयोग करें।
3. राइज़ोबियम कल्चर:- अंत में जैविक कल्चर का उपयोग करें।
बीजोपचार कैसे करें:- फफूंदनाशक दवा से बीजोपचार हेतु दो प्रकार के फफूंदनाशक दवाईयां उपयोग में लायी जाती है।
अदैहिक फफूंदनाशकः– इस दवाई के उपचार सेबीज की ऊपरी तह पर पाए जाने वाले रोग एवं कीटाणुओं को नष्ट किया जा सकता हैं
दैहिक फफूंदनाशक:- इस दवाई के उपचार से बीज के भीतर पर पाए जाने वाले रोगों व कीटाणुओं को नष्अ किया जा सकता है।
शुष्क बीजोपचार (ड्राय सीड ट्रटमेंट) बीजोपचार के लिये एक यंत्र होता है, जिसे बीज सम्मिश्रण यंत्र (सीड ट्रीटिंग ड्रम) कहते हैं। जितनी मात्रा में बीज का उपचारित करना हो, उसके लिये आवश्यक दवा की मात्रा लेकर बीज एवं दवा को ड्रम में डाल दें। ड्रम का मुँह अच्छी तरह सेबंद कर 10-15 मिनट तक अच्छभ् तरह से घुमाएं ताकि बीज पर दवाई की परत अच्छी तरह से चढ़ जाए। इसके बाद बीज को निकाल कर बुवाई करें। यदि बीज सम्मिश्रण यंत्र नहीं है, तो मिट्टी के घड़े /पाॅलीथीन (बैग) से भी बीजोपचार किया जा सकता है। आवश्यकतानुसार बीज एवं बीज दवाई एक दूसरे से अच्छी तरह मिल जाए तो बीज बोने में उपयोग करें। कुछ फसलों के बीजो की सतह चिकनी होती है ऐसे बीजों के उपचार के लिये कुछ खाने का तेल डालकर बीजोपचार सामग्री मिलाते है जिससे वह सतह पर चिपक जाती है।
बीजोपचार किससे करेंः- बीजोपचार में फफूँदनाशियों के साथ-साथ कीटनाशियों, जैव उर्वरकों एवं अन्य जैविक अदानों का भी प्रयोग किया जाता है जैसे- राईजोबियम, पीएसबी कल्चर, ट्रायकोडर्मा एवं स्यूडोमोनास आदि।
बीजोपचार कब करेंः- बीज उपचार फसल बोने के कुछ घण्टे पूर्व या रात्रि में कर सुबह बीज करें, दिन में बीजोपचार करने के बाद उपचारित बीजों को कुछ देर छाया एवं हवादार स्थान पर सूखाने के बाद बुवाई करनी चाहिये।
फसलों के कीट व्याधियों का बीजोपचार द्वारा नियंत्रण
| फसल | कीट व्याधि का नाम | नियंत्रण |
| धान | झुलसा, भूरा धब्बा फुटराॅक | बीज को कार्बेन्डज्ञजिम की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा. की दर से उपचारित करें। |
| पत्तियों का सफेद शिरा | बीज को 24 घंटे ठंडे पानी में भिगोकर रखें, तत्पश्चात 51-53 डिग्री से गर्म पानी में 15 मिनट तक रखें। | |
| जीवाणु पर्ण झुलसा व पर्ण रेखा रोग | बीज को 300 पी.पी.एम. स्टेप्टोसाइक्लिन मे 12 घंटे तक डुबोकर रखें। | |
| जीवाणु शीथ झुलसा | स्यूडोमोनास, फ्लूरेन्सिस 0.5 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 10 ग्राम/किग्रा.बीज की दर से प्रयोग करें। | |
| अन्य कीटों के लिए | क्लोरपायरीफाॅस 3 ग्राम/किग्रा. बीज का प्रयोग करें। | |
| गेहूँ | दीमक | बीजों को बोनी के पूर्व क्लोरपायरीफाॅस 4 मि.ली./ कि.ग्रा. से उपचारित करें। |
| कंडवा एवं विभिन्न स्मट | कार्बाक्सीन 1.5 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति कि.ग्रा. बीज ट्रायकोडर्मा विरडी 1.15 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 4 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। |
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| चना | उकठा, आर्द्र पतन | ट्रायकोडर्मा विरडी 1 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 9 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से तथा कार्बेन्डाजिम एवं कार्बोसल्फान 0.2 प्रतिशत का मिश्रण से बीजोपचार करें। |
| विभिन्न कीट | बीजो को क्लोरपायरीफाॅस 20 ई.सी. के 15 से 30 मिली. सक्रिय तत्व से प्रति कि.ग्रा. बीज का उपचार करें। | |
| मटर | उकठा, झुलसा, जड़गलन | ट्रायकोडर्मा प्रजाति प्रजाति 4ग्राम/कि.ग्रा. बीज |
| सूरजमुखी | बीज गलन | ट्रायकोडर्मा विरडी 6 ग्राम/कि.ग्रा. बीज |
| मूंगफली | बीज,काॅलर एवं मूल विगलन | कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशी की 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज को उपचारित करें। |
| आलू | पछेती अगमारी | डायथेन एम-45 या मेकोजेब की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर कंदो को उपचाारित करें। |
| ब्राउन राॅट | कंदो को 500 पीपीएम स्ट्रोप्टोसाइक्लिन घोल से उपचारित करें। | |
| सोयाबीन | बीज विगलन पौध अंगमारी एवं पत्ती धब्बा रोग | शुष्क बीजोपचार, थायर बाविस्टिन (2:1) की 2.5 ग्राम मात्रा द्वाराप्रति किग्रा. बींज |
| अरहर | उकठा (म्लानी) | थायरम बासिस्टिन (2:1) की 2.5.ग्रा. मात्रा द्वारा प्रति किग्रा. बींज ट्रायकोडर्मा प्रजाति 4 ग्राम/कि.ग्रा. बीज |
| गन्ना | लला विगलन | 0.5 प्रतिशत एगेलाल के घोल में गन्ने के टुकड़ो को 5 मिनट तक डुबोयें। |
| जड़ गलन, उकठा | कार्बेन्डाजिम (0.1 प्रतिशत) 2 ग्राम/कि.ग्रा. ट्रायकोडर्मा प्रजाति 4-6 ग्राम/कि.ग्रा. बीज |
सावधानियाः-
- बीजोपचार करने वाले व्यक्ति के हाथ में खरोंच या घाव आदि नहीं होना चाहिये, दवाएं जो एक प्रकार का जहर है, शरीर में प्रवेश कर नुकसान पहुँचा सकती है।
- बीजोपचार करने वाले व्यक्ति को हमेशा हाथ में छस्ताने तथा मुहँ नाक पर कपड़ा आदि लगाकर बीज उपचार करना चाहिए।
- बीजो को उपचारित करने के बाद गीली जगह पर नहीं रखना चाहिये तथा हमेशा छायादार स्थान पर सुखाना चाहिए न कि तेज धूप में।
- बीज की उतनी ही मात्रा उपचारित करना चाहिये जितने बीज की बुवाई उसी दिन संभव हो।
- उपचारित बीज को खाने के काम में नहीं लाना चाहिये।
- दलहनी फसलों के बीजों को पारायुक्त दवाओं से उपचारित नहीं करना चाहिये।
- बीजोपचार करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिये कि बीज पर दवा की परत ठीक से चढ़ जाये या उपचारित बीज पर दवा की पर्याप्त मात्रा हो।
- फफूंद नाशक दवाओं को बच्चों की पहुँच से दूर रखना चाहिये।
- उपयोग की गई दवाओं के डिब्बो, शीशियों कोकिसी अन्य उपयोग में नहीं लाना चाहिये, उन्हें गड्ढे में गाड़ देना चाहिये।
- बीजोपचार हमेशा खुली जगह पर करना चाहिये।
- यदि बीजोपचार करने वाली दवा पेट में चली गई हो तो प्रभावित व्यक्ति का पेट तुरन्त उल्टी कराकर खाली करा देना चाहिये तथा डाॅक्टर के पास चिकित्सा कराने के लिये ले जाने पर उन्हें दवा की सम्पूर्ण जानकारी देना चाहिये।
- बीजोपचार करने के बाद हाथ व मुंह को साबुन से, भरपुर पानी से धोना चाहिये।
- बीजों को सर्वप्रथम कवकनाशी इसके पश्चात कीटनाशी तथा अन्त में जैव उर्वरक या अन्य पदार्थो के क्रम में उपचारित करना चाहिये।
- जब बीजों को फफूँदनाशी या कीटनाशी से उपचारित करते हैं तो उर्वरक या कल्चर की मात्रा बीज उपचार हेतु दोगुनी कर देनी चाहिए।
बोनी के समय जैविक उर्वरकों से बीजोपचार
| फसल | जैविक उर्वरक | मात्रा (कि.ग्रा./हे.) |
| अरहर, चना मूंग, उड़द, मटर | राइजोबियम | 400-600 ग्रा. |
| मसूूर सोयाबीन | पी.एस.बी. | 1-2(कि.ग्रा.) |
| मूंगफली | राइजोबियम | 1-2(कि.ग्रा.) |
| अनाज फसलें | एजोटोबैक्टर | 1-2(कि.ग्रा.) |
| गेहूँ, जौ, ज्वार, बाजरा | पी.एस.बी. | 1-2(कि.ग्रा.) |
| मक्का , धान | एजोटोबैक्टर | 2-3(कि.ग्रा.) |
| तिलहन | एजोटोबैक्टर | 200 ग्रा. |
| सरसों, तिल | एजोटोबैक्टर | 500-800ग्रा. |
| सूरजमुखी | पी.एस.बी. | 1-2(कि.ग्रा.) |
आर्थिक महत्वः-
- विभिन्न फसलों में रासायनिक पदार्थो जैसे- कीटनाशक/खरपतवारनाशक/फफूंदीनाशक का उपयोग करने की तुलना में जैव रसायनों का प्रयोग करने से फसल उत्पादन की लागत में कमी आती है। रासायनिक कीटनाशको, फफूंदीनाशकों के उपयोग करने पर प्रति हेक्टेयर 700 से 900 रूपये की लागत आती है। जबकि जैव रसायन की लागत प्रति हेक्टेयर 90 रूपये तक आती है।
- रासायनिक कारकों पर खर्च कम होने से किसानों की लागत में कमी आती हे।
- मिट्टी के स्वास्थ्य सुधरने से दीर्घकालीन फसल उत्पादकता।
- बाह्य कारकों (इनपुट) पर निर्भर कम होने से किसान आत्मनिर्भर बनते हैं और उन्हें अपने स्वदेशी बीज और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने का बढ़ावा मिलता है।
अतः रासायनिक पदार्थो की जगह जैव रासायनिक पदार्थो को बीजोपचार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग किया जाए।
लेखक :
डाॅ. प्रीति पैंकरा (सहायक प्राध्यापक), डाॅ. भारती बघेल( सहायक प्राध्यापक ),
डाॅ. सरिता शर्मा(अतिथि शिक्षक), डाॅ. संदीप भंडारकर (अधिष्ठाता)
रेवेन्द्र सिंह वर्मा कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, ढोलिया बेमेतरा










