कृषिराज्य

मक्का (Maize Cultivation) की उन्नत खेती, फसल सुरक्षा एवं पोषक तत्व प्रबंधन

डॉ. एस. एस. पोर्ते, वोमेन्द्र मंडावी, डॉ अभिषेक चौहान एवं डॉ. प्रिया सिहं

मक्का (Maize Cultivation) के दानों तथा पौधा ,दोनों का पशुओं और मनुष्यों के लिए कई प्रकार से उपयोग किया जाता है। मक्का ग्रेमिना कुल का पौधा है। मक्का की खेती प्रमुख रूप से तीन उद्देश्यों से की जाती है। 1. दाने के लिये, 2. चारे के लिये, 3. भुट्टे के लिये। मक्का विशेष रूप से गरीब जनता का मुख्य भोजन है। मक्का के दानों का प्रयोग जानवरों के खिलाने के लिये भी किया जाता है। बच्चों के लिये मक्के का चूरा एक पौष्टिक भोजन है तथा इसके दानों को भून कर भी खाया जाता है। मक्के का उपयोग एसीटिक अम्ल, लैक्टिक अम्ल, कागज, प्लास्टिक एवं कृत्रिम रबर, रंग, चमड़ा, जूते की पॉलिश व पैकिंग पदार्थों के रूप में भी की जाती है। इन उपयोगों के कारण अमेरिका में इसकी खेती बड़े क्षेत्र में की जाती है। धान्य फसलों के मुकाबले में इसमें स्टार्च की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है इसके अलावा मक्के का प्रयोग औद्योगिक रूप से शराब तैयार करने के लिये किया जाता है।

जलवायु –
मक्का की खेती के लिये बस्तर की जलवायु सर्वथा उपयुक्त है। इस क्षेत्र में मक्का की खेती खरीफ के मौसम में की जाती है तथा यदि सिंचाई की सुविधा हो तो जायद में भी मक्का की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मक्का की सभी अवस्थाओं में तापमान लगभग 25 से.ग्रे. के आसपास होना चाहिए। अंकुरण के लिये न्यूनतम तापमान 10 से.ग्रे. होना चाहिए। मक्का के पौधों की अच्छी वृद्धि के लिये 60-70 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता सबसे उत्तम रहती है।

भूमि का चुनाव:-
मक्का की अधिकतम पैदावार के लिये मरहान व टिकरा भूमि उत्तम है क्योंकि इस भूमि का वायु संचार व पानी निकास उत्तम रहता है। भूमि चाहे जैसी भी हो यदि जल निकास ठीक नहीं है तो मक्के की फसल अच्छी नहीं होगी। मक्का की खेती ऐसी भूमियों में. जिनका पी.एच. मान 6.0 से 7.0 तक हो, की जा सकती है। खरीफ में बस्तर संभाग में यह फसल असिंचित अवस्था में तथा जायद में कुछ स्थानों में सिंचित अवस्था में ली जाती है। इस क्षेत्र में कृषक मुख्य रूप से बाड़ी में इसकी बुवाई करते हैं।

वर्गीकरण:-
दाने के रंगों के आधार पर मक्का को छः वर्गो में बांटा गया है। 1. शुद्ध सफेद, 2. पीली 3. नारंगी, 4. लाल, 5. चित्तीदार तथा काली (चित्तीदार व काले रंग) की जातिया बहुत कम पाई जाती हैं।
पकने की अवधि के आधार पर मक्का को तीन वर्गों में बांटा गया है। 1. अगेती (70-80 दिन), 2. मध्यम (80-90 दिन), 3. पछेती (90-120 दिन) ।

भूमि की तैयारी:-
खरीफ की फसल लेने के लिये एक जुताई गहरी मिट्टी पलटने वाले हल से कर देनी चाहिए। यदि खेत गर्मियों में खाली है तो जुताई गर्मियों में करना अधिक लाभदायक है। इस जुताई में खरपतवार, कीट-पतंगे व बीमारियों की रोकथाम में काफी सहायता पहुंचाती है। बोने से पहले 2-3 जुताई हैरों या कल्टीवेटर या देशी हल से कर देना लाभदायक रहता है। इसके पश्चात पाटा (रगड़ा) चलाकर खेत को समतल एवं महीन बना लेना चाहिए एवं खेल में ढेले नहीं रहना चाहिए। इससे बीज का अंकुरण अच्छी होता है। अंतिम जुताई के समय उपलब्धानुसार अच्छी सड़ी गोबर की खाद मिलाना चाहिए।

बीज एवं बीज उपचार:-
मक्के का शुद्ध एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करना लाभदायक होता है। संकर मक्का का बीज प्रत्येक वर्ष किसी विश्वसनीय संस्था से लेकर प्रमाणित बीज की बुवाई करना चाहिए। संकर मक्का की फसल से प्राप्त बीज नहीं बोना चाहिए क्योंकि इसके गुणों में गिरावट होती रहती है और उपज में कमी आ जाती है।

संकुल मक्का का बीज कृषक अपनी पहली फसल से ही प्राप्त करने के लिये संकुल मक्का को ऐसे खेत में बोना चाहिए, जिसके चारों ओर मक्का की कोई दूसरी जाति न बोई गई हो। यदि यह संभव हो तो खेत के बीचों-बीच के भागों से बीज प्राप्त करके अगली फसल के काम में लेना चाहिए। तीन-चार वर्ष बाद नया बीज किसी संस्था से प्राप्त करना चाहिए।

बीजों को बुवाई से पूर्व रसायन जैसे- थीरम, केप्टान आदि से उपचारित किया जा सकता है। इससे मृदा में बीज के अंकुरण तक किसी बिमारी का प्रभाव बीजांकुरों पर नहीं होता ।

बीज दर:-
छोटे आकारों के बीजों की बीज दर कम व बड़े आकार के बीजों की दर प्रति हेक्टेयर जायद रखते हैं। बीज दर मृदा में नमी, फसल बोने का उद्देश्य, बोने का समय व फसल की जाति आदि कारकों पर निर्भर करती है।

विवरण बीज दर (कि.ग्रा./हे.)
संकर जातियां 20-25
संकुल जातियां 15-20
चारे के लिये 40-45
जायद में भुट्टे के लिये 20-25

मक्का की उन्नतशील किस्में:-
मक्के की संकर जातियां इस प्रकार हैं –

क्र. संकर जातियां पकने की अवधि उपज (क्विं./हे.)
1. गंगा सफेद-2 95-100 40-45
2. हाई स्टार्च-हाइब्रिड मक्का 95-100 40-50
3. गंगा हाइब्रिड मक्का-5 90-100 40-45
4. गंगा-11 100-110 40-45
5. डेक्कन-103 100-110 50-55
6. चन्दन मक्का-1 90-100 50-60
7. चन्दन मक्का-2 70-80 25-30
8. चन्दन मक्का-3 90-95 50-55

 

मक्के की संकुल किस्में इस प्रकार हैं:-

क्र. संकुल जातियां पकने की अवधि उपज (क्विं./हे.)
1. शक्ति 95-100 35-40
2. धवल 95-110 35-40
3. अगेती-76 85-90 35-40
4. अंबर 110-115 40-45
5. जवाहर 110-115 40-45
6. किसान 110-115 35-40
7. कंचन-3 80-90 25-40
8. जे.एम.-8 80-90 35-40
9. किरण 80-90 25-30
10. नवजोत 90-100 45-50
11. विजय 100-110 45-50

बीज अन्तरण:-
मक्का के लिये खरीफ के मौसम में कतार से कतार के बीज की दूरी 60 से.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 30 से.मी. रखना चाहिए एवं जायद में कतार से कतार के बीच की दूरी 45 से.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. रखने से अच्छी पैदावार प्राप्त होती है।

बुवाई का समय:-
मक्का की बुवाई जून के मध्य या तीसरे सप्ताह तक करने से पैदावार अच्छी होती है। यदि सिंचाई के साधन उपलब्ध हो तो अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिये मक्का की बुवाई वर्षा ऋतु आरंभ होने के करीब 15 दिन पहले कर देना चाहिए। वर्षा ऋतु होने के बाद बुवाई करने से अनेक हानियां हैं। संभव है बुवाई वर्षा के कारण उचित समय पर न हो पाये। यदि बुवाई हो भी जाती है तो लगातार वर्षा होने से बीज का अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता है।

बसन्त ऋतु में फरवरी से अपै्रल तक भी मक्का की बुवाई की जाती है। शहरों के नजदीक इन फसलों को भुट्टों के लिये उगाते हैं। चारे के लिये भी इन दिनों में बुवाई की जाती है।

खाद प्रबंधन:-
मक्का की फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिये सभी मुख्य एवं सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता होती है। किसी भी तत्व को भूमि में देने के पहले मृदा की जांच करना आवश्यक है।
मक्का की फसल से औसतन पैदावार लेने के लिये मुख्य तत्व औसतन निम्न मात्रा में दिये जाते हैं:-
(पोषक तत्व-कि.ग्रा./हे.)

किस्म नत्रजन स्फुर पोटाश
देशी 60 30 20
संकर 120 50 40
संकुल 100 40 30

मृदा की उर्वरा शक्ति का परीक्षण कराके उपर्युक्त मात्राएं कम या अधिक की जा सकती हैंं।

खाद डालने का समयः –
मक्का में स्फुर, पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय दिया जाता है। सूक्ष्म तत्वों की यदि मृदा में कमी हो तो वे मृदा में बुवाई के समय दिये जा सकते हैं। नाइट्रोजन के उर्वरकों का 1/2 भाग बुवाई के समय खेत में देते हैं। शेष 1/4 भाग बुवाई के 30-40 दिन बाद, जब फसल घुटनों तक बढ़ जाए व 1/4 भाग नरमंजरी पर देते हैं।

जस्ते की कमी के लक्षण यदि दिखाई पड़ें तो जस्ते की कमी की पूर्ति के लिये 10 कि.ग्रा./की दर से जिंक सल्फेट का 0.5 प्रतिशत का घोल खड़ी फसल पर स्प्रेयर मशीन से छिड़क देना चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन एवं मिट्टी चढ़ाना:-
खरपतवार फसल के प्रमुख शत्रु होते हैं, जो उपज में अप्रत्याशित हानि करते हैं। अतः निंदाई-गुड़ाई यदि समय पर न की जाये तो उत्पादन अत्यधिक प्रभावित होता है। निंदाई-गुड़ाई से भूमि पोली बनी रहती है। भूमि में वायु के अच्छे संचार से जड़ों को खाद्य पदार्थ व जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। खरपतवार के प्रभावी नियंत्रण के लिये एट्राजीन या सिमेजीन खरपतवारनाशक 500 ग्राम सक्रिय तत्व (1-1.5 कि.ग्रा.) की दर से 700 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से लगभग 15 दिन तक खरपतवार नियंत्रण में रहते हैं।

निंदानाशक दवाई का प्रयोग बुवाई के बाद अंकुरण से पूर्व करना चाहिए अर्थात बुवाई के 1-2 दिन के अन्दर कर लेना चाहिए। इसके पश्चात 20-30 दिन फसल अवस्था पर हैण्ड-हो से कतार के बीच में निंदाई करनी चाहिए या हाथ से खरपतवार उखाड़कर नींदा नियंत्रण करना चाहिए। निंदाई के पश्चात पौधों पर मिट्टी चढ़ाना चाहिए जिससे पौधे गिरते नहीं हैं।

जल प्रबंधन:-
मक्का की फसल के लिये पानी की अधिकता एवं कमी दोनों ही हानिकारक है। खरीफ में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अवर्षा की स्थिति में आवश्यकतानुसार सिंचाई की जानी चाहिए। ग्रीष्मकाल में यदि मक्का की खेती की जा रही है तो 10-15 दिन के अन्तराल में सिंचाई करते रहना आवश्यक होता है। पूरी फसल में 8-10 सिंचाई की आवश्यकता होती है। फूल आने के समय खेत में नमी में कमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा दाने बनने एवं भरने में कमी आती है।

रबी में मक्के की खेती के लिये 5-6 सिंचाई की जानी चाहिए। इसमें तीन सिंचाई फूल आने की अवस्था तक (लगभग 20-25 दिन के अन्तराल पर) तथा तीन फूल आने की अवस्था के बाद, जिसमें एक शीघ्र दाना भरने की अवस्था पर आवश्यक होती है।

मक्का के साथ अन्तर्वर्तीय फसलें:-
अन्तर्वर्तीय खेती में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिये मक्का के साथ ऐसी फसल का चुनाव करना चाहिए, जिससे कुल उपज में वृद्धि हो। अन्तर्वर्तीय फसल अतिरिक्त लाभ के रूप में प्राप्त होती है। विभिन्न मौसम में निम्नानुसार अन्तर्वर्तीय खेती की सिफारिश की जाती है। खरीफ में मक्का + अरहर, मक्का + मूंग, मक्का + सोयाबीन। रबी में मक्का + अलसी, मक्का + मसूर । ग्रीष्म में मक्का + मूंग, मक्का + उड़द । वर्षा आश्रित क्षेत्र में द्विफसलीय चक्र मक्का के बाद तोरिया गेहूं, तिल एक लाभदायक कृषि है।

पौध संरक्षण:-

कीट व्यवहार नियंत्रण
दीमक दीमक तने में छेद करके अन्दर ही खाती रहती है जिससे हवा चलने पर पौधे टूट जाते हैं। दीमक के प्रकोप वाले क्षेत्र में आखिरी जुताई पर क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. 2.5 लीटर को 5 लीटर पानी में घोलकर 20 कि.ग्रा. बालू में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पहले मिट्टी में मिला दें।
तनाछेदक तनाछेदक कीट की सूंडियां तने में छेद करके अन्दर ही खाती रहती हैं जिससे हवा चलने पर पौधे टूट जाते हैं। रोकथाम हेतु बुवाई के 20-25 दिन बाद लिण्डेन 6 प्रतिशत दाने 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
पत्ती लपेटक कीट पत्ती लपेटक कीट की सूंडियां पत्ती के दोनों किनारांे को रेशम जैसे सूत से लपेटकर अन्दर से खाती है। नियंत्रण हेतु बुवाई के 2.5-7 सप्ताह के बाद कार्बोरिल 50 प्रतिशत, घुलनशील चूर्ण 1.5 कि.ग्रा./हे. या क्विनालफास 25 ई.सी. 2 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
टिड्डा टिड्डों के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं। इनके नियंत्रण मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 20-25 कि.ग्रा./हे. की दर से भुरकाव करें।
भुड़ली (कमला कीट) भुड़ली (कमला कीट) की गिडारें पत्तियों को बहुत तेजी से खाकर फसल को काफी हानि पहुंचाती हैं। इसके शरीर पर रोयें होते हैं। इसकी रोकथाम हेतु मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 20 कि.ग्रा. या एण्डोसल्फान 4 प्रतिशत धूल 20 कि.ग्रा. या क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. 10 लीटर का भुरकाव या छिड़काव प्रति हेक्टेयर करना चाहिए।

 

कीट एवं उनकी रोकथाम के उपाय:-

रोग रोगजनक नियंत्रण रोक थाम
पत्ती अंगमारी रोग  हेल्मेन्थोस्पोरियम टर्सिकम, हेल्मेन्थोस्पोरियम मेडिस यह रोग फाइजोडर्मा जीमोरस नामक फफूंद द्वारा होता है। इस रोग के कारण लगभग 25 प्रतिशत तक फसल की हानि होती है। इसके लक्षण पत्ती, पत्तीपर्ण ड।ठल एवं भुट्टे के बाहरी आवरण पर बनते हैं। इस रोगजनक के द्वारा पत्ती पीली सा हो जाती है, जो कुछ ही समय पश्चात भूरे रंग में परिवर्तित हो जाती है। रोग का प्रकोप तीव्रता से होने के कारण सम्पूर्ण धब्बे आपस में मिलकर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। अन्त में यह धब्बे पत्तीपर्ण या भुट्टों पर ही बन जाते हैं। इसके कारण सम्पूर्ण पौधा रोगग्रसित हो जाता है। अधिक तापमान एवं अधिक आर्द्रता वाले मौसम में रोग का प्रकोप तीव्रता से होता है। पौध अवशेषों को एकत्र कर जला देना चाहिए।

रोग सहनशील जातियां गंगा-2, जय किसान आदि का प्रयोग करना चाहिए।

खड़ी फसल के उपर डायथेन जेड-78, डायथेन एम-45 व केप्टान का 0.2 प्रतिशत की दर से 10 से 12 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

भूरा पत्ती दाग या फाइजोडर्मा लीफ स्पॉट रोग फाइजोडर्मा जी मेडिस। यह रोग फाइजोडर्मा जीमोरस नामक फफूंद द्वारा होता है। इस रोग के कारण लगभग 25 प्रतिशत तक फसल की हानि होती है। इसके लक्षण पत्ती, पत्तीपर्ण ड।ठल एवं भुट्टे के बाहरी आवरण पर बनते हैं। इस रोगजनक के द्वारा पत्ती पीली सा हो जाती है, जो कुछ ही समय पश्चात भूरे रंग में परिवर्तित हो जाती है। रोग का प्रकोप तीव्रता से होने के कारण सम्पूर्ण धब्बे आपस में मिलकर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। अन्त में यह धब्बे पत्तीपर्ण या भुट्टों पर ही बन जाते हैं। इसके कारण सम्पूर्ण पौधा रोगग्रसित हो जाता है। अधिक तापमान एवं अधिक आर्द्रता वाले मौसम में रोग का प्रकोप तीव्रता से होता है। 1. पौधे पर फाइटोलान, ब्लाइटाक्स-50, आदि दवा 0.3 प्रतिशत की दर से 12-15 दिन के अन्तराल में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए ।
2. इसके अलावा डायथेन एम-45 एवं केप्टान नामक दवा का 0.2 प्रतिशत की दर से फसल के उपर 10 से 12 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।
मक्का का वृन्त विगलन रोग – इस रोग के कारण लगभग 25 प्रतिशत फसल का नुकसान पाया गया है। यह रोग पीथियम राइजोक्टोनिया फ्यूजेरियम नामक मृदाजनित कवक द्वारा होता है। इसके द्वारा पौधों की निचली गांठ पर रोग का संक्रमण शुरू होता है, जिसके कारण पौधे की जड़े सड़ने लगती हैं। अनुकूल परिस्थिति मिलने पर पौधों की पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं और यह सड़न पौधों को कमजोर कर देती है, जिससे पौधे गिर कर नष्ट हो जाते हैं। 1. फसल-चक्र अपनाना चाहिए।
2. पौध अवशेषों को एकत्र कर जला देना चाहिए।
3. रोग प्रतिरोधी जाति गंगा-2 उगाना चाहिए।
4. जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए।
5. पौधों की जड़ों में 2.5 ग्राम केप्टान को एक लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
बीज का सड़न रोग: यह रोग पीथियम नामक फफूंद के द्वारा होता है। यह रोगजनक मक्का के बीजों को सड़ा देता है, जिसके अंकुरित होने के बाद भी मरने लगते है। 1. थायरम का केप्टान नामक दवा की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज को उपचारित करके बोना चाहिए।
2. ग्रीष्मकाल में भूमि की गहरी जुताई कर छोड़ देना चाहिए।
ब्राउन स्ट्राइप डाउनी मिल्ड्यू स्क्लेरोफ्थोरेसी वैरा. जी। यह रोग स्क्लेरोस्पोरा नामक फफूंद से होता है। इस दशा में पर्णहरित रहित धारियां छोटी होती हैं तथा जल्दी ही भूरी पड़ने लगती हैं। इनका रंग लाल से बैगनी रहता है, जबकि दूसरे मिल्ड्यू में ये लगभग सफेद से हल्की पीली हो जाती हैं। पत्तियां पर बारीक छोटे-छोटे रेशे देखे जाते हैं। रोगरोधी किस्में गंगा-2, तरूण, रंजीत, जवाहर, किसान आदि लगाना चाहिए।
2. प्रमाणित बीजों का प्रयोग करें।
3. अगेती बुवाई करें।
4. गन्ने के खेत के आसपास मक्का न बोई जाय ।
5. केप्टान व डायथेन एम-45 को 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें।
गेरूई रतुआ रोग पत्तियों पर जंग के समान धब्बे पड़ जाते हैं, जिनके फटने पर गेरूई रंग के बीजाणु बिखरते हैं। प्रतिरोधी किस्में डेक्कन, रंजीत, जवाहर, किसान बोनी चाहिए।
2. डायथेन जेड-78 एवं डायथेन एम-45 की 0.25 मात्रा का छिड़काव करें।
मोजेक रोग रोगजनक-विषाणु यह रोग विषाणु के द्वारा होता है। रोगग्रस्त पौधों की वृद्धि रूक जाती है। रंग पीला पड़ जाता है। पत्तियां चितकबरी दिखाई पड़ती हैं। इसके कारण भुट्टों में दाने नहीं भरते हैं। प्रतिरोधी किस्में डेक्कन, रंजीत, जवाहर, किसान बोनी चाहिए। कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए।

मक्का में विभिन्न प्रकार के कीट हानि पहुंचाते हैं इसलिए अधिक उत्पादन लेने के लिये जरूरी है कि फसलों के हानिकारक कीड़ों एवं फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली अवस्थाओं की हमेशा सही जानकारी हो जिससे सही समय पर उनका नियंत्रण किया जा सके।

रोग (व्याघि) एवं उनकी रोकथाम के उपाय:
मक्का की फसल पर लगभग 20-25 रोगों का प्रकोप होता है जिससे उपज का 10-12 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाता है। मक्का में विभिन्न प्रकार के रोगों से क्षति पहुंचती है इसलिये अधिक उत्पादन के लिये आवश्यक है कि मक्का के हानिकारक रोगों एवं उनके नुकसान पहुंचाने वाली फसल की अवस्थाओं की सही जानकारी हो जिससे सही समय पर उनका नियंत्रण करके अच्छा उत्पादन लिया जा सके। इनमें प्रमुख रोगों की सूची इस प्रकार है:-

मक्का की मुख्य रोगों की सूची:
1. पत्ती अंगमारी या लीफ ब्लाइट रोग: रोगजनक-हेल्मेन्थोस्पोरियम टर्सिकम, हेल्मेन्थोस्पोरियम मेडिस ।
2. भूरा पत्ती दाग या फाइजोडर्मा लीफ स्पॉट रोग: रोगजनक-फाइजोडर्मा जी मेडिस।
3. भूरी धारीदार मृदुरोमिल रोग या ब्राउन स्ट्राइप डाउनी मिल्ड्यू रोग: रोगजनक-स्क्लेरोफ्थोरेसी वैरा. जी।
4. चारकोल विगलन अथवा चारकोल रॉट रोग: रोगजनक-मैक्रोफोमिना फोजिओलाइ।
5. कंडवा रोग अथवा स्मट: रोगजक-अस्टिलैगो मेडिस वैरा. जी।
6. पत्ती गेरूआ रोग: रोगजनक -पक्सीनिया सोर्घाई।
8. जीवाणु वृन्त विगलन या स्टाक रॉट रोगः रोगजनक-इर्वीनिया काइसेन्थेमाई पैथोवार जी।
9. मोजेक रोग: रोगजनक-विषाणु ।
इनमें से कुछ प्रमुख बीमारियों की पहचान के लक्षण एवं रोकथाम के उपाय निम्न हैः-

पत्ती अंगमारी रोग:
यह रोग हेल्मेन्थोस्पोरियम नामक फफूंद के द्वारा होता है। इस रोग के कारण लगभग 15-90 प्रतिशत तक उपज में कमी आ जाती है। इस रोग के संक्रमण द्वारा सबसे पहले निचली पत्ती पर लम्बे दीर्घ वृत्ताकार अथवा नाव के आकार के धब्बे बनते हैं, जो धूसर रंग से लेकर भूरे रंग के होते हैं जिसके कारण सम्पूर्ण पत्ती सूख जाती है। इसका प्रकोप जितना जल्दी होता है, फसलों में उतनी ही अधिक हानि होती है।

रोकथाम के उपायः
1. पौध अवशेषों को एकत्र कर जला देना चाहिए।
2. रोग सहनशील जातियां गंगा-2, जय किसान आदि का प्रयोग करना चाहिए।
2. खड़ी फसल के उपर डायथेन जेड-78, डायथेन एम-45 व केप्टान का 0.2 प्रतिशत की दर से 10 से 12 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

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