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छत्तीसगढ में पायी जाने वाली मृदाओ के भौतिक रासायनिक गुण विशेषताए एवं सब्जी आधारित फसलोत्पादन पद्धति

बलवंत कुमार बघेल, भरत लाल

छत्तीसगढ मे भूगर्भ तापमान वर्षा और फसल पद्धति पर आद्यारित तीन कषि जलवायु क्षे़त्र को विभाजित किया गया है । इसके अलावा मृदा समूह को चार भागो मे बॉटा गया है जिसमे एन्टीसाल इनेप्टीसाल अल्फीसाल एवं वटीसाल मे विभाजित किया गया है जिनमे बस्तर का पठार मे पायी जाने वाली मृदाओ कि संक्ष्प्ति विशेषताए इस प्रकार है बस्तर के पठार मे चार प्रकार कि मृदाये पायी जाती है एवं स्थानिय भाषा मे अलग अलग नामो से जाना जाता है।

इन मृदाओ कि कुछ विशेषताए इस प्रकार है-एण्टीसॉल इस मृदा को स्थानिय भाषा मे मरहान नामो से जाना जाता है ये मृदा मोटे बनावट भारी ढलान उचित जल निकास एवं कम पानी धारण करने की क्षमता होती है। मुख्य फसल उगाने के लिए यह मृदा उपयुक्त होती है। इनसेप्टीसॉल टिकरा नामो से जाना जाता है इनकी बनावट हल्की उथली मृदा कम पानी धारण करने की क्षमता एवं कोदो कुटकी फसले उगाने के लिए उचित माना जाता है। अलफिसॉल को बस्तर मे माल नामो से कहकर पुकारते है ये मृदाएॅ फेलस्पैथिक क्वाटिर्जटियरिया से लिया गया है यह मृदा फसल उत्पादन के लिए दूसरे मृदाओ कि तुलना मे अच्छा माना जाता है एवं धान गेहूॅ सब्जियॉ उगाई जाती है। वर्टीसॉल को बस्तर की स्थानिय भाषा मे गभार से कहकर पुकारते है इस मृदा को फसल उत्पादन कै लिए उपयुक्त अधिक जल धारण क्षमता एवं जल निकास कि उचित व्यवस्था करने कि आवशयकता पडती है धान गेहूॅ उगाने के लिए उचित मृदा है। इन मूदाओ के क्रम मे छत्तीसगढ के विभिन्न क्षेत्रो मे अलग अलग भौगोलिक गुणो कि जानकारी निम्न है-

कृषि जलवायु क्षे़त्र  जिला शामिल  कुल क्षेत्र  मृदा प्रकार  सिचाई प्रतिशत
छ. ग. की मैदानी क्षेत्र रायपुर, महासमुद, धमतरी, दुर्ग, राजनादगॉव, मोहला मानपुर, खैरागढ़ , कबीरधाम, मुंगेली, बिलासपुर, गौरेला पेंड्रा मरवाही, कोरबा, जांजगीर चापा, सक्ती, सारंगढ़, बालोद, रायगढ और कांकेर जिला का कुछ भाग सम्मिलित है।  68.49 लाख/ हे.  एण्टीसॉल (36 प्रतिशत),
इन्सेपटीसॉल, (22 प्रतिशत),
अलफिसॉल (21प्रतिशत),
वरटीसाल (18 प्रतिशत)
40 प्रतिशत
उतरी पहाडी क्षेत्र सरगुजा, कोरिया, जशपुर बलरामपुर अंबिकापुर रायगढ एवं धरंमजयगढ
तहसिल कुछ क्षेत्र तक फैला हुआ है।
28.47 लाख /हे. एण्टीसॉल (13 प्रतिशत),
इन्सेपटीसॉल (28 प्रतिशत),
अलफिसॉल (29 प्रतिशत),
वरटीसॉल (28 प्रतिशत)
7 प्रतिशत
बस्तर का पठार जगदलपुर दंतेवाडा कोण्डागॉव, नारायनपुर बिजापुर सुकमा एवं कुछ भाग कांकेर जिला का इत्यादि। 39.06 लाख/ हे. एण्टीसॉल (26 प्रतिशत),
इन्सेपटीसॅाल (34 प्रतिशत),
अलफिसॉल (25 प्रतिशत),
वरटीसॉल (10 प्रतिशत)
5 प्रतिशत

छत्तीसगढ में पायी जाने वाली मृदाओ की कृषि जलवायु क्षेत्र में अलग अलग नामो से जाना जाता है, जो इस प्रकार है-

छ. ग. की मैदानी क्षेत्र उत्तरीपहाडी क्षेत्र बस्तर का पठार
एण्टीसाल (भाटा) एण्टीसाल (हीली मृदाए) एण्टीसाल (मरहान टिकरा)
इन्सेपटीसाल (मटासी) इन्सेपटीसाल (टिकरा) इन्सेपटीसाल (माल)
अलफिसाल (डोरसा) अलफिसाल (गोडा चवर) अलफिसाल (गभार)
वर्टीसाल (कन्हार) वर्टीसाल (बहरा) वर्टीसाल (गभार)

मृदाओ के भौतिक एवं रासायनिक गुण

विवरण एण्टीसाल(भाटा) इन्सेपटीसाल(मटासी) अलफिसाल(डोरसा) वर्टीसाल(कन्हार)
भौतिक संगठन (प्रतिशत)
बलु
सिल्ट
क्ले
60 -80
15 -22
9- 20
30- 50
30- 40
20 -33
25- 50
25- 30
33- 45
20 -30
20- 30
45 से अद्यिक
स्थूलता घन्तव (ग्राम/ सीसी) 1.76-1.80 1.50- 1.65 1.30- 1.65 1.30-1.60
मृदा गहराइ (सेमीऽ) 5- 30 30- 80 80- 150 150 से अद्यिक
अंतस्यंदन (सेमी/ घंटा) 5- 7 0.6-3 2- 3 2- 2.5
क्षेत्र क्षमता (सेमी.) 5.5 17.4 35 37
मुरझान बिन्दु (सेमी.) 3.37 8.67 17.5 20.2
उपलब्द्य पानी (सेमी.) 2.15 8.67 17.5 16.8
पी.एच. 5.7-6.5 6.5-7 7- 7. 4 7.4- 7.6
कबनिक पदार्थ (प्रतिशत ) 0.27 0.33 0.44 0.67

छ.ग. मे पाये जाने वाली मृदा की विशेषताए-
1. भाटा / जलोढ मृदाये (एण्टीसॉल)- जलोढ मृदाये नदियो के परिहन के दारा एक स्थान पर एक़त्र होने वाली मृदा होती है। इन मृदाओ की गहराई अत्यद्यिक होती है और भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस मृदा को दो बडे भागो मे बाटा गया है- पुरानी एवं नई जलोढ मृदाए पूरानी जलोढ को स्थानीय भाषा मे बांगर कहते है। इसका रंग हल्का तथा बलुई होती है। (चित्र क्र.1) नइ जलोढ को खादर कहते है इनमे क्ले की प्रधानता पायी जाती है। कछार मृदाओ मे नाइटोजन हायूमस और कभी कभी फास्फोरस का अभाव पाया जाता है किन्तु अन्य मृदाओ की अपेक्षा इसमे फास्फोरस की मात्रा पयाप्त होती है। पोटाश की मात्रा काफी होती है। जिसका मात्रा 0.1 से 0.35 प्रतिशत होती है। ये मृदाये गेहूॅ कपास मक्का चना बाजरा गन्ना सब्जियॉ तथा विभिन्न प्रकार के फलो की खेती के लिए उपर्युक्त होती हैं।

(चित्र क्र.1) भाटा / जलोढ मृदाये (एण्टीसॉल)

2. मटासी (इन्सेप्टीसॉल)- इन्सेपटीसॉल को मटासी मृदा भी कहा जाता है इस मृदा कि विशेषताएॅ ये समतल होती है। अविकसीत मृदा होती है। (चित्र क्र.2) मुलायम होने के साथ साथ अचिपचिपा होती है। क्षरण के प्रति संवेदनशील एवं सीमित मात्रा मे जल धारण क्षमता होती है। सिंचाई की उचित प्रबंघन करतने से गेहूॅ, मॅूगफली, सूरजमूखी फसले उगाये जा सकते है।

(चित्र क्र.2) मटासी (इन्सेप्टीसॉल)
3. डोरसा /लाल मृदाए (अलफिसॅाल) – कणाकार हल्का सरंघ्र एवं भुरभूरी संरचना। चूना कंकड तथा स्वतंत्र काबोनेट की अनुपस्थिति। विलेय लवणो कि अल्प मात्रा मे उपस्थिति जिनकी मात्रा अभिक्रिया उदासीन से अम्लीय । नाइटाजन हयूम्स फास्फोरस एवं चूने की कमी । (चित्र क्र.3) इन मिटियो के गुण भिन्न होते है इनका रंग विशेषता लाल होती है । इनमे सिचाई की उचित प्रबंघ होने पर गेंहूँ बाजरा तथा दलहन की खेती की जा सकती है।

(चित्र क्र.3) डोरसा /लाल मृदाए (अलफिसाल)
4. कन्हार /काली मृदाए (वर्टीसाल) – इनकी गहराई एक से दो या कइ फिट तक होति है । कणाकार मे दोमट से लेकर क्ले तक होती है। ये अत्यघिक सघन दृढ तथा कुछ कुछ कंकरीली होती है। गीली मिटटी चिपचिपा होती है गमियो में जल की अघिक मात्रा मे वाष्पीकरण होने से सिकुडन होने लगती है जिससे बडी बडी दरारे पड जाती है दन मृदाओ मे मान्टमोरिलोनाइट तथा वीडेनाइट समूह के खनिज की मात्रा अघिक होती है ।इनमे नाइटाजन काबनिक पदाथ तथा फास्फोरस की मात्राए कम एवं पोटेशियम और चूने की मात्रा अघिक होती है। इनकी जल घारण क्षमता अघिक होती है। (चित्र क्र.4) इसका रंग काला होता है जो टिटैनिफेरस मैग्नेटाइट खनिज की उपस्थिति के कारण होता है। इन मृदाओ मे अघिकतर कपास होती है। इसके अलावा ज्वार, बाजरा, गेंहूँ घनियॉ, प्याज, सब्जियॉ आदि उगाये जाते है।

(चित्र क्र.4) कन्हार /काली मृदाएँ (वटीसाल)

छत्तीसगढ़ हेतु सब्जी आघारित फसलोत्पादन पद्धति

मैदानी भागो हेतु सब्जी आघारित फसलोत्पादन प्रणाली

खेती की स्थिति फसलोत्पादन प्रणाली
भाटा फल वृक्ष आघारित भूमि उपयोग प्रणाली परवल मुनगा कुंदरू
मटासी बैगन-मटर- कददूवगीय सब्जियॉ
टमाटर- घनिया – भिन्डी
हल्दी अदरक – कददूवगीय सब्जियॉ
डोरसा टमाटर- घनिया -लौकी चिकनी तुरइ
कन्हार धान- पत्तेदार सब्जिया – भिन्डी
धान – मटर- भिन्डी

बस्तर पठार के लिए सब्जी आघारित फसलोत्पादन पद्धति प्रणाली

खेती की स्थिति फसलोत्पादन प्रणाली
मरहान टिकरा बाडी जिमीकंद परवल मुनगा कुंदरू सेम खेक्सी कसावा रतालू
माल टमाटर- पत्तागोभी फूलगोभी – बरबटटी
बैगन- धनिया -भिन्उी शकरकेद – मटर – कददूवगीय सब्जियॉ
गभार धान-बरबटटी- भिन्डी
धान- शकरकंद – ग्वार
गभार धान- मिच कुम्हडा
धान – बरबटटी – भिन्डी

छत्तीसगढ के उतरी पहाडी क्षेत्र हेतु सब्जी आघारित फसलोत्पादन प्रणाली

खेती की स्थिति फसलोत्पादन प्रणाली
डांड फल वृक्ष आघारित भूमि उपयोग प्रणाली मुनगा खेक्सी जिमीकंद
चवर मैनपाट फल वृक्ष आघारित भूमि उपयोग प्रणाली
खरीफ आलू-बक व्हीट
मक्का शकरकंद -मटर- खीरा
गादर चवर अदरक – कददूवगीय सब्जिया
मिच- पत्तागोभी फूलगोभी- खीरा
बैगन- प्याज-भिन्उी
बहरा धान- पडत-ग्वार
धान- पडत- चिचिउा

किसान भाइयों के लिए कुछ सुझाव –

  • मृदा परीक्षण के आधार पर खेती सुनिशिचत करनी चाहिए।
  • मृदा परीक्षण के द्धारा मृदा की पोषक तत्व की कमी या अधिकता की जानकारी मिल जाती है जिससे फसलउत्पादन को बढाया जा सकता है।
  • किस प्रकार की मृदाए मे कौन सी फसल उगाये जाते है इसकी जानकारी फसल उत्पादन मै महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

Chhattisgarh Krishi Vaniki

’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ मासिक पत्रिका जो ग्रामीण एवं कृषि विकास पर आधारित है, जिसका प्रकाशन निरंतर रायपुर से किया जा रहा है ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ में तकनीकी आलेख एवं रचनात्मक समाचारों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। इस पत्रिका का पाठक विशेष कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ है तथा ग्रामीण अंचलों में जागरूकता का छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी सशक्त माध्यम है। ’’छत्तीसगढ़ कृषि वानिकी’’ एक ऐसी पत्रिका है जो सुदूर अंचलों के किसानों को कृषि, वानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन, वनोऔषधि आदि की नई तकनीकी जानकारी के साथ-साथ राज्य शासन की जनहितकारी नीतियों, निजी क्षेत्र के उद्यमियों के गतिविधियों/कार्यो की जानकारी उपलब्ध कराती है।

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