जायद मूंग (Mungbean)उत्पादन की उन्नत तकनीक एवं पोषक तत्व प्रबंधन
वोमेन्द्र मंडावी ,डॉ.एस.एस.पोर्ते वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं डॉ विनोद नायक


मूंग (Mungbean)ग्रीष्म कालीन एंव खरीफ दोनों मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। मूंग के दानों में प्रोटीन, विटामिन, खनिज व अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। मूंग का प्रयोग दाल, बड़ा, सांभर, इटली, बड़ी, पकोड़ा व अन्य खाद्य सामग्री बनाने के लिए होता है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ो में ग्रंथियां पाई जाती हैं, जो कि वायुमण्डलीय नत्रजन को मृदा में स्थिरीकरण (38-40 कि.ग्रा.नत्रजन प्रति हैक्टेयर) एवं फसल की खेत से कटाई उपरांत जड़ों एवं पत्त्तियों कें रूप में प्रति हैक्टेयर 1.5 टन जैविक पदार्थ भूमि में छोड़ा जाता है, जिससे भूमि में जैविक कार्बन का अनुरक्षण होता हैं एवं मृदा की उर्वराशक्ति बढ़ती है। इसकी खेती किसान भाईयों को रबी एवं खरीफ के मध्य के खाली समय में अतिरिक्त आय देने के साथ भूमि की उर्वरा शक्ति बनाये रखनें में भी सहायक हैं। गत वर्षो में वैज्ञानिकों ने अल्प अवधि की पीली चितेरी रोग रोधी प्रजातियॉ विकसित करने में सफलता प्राप्त की। इन प्रजातियों को विभिन्न फसल चक्रों में उगाया जा सकता है।
खेती की तैयारी:- ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिये रबी फसलों के कटने के तुरन्त बाद खेत की जुताई कर 4-5 दिन छोड़ कर पलेवा करना चाहिए। पलेवा के बाद 2-3 जुताईयॉ देशी हल या कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर खेत को समतल एंव भुर-भुरा बनावें, इससे उसमें नमी संरक्षित हो जाती है व बीजों से अच्छा अंकुरण मिलता है। अच्छे अंकुरण के लिये एक बेहतर भुर-भुरी मिट्टी की आवश्यकता होती हैं। वास्तव में खेत की तैयारी करते समय हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि बुआई के समय खेत खरपतवार मुक्त हों,भूमि में पर्याप्त नमी हो तथा मिट्टी इतनी भुर-भुरी हो जायें, ताकि बोआई आसानी से उचित गहराई तथा समान दूरी पर की जा सकें।
सिंचाई प्रबन्धन:- ग्रीष्म ऋतु में 10-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती हैं। मूॅग की फसल में फूल आने से पूर्व (30-35 दिन पर) तथा फल्लियों में दाना बनते समय (40-45 दिन पर) सिंचाई अत्यन्त आवश्यक हैं। तापमान एवं भूमि में नमी के अनुसार आवश्यकता होने पर अतिरिक्त सिंचाई देवें। फसल पकने के 15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिये।
खरपतवार नियंत्रण – मूंग के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार भी खेत में उगकर पोषक तत्वों, प्रकाश, नमी आदि के लिए फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। यदि समय पर इनका नियंत्रण नहीं किया गया तो मूंग की उपज में 40-60 प्रतिशत तक की कमी हो सकती हैं। फसल व खरपतवार की प्रतिस्पर्धा की क्रान्तिक अवस्था मूंग में प्रथम 30 से 35 दिनों तक रहती है। इसलिये प्रथम निंदाई-गुड़ाई 15-20 दिनों पर तथा द्वितीय 35-40 दिन पर करना चाहिये। कतारों में बोई गई फसल में व्हीलहो नामक यंत्र द्वारा यह कार्य आसानी से किया जा सकता है। नींदा नियंत्रण के लिये नींदानाशक रसायनों का छिड़काव करने से भी खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। रसायन के छिड़काव के लिये हमेशा फ्लैट फेन नोजल का ही उपयोग करें।
कीट नियंत्रण – मूंग की फसल में प्रमुख रूप से फली भृंग, हरा फुदका, माहू, तथा कम्बल कीट का प्रकोप होता हैं। पत्ती भक्षक कीटों के नियंत्रण हेतु क्विनालफास की 1.5 लीटर या मोनोक्रोटोफॉस की 750 मि.ली. तथा हरा फुदका, माहू एवं सफेद मक्खी जैसे रस चूसक कीटों के लिए डायमिथोएट 1.0 लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल.की 125 मि.ली. मात्रा को 600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हैक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना लाभप्रद रहता है।
रोग नियंत्रण – मूंग में अधिकतर पीत रोग, पर्णदाग तथा भभूतिया रोग प्रमुखतया आते हैं। इन रोगों की रोकथाम हेतु रोग निरोधक किस्में पंत मूंग-1, पंतमूंग -2, टी.जे.एम-3, जे.एम.721 आदि का उपयोग करना चाहियें। पीत रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता हैं। इसके नियंत्रण हेतु मेटासिस्टॉक्स 25 ईसी 750 से 1000 मिली. का 600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हैक्टेयर छिड़काव 2 बार 15 दिन के अंतराल पर करें। फफंूद जनित पर्णदाग (अल्टरनेरिया/सरकोस्पोरा/माइरोथीसियस) रोगों के नियंत्रण हेतु डाइथेन एम-45, 2.5 ग्राम/लीटर या कार्वान्डाज्मि एवं डाइथेन एम-45 की मिश्रित दवा बनाकर 0.2 ग्रा/लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार छिड़काव 12-15 दिनों बाद पुनः करें।
कटाई-गहराई – मूंग की फसल क्रमशः 65-70 दिन में पक जाती है। फरवरी-मार्च में बोई गई फसल मई में तैयार हो जाती है। फल्लियॉ पक कर हल्के भूरें रंग की अथवा काली होने पर कटाई योग्य हो जाती हैं। पौधे में फल्लियॉ असमान रूप से पकती है। यदि पौधे काी सभी फल्लियॉ के पकने की प्रतीक्षा की जाये तो ज्यादा पकी हुई फलियॉ चटकने लगती हैं। अतः फलियों की तुड़ाई हरे रंग से काला रंग होते ही 2-3 बार में करें बाद में फसल को पौधे के साथ काट लें। अपरिपक्वास्था में फल्लियों की कटाई करने से दानों की उपज एवं गुणवत्त्ता दोनों खराब हो जाते हैं। हॅसिए से काटकर खेत में एक दिन सुखाने के उपरान्त खलियान में लाकर सुखाते हैं। सुखाने के उपरान्त डंड़े से पीट कर या बैलों को चलाकर दाना अलग कर लेते है। वर्तमान में मूंग की थ्रेसिंग हेतु थ्रेसर का उपयोग कर गहाई कार्य किया जा सकता है। फल्लियां तोड़ने के बाद फसल को खेत में दबाने से फसल हरी खाद का काम करती हैं और खेत को मजबुती मिलती है।
उपज एवं भडारण – मूंग की खेती उन्नत तरीके से करने पर 8-10 क्विंटल/हैक्टेयर औसत उपज प्राप्त की जा सकती है।











