

मटर रबी (Pea) की एक प्रमुख दलहनी फसल है। देश भर में इसकी खेती व्यवसायिक रूप से सर्वाधिक की जाती है। मटर सर्दी के मौसम में उगाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल है। इसका वानस्पतिक नाम”पाइसम सटाईवम“ है तथा यह फेबिएसी कुल का सदस्य है। मटर का सब्जियों में महत्वपूर्ण स्थान है इसकी हरी फलिया सब्जी बनाने में और सुखी फलिया दाल बनाने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। मटर के पौधे की जड़ो में गाठ पाई जाती है इन गाठो में राइजोबियम जीवाणु पाए जाते है जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने का काम करते है जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। मटर का उपयोग एक मल्टी अनाज के रूप में किया जाता है इसके फलियों से निकलने वाले हरे दाने सब्जी के रूप में तथा सूखे दाने का प्रयोग सब्जी,दाल,सुप,बेसन इत्यादि भोज्य पदार्थ को तैयार करने में किया जाता है। आजकल मटर की डिब्बाबंदी भी काफी लोकप्रिय है जिससे दानो को डब्बे में परिरक्षित कर लम्बे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है।
पोषक महत्व- मटर में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाया जाता है। मटर में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट फास्फोरस रेशा पोटैशियम और विटामिन जैसे मुख्य पोषक तत्व पाए जाते है। इसमें प्रोटीन 22.5 प्रतिशत,कार्बोहाइड्रेट 62.1 प्रतिशत,कैल्सियम 64 प्रतिशत,आयरन 4.8 प्रतिशत,जल 72.1 प्रतिशत,वसा 1.8 प्रतिशत,खनिज लवण 0.8 प्रतिशत पाया जाता है ये सभी तत्व हमारे शरीर के लिए लाभदायक होते है।
मटर को अनेक प्रकार के नाशीकीट नुकसान पहुँचते हैै। मटर को नुकसान पहुंचने वाले प्रमुख नाशीकीटों में माहु,मटर पर्ण सुरंगक,मटर फली छेदक,छेदक इल्ली,मटर का घुन,दीमक इत्यादि किट हैैै। मटर का सफल उत्पादन प्राप्त करने के लिए इन नाशीकीटों का सही समय पर नियंत्रण करना बहुत ही आवश्यक हो जाता है।
माहु एफिड(बेवीकॉर्न ब्रेससिकी)- इस किट को माऊ,लाही,तेला,चेपा इत्यादि नामों से जाना जाता हैैै। यह ब्रोकली के अलावा सरसो,मूली,फूलगोभी,गांठगोभी,बंदगोभी इत्यादि फसलों को हानि पहुँचती हैैै। इस किट के शिशु या निम्फ तथा प्रौढ़ा या व्यस्क दोनों ही अवस्था हानि पहुंचते है। ये किट पौधो की जड़ो को छोड़कर अन्य सभी भागो का रस चूषते है। इसका सबसे अधिक प्रकोप पौधे के मुलायम भागो पर होता है जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है तथा पौधे पीले पड़कर सूखने लगते है। ये किट अपने शरीर से मधुस्राव निकलती है जिसमे काले कवक का आक्रमण भी होता है जिसके कारण जगह जगह काले धब्बे दिखाई देते है जिसके कारण उत्पादन में भरी गिरावट आ जाती है तथा उपज का बाजार मूल्य कम हो जाता है उपज में लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक नुकसान होता हैै।

नियंत्रण-
- पीले चिपचिपे गंध पास येलो इस्टिकी ट्रेप एक हेक्टेयर में 12 की दर से लगाए।
- 3 प्रतिशत नीम के तेल का छिड़काव 0.5 मिली लीटर टिपाल प्रति लीटर पानी के साथ मिलकर छिड़काव करे।
- किट प्रकोप की स्थिति में फसल पर एसिटामाईप्रिड 20 डब्लू.पी. 0.1 ग्राम या थायामीथाक्जाम 25 प्रतिशत डब्लू.जी. 0.25 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे।
छेदक इल्ली(हेलिकोवरपा आर्मिजरा)- यह किट सुंडी की अवस्था में क्षतिकारक होती है। प्रारम्भिक अवस्था में सुंडी कोमल पतियों को खाती है। जब ये बड़े जो जाते है और फल्लिया बनना प्रारम्भ हो जाती है तब ये इनके अंदर छिद्र बनाकर विकसित हो रहे दानो को खाती है। छोटी आकर की सुंडिया पूर्णरूप से फली के अंदर घुस जाती है और अंदर ही अंदर पुरे दाने को खाकर समाप्त कर देती है।
पहचान- इललियो के रंग में विभिन्ता पाई जाती है जो हल्के हरे रंग से लेकर लगभग काला रंग तक मिलती है पूर्ण विकसित सुंडी के ऊपरी ताल पर हल्का हरा तथा निचला ताल चमकदार सफेद होता है। प्रौढ़ का रंग हल्का भूरा होता है अगले पंखो पर गहरे धब्बे पाए जाते है तथा पिछले पंखो का बाहरी किनारा काला रंग का होता है।

नियंत्रण-
- गर्मी में गहरी जोताई करे।
- फसल चक्र अपनाये।
- अरहर में अंतर्वर्ती फसले जैसे ज्वार मक्का सोयाबीन मूंगफली को लेना चाहिए।
- इस किट के प्रबंधंन के लिए प्रकाश प्रपंच लगाना चाहिए।
- खेत में चिडियो के बैठने के लिए अंग्रेजी शब्द टी के आकर की खुटिया लगाए।
- इंडोक्सीकॉर्ब 14.5 ई.सी. 500 मिलीलीटर को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करे।
मटर पर्ण सुरंगक,लीफ माइनर(क्रोमाटोमीय हॉर्टिकोला)– यह एक विश्वव्यापी किट है जो लगभग सभी देशो में पाया जाता है जो मटर के अलावा मसूर बरसीम सूरजमुखी आलू बैंगन अलसी गोभी मूली पालक आदि फसलों को नुकसान पहुंचते है। इस किट की मैगट अवस्था ही क्षतिकारक होती है। जो प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों की मिजोफिल को खाते है तथा बाद में पत्तियों में टेढ़े मेढे सुरंग बनाकर पत्ती के हरित पदार्थ को खाते है जिससे पत्तिया सुख जाती है तथा फल फूल धारण क्षमता कम हो जाती है।
पहचान- मैगट छोटे और गुलाबी रंग के होते है तथा प्रौढ़ मख्खी छोटी और काले रंग की होती है तथा इसे पंख पारदर्शक होते है।

नियंत्रण-
- किट वाधित पत्तियों को किट सहित समय समय पर नष्ट करते रहने से किट प्रकोप कम हो जाता है।
- नीम के तेल का उपयोग करने से यह किट के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित करता है और मैगट की संख्या को कम करता है।
- ”डीगलायफस इसाइया“ एक लाभकारी ततैया जो के मैगट को परजीवीकृत करके नष्ट कर देता है।
- किट प्रकोप होने पर फेनवेलरेट 0.2 मिलीलीटर या डाईमेथोएट 2 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करना चाहिए।
मटर फली छेदक(एटियला जिनकेनेला)- यह मटर की अत्यंत क्षतिकारक किट है। इस किट का प्रकोप होने से मटर की 50.9 प्रतिशत फलिया तथा 77.6 प्रतिशत तक दाने ग्रसित हो जाते है जिससे पैदावार कम हो जाती है। यह किट मटर के अलावा मसूर,अरहर,सनई इत्यादि फसलों को नुकसान पहुँचता है। इस किट की इल्ली अवस्था ही हानिकारक होती है। ये इल्ली पहले अपने चारो ओर जाल बुनती है और फिर फली में घुसकर दानो को क्षति पहुँचती है किट वाधिता से फलिया बेरंगी हो जाती है तथा ऐसी फलियों से दुर्गन्ध आने लगता है।
पहचान- इल्लिया लम्बीचौड़ी गुलाबी रंग की होती है तथा इनका पृष्ठीय भाग हल्का हरा या मखनिया सफेद होता है प्रौढ़ धूसर भूरे रंग के होते है।

नियंत्रण-
- गर्मी में गहरी जोताई करे।
- फसल चक्र अपनाये।
- इंडोसल्फान 2 प्रतिशत धूल या कार्बारिल 5 प्रतिशत धूल का 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करे।










