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छत्तीसगढ़ में अमरुद उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक

अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल है। अमरूद को अंग्रेजी में ग्वावा कहते हैं ;वानस्पतिक नाम सीडियम ग्वायवा, प्रजाति सीडियम, जाति ग्वायवा, कुल मिटसी)। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से देश में उगाये जाने वाले फलों में अमरूद का चौथा स्थान है। भारत में अमरुद का उत्पादन 40 लाख मीट्रिक टन है और इसकी खेती 2 लाख 55 हजार हेक्टेयर में हो रही है । वैज्ञानिकों का विचार है कि अमरूद की उत्पति अमरीका के उष्ण कटिबंधीय भाग तथा वेस्ट इंडीज से हुई है। भारत की जलवायु में यह इतना घुल मिल गया है कि इसकी खेती यहाँ अत्यंत सफलतापूर्वक की जाती है। पता चलता है कि 17 वीं शताब्दी में यह भारतवर्ष में लाया गया। अधिक सहिष्ण होने के कारण इसकी सफल खेती अनेक प्रकार की मिट्टी तथा जलवायु में की जा सकती है। जाड़े की ऋतु मे यह इतना अधिक तथा सस्ता प्राप्त होता है कि लोग इसे निर्धन जनता का एक प्रमुख फल कहते हैं।

अमरूद में कई महत्वपूर्ण विटामिन, खनिज, एंटीऑक्सिडेंट्स और फ्लेवोनोइड यौगिक शामिल होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसकी बहुउपयोगिता एवं पौष्टिकता को ध्यान मे रखते हुये लोग इसे गरीबों का सेब कहते हैं। इसमे विटामिन सी प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। इससे जैम, जैली, नेक्टर आदि परिरक्षित पदार्थ तैयार किये जाते है। छत्तीसगढ़ में अमरुद की खेती 21296 हेक्टेयर में की जा रही है जिससे 1लाख 86 हजार मीट्रिक टन का उत्पादन हो रहा है। छत्तीसगढ़ देश में अमरूद के कुल उत्पादन का लगभग 4.2% का उत्पादन करता है। प्रदेश में प्रमुख अमरूद उत्पादक क्षेत्र हैं रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाव, बिलासपुर, महासमुंद और जगदलपुर ।

विशिष्ट तत्त्व पोषक तत्व मूल्य (प्रति 100 ग्राम)
ऊर्जा 68 किलो कैलोरी
कार्बोहाइड्रेट 14.3 ग्राम
फाइबर आहार 5.4 ग्राम
नियासिन 1 मिलीग्राम
विटामिन सी 228 मिलीग्राम
पोटैशियम 417 मिलीग्राम
कैल्शियम 18 मिलीग्राम

भूमि एवं जलवायु : अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, परन्तु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दुमट भूमि अच्छी पाई गई है। इसके उत्पादन हेतु 6 से 7.5 पी.एच. मान की मृदा उपयुक्त होती है किन्तु 7.5 से अधिक पी.एच. मान की मृदा में उकठा रोग के प्रकोप की संभावना होती है। अमरूद को उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में सफलता पूर्वक पैदा किया जा सकता है, परन्तु अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, अमरूद की खेती के लिये उपयुक्त नहीं होते हैं। अमरूद की खेती के लिये 15 डिग्री. से. 30 डिग्री से. तापमान अनुकूल होता है। यह सूखे को भी भली-भाँति सहन कर लेता है। तापमान के अधिक उतार चढ़ाव, गर्म हवा, कम वर्षा, जलक्रान्ति का फलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है।

उन्नत किस्में : अमरूद की व्यावयायिक स्तर पर उगाई जाने वाली किस्मों में से इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49, एपिल-गुवावा एवं धारीदार प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त अर्का-मृदुला, श्वेता, ललित एवं पंत-प्रभात किस्में व्यवसायिक उत्पादन हेतु उपयोग में लाई जा सकती हैं।

पादप रोपणः पादप रोपण द्वारा अमरूद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है लेकिन जिन स्थानों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर पौधे फरवरी-मार्च में भी लगाये जा सकते हैं। बाग लगाने के लिये खेत को समतल करने के पश्चात् रेखांकन कर पौधे लगाने के लिये निश्चित दूरी पर 60 सें.मी x 60 सें.मी. x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार करें। इन गड्ढों को 15-20 कि.ग्रा. अच्छी तैयार हुई गोबर की खाद, 500 ग्राम सुपर फॉस्फेट, 250 ग्राम पोटाश तथा 100 ग्राम मिथाईल पैराथियॉन पाऊडर को अच्छी तरह से मिट्टी में मिला कर पौधे लगाने के 15-20 दिन पहले भर दें। बाग में पौधे लगाने की दूरी मृदा की उर्वरता, किस्म विशेष एवं जलवायु पर निर्भर करती है। इस प्रकार कम उपजाऊ भूमि में 6 मी. x 6 मी. एवं 6.5 मी. x 6.5 मी. की दूरी पर पौधे लगायें।

सघन बागवानी रोपण: अमरूद की सघन बागवानी के बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं। सघन रोपण में प्रति हैक्टेयर 500 से 5000 पौधे तक लगाये जा सकते हैं तथा समय-समय पर कटाई-छँटाई करके एवं वृद्धि नियंत्रकों का प्रयोग करके पौधों का आकार छोटा रखा जाता है।

सिंचाई प्रबंध: अमरूद के एक से दो वर्ष पुराने पौधों की सिंचाई, भारी भूमि में 10-15 दिन के अन्तर से तथा हल्की भूमि में 5-7 दिन के अन्तर से करें। गर्मियों में सिंचाई का अंतराल कम करें व सिंचाई जल्दी-जल्दी करें।

खाद एवं उर्वरक प्रबंध: अमरूद की संतोषजनक वृद्धि एवं उत्पादन के लिये पर्याप्त मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। अमरूद को मुख्य एवं सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश युक्त तत्वों की काफी मात्रा में आवश्यकता होती है। जस्ते एवं बोरॉन तत्वों की कम मात्रा में अवश्यकता पड़ती है।
अमरूद के लिये खाद एवं उर्वरक की मात्रा

पौधों की आयु (वर्षों में) गोबर खाद(कि.ग्रा.) नत्रजन(ग्राम) स्फुर(ग्राम) पोटाश (ग्राम)
1 10 50 30 50
2 20 100 60 100
3 30 150 90 150
4 40 200 120 200
5 50 250 150 250
6 60 300 180 300

अमरूद में पोषक तत्व खींचने वाली जड़ें तने के आस-पास एवं 30 सें.मी. की गहराई में होती है। इसलिये खाद देते समय इस बात का ध्यान रखें कि खाद, पेड़ के फैलाव में 15-20 सें.मी. की गहराई में थाला बनाकर दें । गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा जून-जुलाई में तथा शेष नत्रजन की मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में वर्षा समाप्त होने से पहले दें।

अन्तरवर्तीय फसलें: प्रारंभिक दो-तीन वर्षों में बगीचों के रिक्त स्थानों में रबी में मटर, फ्रैंचबीन, गोभी एवं मेथी, खरीफ में लोबिया, ज्वार, उर्द, मूँग एवं सोयाबीन तथा जायद (गर्मी की फसल) में कद्दू वर्गीय सब्जियाँ उगायें।

बहार ट्रीटमैंट: अमरूद में आमतौर पर वर्ष में एक मुख्य शीतकालीन फसल ( मृग बहार) लेने का सुझाव दिया जाता है जबकि अमरूद में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं । अतः गर्मी एवं वर्षा ऋतु में आने वाले फूलों को सिंचाई रोककर प्रतिबंधित करना उचित होता है। वर्षाकालीन फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है। जबकि सर्दी की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते हैं तथा फलों में विटामिन-सी की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। वर्षाकालीन फसल को बाजार में अच्छा मूल्य नहीं मिल पाता है। अतः ठंड की फसल लेने की सिफारिश की जाती है।

प्रकार फूल लगने का समय  फलने का समय  गुणवत्ता
अम्बे बहार  फरवरी-मार्च
(बसंत ऋतु)
जुलाई से सितंबर (वर्षा ऋतु) फल स्वाद मे कम मीठे एवं गुणवत्ता अच्छी नही रहती है ।
मृग बहार जून-जुलाई (वर्षा ऋतु) नवंबर-जनवरी  फल उच्च कोटि के मीठे एवं बड़े होते है। उपज अधिक व बाजार मूल्य अधिक प्राप्त होता है।
हस्त बहार अक्टूबर-नवंबर (शरद ऋतु)  फरवरी-अप्रेल (बसंत/ग्रीष्म ऋतु)  फलों का स्वाद अच्छा लेकिन उपज कम मिलती है।

वर्षाकालीन फसल को रोक कर ठंड की फसल लेने के लिये निम्नलिखित उपाय करें –
1. अप्रैल से जून तक पौधों को पानी नहीं दें। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करें। जिससे बसंत ऋतु में फूल एवं पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा वर्षान्त में फूल काफी संख्या में आते हैं। इस कार्य हेतु स्थानीय अनुभव अनुसार पानी रोकने की समय सीमा तय करे।
2. यूरिया का 10 प्रतिशत घोल का छिड़काव एक बार या 100-200 पी.पी.एम नेफ्थलीन ऐसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव 20 दिन के अंतराल से दो बार करें । जिससे अनचाहे फलध्पत्तियाँ गिराये जा सकते हैं ।

उपज
अमरूद की उपज किस्म , देख – रेख और उम्र पर निर्भर होती है अमरूद के पौधे 8-10 में पूर्ण बिकसित हो जाते है एक पूर्ण बिकसित पौधा से वर्ष 400-600 फल तक प्राप्त होते है जिनका वजन 125 से 150 किलो ग्राम होता है इसकी भण्डारण क्षमता बहुत ही कम होती हैए अत इनकी प्रति दिन तुड़ाई करके बाजार में भेजते रहना चाहिए .

भण्डारण
अमरूद के फलो को कमरे के 18-23 °सेंटीग्रेड 0.25: पर छिद्र युक्त पोलीथिन कि थैली में 8-10 दिनों तक भंडारित किया जा सकता है शीत भण्डारण में फलो को 5-10 °सेंटीग्रेड तापमान और 80-90% सापेक्ष तापमान आद्रता पर 4 सप्ताह तक भंडारित किया जा सकता है भण्डारण हेतु ऐसे फलो का चुनाव करते है जो हलके पीले रंग के हो अधिक पक्के और कच्चे फल शीत भण्डारण के लिए उपयुक्त नहीं होते .

जीर्णोद्धार
जीर्णोद्धार की विकसित वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर पुराने बागों की गुणवत्तायुक्त उत्पादकता में वृद्वि की जा सकती है। आर्थिक एवं परिस्थितिकीय दृष्टिकोण से जीर्णोद्धार तकनीक निःसंदेह बागवानी के लिए प्रभावी एवं लाभकारी हैं। पुराने वृक्षों का जीर्णोद्धार द्वारा वांछित प्रक्रियाओं को अपनाकर फिर से वृक्षों में युवावस्था के गुणों को सृजित करना है। पुराने वृक्षों की वांछित कटाई-छटाई करके नये कल्लों का सृजन करना, ताकि उन पर ओजपूर्ण फलन आ सके ।

नई तकनीक के द्वारा पुराने घने व बेकार हो चुके पेड़ो को दुबारा उत्पादक बनाया जा सकता है इस नई जीर्णोद्धार तकनीक के कनोपी प्रभंधन द्वारा अधिक से पोधो की अधिक फल देने वाली शाखाओ में बढ़ोतरी की जाती है, जिस के फलस्वरूप पुराने भागो से फिर से अच्छी उपज मिलती है, आमतौर पर बरसात के बाद ही ज्यादातर पेड़ो में ऊपर की पत्तिया पिली होने लगती है व धीरे धीरे शाखाये एक के बाद एक सूखने लगती है, जिस से जीवनोद्धार करना जरुरी हो जाता है

अमरूद में जीर्णोद्धार की तकनीक
प्रथम चरण :
पुराने घनें एवं आर्थिक दृष्टि से अनुपयोगी पौध को दिसंबर से फरवरी के बीच भूमी से 1 से 1.5 मी० की ऊँचाई से काटकर कटी हुई लकड़ी को बाग से हटा देना चाहिये तथा कटाई के तुरंत बाद कटे भाग पर फूफंदनाश्क दवा (कॉपर आक्सीक्लोराइड) को करंज या अरंडी के तेल में मिलाकर पेस्ट कर देते हैं। कटाई के बाद पौधों के तनों में चूना से पुताई कर देते हैं । ऐसा करने से गोंद निकलने तथा छाल फटने की समस्या कम हो जाती है शाखाओं को तेज धार वाली आरी या मशीन चालित ‘प्रूनिंग सॉ’ की सहायता से काटते हैं । तत्पश्चात ऊपर से पूरी शाखा को काट देते ऐसा करने से डालियों के फटने की संभावना नहीं रह जाती । पौधों में थाला बनाकर उनमें सफाई-निराई व गुड़ाई कर दी जाय तथा तना भेदक कीट के नियंत्रण हेतु छेद को साईकिल की तीली से साफ कर उसमें कीटनाशक दवा को रूई में भीगों कर छेद में रखकर तीली के माध्यम से अन्दर कर दी जाय एवं छेद को गीली मिट्टी से बन्द कर दिया जाय। थाले में सड़ी गोबर की खादध्बायोफर्टीलाइजर डालकर गुड़ाई करने के तुरन्त बाद सिंचाई करना चाहिये।

दूसरा चरण :
पौधों में 70-80 दिनों के अंदर सूसूप्त कलियों से नये- नये कल्ले निकलते हैं। आवश्यकतानुसार प्रत्येक डाली में 8-10 अच्छे, स्वस्थ तथा ऊपर की ओर बढ़ने वाले कल्लों को छोड़कर बाकी सभी कल्लों को सिकेटियर की सहायता से काट दें । कटे हुए भाग से पुनः अधिक संस्था में नये कल्लों का सृजन होता है जिस पर फूल और फल आते हैं। जीर्णोद्धार के उपरान्त निकले सभी कल्लों का प्रबन्धन (निकले प्ररोह का आधा भाग काटना) तथा शस्य क्रियायें प्रथम चरण की भाँति की जाय। दो चरणों के उपरान्त हर साल मई माह में प्रुनिंग (प्ररोह का आधा भाग काटना) करते हैं जिससे ठण्ड में अधिक फल की प्राप्ति होती है तथा साथ ही पौधों के फैलाव और आकार पर भी नियंत्रण बना रहता है।

तीसरा चरण :
द्वितीय चरण के बाद मई माह में फल-फूल वाली अन्य शाखाओं को उनकी कुल लम्बाई का आधा भाग (50%) काट देना चाहिये ताकि जाड़े में अधिक फल प्राप्त हो सके तथा पौध का फैलाव व आकार पर नियंत्रण होने के साथ-साथ बरसाती फल भी कम हो जाता है। इसी प्रकार हर साल मई माह में पौधों में प्रुनिंग की जाती है।
इस के बाद हर साल मई में पेड़ो की काट छाँट करते है, जिससे ठण्ड में अधिक फल मिल जाते है और साथ ही पौधों के फैलाव और आकर पर भी नियंत्रण बना रहता है।

अन्तरवर्तीय फसलें लेना
जीर्णोद्धार का पश्चात् बगीचे की जमीन काफी खाली हो जाती है जिसमें तरह-तरह की अंतरफसल जैसे जायद में लौकी, खीरा व अन्य सब्जियां, खरीफ में अरहर, मूंग, उड़द व अन्य दलहनी फसलें तथा रबी में आलू, मटर, सरसों इत्यादि फसलों की सफल खेती कर सकती हैं । इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी के साथ- साथ बगीचे की मिट्टी में भी सुधार होता है ।

अमरूद की सघन बागवानी
अन्य फल वृक्षों की तरह अमरूद में भी सघन बागवानी की अच्छी संभावनाएँ हैं यह एक लोकप्रिय फल है। इसके उत्पादन में कम लागत लगती है, लेकिन पैदावर काफी अच्छी होती है। अमरूद पोषक तत्वों का एक बहुत अच्छा और सस्ता स्रोत है। पौषिटकता की दृष्टि से सेब से भी अधिक पौष्टिक है।

भूमि की तैयारी एवं रेखांकन : भूमि की तैयारी परम्परागत तकनीक के जैसा ही करते हैं, सिर्फ रेखांकन में पौधों-से-पौधों एवं कतार-से-कतार की दूरी को कम किया जाता है। अमरूद के पेड़ों को 2 × 2 मीटर की दूरी पर लगाया जा सकता है। केंद्रीय उष्णकटिबंधीय बागवानी संसथान ने 2 x 1 मीटर की दुरी पर लगाना अनुसंशित किया है।
पौध रोपण : पूर्णरूपेण तैयार गडढों में पौधों को मानसून शुरू होने के बाद लगा दिया जाता है।
सिंचाई : नये पौधों को सप्ताह में कम-से-कम एक बार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।

कटाई-छँटाई :

  • अमरूद के पेड़ को एक विशेष आकार एवं मजबूती देने के लिए कटाई-छँटाई की जाती है। अमरूद के पेड़ में मुख्य तने पर भूमि तल से लगभग 60-70 सेमी तक कोई शाखा नहीं रहना चाहिए इसके बाद मुख्य तना के उपरी भाग को काट दिया जाता है।
  • इस उँचाई के बाद 20-25 सेमी के अंदर 3-4 शाखाएँ चुन ली जाती है। इन शाखाओं को बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता है एवं अन्य शाखाओं को काट दिया जाता है।
  • इन शाखाओं को 4-5 महीने तक बढ़ने दिया जाता है। जब तक कि ये 40-50 सेमी का न हो जाय। अब इन प्ररोहों को इनकी लम्बाई के 50 प्रतिशत तक काटा जाता है जिससे कि कटे हिस्से के ठीक नीचे से कल्लों का सृजन हो सके।
  • नव सृजित कल्लों को 40-50 सेमी लम्बाई तक बढ़ने देने के 4-5 माह बाद पुनरू उनकी कटाई-छँटाई की जाती है। कटाई-छँटाई का कार्य पौध रोपण के दूसरे वर्ष के दौरान भी जारी रखा जाता है।
  • दो वर्षों के बाद, कैनापी की परिधि के भीतर वाली छोटी शाखाएँ सघन तथा सशक्त ढाँचे का निर्माण करती है। सही तरीके से कटाई-छँटाई द्वारा तैयार किये गये पौधे का व्यास दो मीटर तथा उँचाई 2.5 मीटर तक सीमित रखने हेतु प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी तथा मई-जून में कल्लों की कटाई की जाती है।

पोषण प्रबंधन :

  • अच्छी पैदावार और स्वादिष्ट फलों के लिए पौधों को नियमित खाद और उर्वरक देना आवश्यक है। खाद और उर्वरक की उचित मात्रा देने का समय और सही तरीके से उसको दिया जाना अत्यन्त आवश्यक है।
  • अमरूद में पहले एवं दूसरे साल गोबर की खाद 10-15 किग्रा, नाइट्रोजन 60 ग्राम, फास्फोरस 30 ग्राम एवं पोटाश 30 ग्राम दिया जाना चाहिए।
  • नाइट्रोजन की आधी मात्रा अक्टूबर और आधी मात्रा जून में दी जाती है।
  • फास्फोरस और पोटाशधारी उर्वरकों को अक्टूबर में दिया जाना चाहिए।
  • गोबर की खाद की पूरी मात्रा जून में दी जाती है।
  • इन उर्वरकों को तने से थोड़ी दूर छोड़कर अच्छी तरह मिटटी में मिला देना चाहिए। इसके बाद सिंचाई करना जरूरी है।

पौध संरक्षण :
फलमक्खी : बरसात में फल के अन्दर पिल्लू हो जाते हैं जो फलमक्खी के होते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगर दवा का 0.05 प्रतिशत घोल का छिड़काव 10 दिनों के अन्तर पर जब फल पेड़ में लग जाय, 3-4 बार करें। इसी तरह अन्य कीड़े एवं बीमारियों का उपचार समय-समय पर करते रहना चाहिए।
उपज : परम्परागत बागवानी की तुलना में सघन बागवानी से 5-6 गुना अधिक उपज प्राप्त किया जा सकता है।

अमरूद के वृक्षों में प्लास्टिक पलवार बिछाना

प्लास्टिक मल्चिंग पौधों के चारों तरफ की भूमि को प्लास्टिक फिल्म से व्यवस्थित रुप से ढकने की क्रिया है। वर्तमान में प्रयोग में लाए जाने वाले प्लास्टिक फिल्म विभिन्न रंगों एवं मोटाई में उपलब्ध है। तुलनात्मक रूप से प्लास्टिक पलवार अन्य पलवारों से पूरी तरह से पानी के लिए अभेद्य है। इसलिए प्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से नमी के वाष्पीकरण, पानी का कम उपयोग और मिट्टी कटाव को रोकती है। इस प्रकार पलवार जल सरंक्षण में एक सकारात्मक भूमिका निभाती है तथा पैदावार बढ़ाने में मदद करती है।

प्लास्टिक मल्चिंग में विभिन्न रंग जैसे काली, नीली व पारदर्शी पलवार प्रमुख रूप से उपयोग में लायी जाती है इसके अतिरिक्त कभी-कभी दो रंगों की पलवार का भी जैसे सफेदध्काली, सिल्वरध्काली, लालध्काली या पीलीध्भूरी उपयोग में लायी जाती है।

फल वाली फसलों में सामान्यत: 100 माईक्रोन मोटाई वाली प्लास्टिक मल्च फिल्म का प्रयोग किया जाता है। फलदार वृक्षों में पलवार उपयोग पौधे के आच्छादन के अनुसार करना चाहिये। लम्बाई एवं चौड़ाई को बराबर रखते हुए प्लास्टिक मल्चिंग (पलवार) को काटना चाहिये। अमरूद में मल्च फिल्म को मुख्यत: हाथों द्वारा ही पौधों के चारों तरफ बिछाया जाता है। इसमें सामान्यतरू फसलों के वितान क्षेत्र के विस्तार के कम से कम 50 प्रतिशत जड़ क्षेत्र में लगाने की अनुसंशा की जाती है। सबसे पहले पौधे के चारों तरफ की जगह को खरपतवार तथा घासफूस इकट्ठा करके साफ किया जाता है। फिर एक छोटी नाली पौधे के चारों तरफ बनाया जाता है जिससे कि मल्च फिल्म को लगाकर आसपास की मिट्टी से दबाया जा सके। मल्च फिल्म के एक सिरे से चौड़ाई वाले भाग में बीच से आधी मल्च फिल्म को काटकर पेड़ के तने के पास लगाते हैं तथा कटी हुई फिल्म को 10-15 सेमी दूसरी सतह पर आच्छादित करके मिट्टी से ढक दिया जाता है।

 

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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